जलते हुए मकान में कुछ लोग

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हिंदी के विद्रोही रचनाकार राजकमल चौधरी का आज जन्मदिन है. महज ३७ साल की उम्र में गुजर जाने वाला यह लेखक हिंदी कहानी को उस वर्जित प्रदेश तक लेकर गया जिसकी कहानियां हिंदी में तब तक नहीं लिखी गई थीं. ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत है- जानकी पुल.




इस बात में शक की कोई गुंजाईश नहीं. वह मकान वेश्यागृह ही था. मंदिर नहीं था. धर्मशाला भी नहीं. शमशाद ने कहा था- तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. सोने के लिए धुला हुआ बिस्तरा मिलेगा. सुबह वहीँ नहा-धो लोगे, चाय पीकर चले आओगे. मैंने कहा था- ठीक है. सेल्समैन को और क्या चाहिए! कहीं रात काट लेने की जगह. कोई कमरा. कोई भी औरत. और अंत में नींद.
औरत बुरी नहीं थी. मगर, एकदम टूटी हुई थी. बोली- फ़ालतू पैसे हों तो देसी रम की एक बोतल मंगवाओ. सारा दिन इस औद्योगिक नगरी में चक्कर काटने के बाद मैंने पांच हज़ार रुपयों का बिजनेस कर लिया था. कमीशन के लगभग तीन सौ रुपये मेरे बनते थे. रम की बोतल मंगवाई जा सकती थी. रम की बड़ी बोतल और सामने के पंजाबी होटल से मुर्गे का शोरबा. औरत खुश हो गई. मेरे गले में बाँहें डालकर मचलने लगी. कहने लगी- तुम दिलदार आदमी हो! ज़रा रात ढल जाने दो, तुम्हें खुश कर दूंगी. मैं ठंढी औरत नहीं हूँ.
औरतें इस मकान में और भी थीं. मगर शमशाद ने कहा था- दूसरी के पास मत जाना. उसका नाम दीपू है, दीपू! पंजाब की है. उसी के पास जाना. और मैं दीपू के पास आ गया था. मैंने कहा था- शमशाद ने तुम्हारे पास भेजा है. मैं न्युबिल्ट कंपनी का सेल्समैन हूँ. कल सुबह कलकत्ते चला जाऊंगा. रात भर रहना चाहता हूँ. मगर, पैसे मेरे पास ज्यादा नहीं हैं.
कौन शमशाद? कश्मीरी होटल वाला? वह खुद क्यों नहीं आया? ज़रूर परले मकान की कलूटी मेम के पास गया होगा. अब उसी के पास जाता है,- दीपू ने एक लंबी उसांस लेकर उत्तर दिया था, और मेरे द्वारा मिले हुए बीस रुपये मकान मालिक को देने चली गई थी. फिर लौटकर बोली थी, फ़ालतू पैसे हों, तो देसी रम की बोतल मंगवाओ. कुल आठ रुपयों में आ जायेगी. शराब और औरत यहाँ सस्ते में मिलती है. देखो न, मैं बैठती तो रात भर के पचास रुपये लोग खुशी से दे जाते. मैं मिहनती औरत हूँ. कायदे से काम करना जानती हूँ. तुम ज़रा भी शर्म मत करो. समझ लो, अँधेरे में हर औरत हर मर्द की बीवी होती है. अँधेरे में शर्म मिट जाती है. रंग, धर्म, जात-बिरादरी, मोहब्बत, ईमान, अँधेरे में सब कुछ मिट जाता है. सिर्फ कमर के नीचे बैठी हुई औरत याद रहती है.
मगर, रात के बारह भी नहीं बजे होंगे कि पुलिस आ गई. मकान का मुख्य द्वार अंदर से बंद था. मालिक ने खिड़की से झांककर देखा होगा, पुलिस ही है. वह दीपू के कमरे के पास आया. बोला, दीपू पुलिस आ गई है. गाहक के साथ भागो! वह दीपू जैसी दूसरी औरतों के कमरे के पास गया. गाहक के साथ भागना होगा. कहाँ? दीपू बोली, नीचे अंडरग्राउंड में. चलो, वहीं पियेंगे. और तबियत खुश करेंगे. घबड़ाओ नहीं, पुलिस ज्यादा देर नहीं रुकेगी. दीपू नंगी थी और मैं भी लगभग प्राकृतिक अवस्था में ही था. उसने एक चादर लपेट ली और बोली- चलो ग्लास और बोतल उठा लो! ज़ल्दी करो!
