बिना अपनी परम्परा को जाने उससे विद्रोह की बात काफी निरर्थक लगती है

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मनोहर श्याम जोशी के जन्मदिन पर प्रस्तुत है यह साक्षात्कार जो सन २००४  में आकाशवाणी के अभिलेखगार के लिए की गई उनकी लंबी बातचीत का अंश है. उसमें उन्होंने अपने जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को लेकर बात की थी। यहां एक अंश प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने अपने जीवन और लेखन के कुछ निर्णायक पहलुओं को लेकर खुलकर बातें की हैं. पूरी ईमानदारी से. उनके अपने शब्दों में कहें तो बायोग्राफी पॉइंट ऑफ व्यू से- प्रभात रंजन
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प्रश्न- आपके उपन्यास हों चाहे सीरियल उनमें चरित्र-चित्रण भी जबर्दस्त होता है और किस्सागोई भी सशक्त होता है। भाषा पात्रों के अनुकूल होती है। बड़ा जीवंत परिवेश होता है. यह गुण आपको कहाँ से मिला?
  
जोशीजी- माँ से। बल्कि मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हालांकि मेरी माँ कभी स्कूल नहीं गई मुझे अपना बुनियादी साहित्य-संस्कार और तेवर उसी से विरासत में मिला है। उसे पढ़ने की इतनी ललक थी कि उसने भाइयों की किताबें देख-देखकर स्वयं को अक्षर ज्ञान कराया। धार्मिक ग्रंथ ही नहीं उपन्यास भी वह बहुत चाव से पढ़ती थी। शरत साहित्यरवीन्द्र साहित्यचंद्रकांतासरस्वती सीरिज की किताबें ये सब हमारे घर में हुआ करती थी। प्रसंगवशमेरे एक मामा लक्ष्मीदत्त जोशी को हिन्दी साहित्य के कुछ इतिहासों में बांग्ला साहित्य के हिन्दी में अनुवाद करने के लिए औरजवाकुसुम नामक एक उपन्यास लिखने के लिए याद किया गया है। मतलब यह कि ननिहाल में अच्छा साहित्यिक माहौल था। 

मेरी माँ कुशल किस्सागो और नक्काल थी। हर घटना का वह बहुत ही सजीव वर्णन करती थी और उसके बीच-बीच में पात्रों के संवादों के हूबहू नकल उतारकर प्रस्तुत किया करती थी। हमारे यहां बारात के रवाना हो जाने के बाद रतजगे में मेरी माँ के आइटमों की धूम रहती थी। हम सब भाई-बहनों को घटनाओं का सजीव वर्णन करने का और उससे संबद्ध लोगों की नकलें उतार सकने का गुण अपनी माँ से विरासत में मिला है। मैं खुद ही कितनी ही आवाजें बदल करके और कितनी ही आवाजों में बोल सकता हूं। जवानी के नादानी भरे दिनों में इस क्षमता का मैंने टेलिफोन पर मित्रों को बेवकूफ बनाने में अक्सर दुरुपयोग किया। आज जब मेरा सबसे छोटा बेटा फोन पर इस तरह बेवकूफ बनाता है तो जबर्दस्त खीज होती है। 

प्रश्न- आपकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य प्रबल होता है। आपे नेताजी कहिन जैसा व्यंग्य का लोकप्रिय स्तंभ लिखा। तो दूसरी तरफ आपके उपन्यासों में इसी व्यंग्य के साथ एक त्रासदी भी चलती रहती है। यह नजरिया आपने कहां से पाया?

जोशीजी- अपनी मां से ही। उनका व्यक्तित्व विचित्र प्रकार का था। एक तरफ वह बहुत धर्मपरायण और धर्मभीरु महिला थीं। निहायत दबी-ढकीनपी-तुली जिंदगी जीने वाली। हमें धर्मभीरुता का संस्कार भी उसी से मिला। उसी के चलते अपने तमाम तथाकथित विद्रोह के बावजूदजनेऊ को कील पर टांग देने और मुसलमानों के घड़े से पानी पी लेने के बावजूद कर्मकांड को कभी पूरी तरह से अस्वीकार नहीं कर पाया हूं। और इस मामले में मेरी माननेवालों और न माननेवालों के बीच की स्थिति बन गई।

