आधे सफर की पूरी कहानी

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अक्सर कई किताबों की इतनी चर्चा हो जाती है कि उसका कोई कारण समझ में नहीं आता जबकि कई अच्छी किताबों पर ध्यान कम जा पाता है. ऐसी ही एक किताब पिछले दिनों पढ़ने को मिली- अर्धकथानक. 1641 में बनारसीदास द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा में लिखी इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद. मध्यकाल तक लेखक-कवि अपने बारे में न लिखने के लिए जाने गए. हिंदी की इस आरंभिक आत्मकथा में पहली बार इसको लिखनेवाला अपने आत्म को प्रकट करता दिखाई देता है. क्या उसका कोई सम्बन्ध हिंदी की आधुनिकता से जोड़ा जा सकता है? फिलहाल इस दूर की कौड़ी को ढूंढने की कोई आवश्यकता नहीं है. हो सकता है वे ब्रजभाषा गद्य में कुछ और भी लिखते लेकिन पुस्तक लिखने के दो-तीन साल के अंदर ही उनका देहांत हो गया. आधे सफर की यह पूरी कहानी उनके पूरे सफर की आधी कहानी बन गयी.
रोहिणी चौधरी ने अनुवाद के साथ-साथ पुस्तक की बहुत सुन्दर भूमिका भी लिखी है. उसमें उन्होंने पुस्तक लिखे जाने की कथा लिखी है. बनारसीदास जी ने जब यह आपबीती लिखी उस समय उनकी उम्र ५५ साल की थी. ‘जैन शास्त्रों के अनुसार मनुष्य का पूर्ण जीवनकाल ११० वर्षों का होता है. उन्होंने अपनी आधी जिंदगी की कहानी को ‘अरध कथान’ कहा है.’ इससे मुझे याद आया कि डॉ नगेन्द्र ने जब अपनी आत्मकथा लिखी तो उसका नाम दिया ‘अर्धकथा’. पुस्तक की भूमिका से पता चलता है कि नाथूराम प्रेमी के संपादन में इसके दो संस्करण निकले थे- १९५६ और १९५७ में. बाद में प्रख्यात चिन्तक मुकुंद लाठ ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया ‘हाफ ए टेल’ के नाम से. बहरहाल, बहुत दिनों से हिंदी में अनुपलब्ध इस पुस्तक का अनुवाद पेंगुइन प्रकाशन ने छापा है. एक तरह से पहली ही बार एक ‘बड़े’ प्रकाशन ने इतने प्रकाशित किया है और आम पाठकों को सुलभ करवाया है.
बनारसीदास का सम्बन्ध वैश्य परिवार से था. उनकी आपबीती को पढ़ने से उनके समाज के बारे में भी पता चलता है. किस तरह बचपन से ही बच्चों को व्यापर में पारंगत किया जाता था. लेकिन बनारसीदास का जीवन इसलिए विशिष्ट है क्योंकि वे व्यापार में नहीं छंद में, शास्त्र में पारंगत हुए और प्रेम में. बहुत दिनों तक उनको दो ही धुन रही- पढ़ाई और प्रेम[किताब में आशिकी कहा गया है]. उन्होंने लिखा अपने प्रेमालंबन की उनके ऊपर ऐसी धुन सवार थी कि ‘वे अपने पिता से मानिक, मणि आदि चुराते और खूब पान और मिठाइयां खरीदते जो अपनी प्रेमिका को पेशकशी के रूप में भेजते. वे अपने आपको ‘गरीब’ और अपनी प्रिया को ‘दास’ बुलाते. अपने प्रेम के ऊपर उन्होंने हज़ार दोहे और चौपाइयां लिखीं, उस दौर में उनको प्रेम के अलावा कुछ भी नहीं सूझता था. लेकिन एक बार जब वे बुरी तरह बीमार हुए तब परिवार के सब लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया. उस कठिन समय में अपनी पत्नी की सेवा से वे ठीक हुए और उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया. बाद में उनके अंदर वैराग्य जाग गया. जैन धर्म का गहरा अध्ययन किया और बाद में उन्होंने ‘अध्यात्म’ धर्म चलाया जो गृहस्थों का धर्म था.
