उर्दू के मशहूर शायर और गमन, उमराव जान जैसी फिल्मों के मानीखेज़ गीतों के गीतकार शहरयार को देश में साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है. आइये इस मौके पर उनकी कुछ ग़ज़लों से रूबरू होते हैं.
१.
मिशल-ए-दर्द फिर एक बार जला ली जाए,
जश्न हो जाए ज़रा धूम मचा ली जाए.
खून में जोश नहीं आया ज़माना गुज़रा,
दोस्तो आओ कोई बात निकाली जाए.
जान भी मेरी चली जाए तो कुछ बात नहीं,
वार तेरा न मगर एक भी खाली जाए.
जो भी मिलना है तेरे दर से ही मिलना है उसे
दर तेरा छोड़ के कैसे ये सवाली जाए.
वस्ल की सुबह को होने में है कुछ देर अभी,
दास्ताँ हिज्र की कुछ और बढ़ा दी जाए.
२.
जिंदगी भेस नए शामो-सहर बदला की,
आंख का काम था बस देखना वो देखा की.
रंग-ए-वहशत से सभी रंग बहोत धुंधले थे,
शहर का खाका था तस्वीर बनी सहरा की.
प्यास का क्या था सराबों से भी बुझ सकती थी,
याद आती रही हर आन मगर दरिया की.
कतरा-ए-अश्क से आँखों का भरम बाकी है,
छीन ले जाए न उसको भी हवा दुनिया की.
ता न फिर खोशा-ए-गंदुम से पशेमानी हो,
दिल में हर शख्स ने जीने की हवस पैदा की.
३.
हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के
आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के
इक बूँद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिंझोड़ के
इन पानियों से कोई सलामत नहीं गयाकोई नहीं जो हम को जगाये झिंझोड़ के
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के.
४.
कहीं ज़रा सा अँधेरा भी कल की रात न था
गवाह कोई मगर रौशनी के साथ न था।
सब अपने तौर से जीने के मुद्दई थे यहाँ
पता किसी को मगर रम्ज़े-कायनात न था
कहाँ से कितनी उड़े और कहाँ पे कितनी जमे
बदन की रेत को अंदाज़-ए-हयात न था
मेरा वजूद मुनव्वर है आज भी उस से
वो तेरे कुर्ब का लम्हा जिसे सबात न था
मुझे तो फिर भी मुक़द्दर पे रश्क आता है
मेरी तबाही में हरचंद तेरा हाथ न था.
गवाह कोई मगर रौशनी के साथ न था।
सब अपने तौर से जीने के मुद्दई थे यहाँ
पता किसी को मगर रम्ज़े-कायनात न था
कहाँ से कितनी उड़े और कहाँ पे कितनी जमे
बदन की रेत को अंदाज़-ए-हयात न था
मेरा वजूद मुनव्वर है आज भी उस से
वो तेरे कुर्ब का लम्हा जिसे सबात न था
मुझे तो फिर भी मुक़द्दर पे रश्क आता है
मेरी तबाही में हरचंद तेरा हाथ न था.

अच्छा है और अपना है....
ReplyDelete'दास्ताँ हिज्र की कुछ और बढ़ा दी जाए'...........बहुत खूब!! अच्छा चयन है!
ReplyDeleteप्रभात भाई, शहरयार साहब की रचनाएँ पढ़वाने का शुक्रिया।
ReplyDeleteवाक़ई ये अच्छा काम किया है आपने प्रभात जी। वैसे शहरयार की एक ग़जल है--
ReplyDeleteएक ही धुन है कि इस रात को ढलता देखूं
अपनी इन आंखों से सूरज को निकलता देखूं
आपके पास है क्या...