एक ओर मेरी मां का व्यक्तित्व दबा-ढका था तो दूसरी ओर इतने जबर्दस्त ढंग से खिलंदड़ भी कि मध्यवर्गीय मानकों की ऐसी-तैसी कर जाए। खुद अपना और दूसरों का हास्यास्पद पक्ष उसे साफ नजर आता था। उस पर वह खिलखिलाकर हंस सकती थी और हंसा भी सकती थी।

वे बहुत ऊंचे परिवार की थी। दीवान-राठ थे मेरे ननिहाल वाले। गोया उस परिवार केजिसके सदस्य राजाओं के दीवान होते आए थे। मेरे मां के परदादा थे हर्षदेव जोशी जिनका कुमाऊंगढ़वालहिमाचल प्रदेश और रूहेलखंड के ब्रिटिशकालीन इतिहास में जिक्र आता है- कहीं नायक और कहीं खलनायक के रूप में। वे पंडितराजनीतिज्ञ कूटनीतिक और सेनापति सभी कुछ थे। वे बराबर इस जोड़-तोड़ में रहे कि कुमाऊं के शासन की बागडोर कुमाउंनियों हाथ में आ जाए। इसीलिए जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने गोरखाओं से दगा करके अंग्रेजों का साथ दिया। उन्हें गोरखाओं को हराने की विधि बताई। लेकिन इससे कुमाऊं का राज कुमाउंनियों को मिलने के बजाय अंग्रेजों को मिला। उनकी गिनती गद्दारों में हुईं वे राजनीति से विरक्त होकर आध्यात्म की शरण में गए। 

प्रश्न- आपने हर्षदेव जोशी के चरित्र का कोई आधार बनायाकभी उनके बारे में कुछ लिखने के बारे में सोचा?

जोशीजी- मैं हर्षदेव जोशी को लेकर एक नाटक लिखना चाहता था लेकिन मैं उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का काम ही पूरा नहीं कर सका। कहा जाता है कि हर्षदेव जोशी को किसी ने वंश-नाश का शाप दिया था। मेरे ननिहाल में पुत्र बहुत कम हुए और उस वंश का जो ताजातरीन इकलौता मर्द वारिस है-मेरे मामा का पोता- उसके कोई पुत्र नहीं है। इसलिए लोग कहते हैं श्राप पूरा हो गया। मिथकीय किस्म के कैरेक्टर थे लेकिन उन पर कुछ लिखना नहीं हो पाया।
प्रश्न- आपने अपने पिता के बारे में विस्तार से नहीं लिखा है। केवल कुरु कुरु स्वाहा में उनके बारे में कुछ सूचनाएं आती हैं?

जोशीजी- मैं कुल 7-8 बरस का था जब मेरे पिता गुजर गए। इसलिए मैं उन्हें एक अनुपस्थिति के रूप में ही जानता हूं। एक ऐसी अनुपस्थिति जिसे मैंने उनके बारे में अपनी चंद यादों सेघर में उपलब्ध उनके चित्रों से और दूसरी सुनी-सुनाई बातों से- जो अक्सर परस्पर विरुद्ध होतीं मैंने दूर करने की कोशिश की। अपने पिता के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी मुझे अपने भाई साहब से प्राप्त हुई। विडंबना यह है कि हम भाइयों में पिता के बारे में लंबी बातचीत तब हुई जब वह गंभीर रूप से बीमार थे। उनका इरादा पिता और अन्य पूर्वजों को लेकर एक वृहद उपन्यास लिखने का था। दुर्भाग्य से उसी बीमारी में उनकी असमय मृत्यु हो गई।
प्रश्न- आपके पिता की आपके अंदर कैसी छवि रही है?
जोशीजी- मेरे पिता राय साहब प्रेमवल्लभ जोशी कद-काठी, आवाज़, उपलब्धि हर दृष्टि से बहुत रोब-दाब वाले आदमी थे. गोया उनके बच्चों के लिए उनसे प्रभावित होने से ज्यादा उनसे आतंकित होने वाली स्थिति थी. मेरे भाई दुर्गादत्त एक तरह हमारे पिता की छवि से लड़ते हुए या होड़ करते हुए अपना जीवन बर्बाद करते रहे और असमय गुजर गए.
प्रश्न- रोब-दाब माने? क्या वे बहुत गुस्सैल थे?

