Saturday, October 30, 2010

हर बशर वीरां सफर ले जाएगा

वीकेंड कविता में आज प्रस्तुत है मनु गौतम की गज़लें. फिल्म इंस्टीट्यूट के ग्रेजुएट मनु 'देवदास' में संजय लीला भंसाली के सहायक थे, फिल्म 'चौसर' के गाने लिखे, अनेक टीवी धारावाहिकों का लेखन-निर्देशन किया. सबसे बढ़कर वे मूलतः संवेदनशील कवि हैं. यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ गज़लें- जानकी पुल.

1.  

कौन किसको लूट  कर ले जाएगा
हर बशर  वीरां सफर  ले  जाएगा

रात की थाली में सिक्का रख कोई
रौशनी नीलाम  कर  ले   जाएगा

दर्ज करता है  जो गुजरे  काफिले
वक्त इक दिन वो शज़र ले जाएगा

सारे  बच्चों को  बिठा कर  सामने
फिर  तसव्वुर के  शहर ले जाएगा

किस की आँखों में बची है रौशनी
देखिए किसकी नज़र ले जाएगा

अब खुद को देखने की वो वहशत नहीं रही
आईना  रू-ब-रू  है  हिम्मत  नहीं   रही

ख्वाबों के फूलदान हमें  अब भी हैं  अज़ीज़
लेकिन  उन्हें सजाने की  फुर्सत नहीं  रही

जबसे  मकामे-इश्क पे  पहुंचे हैं  कामयाब
वैसी  जुनूने-इश्क की  शिद्दत नहीं  रही

आशिक भी हैं  महबूब भी  रातें भी  चाँदनी
बस अब वो बूढ़े मकबरे की  छत नहीं रही

जीने पे फिर से दौड़ के चढ़ जाए वो गुलाब
शायद  मेरी दुआ में वो ताकत नहीं  रही

चुप्पी की   सरहदों के परे वो निकल  गया
मुझ को भी बात करने की आदत नहीं रही

लौटा हूं अबके कौनसी मंजिल को छू के मैं
आवारगी  जो अब  मेरी  फ़ितरत नहीं रही
मैं तुझ से दूर भी जाऊँ तो मुझको राह नहीं
तेरी तपिश  में जला  हूँ  कहीं पनाह  नहीं

कहा बस इतना ही उसने उरूज पे ले जा कर
यहां पे  ला के  गिराना  कोई गुनाह  नहीं

धड़क उट्ठेगा अभी देखना ये दिल कमबख्त 
हजार टुकड़ों में  टूटा है पर तबाह  नहीं

वो शख्स जिसपे हमने दिल ओ जान वार दिए
वो हम-खयाल तो है पर  मेरा हमराह नहीं

अब तो बस मैं हूँ, तू है और माजी के फ़राज़
अब तमन्ना के सराबों की दिल को चाह नहीं

 ४

फानूस  के   ढलते  हुए   रंगों की  ज़बानी
सुनता  हूं   तेरे  महल  की  रंगीन  कहानी

जब  शाम ढलेगी  तो  मैं सूरज-सा  ढलूँगा
लाऊँ  कहाँ  से  माँग  के  ता-उम्र  जवानी

जब मौत मुयय्यन है यहाँ सब की  किसी दिन
फिर क़त्ल, खुदकु़शी या शहादत के क्या मानी

हमने भी बस बढ़ा ही दी जज्बात की दूकान
यारों ने  जब से बेच दिया  आँख  का पानी

गाफ़िल  को  क़यामत की फिक्र है न इंतजार
उसके  लिए  तो  चीज क़यामत  है  पुरानी




Friday, October 29, 2010

साहिर लुधियानवी की याद में

कुछ दिन पहले शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्यतिथि थी. उनके एक दोस्त जोए अंसारी ने साहिर लुधियानवी पर यह संस्मरण लिखा था. जिसमें उनकी शायरी और जिंदगी के कई नुक्ते खुलते हैं. यह ‘शेष’ पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित हुआ है. उसका सम्पादित रूप प्रस्तुत है- जानकी पुल.

