नाम तो नाम उपनाम भी सुभानअल्ला

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अज्ञेय की जन्म-शताब्दी के अवसर पर आज प्रस्तुत है उनके घोषित शिष्य मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखा गया एक व्यक्ति-चित्र जिसमें अज्ञेय के व्यक्तित्व को बहुत रोचक ढंग से खोला गया है. ‘बातों-बातों में’ संकलित लेख का एक सम्पादित अंश- जानकी पुल.
अगर जैनेन्द्र गांधी स्मारक निधि हैं तो सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ नेहरु अभिनन्दन ग्रन्थ हैं. जिस तरह नेहरु ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ और ग्लिम्प्सेज़ ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ का और गांधी और मार्क्स का समन्वय करके भारतीय राजनीति में छा गए, उसी तरह अज्ञेय पूर्व और पश्चिम, लोक-मानस और अभिजात-मानस, अतीत और भविष्य, परंपरा और प्रयोग को घोल के पी और पिला गए. यह सही है कि हिंदी साहित्य में अज्ञेय का वैसा एकक्षत्र राज्य नहीं हो सका जैसा नेहरु का भारतीय राजनीति में हुआ, मगर यह भी सही है कि हिंदी साहित्य में और किसी का अज्ञेय जितना भी नहीं हुआ. अज्ञेय फिलहाल साहित्यिक संघर्ष के ‘टेस्ट मैच से ‘रिटायर्ड हर्ट’ हैं और उनकी मुद्रा यह बताती है हर्ट का तर्जुमा ‘चोट खाकर’ नहीं ‘रूसा कर’ किया जाना चाहिए. जब मैंने पहली बार उनसे इस लेखमाला का प्रसंग छेड़ा तो उन्होंने कहा, ‘आप लिख दीजिए कि जब मैंने अज्ञेय से पूछा कि दिल्ली की साहित्यिक राजनीति के बारे में आपके क्या विचार हैं तब उन्होंने दोनों हाथ मेज पर रखकर और त्योरियों पर बल डालकर यह कहा- ‘ओ, दिल्ली! आपसे किसने कह दिया कि मैं दिल्ली में रहता हूँ. ऐसा लिखने से आपकी शैली भी निभ जायेगी और संपादक भी संतुष्ट होंगे.’ 
अज्ञेय व्यक्तिवाद के स्तंभ बताये जाते हैं, लेकिन शायद उनकी कोशिश एक अलग व्यक्ति होने की इतनी नहीं रही है जितनी कि एक अलग हस्ती और एक अलग संस्था बनने की. अज्ञेय का हस्तीवाद साहित्य पर कुछ ऐसा छाया कि जिसने कलम संभाली उसने हस्ती बनने के लिए पिछली हस्तियों के साहित्य-शीर्ष पर हस्त-कौशल सिद्ध करना शुरू कर दिया. अज्ञेय इस नाते भी अपने को हस्तियों की हस्ती मान सकते हैं कि सबसे ज्यादा हस्तियाँ उनके खिलाफ हैं. इसके बावजूद अज्ञेय की यश-यात्रा की राह में कोई बड़ी रुकावट नहीं पड़ी है और कुछ लोग इस रुकावट के न पड़ने को ही अज्ञेय के अज्ञेय होने का प्रमाण मानते हैं. जो लोग अज्ञेय के समर्थकों और विरोधियों द्वारा निर्मित लोक-प्रतिमाओं में पूरी आस्था रखते हैं, उन्हें अज्ञेय का आचरण अक्सर बहुत निराश और आश्चर्यचकित कर जाता है. इससे यह सद्ध होता है कि अज्ञेय व्यवहारिक हैं.
साहित्य में उनके इर्द-गिर्द जितने लोग आते रहे हैं, उनमें से कुछ शुद्ध व्यावहारिकता के नाते आये हैं और कुछ उनके महिमा मंडित अभिजात्य से आकर्षित होकर. पहले वर्ग ने यह पाया है कि अज्ञेय सौदा करने में बहुत भोले नहीं हैं. दूसरे वर्ग को यही दुःख लगा रहा है कि अज्ञेय का सौदागरों से सम्बन्ध ही क्यों है? जिज्ञासा और भक्ति में बुनियादी बैर है. इसलिए अज्ञेय के भूतपूर्व भक्तों की संख्या बहुत बड़ी है. अज्ञेय ने साहित्य अकादेमी पुरस्कार स्वीकार किया तो भक्तों को घोर निराशा हुई और भूतपूर्व भक्तों ने यहाँ तक कहा कि उन्होंने कोशिश करके लिया है, अस्वीकार करने का तो सवाल ही नहीं उठता.