जोशीजी- सवाल उनके गुस्सैल होने का नहीं है. इस बात का भी नहीं कि अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद अधेडावस्था में मारे भग्नाशा के वे शराबी ही गए थे. सवाल है उनकी बहुमुखी प्रतिभा और उपलब्धियों का, जिनके सामने दूसरे लोग बौने नज़र आते थे. सवाल है उनके दबंग व्यक्तित्व का, उनकी महत्वाकांक्षा और आगे बढ़ने की धकापेल कोशिशों का. उनके सामने औसत दबा-ढका जीवन जीने वाले मध्यवर्गीय लोग हीन भावना का शिकार हो सकते थे. हमारे कुटुंब में वे पहले व्यक्ति थे जो प्रसिद्ध हुए. इसलिए उन्हें लगभग मिथकीय दर्ज़ा मिला परिवार-गाथा में. वे इतने योग्य माने गए कि हम उनके अयोग्य पुत्र-पुत्री ही हो सकते थे. आज भी परिवार के बुज़ुर्ग लोग जब पिता की चर्चा मेरे सामने करते हैं तो उसमें यह ध्वनि ज़रूर होती है कि बेटा हीरो तू अपने बाप के मुकाबले में जीरो है. 

प्रश्न- आपने कहा कि आपके पिता प्रसिद्ध हुए, किस क्षेत्र में उनको प्रसिद्धि मिली?

जोशीजी- एक नहीं अनेक क्षेत्रों में. कुमाऊँनी ब्राह्मणों में पिछली सदी से ही आधुनिक शिक्षा का खूब प्रचार-प्रसार रहा था. मेरे पिता पढ़ने में बहुत होशियार थे और अल्मोड़ा से विज्ञान में इंटरमीडिएट करके आगे की पढाई के लिए उस समय इलाहाबाद गए जब वहाँ विश्वविद्यालय नहीं था केवल म्योर सेंट्रल कॉलेज था जो कलकत्ता विश्वविद्यालय की परीक्षा दिलवाता था. मेरे पिताजी ने बीएससी तब किया जब भारत में स्नातक इतने कम होते थे कि ग्रेजुएट असोसिएशन ऑफ इंडिया जैसी एक संस्था हुआ करती थी. मेरे पिता की विज्ञान में गहरी रुचि थी और उन्होंने उसी ज़माने में अपने सहपाठी डॉ. गोरख प्रसाद के साथ मिलकर प्रयाग विज्ञान परिषद की स्थापना की थी. उन्होंने तब पदार्थों के स्वभाव और गुण नामक एक पुस्तक लिखी थी जो शायद हिंदी में लिखी हुई विज्ञान की सबसे पुरानी पुस्तकों में से हो. तभी उन्होंने स्कूली छात्रों के लिए हिंदी में विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें लिखी थी जो नवल किशोर बुक डिपो ने छापी थी.

बहरहाल, मेरे पिता स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए क़ानून का विषय लेना चाहते थे. उनका ख़याल था, उनके प्रशंसकों का आज भी है कि अगर वह एलएलबी कर लेते तो न केवल नामी वकील बनते बल्कि अपने एक अन्य सहपाठी गोविन्दवल्लभ पन्त की तरह चोटी के नेता भी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में उन्होंने अपनी आधुनिकता का परिचय देने के लिए अल्मोड़ा के भरे बाज़ार में अनुसूचित जाती की तब एकमात्र पढ़ी-लिखी महिला से हाथ मिला लिया और ब्राह्मणों के रोष से बचने के लिए उन्हें अल्मोड़ा छोड़कर सुदूर अजमेर जाना पडा. वकालत पढ़ने की बात धरी रह गई.

