रिक्शे पर सवार जी. बी. रोड

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गार्सटिन बैसन रोड अंग्रेज कलेक्टर के नाम रखी इस सड़क को लोग जी. बी. रोड के नाम से अधिक जानते हैं। लाल किला, कुतुबमीनार, जंतर मंतर, चांदनी चौक, कनॉट प्लेस की तरह यह भी दिल्ली की पहचान का पुराना और अहम हिस्सा है। उसकी पुरानी रवायत का एक ऐसा बदनाम सफा जिसके बारे में जानना तो सब चाहते हैं मगर बात कोई नहीं करना चाहता।

अब देखिए न पहचान बदलने के खयाल से सरकार ने सोचा नाम बदल दिया जाए। नाम रखा गया श्रद्धानंद मार्ग। पैंतालीस साल हो गए, नाम आज तक लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ा। यह अलग बात है कि सड़क के निशान, दुकानों के नामपट्ट सब इसका पता श्रद्धानंद मार्ग ही बताते हैं। लेकिन… कलेक्टर गार्सटिन साहब जरूर नेकदिल इंसान रहे होंगे, तभी तो आज तक उनका नाम लोगों की जुबान से नहीं उतरा।

अंग्रेज चले गए रोड छोड़ गए…

जी. बी. रोड की तफरीह न सही सैर करनी हो तो रिक्शे की सवारी ही सबसे शान की सवारी है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन या नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के बाहर निकलकर कमला मार्केट चौक पर आइए। दस रुपए देकर रिक्शे पर बैठिए खारी बावली के लिए, मसाले, ड्राई फ्रूट के बडे थोक बाज़ार के लिए। बीच में करीब तीन किलोमीटर लंबी सड़क आती है जो जी. बी. रोड मेरा मतलब है श्रद्धानंद मार्ग कहलाती है। हार्डवेयर के इस मशहूर मार्केट में आगे चलकर बीस इमारतें आती हैं, जिनकी पहली और दूसरी मंजिल के तकरीबन सौ कोठों(अब ९६ हैं, कुछ साल पहले तक इन कोठों की संख्या १०८ थी) के कारण ही जी. बी रोड की असली शोहरत और बदनामी है। शाम ढलने के बाद नीचे दुकानों के शटर गिरने लगते हैं, ऊपर की मंजिलों के झरोखे रोशन होने लगते हैं। झरोखों से इशारे करती लड़कियां बता देती हैं जी. बी. रोड की रुसवाई का चर्चा क्यों है। शाम के बाद कमला मार्केट चौक से खारी बावली तक की गई यात्रा की झुरझुरी याद रह जाती है।

१९८८ में पहली बार यह यात्रा पाँच रुपए की पड़ी थी। २०-२१ सालों में बस पाँच रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है। पुरानी दिल्ली की ज्यादातर सड़कों की तरह यह सड़क भी अक्सर जाम मिलती है। सबसे सहूलियत रिक्शे की सवारी में है, जाम में फंस गए तो ऊपर के नजारे लिजिए। तब बीए में पढ़ने दिल्ली आया था, पुरानी दिल्ली की रहस्यमयी दुनिया के आकर्षण में हम ऐतिहासिक गलियों की खाक छानते भटकते रहते। दिल्ली विश्वविद्यालय कैंपस पुरानी दिल्ली के पास ही था मेरा मतलब है। बाद में अनेक बार पत्रकार के रूप में स्टोरी की तलाश में इधर भटका किया। इधर कुछ वर्षों से इसके पास ही दिल्ली के एक रवायती कॉलेज जाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ाने के कारण भी इस सड़क से गुजरने का सौभाग्य मिलता रहा है। रिक्शे में बैठकर!

