मैं अभी तक एक आधी लिखी हुई किताब हूँ

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हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक महान अभिनेताओं में से एक दिलीप कुमार का आज जन्मदिन है. उन्होंने बरसों पहले एक लेख अंग्रेजी में लिखा था “my two worlds”. उसी का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है- जानकी पु.





“तुम दूसरों की तरह क्यों नहीं रहे,
हवा से बातें करती गाड़ियों के आराम में डूब जाओ,
एक पत्रिका के पन्ने से दूसरी पत्रिका के पन्ने तक छा जाओ और
ख्याति की नई ऊंचाइयों तक पहुंचकर
चालीस करोड़ इंसानों के दिलों पर राज करो.
किसी ने मुझसे कहा और मैंने सोचा,
ख्याति की नई ऊंचाइयां…
और फिर मैंने ज़मीन और आसमान के फैलाव की ओर देखा और कहा-
लेकिन मैं अपने आप से अप्रिय नहीं होना चाहता और यह कैसे हो सकता है
कि कोई अपने आप को तो पसंद न करे और चाहे कि
चालीस करोड़ इंसान उसको पसंद करें.
मैं नहीं हूँ जो कुछ मैं हूँ.
तन्हाई के क्षणों में कुछ देर अपने आप की ओर देखते हुए
विभिन्न प्रकार की चीज़ों में समानता तलाश करता हूँ,
भिन्नता के राज़ समझने की कोशिश करता हूँ,
और यह खोज करता हूँ कि
मैन अभी तक एक आधी लिखी हुई किताब हूँ.
बर्लिन बिल्कुल मेरी तरह है,
दो भागों में विभाजित.
क्या यह इंसानी समाज पर एक दाग है?
लोग क्यों इसको ट्रेजेडी का नाम देते हैं और कभी-कभी अपने आप से भी.
इसमें कोई ट्रेजेडी नहीं है.
यह दीवार दो भिन्न विचारधारा रखनेवालों का प्रतिनिधित्व करती है.
लेकिन यह घरों को भी विभाजित करती है और,
यह दिलों को भी काटती है.
मैं यह दीवार देखने के लिए नहीं जाना चाहता,
मुझे यह दीवार इंसानों का मजाक उड़ाती दिखती है.
यह दीवार इंसानी सोच की प्रगति को नकारती है,
लेकिन इस तथ्य से कैसे इनकार करें कि
यह दीवार हमारी आँखों के सामने खड़ी है
हम एक हठी नस्ल से हैं और
दुनिया में हर जगह अपनी-अपनी दीवारें उठाये फिरते हैं,
बर्लिन की दीवार टूट चुकी है,
बर्लिन की दीवार गिरा दी गई है.
यह दीवार फासीवाद की शैतानी करतूत थी.
इंसान ने हिटलर और मुसोलिनी जैसे शैतानों
और उनके विचारों को नष्ट कर दिया.”
अमेरिकी अनथक काम करने वाले हैं. मुझे उनकी गर्मजोशी और मेहमाननवाजी का अहसास बहुत पसंद है. मुझे न्यूयॉर्क वाल स्ट्रीट के मालिकों में बहुत-से लोगों ने यह प्रश्न किया था कि मैंने चुनाव में कृष्ण मेनन की हिमायत क्यों की? यह प्रश्न मुझसे बर्लिन, न्यूयॉर्क और विभिन्न पत्रकार सम्मेलनों में लगभग हर जगह किया गया.
मैंने कहा था कि सकारात्मकता निष्पक्षता जिंदा रखने के लिए बेहतरीन पॉलिसी है. उसका मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि हम जिसको ठीक समझते हैं उससे बेपरवाही दिखाएँ.