इसीलिए आगे चलकर उन्होंने बहुत जिद की कि उनका बड़ा बेटा दुर्गादत्त एलएलबी करे. जबकि भाई साहब साहित्य में एमए करना चाहते थे. एलएलबी होकर भी वकालत न करके भाई साहब ने पिता के आतंक के विरुद्ध वह विद्रोह शुरू किया जी अंततः उनके लिए बर्बादी का कारण बना. मेरे पिता अपने नैनीताल निवासी चाचा की सहायता से अजमेर गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल हैरिस के पास पहुंचे थे. वह लाइब्रेरियन नियुक्त हुए और उन्होंने हिस्ट्री में एमए किया. वहीँ कॉलेज में हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर बने. हिस्ट्री की भी किताबें लिखी और इतिहासकारों की बिरादरी में भी सम्मान का स्थान पाया.

प्रश्न- यानी आपके पिता आलराउंडर थे? कई विधाओं में पारंगत?

जोशीजी- गज़ब के. जिस क्षेत्र में भी वे घुसे उसमें चोटी तक पहुँचने की कोशिश में लगे और अक्सर कामयाब रहे. राजस्थान में रहते हुए उन्हें राजपूत चित्रकारी के नमूने देखने को मिले और देखते ही देखते वह राजपूत और मुग़ल शैली की चित्रकारी के विशेषज्ञ बन गए. खुद उन्होंने उनका बहुत अच्छा संग्रह किया जो वह मरने से पहले अल्मोड़ा में नए-नए खुले उदयशंकर के केंद्र को भेंट कर आए. आज वह हमारे पास होता तो लाखों-करोड़ों का होता.

इसी तरह वे एम्बुलेंस और रेडक्रॉस के काम में घुसे. वे इतनी तेज़ी से आगे बढे कि अगर जीवित रहते और चाहते तो भारतीय रेडक्रॉस के पहले भारतीय अध्यक्ष बन जाते. तथाकथित सीक्रे सोसाइटी फ्रीमेंसंस में भी उन्हें उच्च पद प्राप्त हुआ. अब जब मेरे भांजे को इंग्लैंड में फ्रीमेंसन बनना था तो वह अपने नानाजी की मेसोनिक लॉज की सदस्यता के प्रमाण-तस्वीरें वगैरह साथ ले गया था.

मेरे पिता ने सबसे अधिक नाम संगीत के क्षेत्र में कमाया. उनसे पहले हमारे कुटुंब में गाने-बजाने की कोई परम्परा नहीं थी. कहना यह चाहिए कि यह शौक उन्हें ब्राह्मण बिरादरी से अलग भी करता था. भले ही उन्होंने कभी विधिवत संगीत की दीक्षा नहीं ली, उनकी गणना देश के शीर्षस्थ संगीत-शास्त्रियों में हुई. भारतीय शिक्षा सेवा के सदस्य के नाते अजमेर में नियुक्त होने के कारण सारा राजस्थान, मध्य भारत और ग्वालियर उनके कार्यक्षेत्र में शामिल था. यहाँ के रजवाडों से उन्हें न सिर्फ चित्रकला के बेहतरीन नमूने मिले बल्कि दरबारी संगीतज्ञों को निकट से जानने का अवसर भी.

इसके चलते वे हिन्दुस्तानी संगीत के पुनरोद्धारक भातखंडे जी के बहुत काम के साबित हुए. पुरानी बंदिशें जमा करने और उनकी स्वर लिपि दर्ज कर लेने के अभियान में मेरे पिता भातखंडे जी के सहयोगी बने. जनसंपर्क और संगठन में मेरे पिता अत्यंत कुशल थे. लखनऊ में मौरिस कॉलेज की स्थापना में उनका बड़ा हाथ था, जो अब भातखंडे संगीत विद्यालय कहलाता है. इसी तरह उन्होंने अखिल भारतीय संगीत-नृत्य सम्मेलनों का आयोजन किया जिससे शास्त्रीय संगीत दरबारों से बाहर निकलकर जनता के बीच पहुंचा. उनके जीवन का अंतिम काम हिस्ट्री ऑफ इंडो-पर्शियन म्यूजिक नामक ग्रन्थ लिखना था. 

प्रश्न- क्या वह किताब प्रकाशित हुई?