बम्बई शहर के उबलते हुए बाज़ारों में, साहिलों पर, सस्ते होटलों में तीन लंबे-लंबे जवान बाल बढ़ाये, गिरेबान खोले आगे की फ़िक्र में फिकरे कसते, खाली जेबों में सिक्के बजाते घूमते फिरते थे. दो उत्तर से आये थे, एक दक्षिण से इस उम्मीद से कि वो दिन दूर नहीं जब खुद उनकी तकदीर के साथ फिल्म स्टूडियो के फाटक खुलेंगे और फिल्म इंडस्ट्री में अदब का सितारा चमकेगा.
हिंदुस्तान के बंटवारे से कोई साल भर पहले और तीन-चार साल बाद तक सेल्यूलाइड की दुनिया पर उदासी छाई रही. हर तरफ बदइन्तजामी और आपाधापी. वो दिन उगने में अभी देर थी. आखिर आखिर इब्राहीम जलीस, हमीद अख्तर और साहिर लुधियानवी, तीनों एक के बाद एक पाकिस्तान सिधार गए और तीनों ने आगे चलकर अपनी बिसात भर नाम कमाया.
मगर साहिर की रवानगी से चंद रोज पहले का एक मंज़र जो मुझे हजारों बार याद आ चुका है:
वाल्केश्वर रोड पर सज्जाद ज़हीर का मकान (जिसे कम्युनिस्ट ख्याल के बेघरों ने धर्मशाला बना रखा था), मुल्क में फसादात की हौलनाक ख़बरों पर रायजनी करते-करते हम लोग रात ढाले सो गए. हम में से एक बन्दा था जो नहीं सोया. बेकरार रहा. सुबह आँख खुली तो देखते हैं कि वो उलझे घने बालों में बार-बार कंघा फेर रहा है और आप ही आप बुदबुदा रहा है: मेरे पंजाब में आग लगी तो आसानी से नहीं बुझेगी, बड़ी बरबादी होगी.
ये साहिर लुधियानवी था. उसकी आँखें पंजाब में फसाद की आग के तसव्वुर से लाल थीं और नींद उस आग के अखबारी शोलों में जल चुकी थी.
एक बार बम्बई की तरफ अस्थायी वापसी हुई, फिर लुधियाना और वहां से लाहौर. वहीँ उसने पूछा:
चलो वो कुफ्र के घर से सलामत आ गए
खुदा की मुमलिकत में सोख्ताजनों पे क्या गुजरी.
साहिर को मुमलिकते-खुदादाद(पकिस्तान) में हुकूमत ने सियासी तौर पर नापसंदीदा, बल्कि शक भरा करार दिया. शायद वारंट ज़ारी हुआ और साहिर ख़ामोशी से देहली सरक आये.
साहिर देहली आये, तो वो मशगला साथ लाए. लिख-पढकर जीना चाहते थे, मगर उर्दू बाज़ार में ख़ाक उड़ रही थी. बाहर की सेल से मनीऑर्डर आये तो लेखक और प्रकाशक को रोटी नसीब हो. साहिर ने यहीं हाली पब्लिशिंग के मालिक से मिलकर ‘शाहराह’ नमक दोमाही मैग्जीन की बुनियाद डाली. ऐसा उम्दा तरक्कीपसंद रिसाला निकाला कि उससे पहले के सारे माह्नामे गर्द होकर रह गए. ‘शाहराह’ १९५० से १९६० तक निकला लेकिन साहिर ने कुछ समय बाद शाहराह में अपने एक असिस्टेंट और निहायत मेहनती और दिलनवाज़ शख्सियत प्रकाश पंडित को जमाया और बम्बई चले आये. बाज़ारों और दफ्तरों में भटकने के लिए नहीं बल्कि फ़िल्मी माहौल और अव्वल उसकी शर्त के साथ कबूल करने और फिर उससे अपने आपको कबूल करवाने के लिए. उन दिनों का एक वाकया खुद साहिर की जुबान से मैंने सुना था जो ज़माने की उथल-पुथल पर आज भी हंसाता है;