यह पॉलिसी तर्क के दरवाज़े हर समय और हर जगह खुले रखने की अहमियत पर जोर देती है, चाहे हम किसी भावनात्मक तूफ़ान में घिरे हों या किसी बड़ी दुर्घटना के खतरे हमारे सिरों पर मंडरा रहे हों. लेकिन अमेरिका और यूरोप वालों की सूई कृष्ण मेनन पर अटक गई थी. मैंने उन्हें कह दिया कि मेनन आपको इसलिए पसंद नहीं कि वह आपका विरोध करता है और आपको चापलूस और जी-हुज़ूर करने वालों की ज़रूरत है. जो आपका विरोध करे वह आपका दोस्त नहीं हो सकता.
अमेरिका और यूरोप के सोचने का अंदाज़ खौफ की पैदावार है.
मैंने उन्हें कहा, “तुम लोग कम्युनिज्म से डरते थे. हम हिन्दुस्तानी कम्युनिज्म से नहीं डरते और सच तो यह है कि एक राज्य में कम्युनिस्ट सरकार भी है.”
मुझे शांग्रीला की याद आती है.
शांग्रीला, जहाँ मिथक और तथ्य के बीच कोई पर्दा नहीं होता और यह रहस्यमयी जगह हिमालय के पहाड़ों में किसी जगह पर स्थित है. यहाँ पर मोहब्बत अपनी पूरी शान के साथ राज करती है. इंसान के शरीर और उसकी आत्मा के लिए यह एक स्वर्ग है. हर इंसान के जीवन में एक शांग्रीला होता है, उसका अपना शांग्रीला. मैं दो दुनिया के किनारों पर खड़ा हूँ. कौन-सी दुनिया मेरी है? अपने बाप के सीने से चिपटकर रोता हुआ भूख से निढाल बच्चा या सिर्फ चमकदार रंगों में चमचमाती दुनिया?
मैं कौन हूँ? क्या मैं मूक दर्शक हूँ? क्या यह औरत जिसका बच्चा भूखा है, मेरे लिए कोई अर्थ नहीं रखता? सिर्फ एक दर्शक. मुझे इन सब लोगों के लिए क्या करना है…
मैं उस बच्चे की ओर देखता हूँ जो जिंदगी और मौत के बीच खतरनाक संघर्ष कर रहा है.
लेकिन अपने दिल के अंदर गहरे तहखानों में मैं ही जानता हूँ कि जीवन की जीत होगी. मैं मुस्कुराता हूँ और मेरी यह मुस्कराहट हालात के सन्दर्भ में कितनी तुच्छ और बेमौका है. भावुकता के अहसास के महान क्षण में मुझे अपनी दो दुनिया का ज्ञान और बोध प्राप्त होता है. मेरी अपनी दो दुनिया है. पहली की तरह दूसरी भी सच्ची है. और मुझे लाखों और करोड़ों बनना है. मुझे खुशी और गम में ढलते जाना है. अपनी दो न विभाजित होने वाली दुनिया में. एक बड़ा अदाकार और दर्शक बनने के लिए.
मुझे हर पल नया जन्म लेना पड़ेगा.  
वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘दिलीप कुमार: अहदनामा-ए-मोहब्बत’ से साभार  

4 COMMENTS

  1. आजकल से उलट उस ज़माने केअभिनेता बहुत पढ़े-लिखे और विचारवान और हृदयवान हुआ करते थे ! दिलीप कुमार का यह लेख इसकी मिसाल है !आभार इसे उपलब्ध कराने के लिए !

  2. ट्रेजेडी किंग की यह अधूरी किताब कितनी लाजवाब है, बिल्कुल बर्लिन की ही दीवार की तरह ऎतिहासिक और चर्चित..सकारात्मकता निष्पक्षता ज़िंदा रखने के लिए सबसे बेहतरीन पालिसी है..कितना बडा और समसामयिक यथार्थ कह गए दिलीप साहब वह भी इतने साल पहले..वही यथार्थ वह भोग भी रहे हैं आज भी..जन्मदिन की शुभकामनाओं के साथ हार्दिक नमन!!

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