जोशीजी- अफ़सोस कि नहीं. वह उसे पूरा कर गए थे और विलायत के एक प्रकाशक ने उसे छापना मंज़ूर भी कर लिया था. उसे लिखने के सिलसिले में उन्होंने समय से पहले सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण कर लिया था और शराब पीना भी छोड़ दिया था क्योंकि उनको पता था कि जिगर इतना सड़ चुका है कि अब पियेंगे तो इधर शराब उनके गले से उतरेगी उधर वह मौत के मुंह में जायेंगे. प्रकाशक को किताब रवाना करने के बाद और अपनी सभी पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए कुछ न कुछ व्यवस्था करने के बाद वे दिल्ली गए जहाँ एक तरह से उन्होंने संगीत-कला प्रेमियों के साथ जिंदगी का अपना आखिरी जश्न मनाया. वहाँ से जिस दिन लौटे उसी रात खून की उल्टियां करते हुए मर गए. वह युद्ध का ज़माना था. बाद में प्रकाशक ने लिखा कि एक परिच्छेद नहीं मिल रहा है. जिसे पांडुलिपि पूरा करने का काम दिया गया उसने वह परिच्छेद कभी लिखकर ही नहीं दिया.  
    
प्रश्न- आपके भाई भी लेखक थे
जोशीजी- उनकी कुछ रचनाएं प्रकाशित और प्रसारित भी हुई थीं। जिन्दगी में दो मर्तबा उन्होंने पत्रकार की हैसियत से काम किया था। मेरी बड़ी बहन भगवती दी की भी एक-दो रचनाएं प्रकाशित हुई थीं। आज भी वे अगर कोई भूले-भटके पत्र लिखती हैं तो सब लोग ले-लेकर पढ़ते हैं। मेरे ताऊजी और छोटे चाचा की रचनाएं भी प्रकाशित हुईं। पढ़ने-लिखने की हमारे परिवार में जबर्दस्त परंपरा थी और सो भी उस जमाने में जब फालतू किताबें पढ़ना उतना ही खराब समझा जाता था जितना आजकल टीवी देखते रहना। 

प्रश्न- पिता की अनुपस्थिति को आप किस तरह से देखते रहे?

जोशीजी- इसके कारण मेरे जीवन में ही नहीं साहित्य में भी जबर्दस्त अनाथ काम्पलेक्स ढूंढा और दिखाया जा सकता है। मुझे खुद ही कभी-कभी आश्चर्य होता है मेरे लिए कोई व्यक्ति पिता प्रतीक बन जाता है और मुझे अपने बारे में उसकी राय अच्छी बनाने कीअपने किए पर उसकी दाद पाने की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभी अपनी इस कमजोरी पर मैं इतना झुंझलाता हूं कि उसके द्वारा उपेक्षित किए जाने पर अपना आपा खो बैठते हुए उल्टा-सीधा कहने लगता हूं। मृत्युभय और असुरक्षा की सतत भावना भी मेरे अनाथ काम्पलेक्स के हिस्से हैं। भाई साहब की असमय मृत्यु और उनके जीवन में आए बेरोजगारी के अनेक दौर इस भावना को और भी दृढ़ कर गए। 

प्रश्न- इसका आपके जीवन पर क्या असर पड़ा?

जोशीजी- इसकी वजह से मेरे भीतर का डर कुछ और बढ़ गया। कुछ पैदाइशी डर था और कुछ परिस्थितियों ने बना दिया। कोई विद्रोह करते हुए या बड़ा खतरा मोल लेते हुए मुझे यह डर सताता रहा कि कहीं भाई साहब की तरह मेरी जिन्दगी भी तबाह न हो जाए। मध्यवर्गीय मानकों के अनुसार जब छोटे-मोटे कुछ विद्रोह किए तब यही सुनने को मिला कि अपने भाई के नक्शे-कदम पर चल रहा है। यह भी उसी तरह लायक बाप का नालायक बेटा साबित होगा। इसी के चलते विशेष महत्वाकांक्षी न होते हुए भी मैंने महत्वपूर्ण गोया लायक बनने कर कोशिश की और अपने को बराबर नालायक ही पाता रहा। इसी तरह मुझे इस बात का भी अहसास रहा कि शराब और विलासिता मेरे पिता की कमजोरी बने। अगर उनमें परिवार के संस्कारों के विरुद्ध जाने वाली यह प्रवृत्ति न होती तो वे दीर्घायु होते और जीवन में कहीं अधिक सफलता पाते। इसके कारण मैं कभी पूरी तरह विद्रोही नहीं हो सका। 

प्रश्न- तो आप अपने को अधूरी तरह के विद्रोही मानते हैं?