बम्बई आये तो फ़िल्मी दुनिया में जो अपने थे, पहले उनसे मिले कि कुछ काम मिले, आगे की राह मिले. शाहिद लतीफ़(इस्मत चुगताई के शौहर) के अच्छे दिन थे. मियां-बीवी की कमान चढ़ी हुई थी. बड़े शिष्ट, बड़े रौशन दिमाग और दोस्त नवाज़. साहिर का हाल जानने के बाद शाहिद लतीफ ने दिलदारी की और कहा, देखो साहिर, जब तक कहीं कुछ राह निकले, तुम शाम का खाना यहीं खा लिया करो, लेकिन गेट का मुआमला यह है कि फ़िल्मी गीत लिखना तुम्हारा काम नही. मैं अगर राज़ी भी हो जाऊँ तो प्रोडूयूसर, फाइनांसर का कैसे राज़ी करूँगा!
यूँ दर-ब-दर सवालों के जवाब लेते हुए आखिर उन्हें कॉलेज के ज़माने के, विभाजन के पहले के कुछ पंजाबी अहबाब मिल गए. शुरू शबाब और पंजाब ये दो रिश्ते ऐसे हैं कि जंगों के बाद भी दिलों के मिलन की खुफिया सुरंग बिछाए रखते हैं. इसलिए वह सुरंग काम आई. साहिर ने घर दुरुस्त किया- कृशन चन्दर ने उन्हें अपने बंगले का ऊपरी हिस्सा किराये पर दे दिया. घर पर मिलने-मिलाने का प्रोग्राम दुरुस्त किया. ज़ल्दी से एक कार खरीदी क्योंकि उसके बगैर प्रोड्यूसर, फायनांसर की नज़र में शायर की हैसियत ‘मुंशी लोग’ की रहती है, एस.डी. बर्मन का दिल हाथ में लिया. गाडी का स्टीयरिंग हाथ में लिया और गाडी चल निकली.
साहिर आये थे इस इरादे से कि फ़िल्मी खजाने से नाम, काम और दाम का बैंक लूटकर राहे-फरार इख्तियार करेंगे और फिर इस माले-गनीमत से उम्दा-सा अदबी रिसाला और पब्लिशिंग हाउस जमायेंगे. उनके सियासी शऊर, तेज दिमागी और दर्दमंद दिल तीनों को रुपये का नहीं कुछ कर दिखाने का अरमान था. कुछ कर दिखने के अरमान में गुरुदत्त और महेश कौल सरीखे ज़हीन और हमख्याल भी मिल गए. किसी को शुरू में गुमान भी नहीं गुज़रता कि जिस ज़मीन पर आदमी का जवान लहू और पसीना एक हो वो ज़मीन गीली हो जाती है. फिर जब उसमें फसल आने लगे तो उसे और भी सींचना पड़ता है. यहाँ तक कि ज़मीन दलदल की तरह पाँव पकड़ने लगती है. साहिर से पहले वालों का भी हश्र यही हुआ था और साहिर के लहू-पसीने से जो भरी-पूरी फसल आई, उसमें वो घुटनों-घुटनों धंस गए. यही उनकी मस्ती ने होशियारी की और सादगी में होशियारी दाखिल की. उन्होंने सेल्यूलाइड के लिए भी वही लिखना शुरू कर दिया जो कागज़ पर लिखते आये थे.
१९५१-५२ की बात है. एक दिन इत्तेफाक से फेमस स्टूडियो में मिल गए. फिक्रमंद थे. फ़िक्र या परेशानी उनके चेहरे पर कभी देखी नहीं थी. ताज्जुब हुआ. हस्बे-मामूल बोले, यार गीत के मुखड़े में फंसा हुआ हूँ. बात बन नहीं रही: ये रात, ये चांदनी फिर कहाँ
...........................................................दास्ताँ   
............................................................आसमां
बात बनाने के लिए मैं भी उनके साथ बैठ गया क्योंकि तब तक मैं भी बेतकल्लुफ शेर कह लिया करता था. उनके साथ बैठ गया लेकिन बात और बिगड़ने लगी तो उनकी तरफ से हिम्मत अफजाई के बावजूद मुखड़े के साथ तनहा छोड़ कर चल दिया.
बस यही पांच-सात साल थे, दरवाज़ों पर अव्वल दस्तक देने और फिर दरवाज़े तोड़ने और और अंदर घुसकर सद्र बनकर बैठ जाने के. साहिर के नाम का सिक्का हो गया, तमगा बन गया जिसके एक तरफ साहिर का नाम और पोर्ट्रेट था और दूसरी तरफ उनके गीत.