बनारसीदास की यह कहानी जौनपुर, बनारस, आगरा, और इलाहाबाद में फैली हुई है. वे यह जानते थे कि आपबीती सुनाते हुए व्यक्ति को पूरी इमानदारी बरतनी चाहिए और बिना गुण-दोष विवेचन के उन्होंने यह कहानी बड़ी साफगोई से सुनाई है. रोहिणी चौधरी की भूमिका से मेरा ध्यान इस बात की ओर गया कि पुस्तक में अनेक स्त्रियों की कथाएं आई हैं. उनकी नानी, बुढिया दादी जो अपने पोते बनारसी की पहली कमाई पर मिठाई बांटती हैं, उनकी पत्नी, प्रेमिका. दिलचस्प है कि इसमें किसी स्त्री का नाम नहीं आया है. जिससे पता चलता है कि तत्कालीन समाज में सार्वजनिक रूप से महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता था. लेकिन लेखक ने उन सबका उल्लेख पुस्तक में किया है जिनका किसी भी रूप में बनारसीदास से वास्ता रहा, साबका रहा.
लेकिन अर्धकथानक के महत्व का केवल यही कारण नहीं है. यह वास्तव में बनारसीदास की जगबीती भी है. उन्होंने अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ तीन मुग़ल बादशाहों का दौर देखा था. पुस्तक में मुगलों के आतंक और उनके इन्साफ का वर्णन तो है ही समाज में उनकी व्याप्ति के भी प्रसंग आते हैं. जब बादशाह अकबर की मृत्यु हुई उस समय बनारसीदास जौनपुर में थे. उन्होंने लिखा है कि जब उन्होंने उनकी मौत की खबर सुनी तो सीढ़ियों से गिर पड़े और उनका सर फूट गया. यही नहीं अकबर के न रहने के समाचार से शहर में दंगे भड़क उठे, लोगों में असुरक्षा की भावना भर गयी. ‘लोगों ने अपने अच्छे वस्त्र और कीमती आभूषण ज़मीन में गाड़ दिए; हुंडी-बही कहीं और गाड़ी और नकद पैसा सुरक्षित स्थानों में छिपा दिया’. दस दिनों तक जौनपुर में भय का ऐसा ही माहौल व्याप्त रहा. जब आगरा से खबर आई कि सब कुछ ठीक हो गया है, अकबर का बेटा सलीम शाह गद्दी पर बैठ गया है तब जाकर शहर में शांति लौटी. सलीम के बादशाह बनने का समाचार जब घर-घर सुनाया गया तो शहर भर में जय-जयकार होने लगी. तीनों बादशाहों के दौर में उनके परिवार को अपमानित होना पड़ा लेकिन किताब में मुगलिया सल्तनत को लेकर अच्छी ही बातें कही गई हैं.
अनुवादिका की भूमिका से पता चलता है कि अर्धकथानक के अलावा बनारसीदास की चार और किताबें उपलब्ध थी, जिनके सन्दर्भ आते रहे हैं- मोह-विवेक युद्ध, बनारसी नाममाला, समयसार नाटक और बनारसी विलास. लेकिन उनके नाम के साथ अर्धकथानक ही एकमेक हो गया. इसकी भाषा को लेखक ने ‘मध्यदेश की बोली’ कहा है जिसके बारे में विद्वानों का कहना है कि वह आज की खड़ी बोली के अधिक करीब है. इसीलिए शायद इसे हिंदी की पहली आत्मकथा कहा जाता है.
अनुवादिका ने बहुत विस्तार से पुस्तक के अंत में नाम सूची और शब्दावली की सूची दी है जो पुस्तक को समझने में मदद करती है. आम पाठकों का पूरा ध्यान रखा गया है. अनुवाद को लेकर फिर चर्चा हो सकती है लेकिन तत्कालीन हिंदी की इस किताब का समकालीन हिंदी में आना ही बड़ी बात है.

7 COMMENTS

  1. इस बड़े(?) प्रकाशक ने कवर पर अनुवादक का नाम रोमन में क्यों छपवाया है? किन्हीं ख़ास लोगों की सहूलत वास्ते?
    —ओछापन।

  2. बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक की जानकारी दी हैं आपने. इसे हिंदी की प्रथम उपलब्ध आत्मकथा माना जा सकता है.

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