विलियम डेलरिम्पल की दिल्ली

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विलियम डेलरिम्पल द लास्ट मुगल के कारण चर्चा में रहे। बरसों पहले उन्होंने दिल्ली पर सिटी ऑफ जिन्स(जिन्नों का शहर), ए ईयर इन दिल्ली नामक पुस्तक लिखकर ख्याति अर्जित की थी। उसके बाद दिल्ली के इतिहास से जैसे उनको प्यार हो गया। उनकी व्हाइट मुगल नामक पुस्तक की पृष्ठभूमि भी दिल्ली ही है।
यह अंश सिटी ऑफ जिन्स(जिन्नों का शहर) से- जानकी पुल.





जिन्नों के शहर दिल्ली में
दिल्ली में खंडहरों ने मुझे बहुत आकर्षित किया। शहर नियोजकों ने कंक्रीट की नई बस्तियाँ बसाने की बड़ी कोशिशें कीं, लेकिन उनके बीच किसी चौराहे पर, किसी पार्क में पुरानी ढहती मीनारों, पुरानी मस्जिदें या मदरसों के दर्शन हो ही जाते हैं। इसकी फ़सीलें अनेक राजवंशों की क़ब्रिस्तानों पर खड़ी हैं। कुछ लोगों के अनुसार दिल्ली शहर सात बार बना-उजड़ा। यह आठवाँ है। कुछ लोग इसकी संख्या पंद्रह मानते हैं तो कुछ इसकी संख्या इक्कीस तक ले जाते हैं। वैसे इस बात को लेकर सब सहमत हैं कि इस शहर के ढहते खंडहरों की संख्या असंख्य हैं।
लेकिन दिल्ली इस मामले में अनूठा है कि इस शहर में इधर-उधर इंसानी खंडहर भी बिखरे हुए हैं। ऐसा लगता है कि दिल्ली के अलग-अलग इलाकों ने अलग-अलग शताब्दियों के वजूद को संभाल कर रखा है, यहाँ तक कि अलग-अलग सहस्त्राब्दियों को भी। आज के लिए उसकी कसौटी पंजाबी शरणार्थी हैं, छोटी मारुति कारों और हर नई चीज़ की ओर आकर्षित होने वाले, उन्होंने अस्सी के दशक में दिल्ली की जीवनरेखा बनाई। लोदी गार्डेन में टहलते आपको ऐसे बुजुर्ग मिल जाएँगे जिनकी बातचीत, शैली से आपको यह अहसास हो जाएगा कि वे 1946 में ही फँसे हुए हैं यानी भारत की आज़ादी से पहले के दौर में। पुरानी दिल्ली के हिजड़े, उनमें से कुछ तो दरबारी उर्दू बोलते हैं, महान मुगलों की छाया में वे भी इस शहर में बेगाने नहीं लगते। निगमबोध घाट के साधुओं के बारे में मैंने कल्पना की कि वे इंद्रप्रस्थ के बेचारे नागरिक हैं, महाभारत की पहली दिल्ली के।
महीनों बाद जब मेरी मुलाकात पीर सदरुद्दीन से हुई तब जाकर मुझे उस रहस्य का पता चला जिससे दिल्ली में बार-बार जान लौट आती थी। दिल्ली, पीर सदरुद्दीन ने बताया, जिन्नों का शहर है वैसे तो आक्रमणकारियों ने इसे कई बार जला डाला, मगर यह शहर फिर बस गया, फीनिक्स पक्षी की तरह यह अपनी ही आग से बार-बार पैदा होता रहा। जैसी कि हिंदुओं में मान्यता है शरीर का तब तक पुनर्जन्म होता रहता है जब तक कि उसे मोक्ष नहीं मिल जाता, उसी तरह दिल्ली की किस्मत में हर शताब्दी में नए अवतार में प्रकट होना बदा था। इसका कारण यह है, सदरुद्दीन ने बताया, कि जिन्नों को दिल्ली से इतना प्यार है कि वे इसे खाली या उजाड़ नहीं देख सकते। आज भी वे हर घर में, सड़क के हर नुक्कड़ पर मौजूद हैं, बस आप उनको देख नहीं सकते, सदरुद्दीन ने बताया।
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उस साल गर्मियों में दिन की झुलसा देने वाली गर्मी के बाद शाम को चलने वाली हवाओं से मौसम की गर्मी जब कुछ कम हो जाती तब मैं और ओलिविया(लेखक की पत्नी) अक्सर टहलते हुए निज़ामुद्दीन दरगाह चले जाते। वहां हम कव्वाली सुनते और तीर्थयात्रियों से बातें करते।
यह समझने में मुझे देर नहीं लगी कि दरगाह पर आने वाले ज्यादातर तीर्थयात्रियों के लिए निज़ामुद्दीन सदियों पहले मर जाने वाले औलिया नहीं थे, वे उन्हें अभी भी जीवित शेख समझते हैं, जिनसे मदद और सलाह अभी भी ली जाती है। एक बार कव्वाली सुनते हुए मैंने डॉ. जाफरी से पूछा कि क्या ऐसा सामान्य तौर पर माना जाता है।