उर्दू अदब की महफ़िल से सिर्फ तीन हस्तियाँ हैं जिन्हें आँखों देखते फ़िल्मी नग्मानिगारी ने थोड़े-से अरसे में अपनाया, सर-आँखों पर बिठाया और उनका हुक्म माना है: आरज़ू लखनवी, मजरूह सुल्तानपुरी और साहिर लुधियानवी.... साहिर को इनमें भी फौकीयत हासिल है.
अव्वल बम्बई में न्यू थियेटर्स, कलकत्ता के शालीन और बामकसद कारनामों का माहौल न था, दूसरे उर्दू का बाज़ार उतार पर था. साहिर ने उर्दू तरकीबों पर आग्रह करके इस माहौल को बदल दिया. तीसरे ये कि साहिर ने अपने जाने-पहचाने लहजे में पंजाबी टच के ताजादम लब्बो-लहजे के साथ न सिर्फ मकबूल आम और खास गीत लिखे, बल्कि फ़िल्मी गीत लिखने को सच्चे और प्रामाणिक शायर का काम मनवा  दिया. शायर का मकाम इतना बुलंद किया कि वो मुजिक डायरेक्टर की गिरफ्त से निकल गया. कुछ ऐसा पेंच डाला कि पिछले पचास बरस के दौरान जितनी ज़िल्लत शायरी के फन की हो चुकी थी सबका हिसाब साफ हो गया. न सिर्फ ये कि म्यूजिक डायरेक्टर धुन बनाते वक्त साहिर का मुंह देखने लगे- बता तेरी रजा क्या है? बल्कि कुछ तो उसके अहसान तले आ गए और उसके गीतों से ही चमके. उनके घर आकर पूछ-पूछ कर धुनें बनाने लगे. अमीर खुसरो ने ने एक फारसी मुक्तक में किसी संगीतकार को जवाब दिया था कि मियां मुझे मौसिकी अख्तियार करने का मशविरा क्या देते हो, ये मौसिकी है जिसे अलफ़ाज़ की हाज़त है. शायर को मौसिकी की मुहताजी नहीं. साहिर ने इसे साबित कर दिखाया.
जब साहिर कबूले-आम की इंतिहा को पहुँच गए थे. १९६० और १९७० के दौरान और फिल्म इंडस्ट्री जो बॉक्स ऑफिस की ही पुजारी है, तो जैसी पुरसोज़, दर्दमंद, खुद्कलाम, कसक उनकी जाती जिंदगी, उनके अकेलेपन में रची-बसी थी... वो प्रसंशकों और जी हुजूरियों के रात-दिन के मजमों और महफ़िलों में आकर बेसुरी हो गई. तरह-तरह के लोग उनको घेरने लगे. शराबबंदी के बरसों में साहिर का फैज़ ज़ारी रहता था. सबल लगी थी, जो आये अदब से बैठे, साहिर के बड़प्पन, महानता के अफ़साने सुनाये, औरों के असली या फर्जी ऐब निकाले, लल्लो-चप्पो करे, खाने-पीने का मज़ा उठाये और अपनी राह लगे.
पैगम्बर शायद खुद को बचा ले जाते हों, किसी फनकार का यहाँ ठोकर खाना बिलकुल स्वाभाविक है. इस शहर में साहिर ने खास तरह के लोगों में बड़ी हैसियत हासिल कर ली. कुछ तो बाल-बच्चों समेत उसके यहाँ पड़े रहते. कुछ ने साहिर की-सी छड़े-छांट की जिंदगी अपना ली और यहीं पसर गए और कुछ साथियों ने सितम ये किया कि अपनी कला और रोजी की गाड़ी साहिर की नाज़ुकमिजाज़ कार के पीछे बाँध ली. धक्के तो लगने थे.