चारों तरफ घना अन्धकार है और नंगी फर्श पर बैठे हुए हम लोग रौशनी का इंतज़ार कर रहे हैं. रौशनी कब आएगी? दीपू अपने देह से चादर उतारकर फर्श पर बिछाती है. दीवार टटोलकर बोतल और ग्लास किनारे रखती है. फिर पूछती है- और कौन-कौन आया है? चन्द्रावती तुम भी आई हो? अँधेरे में कहीं कुछ नहीं दीखता है. अपना हाथ-पाँव तक नहीं. और इस अँधेरे में दीपू की आवाज़ चांदी की सफ़ेद तलवार की तरह चमकने लगती है- बोलते क्यों नहीं? यहाँ की आवाज़ ऊपर नहीं जाती है. और अब तो मालिक पुलिसवालों को रुपये दे चुका होगा. अब क्यों डरते हो? बोलते क्यों नहीं? और कौन है यहाँ?
कौन? दीपू रानी? तू भी आ गई? कैसा गाहक है तेरे पास? बोतल लेकर आया है? भाई, एक औंस मुझे भी देना. यहाँ बड़ी सर्दी है. देगी तो? कोई दूसरी औरत अँधेरे की परतें तोडती है. मुझे लगता है अँधेरे में प्रेतछायाएं रेंग रही हैं. कमरे में टहलता हुआ कोई आदमी मेरी जांघ पर पाँव रख देता है, और डरकर उछल जाता है, मैंने समझा कोई जानवर है.
जी हाँ! जानवर ही है! आप खुद को क्या समझते हैं? आदमी? हुज़ूर यहाँ जानवर ही आते हैं. आदमी नहीं! आप कौन हैं? दीपू हँसने लगती है. तब कमरे में टहलता हुआ वह आदमी सिगरेट के लिए माचिस जलाता है. वह ओवरकोट डाले हुए है. सिर पर हैट नहीं है. पांवों में जूते नहीं. बड़ी-बड़ी घनी मूछें हैं. चेहरे पर फरिश्तों जैसा भाव टपकता है. मैं पूछता हूँ, आप कौन हैं?
मैं यहाँ की एक फैक्ट्री में इंजीनियर हूँ. अकेला आदमी हूँ, वक्त काटने के लिए यहाँ चला आया. क्या पता था, वक्त इस तहखाने में कटेगा, वह दुबारा माचिस जलाता है और इस कमरे के दूसरे मुसाफिरों को देखने लगता है. छोटा-सा कमरा है. दीवारें नंगी हैं. फर्श सीलन से तर. अपनी ही बांहों में सिर डाले हुए एक दुबली-पतली लड़की एक कोने में बैठी हुई है. हरी लुंगी और सफ़ेद कमीज़ पहने हुए एक बूढ़ा आदमी बीच कमरे में खड़ा है, चुपचाप. चन्द्रावती एक विद्यार्थी जैसे दीखते हुए कमसिन लड़के के गोद में सिर डाले लेटी हुई है. वह लड़का चन्द्रावती का माथा सहला रहा है. माचिस की तीली बुझ जाती है. इंजीनियर कमरे में चक्कर काटता रहता है. उसके जूतों की भारी और सख्त आवाज़ अँधेरे में गूंजती रहती है. कमरे के बीच में खड़ा बूढ़ा आदमी कहता है, मेरे रुपये भी चले गए. मेरी औरत भी उधर ही रह गई. मेरे पास शराब भी नहीं है. सिगरेट भी नहीं. पता नहीं, पुलिस कब तक ऊपर शोर मचाती रहेगी.
ऊपर वाकई आग लगी हुई है. छत जैसे टूट जायेगी. पुलिस शायद कमरों की तलाशी ले रही है. शायद, ऊपर रुकी हुई औरतों को तमाचे लगा रही है. शायद, मकान मालिक को हंटर लगा रही है. कुछ पता नहीं चलता है. सिर्फ, लगता है, ऊपर कोई दौड़ रहा है, और चीख-पुकार मची हुई है.
विद्यार्थी दीखता हुआ कम उम्र लड़का बड़ी महीन आवाज़ में चीखता है, माचिस जलाओ… मेरे पेंट में कोई कीड़ा घुस गया है. माचिस जलाओ… मगर कोई माचिस नहीं जलाता. इंजीनियर चुपचाप टहलता रहता है. दीपू मेरे करीब खिसक आती है, दीवार पकड़कर बोतल और गिलास ढूंढती है. ज़रा-सी ठोकर से ग्लास टूट जाता है. मैं फर्श टटोलता हुआ ग्लास के बड़े टुकड़े किनारे हटाने लगता हूँ. शीशे की टुकड़ों की आवाज़ में बड़ा ही कोमल संगीत है. दीपू बोतल खोलकर दो घूँट शराब गले में डालती है, फिर बोतल मुझे थमाकर खांसने लगती है. पुरानी खांसी. शायद, दमा है. चन्द्रावती कहती है, अकेले-अकेले पीने का से यही होता है…