जोशीजी- हां. और इसी के चलते मैं न तो कलाकारों वाले सांचे में फिट हो सका और न घरेलू सांचे में. जैसा कि मैंने बहुत पहले अपने बारे में कहा था मैं एक पालतू बोहेमियन होकर रह गया. लेखक जोशीजी बेचारे घर-परिवार में थोड़े बोहेमियन होने के नाते विचित्र समझे गए और बोहेमियन बिरादरी को उनका घरेलूपन अजीब नज़र आया. यह उनके पालतू बोहेमियन, अधूरे विद्रोही होने का ही प्रमाण है कि शराब पीते हुए भी उनका सारा ध्यान इस ओर रहा कि कहीं होश न खो बैठूं. इसी के चलते उन्हें हर सुरा-संध्या के अंत में किसी लड़खड़ाते मित्र को उनके घर पहुंचाने का और उनके स्वजनों की फटकार सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा.
प्रश्न- अनाथ कॉम्प्लेक्स से आर्थिक असुरक्षा भी होती होगी?

जोशीजी- बहुत ज्यादा. मेरे पिता कि गिनती तब के मानकों के अनुसार रईसों में होती थी. घर में तब दो-दो कारें थी. उनके गुजरते ही हम एक झटके के साथ आर्थिक दृष्टि से सिफार ही गए क्योंकि ठाठ की जिंदगी जीने वाले हमारे पिता विशेष कुछ छोड़कर नहीं  गए और मेरे भाई साहब तब मामूली क्लर्की कर रहे थे जो उन्होंने सिर्फ इसलिये कर ली थी कि अफसर वर्ग के हमारे पिता के प्रति विद्रोह जता सकें. बाद में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और उनके बीच-बीच में बेरोजगार होने का सिलसिला चल निकला. इस आर्थिक असुरक्षा की भावना ने ही मुझे हमेशा लेखन से पैसे कमाते रहने के लिए बाध्य किया है. आज भी जबकि मुझे पैसा कमाने की कोई ज़रूरत नहीं है मैं व्यावसायिक लेखन को छोड़ नहीं पाता.

मैंने शुरू से ही दोनों तरह का लेखन खूब किया. छात्र जीवन से मैंने साहित्य और प

10 COMMENTS

  1. KYA BAAT HAI JOSHI JI KEE ! ITNEE SPASHT VAADITAA PAHLEE BAAR PADHEE HAI MAINE . SAKSHAATKAAR MEIN UNHONNE TO AATM KATHA HEE SAMET DEE HAI . GURUON KEE SRAAHNAA KOEE UNKE IS SAAKSHAATKAR SE SEEKHE . IQBAL KAA EK
    SHER YAAD AATAA HAI –

    HAZAARON SAAL NARGIS APNEE BENOOREE PE ROTEE HAI
    BADEE MUSHKIL SE HOTAA HAI CHAMAN MEIN DEEDAWAR PAIDA

    SANGRAHNEEY SAAKSHATKAAR .

  2. जोशी जी से मेरी यह बातचीत 'कथादेश' में प्रकाशित हुई थी.

  3. यह साक्षात्कार बड़े मौके पर पोस्ट किया है आपने. इसे प्रिंट करा के पढूँगा.

  4. जिस दिन लेखक संतुष्ट हो गया, उस दिन उसके लेखक की मृत्यु हो जाती है, ऐसा बडे बूढे कहते आए हैं। जोशी जी से मिलवाने का आभार।
    प्रभात भाई, प्रत्येक प्रश्न और उत्तर के बीच में अगर एक लाइन का गैप दे दें, तो मैटर देखने में भी अच्छा लगेगा और पढने में भी सुविधाजनक हो जाएगा।

  5. यह साक्षात्कार जोशी जी और उनकी रचना-प्रक्रिया को जानने के लिये अनिवार्य है।इतने महत्तवपूर्ण सक्षात्कार के लिये मैं आपका आभारी हूँ और कामना करता हूँ कि आप अपने साहित्यिक कर्मों से हिन्दी साहित्य का दामन भरते रहें।

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