साहिर को दुनिया भर से बुलावे आते थे. मुल्क के बाहर वे इस खौफ से न गए कि सफर हवाई जहाज़ का होता था. जहाँ भी हवाई जहाज से जाने की बात आती वो वादा करके टाल जाते. जहाँ जाना ज़रूरी होता वहां एयर के बजाय कार इस्तेमाल करते. बिहार के अकाल के सिलसिले में तो उन्होंने हमख्याल कलाकारों की एक टीम के साथ हज़ारों किलोमीटर का दौरा कार से ही किया. हज़ारों शैदाई जगह-जगह उन्हें घेरते थे. कॉलेज के लड़के-लड़कियां जो दरअसल साहिर की जादूगरी से सही मुखातिब थे, जिनके कच्चे और मीठे दर्द साहिर के कलाम में अपना इज़हार पा चुके थे वो साहिर को देखते ही औरों को भूल जाते थे. एक बार मैंने टहोका लिया यो वे भड़क कर बोले, यहाँ क्या अंसारी साहब, किसी बड़े मजमे में देखिये कि नौजवान किस्से ऑटोग्राफ लेते हैं, आप जैसों से या मुझसे?
मेरी जुबान से निकला- साहिर साहब, दुआ कीजिये कि हिन्दुस्तान का तालीमी और जेहनी मेयार यहीं ठहरा रहे.
आपसी एहतराम और कद्रदानी ने कभी आप और साहब को तुम या तू तक नहीं जाने दिया था. उस दिन न जाने क्या बात थी कि वो तुम तक उतर आये.
अंदरूनी शराफत ने उन्हें दूसरे दिन टोका होगा. जनवरी, १९६९ में ग़ालिब दे पर हम औरंगाबाद हवाई जहाज से गए. मेरा सर्जिकल ऑपरेशन हुआ था. मुझे तकरीबन लिटाकर ले गए. दिन को आराम करने लेटे ही थे कि साहिर मुजिक डायरेक्टर खैयाम के साथ कर से आ पहुंचे. उनके लिए पहले से माकूल इंतज़ाम नहीं था. नाराज़ हो गए. मैंने कहा, मैं दिन में नहीं सोता, आप यहाँ इस कमरे में इस बिस्तर पर आ जाइये. आ तो गए मगर बिगड़े रहे.
शाम को इजलास में मेहमान बहुत देर से पहुंचे. इजलास टूल पकड़ गया. कॉलेज के कर्ता-धर्ता रफीक जकारिया और चीफ गेस्ट एस.बी. चौहान दोनों स्टेज से देख रहे थे कि मजमा नाराज़ है. उनकी कुव्वते-बर्दाश्त जवाब दे रही है. मेरा नाम पुकार दिया. मैंने कुछ तहरीर, कुछ तक़रीर से हाजिरीन को बहला लिया. उबलता हुआ मजमा शांत हो गया.
जलसे के बाद जब हमारे कमरे में कई मेहमान लब तार कर रहे थे, साहिर आ पहुंचे. आते ही ऊंचे सुरों में दाद दी. कहा, यार किसी में कोई कमाल हो तो छुप नहीं सकता. देख लिया आज और हाँ, मैं इसलिये आ गया कि नज़्म कही थी. तीन-चार मिसरे नहीं जम रहे हैं. ज़रा राय तो दीजिए अभी पढनी है... राय-वाय तो क्या देनी थी. असल में वो उस पुरानी वक्ती रंजिश को धो डालना चाहते थे. यही हुआ. जब नज़्म सुनाकर बैठे तो मेरी तरफ झुककर बोले, आप ही के मिसरों पर ज्यादा दाद मिली है. अब तो खुश? मैं इतना बेवकूफ नहीं था कि मिसरों को अपना समझकर फूल जाता. वो भी तो साहिर के ही थे. मैंने तो सिर्फ दाया का काम किया था. अलबत्ता साहिर के इस बर्ताव ने मन मोह लिया.
ये मनमोहक जब दिल और गुर्दों के मरज़ का शिकार हुआ तो उतना भी न घबराया जितना हवाई जहाज के परवाज़ से. दिल उनका बारहवीं क्लास के ज़माने से ही मरज़ पकड़ चुका था और इस मरज़ की पहचान शायरा अमृता प्रीतम कर चुकी हैं. उन्होंने वो लिखा जो शायद ही कोई हिन्दुस्तानी औरत लिख सके, मगर नुस्खा न लिखा, अच्छा ही किया.
साहिर ने शायरी और उदारता के अलावा जिंदा रहने के और कौन-कौन से जतन किये मालूम नहीं, लेकिन वे मौत से खौफज़दा नहीं हुए. यहाँ तक कि मौत ने भी उनसे बराबर का व्यवहार किया. अचानक उठा ले गई. गली-गली साहिर का नाम इतना गूंजा हुआ है कि यकीन नहीं आता कि साहिर को सिधारे इतने साल हो गए.           