दूँगी, बदजात! तुम्हें भी दूंगी. इस तरह गालियां मत निकाल, दीपू चीखती है, फिर खांसने लगती है. सर्दी में जमे हुए अपने पाँव मैं सीधा करने की कोशिश करता हूँ. दांयें पाँव की उंगलियों में रबर की कोई चीज़ फंस जाती है. पाँव ऊपर खींचकर उसे उठाता हूँ. इस तहखाने में में भी रबर की यह चीज़ लाना लोग भूल नहीं सके. मैं मुस्कुराता हूँ. मुस्कुराने के बाद रम की बोतल गले में उतारने की कोशिश करता हूँ. पता नहीं, अब कितनी शराब बची है. चन्द्रावती अँधेरे में लड़खड़ाती हुई आती है, और हँसती हुई मेरी गोद में गिर जाती है. दीपू समझ गई है कि चन्द्रावती ही है. कहती है, देखो चंद्रा, शराब पिएगी तो इस बाबू को खुश करना पड़ेगा. यह बाबू हमारी ही जात का है. हम चमड़ा बेचते हैं, यह चमड़े से बना खेलकूद का सामान बेचता है…
हाय रे, तुम तो एकदम नंगे हो, चंद्रावती खिलखिलाने लगती है. मैं खुश होकर बोतल उसके हाथ में थमा देता हूँ. वह खुश होकर बोतल दीपू के हाथ में थमा देती है. बोतल खाली हो चुकी है और मेरा सिर चकराने लगा है. रबर की वह चीज़ अब तक मेरी उंगलियों में पड़ी है. मेरा सिर घूम रहा है. दुर्गंध से मेरी नाक फटी जा रही है. किस चीज़ की दुर्गन्ध? लगता है आसपास कई चूहे मरे पड़े हों. चन्द्रावती बहुत ज़रा-सी औरत बच गई है. मैं उसकी ब्लाउज के अंदर हाथ डालता हूँ. अंदर जैसे कुछ भी नहीं है. सिर्फ मांस का एक झूलता हुआ टुकड़ा. मगर उसकी जाँघों की पकड़ बेहद मजबूत है. मैं नफरत से भरकर दूर खिसकना चाहता हूँ. लेकिन खिसक नहीं पाता. मेरी दोनों टांगें उसकी जाँघों के बीच कैद हैं. बेहद मोटी टांगें. भारी कमर. दीपू कहती है, सिर्फ मिलिटरी वाले इस चन्द्री के पास आते हैं. हरामजादी, लोगों को तोड़कर रख देती है. क्यों मिस्टर सेल्समैन. क्या हाल है?
मैं सिकुड जाता हूँ. चन्द्रावती ताकत लगाती है, मैं सिकुड़ जाता हूँ. लगता है, मेरी जांघों के बीच कोई मरा हुआ चूहा चिपक गया हो. शराब ने मुझे और भी सर्द बना दिया है. तभी, बीच कमरे में खड़ा बूढ़ा चीखने लगता है, सांप! मुझे सांप ने काट खाया है! रौशनी जलाओ, मुझे सांप ने काट लिया… रौशनी जलाओ…
मगर, रौशनी नहीं होती है. इंजीनियर के जूतों की आवाज़ रुक जाती है, मगर माचिस नहीं जलती. चन्द्रावती के साथ आया हुआ लड़का गरजता है, माचिस जलाओ! इंजीनियर साहब, माचिस जलाओ, मुझे सांप काट लेगा… मैंने एक बार सांप को मार दिया था. सांप मुझसे बदला लेगा… मुझे बचाओ. मुझे बचा लो…
मगर, इंजीनियर पर कोई असर नहीं होता. वह कहता है, मेरे पास दो सिगरेट हैं और माचिस की कुल दो तीली हैं, जब मुझे सिगरेट पीने की ख्वाहिश होगी तभी माचिस जलाऊंगा. अँधेरे में इंजीनियर की सिगरेट का सिरा चमकता है. उसकी घनी मूंछें चमकती हैं. वह एक किनारे दीवार के सहारे टिका खड़ा है. और वह बूढ़ा चीख रहा है. और, वह लड़का चीख रहा है. और, चन्द्रावती कहती है- बूढ़े को मरने दो. कब्र में नहीं गया, यहाँ ऐश करने चला आया. और, दीपू कहती है, रबर का सांप होगा. आठ नंबर कमरे वाली सुलताना पिछली पुलिस रेड में अपने साथ यहाँ रबर का सांप ले आई थी. हम लोग खूब डर गए थे. सुल्ताना का गाहक तो डर के मारे बेहोश हो गया था.