अज्ञेय पर जो आरोप लगाया जाता है वह इतना टुच्चा होता है कि अज्ञेय की महानता से मेल नहीं खाता. कुल मिलकर मिंक कोट और हीरों के हार वाला मामला हो जाता है. आरोप लगानेवाला ही कुछ छोटा हो जाता है. अज्ञेय कोई प्रत्युत्तर नहीं देते और आरोपकर्ता से अधिक शालीनता से पेश आते हैं. इससे आरोपकर्ता ही घबड़ा जाता है. साहित्यिक राजनीति में सत्ता का विघटन होने पर जब से लोहियावादी मूर्तिभंजन की बन आई है अज्ञेय अपनी मूर्ति हिंदी साहित्य सभा उद्यान से उठाकर विश्व साहित्य वांग्मय में रख आये हैं और हिंदी के एकमात्र निर्यात-योग्य लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं.
अज्ञेय हिंदी में ‘बायोग्राफी प्वाइंट ऑफ व्यू’ के आद्याचार्य रहे हैं. पुस्तक के पीछे प्रकाशित उनका सामान्य परिचय भी सामान्य पाठक के लिए विस्मय और लेखक-पाठक के लिए इर्ष्या की सामग्री जुटा जाता है. अज्ञेय को कायदे-करीने में बड़ी आस्था है और वह अपना छोटे से छोटा काम भी बड़े सलीके से और खूब सोच-विचार कर करते हैं.
अज्ञेय की सारी बायोग्राफी में यही सलीका और सोच-विचार झलकता है. इस दिलचस्प बायोग्राफी में इतनी विविधता है कि नट-विद्या का धोखा होता है. और लुत्फ़ यह है कि इसके बावजूद शील का तर्क कहीं भंग नहीं हुआ है. अज्ञेय ने ज़माने भर के काम किये हैं और दुनिया भर की यात्रा की है. छोटा-मोटा आदमी होता तो इसमें से कोई एक काम या कोई एक यात्रा करके या करते रहकर घटिया हो गया होता. अज्ञेय ब्रितानी शासन में आतंकवादी भी रहे हैं और एम. एन. राय के चेले होने के कारण सेना-अधिकारी भी. अज्ञेय अमेरिका भी गए हैं और सोवियत संघ भी. उन्होंने जहाँ भी कुछ काम किया है, कुछ अलग ढंग का और कुछ अलग तरह से किया है. रेडियो में कर्मचारी रहे तो समाचार विभाग में, समाचार विभाग में रहे तो केवल भाषा-सलाहकार होकर, साहित्य में जमे तो प्रतीक के संपादक होकर, प्राध्यापक हुए तो बर्कले, कैलिफोर्निया में, पत्रकारिता में लौटे तो हिंदी के पहले समाचार-साप्ताहिक के संपादक होकर, आंदोलन चलाया तो नई कविता का, संस्था बनाई (या बिगाड़ी?) तो परिमल और भक्तों में कोई भक्त चुना तो वह भी सर्वेश्वर.  
ज्ञान-विज्ञान के शौक-शगल के मामले में अज्ञेय ने अपने को सर्वतोमुखी प्रतिभा के पुराने ब्रितानी मॉडल पर ढाला है. ‘सारिका’ में जब अज्ञेय ‘अपनी दृष्टि’ में उजागर हुए थे तो यह फिक्र मुकम्मल हुआ था कि एक कुरुक्षेत्र से चूक गए वर्ना अज्ञेय किस क्षेत्र में नहीं कूदे.
अज्ञेय ‘एनेकडोट पॉइंट ऑफ व्यू’ में भी किसी से पीछे नहीं रहे और छोटी से छोटी बात में भी उन्होंने इतनी खास भंगिमा अपनाई कि किस्सागो का कल्याण हो गया. टेलीफोन के मामले में ही उनकी कई बारीकियां हैं. मसलन हेलो के बजाय जी कहना. इससे दूसरी ओर वाला विस्मित हो जाता है और इस कारण वह अज्ञेय को जाहिल देहाती समझकर अंग्रेजी में रोब ग़ालिब करने लगता है तो अज्ञेय उसकी हिन्दुस्तानी अंग्रेजी के मुकाबले में अपनी अंग्रेजी-अंग्रेजी दागकर उसे और अधिक विस्मित होने का अवसर प्रदान करते हैं. अगर टेलीफोन पर वार्तालाप दूसरी ओर से शुरू हुआ है और अंग्रेजी में तो ‘कुड आई स्पीक टू मिस्टर वात्स्यायन’ का जवाब अज्ञेय ‘दिस इज ही’ में देकर सही अंग्रेजी में बोलने और अंग्रेजीदां-हिन्दुस्तानी से कुछ अलग होने का सुख लूट लेते हैं. हिंदी में कोई पूछ बैठे कि ‘अज्ञेय जी हैं’ तो जवाब मिलता है ‘मैं वात्स्यायन बोल रहा हूँ.’
इसका शीर्षक मनोहर श्याम जोशी द्वारा अज्ञेय के ऊपर लिखे एक अन्य लेख से लिया गया है. वह लेख भी ‘बातों-बातों में’ संकलित है.

लेख  के साथ वात्स्यायनजी का जो चित्र दिया गया है वह श्री दीपचंद सांखला के सौजन्य से. सांखलाजी का आभार.

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