    

Wednesday, October 27, 2010

75 साल का ‘अनटचेबल्स’

‘अनटचेबल्स’ के प्रकाशन के ७५ साल हो गए. मुल्कराज आनंद के पहले उपन्यास ‘अनटचेबल्स’ को आधुनिक भारतीय अंग्रेजी के भी आरंभिक उपन्यासों में शुमार किया जाता है.  दलित साहित्य की पहचान और प्रतिष्ठा के इस दौर में यह याद किया जाना चाहिए कि भारतीय अंग्रेजी के इस कद्दावर लेखक का पहले उपन्यास की कथा का आधार एक अछूत के जीवन का एक दिन था. आज भारतीय अंग्रेजी लेखन के बारे में सामान्य तौर पर यह कहा जाता है कि उसका अधिकांश भारतीय समाज के वास्तविक यथार्थ से कटा हुआ है. ऐसे में इस पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि भारतीय अंग्रेजी साहित्य का आरम्भ ऐसे उपन्यास से हुआ था जिसकी कथा के केंद्र में दलितों का जीवन था. समाज में सबसे निम्न समझे जाने वाले तबके की दुरवस्था का वर्णन था.
मुल्कराज आनंद ने यह उपन्यास कैसे लिखा इसकी कथा भी बड़ी दिलचस्प है. कहते हैं कि जब वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद लन्दन विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में शोध कर रहे थे तब उनकी मित्रता इ. एम. फोर्स्टर, वर्जीनिया वुल्फ जैसे अंग्रेजी के धाकड़ लेखकों से हुई. कहते हैं कि वहीँ ब्लूम्सबरी ग्रुप के लेखकों के सुझाव पर उन्होंने ‘अनटचेबल्स’ लिखने के बारे में तय किया. कहते हैं कि उन दिनों वे जो भी लिखते थे फोर्स्टर को सुझाव के लिए दिखाते थे. एक दिन फोर्स्टर ने उनसे कहा कि कुछ ऐसा लिखो जिसमें भारतीय समाज का यथार्थ हो, उसके जीवन की विडंबनाओं का चित्रण हो. तब जाकर मौलिक लेखक कहलाओगे. १९२९ में पीएचडी करने के बाद वे भारत आये और यहाँ महात्मा गाँधी के विचारों से उनको अवगत होने का मौका मिला. महात्मा गाँधी के अछूतोद्धार के कार्यक्रम को जानने का मौका मिला. उनको अपने बचपन की एक घटना याद आई जब एक अछूत समझे जाने वाले लड़के ने उनका स्पर्श किया था और उसकी पिटाई हुई थी. भारत वापस लौटने के बाद उन्होंने महसूस किया कि जाति-व्यवस्था अभी भी समाज में उसी तरह है, उसकी जकडबंदी समाज में कम नहीं हुई है. तब उन्होंने यह उपन्यास लिखना शुरू किया.
लिख तो लिया लेकिन छपवाना इतना आसान नहीं था. कहते हैं १९ प्रकाशकों ने बारी-बारी से इस उपन्यास को छापने से मन कर दिया था. वह भी उस लेखक मुल्कराज आनंद के उपन्यास को जिसको लेखक के रूप में पहचान मिलने लगी थी. लन्दन में रहते हुए वे टी. एस. इलियट की पत्रिका ‘क्रिटेरिया’ में पुस्तक समीक्षाएं लिखते थे. कुछ कहानियाँ-कुछ कवितायेँ लिख चुके थे. लेकिन ‘अनटचेबल्स’ छपवाना मुश्किल पड़ रहा था. आखिरकार इ. एम. फोर्स्टर की भूमिका के साथ उसे लन्दन का एक प्रकाशक छापने को तैयार हो गया. प्रसंगवश, यह बता दिया जाये कि फोर्स्टर वह लेखक थे जिनका आरंभिक भारतीय अंग्रेजी साहित्य के विकास में बड़ा योगदान रहा है. बाद में उन्होंने अहमद अली के उपन्यास ‘ट्विलाइट इन डेल्ही’ के प्रकाशन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. फोर्स्टर ने ‘अनटचेबल्स’ की भूमिका में लिखा था कि इस तरह का उपन्यास केवल एक भारतीय ही लिख सकता था. वह भारतीय जिसने दूर से उस भारत को देखा हो. उन्होंने लिखा कि कोई यूरोपीय इस कृति को इसलिए नहीं लिख सकता था क्योंकि उसे भारतीय समाज के इस यथार्थ का वैसा ज्ञान नहीं हो सकता तथा कोई दलित इसकी रचना इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह आत्मदया का शिकार हो जाता.