रिक्शेवाले इस रोड की समझ लिजिए जान हैं। नई दिल्ली रेलवे स्टेषन, कमला मार्केट, नया बाजार, सदर बाजार सब मिलाकर इधर करीब एक हजार रिक्शेवाले होंगे। वैसे जब से चांदनी चौक में रिक्शे का चलना बंद हुआ है तबसे इन इलाकों में रिक्शेवालों की तादाद बढ़ गई है। जी. बी. रोड के जीवन से गहरा रिश्ता इन रिक्शेवालों का है। शाम ढलने के बाद ज्यादातर कस्टमर इन पर सवार होकर ही आते हैं। दिन के वक्त इन कोठेवालियों का सबसे बड़ा सहारा भी रिक्शेवाले ही बनते हैं।

यह दिलचस्प है कि औरतों के इतने बड़े बाजार होने के बावजूद यहाँ एक ब्यूटी पार्लर तक नहीं है। दिन के वक्त ऊपर रहने वाली औरतें उतरती हैं और चुपचाप इन्हीं रिक्शों पर सवार होकर पुरानी दिल्ली के दूसरे बाजारों में सौदा-सुलुफ करने के लिए निकल जाती हैं। उन बाजारों में जहाँ उनको कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता। आसपास के उन दुकानों, बाजारों में वे नहीं दिखाई देती हैं जो उनके ही दम से चल रही हैं। सब्जी तक खरीदने के लिए वे सीताराम बाजार जाती हैं। कम से कम चार किलोमीटर दूर। एक हनुमान मंदिर, चार मस्जिद होने के बावजूद ये कोठेवालियां इबादत के लिए भी यहां के इबादतखानों में नहीं जातीं। उनके भगवान भी यहां से दूर ही बसते हैं…

वैसे बाजार सीताराम से दुकानदारी के उनके इस रिश्ते की कहानी पुरानी दिल्ली वाले दूसरी ही बताते हैं। बीसवीं शताब्दी की आजादी के कुछ साल पहले तक आज कागज वगैरह के बड़े बाजार के रूप में प्रसिद्ध चावड़ी बाजार में तवायफों का कोठा था। आज भी चावड़ी बाजार के ऊपरी मंजिलों के झरोखों को देखकर सहसा जी. बी. रोड के कोठों की याद आ जाती है। वैसे ही झरोखे, वैसी ही झिरियां। तब सीताराम बाजार के पास होने से वहां की तवायफों को सीताराम बाजार में जाने की आदत पड़ गई। बाद में सरकार ने जिस्म के इस बाजार को आबादी से दूर थोक बाजारों के इस गोल में लाकर बसा दिया। पचास-साठ साल हो गए, पीढ़ियां आईं-गईं, लेकिन सीताराम बाजार जाने की आदत नहीं गई। आपने भी सुना होगा पुरानी आदतें जाती नहीं हैं।

बाहर से आने वाले यहां गर्दन ऊपर उठाकर चलते हैं, लेकिन यहां की कोठेवालियां रिक्शे पर बैठकर गर्दन झुकाए गुजर जाती हैं। अपने मुहल्लेवालों से शायद शर्म आती हो। कई बार जब कोई लड़की कोठे से भागती है तो अक्सर इन्हीं रिक्शों पर सवार होकर निकल जाती हैं। पिछले दिनों जब अखबार में यह खबर पढ़ी कि जी. बी. रोड के इलाके में दो पुलिस वालों की हत्या हो गई और पुलिस वालों ने हत्यारों की तलाश में सारे इलाके को घेर लिया था। एक अखबार में लिखा था पुलिसवालों का झगड़ा कोठा नंबर ६४ में हुआ था। कोठा नंबर ६४ का जिक्र पढ़कर पिछले साल की रिक्शा यात्रा और रिक्शेवाले से हुई बात याद आ गई – सबसे नामी कोठा है ६४ नंबर। वहां तो एसी भी है, विदेशी कस्टमर आते हैं। वैसे ज्यादा काले विदेशी ही होते हैं – अफ्रीका वाले। वहां का रेट भी हाई है! कोठा नंबर ६४ जी. बी. रोड के हाई-फाई कल्चर का प्रतीक है।