रबर का सांप नहीं, सच्चा सांप है! मेरे पाँव से खून बह रहा है. ज़हर ऊपर चढ़ रहा है. सबको काट लेगा, बूढ़ा आदमी चीखता रहता है और फर्श पर गिरकर छटपटाने लगता है. दीपू हँसती है, साला छटपटा रहा है… अरे अब्बाजान, बूढ़े आदमी हो, मर गए तो क्या बिगड जायेगा… क्यों बे चन्द्री, क्या करती है? ज़ल्दी खलास क्यों नहीं करती है? बिचारे ने आठ की शराब मंगाई है, बीस रुपये कैश दिए हैं, मुर्गे का गोश्त ऊपर ही पड़ा रह गया…ज़रा बिचारे को मौज पानी लेने दो. दो-एक कसरत मैं भी करुँगी. ज़ल्दी कर चन्द्री, मैं अब गर्म होती जा रही हूँ.
अब इंजीनियर माचिस जलाकर दूसरी सिगरेट सुलगाता है. बूढ़े के पाँव में ग्लास का टुकड़ा गया है. वाकई खून बह रहा है. बूढ़ा फर्श पर पाँव पटक-पटक कर चीख रहा है, मैं कोयले का स्टॉकिस्ट हूँ. मर गया, तो लोग गोदाम तोड़कर सारा कोयला उठा ले जायेंगे…बेटा मेरा आवारा निकल गया है. घर-दरवाज़े तक बेचकर रंडियों को दे देगा… मुझे बचाओ…बाहर जाने दो. मुझे इस तहखाने से निकालो…
विद्यार्थी दीखते हुए लड़के ने माचिस की रौशनी में दीवार के सहारे चुपचाप और अकेली लड़की को देख लिया है. वह खिसककर उसके पास जा रहा है. लड़की डरी हुई है और खामोश है. लड़का शायद चन्द्रावती के अभाव को पूरा करना चाहता है. इंजीनियर माचिस बुझा देता है, और सीने की सारी ताकत लगाकर सिगरेट के काश खींचता रहता है. शराब की खाली बोतल दीपू की जांघों के बीच दबी पड़ी है. लकड़ी के कुंदों की तरह मोटी-मोटी जांघें. चन्द्रावती ने मेरी गर्दन में अपनी बाँहें फंसा दी है और मुझे हिलाती हुई कह रही है, ऐ मिस्टर, थोडा होश तुम भी करो…अकेले मैं क्या करूँ? थोड़ी ताकत लगाओ.
मगर मुझे लगता है कि मैं अब बेहोश हो जाऊंगा. यह घुटन, यह ठंढी फर्श, इंजीनियर के सिगरेट का धुआं, मरे हुए चूहों की दुर्गन्ध, बूढ़े आदमी की चीख-पुकार, दीपू के जांघों में अटकी हुई बोतल…मुझे लगता है कि अब मैं बेहोश हो जाऊंगा. अचानक बोतल दूर फेंककर दीपू चीखती है, तू हट जा चन्द्रावती, तू अब रास्ता छोड़! मैं इस बाबू को बताती हूँ…चल, परे हट, साले को मैं कच्चा चबा जाउंगी…
और, रम की खाली बोतल दीवार के सहारे बैठी उस लड़की के पास गिरती है. वह बड़ी पतली आवाज़ में चीखती है- मैं मर गई. मेरा सिर फट गया…मैं मर गई.
वह लड़का शिकारी कुत्ते की तरह उछल कर उसके पास पहुँच जाता है. इंजीनियर फिर टहलने लगा है. उसके जूतों की आवाज़ बड़ी भयावनी है. चन्द्रावती फर्श पर गिरी हुई हांफ रही है. दीपू मेरे ऊपर चढ़ी है और मुझे झकझोर रही है. मैं धीरे-धीरे सो जाता हूँ. शायद बेहोश हो जाता हूँ. शायद मर जाता हूँ.
मर जाने के सिवा अब और कोई उपाय नहीं रह गया है. 


स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी कोश से साभार 

9 COMMENTS

  1. कहानी डर या भय से शुरू होती है फिर करुण,वीभत्स और उबकाई आने लगती है….

    सार्थक कहानी के लियें आभार ..

  2. मंटो से कुछ जुदा अंदाज… शुक्रिया इसे पढवाने के लिए…

  3. क्या गज़ब कहानी है, एकदम परकाया प्रवेश है जैसे..सब कुछ सिनेमाई अंदाज में घटित होता सा दिखता है..राजकमल जी को नमन व आपका आभार प्रभात जी यह उम्दा कहानी पढने का सुख देने के लिए..

  4. कहानी भय बनकर प्रवेश करती है और एक गहरी उदासी तथा अँधेरा मन के मंच पर छोड़ती है ….. समाज का एक वीभत्स रूप – करुणा और दुःख से मन रो सकता है , बस .

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