विषम सामाजिक यथार्थ की यथार्थ-कथा होने के कारण उनके इस पहले उपन्यास ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया. लेखक के रूप में उनकी पहचान को पुख्ता किया. वास्तव में, ‘अनटचेबल्स’ अछूतों के जीवन की कोई महाकाव्यात्मक कथा नहीं कहता है, न ही विस्तृत रूप में उनके जीवन का इसमें अंकन किया गया है. इसमें तो बाखा नामक एक भंगी या मेहतर के जीवन के एक दिन की कथा के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि वास्तव में, समाज के सबसे अंतिम पायदान के खड़े इन लोगों का जीवन कितना सख्त होता है, किस तरह कदम-कदम पर वह उनके लिए अपमानों की दास्तान बनाता चलता है. उनको छोटी समझी जाने वाली जाती में जन्म लेने की सजा भुगतनी पड़ती है. इसी बात को लेखक ने उसके जीवन के एक दिन के माध्यम से दिखलाने का प्रयास किया है. मैला साफ़ करने के अपने नीच समझे जाने वाले काम के कारण उसके प्रति समाज के तथाकथित सभ्य समझे जाने वाले लोग जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं. अगर किसी से गलती से वह ‘छू’ जाये तो उसे पाप का भागी मन जाता. भोजन-पानी जैसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उच्च-जाति पर निर्भर रहना पड़ता.
लेकिन इस छुआछूत के अपने विरोधाभास भी थे. इसे उपन्यास में उन्होंने पंडित कालीनाथ की कथा के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. पंडित कालीनाथ अछूत-कन्या सोहिनी को अकेले में अपने करीब लाने का प्रयास करता है, लेकिन जब वह इसका विरोध करती है तो वह यह कहने लगता है कि सोहिनी ने उसे अपवित्र कर दिया-उसको छू दिया. सोहिनी लोगों को सच बताने का प्रयास करती है लेकिन लेकिन उसकी बात कोई नहीं सुनता. उपन्यास में उनकी दारुण दशा का केवल वर्णन ही नहीं है उनके लिए आशा का एक दीप भी झिलमिलाता दिखाई देता है.
बाखा कहानी वाले दिन गाँधी की सभा में जाता है जहाँ वह कुछ लोगों को यह बातचीत करते सुनता है. वे आधुनिक कमोड के बारे में बातें कर रहे होते हैं जिसमें मनुष्य का मल फ्लश कर दिया जाता है. उसे लगता है कि कमोड आयेगा तो उसके जैसों को अपने अमानवीय जीवनावस्था से मुक्ति मिल जायेगी. उसे उस दिन यह अहसास होता है कि उसके समाज की मुक्ति धर्म-परिवर्तन या वहां से भागने में नहीं है. वह मुक्ति कमोड की आधुनिक तकनीक में है. परंपरा के विषम बंधनों से मुक्ति आधुनिकता को अपनाने में है- कहीं न कहीं उपन्यास इस तरह का सन्देश भी देता दिखाई देता है.
कहते हैं मेहतर के जीवन के कुछ पहलुओं का चित्रण इस उपन्यास में इतनी गहराई से किया गया है कि काफी दिनों तक इसने भारत के सामाजिक भेदभाव की एक छवि पश्चिम में रूढ़ कर दी. मजेदार बात यह है कि बरसों बाद जब हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता मार्लन ब्रांडों ने अपनी जीवनी लिखी ‘द सांग्स मई मदर टौट’ तो उसमें अपनी भारत यात्रा के बारे में भी लिखा है. उस यात्रा-वर्णन में उन्होंने बिहार यात्रा के वर्णन के क्रम में वहां के समाज में प्रचलित छुआछूत का भी वर्णन किया है. उसने दावा तो यह किया कि बिहार की अवस्था का उसने आँखों देखा वर्णन किया है मगर वह वर्णन आश्चर्यजनक रूप से इसी उपन्यास के वर्णनों से मिलता-जुलता है.
बहरहाल, आज जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी-लेखक अपने लेखन से अधिक उसको लेकर मिलने वाले एडवांस को लेकर चर्चा में रहते हैं वैसे में यह समझ पाना मुश्किल प्रतीत होता है कि मुल्कराज आनंद जैसे भारतीय अंग्रेजी के आरंभिक लेखक की पहचान अपने विषय, अपने लेखन के लिए थी. वे धन कमाने या विदेशों में लोकप्रिय होने के लिए नहीं लिख रहे थे. उनका उद्देश्य औपनिवेशिक भारत की विडंबनाओं को सामने लाना होता था. यह बताना होता है कि अंग्रेजी शासन द्वारा भारत को आधुनिक बनाने के तमाम दावों के बावजूद उसमें किस हद तक भेदभाव व्याप्त था. किस कदर शोषण था.
‘अनटचेबल्स’ उपन्यास इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहा जा सकता है.
  