पीर-पैगंबर कभी मरते नहीं, उन्होंने कहा। हमारा शरीर-आपका शरीर तो गल जाएगा। लेकिन पीरों के साथ ऐसा नहीं होता। वे बस परदे के पीछे ओझल हो जाते हैं।
लेकिन आप यह सब कैसे जानते हैं, मैंने पूछा।
बस अपनी आँखों का इस्तेमाल कीजिए! अपने आसपास देखिए, डॉ. जाफरी ने कहा। इस अहाते में एक बादशाह की मजार है- मोहम्मद शाह रंगीला की और एक शाहजादी की भी मजार है- जहांआरा की। सड़क की दूसरी ओर एक और बादशाह का मकबरा है- हुमायूं का। ये दोनों मकबरे निज़ामुद्दीन के मकबरे से ज्यादा खूबसूरत हैं, लेकिन उनको देखने कौन जाता है! केवल सैलानी। जो हँसते हैं, आईसक्रीम खाते हैं और जब मकबरे के अंदरख़ाने जाते हैं तो जूते उतारने के बारे में सोचते भी नहीं हैं।
जबकि यह जगह अलग तरह की है। निज़ामुद्दीन की दरगाह पर किसी को बुलाया नहीं जाता। यह एक गरीब आदमी की मज़ार है जो गुरबत में मरा। तो भी यहाँ हजारों लोग रोज़ आते हैं, अपने आँसू और जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद लेकर। कुछ तो है कि लोग निज़ामुद्दीन के गुजरने के छह सौ साल के बाद उसकी दरगाह पर आ रहे हैं। जो भी यहाँ आता है उसे औलिया की मौजूदगी यहाँ बड़ी शिद्दत से महसूस होती है।
निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह की देखभाल करने वाले पीरज़ादा निज़ामुद्दीन की बड़ी बहन के वंशज हैं। जब उनसे जान-पहचान हो गई तो उन्होंने अपने पुरखों की कहानियाँ सुनानी शुरू कर दीं।
निज़ामुद्दीन के दीदार आपको तभी हो सकते हैं जब आपका दिल साफ हो, एक दिन हसन अली शाह निज़ामी ने बताया, जब एक शाम हम मज़ार की फर्श पर बैठे थे। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी इबादत में कितनी तासीर है। कुछ उन्हें मज़ार पर बैठा देखते हैं। कोई यह देखता है कि वे दरगाह का चक्कर लगा रहे हैं। किसी को वे सपने में दीदार देते हैं। इसका कोई बंधा-बंधाया नियम नहीं है। चूँकि वे मिट्टी के इस तन से आजाद हो चुके हैं इसलिए हमारे बंधनों का उनके ऊपर कोई असर नहीं होता।
क्या आपने उनको कभी देखा है, मैंने पूछा।
अपनी इन आँखों से नहीं, निज़ामी ने जवाब दिया। लेकिन कभी-कभी जब मैं किसी इंसान का इलाज कर रहा होता हूँ या किसी बदमाश जिन्न को भगा रहा होता हूँ तब मैं उनका नाम पुकारता हूँ और तब मुझे उनकी मौजूदगी महसूस होती है…ऐसा है जैसे मैं कोई बाँसुरी होऊँ, अपने आपमें कुछ भी नहीं।
निज़ामी ने यह बताने के लिए कि निज़ामुद्दीन किस तरह अपनी दरगाह की देखभाल करते हैं यह किस्सा सुनाया। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि केवल पीरज़ादे ही अपने पूर्वजों की मज़ार की सफाई कर सकते हैं। एक रात जिस मुहाफिज़ की बारी थी वह पास में ही खेले जा रहे एक नाटक को देखना चाहता था, इसलिए उसने मज़ार की सफाई का जिम्मा अपने एक दोस्त को सौंप दिया। जब पीरज़ादा लौटकर आया तो उसने देखा कि उसका दोस्त चित्त पड़ा है और झाड़ू उसके हाथ में ही है। उसने अपने साथियों को आवाज़ देकर बुलाया और सबके साथ मिलकर उसे खींचकर बाहर लाए, उसके चेहरे पर पानी के छींटे डाले। उसने बताया कि किस तरह उसने मज़ार की सफाई शुरू की कि उसने देखा मज़ार से एक बड़ी तेज़ रोशनी उठी और वह गिर गया। उसे इसके बाद कुछ भी याद नहीं। पीरज़ादे को अपनी गलती का अहसास हो गया।
निज़ामुद्दीन की दरगाह पर जुटने वाले दरवेशों और वहाँ के पीरज़ादों से बातें करते हुए मैंने कई शामें बिताईं।

4 COMMENTS

  1. बहुत बढ़िया तोहफा दिल्ली की सालगिरह पर.. पूरी किताब पढ़ने का मन हो आया

  2. बेहतरीन और सामयिक पोस्ट. वैसे यह जानने की जिज्ञासा है कि यह अनुवाद किसका है और यह किताब हिन्दी में प्रकाशित हो चुकी है या नहीं? इस पोस्ट के लिए आपका आभार!!!

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