असल में बीस इमारतों और ९६ कोठों वाले इस बाजार में अमीर-गरीब की खाई है। कमला मार्केट की तरफ रिक्शे पर करीब आधी दूरी तय करने के बाद हनुमान मंदिर आता है। कोठा नंबर ६४ उसके बाद पड़ता है। हनुमान मंदिर के दूसरी तरफ की कोठेवालियों की इसक कुछ ज्यादा है क्योंकि उनमें ज्यादातर गोरी लड़कियां धंधा करती हैं – जी. बी. रोड पर धंधे के लिए लाई जाने वाली लड़कियों में बड़ी तादाद नेपाल, आसाम से आई लड़कियों की है, उनमें से अधिकतर हनुमान मंदिर के दूसरी ओर के कोठों में पाई जाती हैं। उनकी तलाश में इधर शहर के रईसजादों की आमदरफ्त भी लगी रहती है। रिक्शे पर बैठकर…

मंदिर के इधर वाली बाइयों का रेट कम से कम २०० तक भी हो सकता है तो मंदिर के उधर की गोरी लड़कियां एक-एक ग्राहक से दो-दो हजार तक वसूल लेती हैं। कोठा नंबर ६४ से ध्यान आया करीब दो साल पहले पुलिस ने जी. बी. रोड पर छापा मारकर करीब दो सौ कमसिन लड़कियों को मुक्त करवाया था। सबसे ज्यादा ४० नेपाली लड़कियां कोठा नंबर ६४ से मुक्त करवाई गई थीं। तब एक रिक्शेवाले ने ही इलाके में काम करने वाले एक एनजीओ को उस कोठे में रहने वाली कम उम्र की लड़कियों के बारे में बताया था, शक्तिवाहिनी नामक उस संस्था के दबाव पर पुलिस ने कोठों पर छापा मारा था।

इंटरनेट और मोबाईल फोन के इस दौर में जिस्म का व्यापार भी हाईटेक हो गया है। जी. बी. रोड पर भी इसका असर पड़ रहा है। यहां धीरे-रिक्शेवालों की मिल्कियत खत्म होती जा रही है। अब ऑटोरिक्शे की आमद इस इलाके में बढ़ने लगी है। कोठेवालियां मोबाईल पर कस्टमर से सौदा तय करती हैं और बन-संवरकर ऑटो में सवार होकर किसी अनजान स्थान के लिए निकल पड़ती हैं। अब यहां आना ग्राहकों के लिए पहले जैसा निरापद नहीं रहा। जी. बी. रोड गांजा, चरस, स्मैक जैसे नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार का भी बड़ा सेंटर बन चुका है। इसकी वजह से यहां अपराध की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। पहले कस्टमर के जान-माल का ध्यान कोठेवालियां और उनके दलाल रखते थे क्योंकि उनसे ही उनकी रोजी-रोटी चलती है। अब दलाल ही उनको लूटने लगे हैं। इसलिए लोग यहां आने से घबड़ाने लगे हैं। लड़कियों के लिए भी बाहर जाना फायदे का सौदा लगने लगा है। एसी रूम मिलता है, अच्छा पैसा मिलता है। इसलिए उनके व्यापार को अब रिक्शेवाले से अधिक अधिक ऑटोवाले भइया भाने लगे हैं। वे ही उनके लिए कस्टमर भी तय करते हैं, उनको गाड़ी में बिठाकर ले जाते हैं, फिर वापस भी छोड़ जाते हैं।

लेकिन ऑटो में वह मजा कहां जो रिक्शे में है। रिक्शे पर बैठकर तो खुला आसमान दिखाई देता है, झरोखे से झांकती, इशारे करती लड़कियां भी। रिक्शे पर बैठकर यहां से गुजरने का खयाल बुरा नहीं है… शाम के बाद… जब हार्डवेयर बाजार बंद होने लगता है… नषेड़ियों, भिखमंगों, पुजारियों, व्यापारियों, ठेलेवाले, चाट-खोमचेवालों की भीड़ और उनके बीच टुनटुन घंटी बजाकर जगह बनाता रिक्शा...

4 COMMENTS

  1. दिल्ली में इतने दिनों रह कर जिस गली में जाने का मौका नहीं मिला वहा आपके साथ रिक्शे में घूम कर बड़ा बढ़िया लगा. शुक्रिया .

  2. बहुत बेहतर लेख-संस्मरण है। मजा आगया पढकर, जानता था जी बी रोड के बारे में लेकिन उधर कभी गया नही लेख पढकर लगा वही से होकर आ रहा हूँ।

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