Monday, October 25, 2010

जयप्रकाश नारायण की एक कहानी 'टामी पीर'

सम्पूर्ण क्रांति के नायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बारे में यह कम लोग जानते हैं कि उन्होंने कुछ कहानियां और कवितायेँ भी लिखी थीं. अक्टूबर के महीने में जन्म लेने वाले और इसी महीने अंतिम सांस लेने वाले लोकनायक की पहली प्रकाशित कहानी   'टामी पीर' प्रस्तुत है- जानकी पुल.


शहर के बाहर एक मशहूर पीर का मकबरा है. जिस दिन पीर साहब समाधिस्थ हुए थे उस दिन से हर साल मेला लगता. हिंदू-मुसलमान, मर्द-औरत, बच्चे-बूढ़े सभी जाते, मज़ार पर फूल चढ़ाते, माता टेकते, पैसे नज़र करते और फिर मेले का तमाशा देखते. मेले के दिन के अलावा रोज दस-पांच आदमी मज़ार पर जाते ही.
मकबरे तक शहर से जो सड़क जाती थी, उस पर शहर और मकबरे के बीच एक और छोटी-सी कब्र थी. कब्र पर जो पक्का चबूतरा बना था, उसे देखने से मालूम होता मानो किसी बच्चे की यादगार हो. जो लोग पीर साहब की मज़ार पर पूजा करने जाते वे इस छोटी कब्र के पास भी दम रुक जाते, दो-चार फूल वहां भी चढ़ाते और दुआएं मांगते. मशहूर था की वह मज़ार किसी टामी पीर साहब की है, जो बड़े पीर साहब के शागिर्दों में थे, लेकिन ठीक-ठीक पता किसी को न था. यह भी कभी-कभी सुनने में आता था कि पीर साहब की गद्दी पर जो नए पीर जानशीन थे वे लोगों को मना करते थे कि टामी पीर की मज़ार की पूजा न करें, लेकिन वजह पूछने पर चुप रह जाते थे. कुछ भी हो, सिवा उनके थोड़े से शागिर्दों और पास आने-जाने वालों के और कोई उनकी बात सुनता न था, बल्कि यह कहना ठीक होगा कि जानता ही न था. नतीजा यह होता कि मकबरे को जाते समय टामी पीर की कब्र पर फूल चढ़ते ही, चिराग जलते ही, दुआएं मांगी ही जाती.
मैं भी एक रोज सिर के ख्याल से मकबरे की और निकल गया. रास्ते में वह छोटी कब्र भी मिली. लौटते समय दो-चार मुसलमानों का साथ हो गया, जो पीर साहब से दुआएं मांगकर लौट रहे थे. बातचीत होने लगी. पीर साहब का गुणगान हुआ, उनकी दुआओं में जो ताकत थी उसका ज़िक्र हुआ. एक साहब शायर मिजाज़ थे, उन्होंने दो-चार शेर कहे. इतने में वह छोटी मज़ार आ गई. मैंने उसके मुताल्लिक दरयाफ्त किया. पता चला एक टामी पीर साहब थे, उनकी ही मज़ार है. टामी साहब शायद बड़े पीर के मुरीदों में थे.
मुझे टामी नाम खटका, मैंने उनके सम्बन्ध में कई सवाल किये. शायर साहब के अलावा हमारे बाकी सब साथी अनपढ़ गंवार थे. उन्हें ज्यादा पता तो था नहीं. शायर साहब कुछ जानते हों मालूम नहीं, लेकिन उन्होंने कुछ बताया नहीं. फिर भी उनके बोलने की तर्ज़ से मालूम हुआ वह टामी साहब की कोई खास कद्र नहीं करते. उनकी मजार पर वह वह कभी जाते भी नहीं, हालांकि इश्कमिजाजी का मज़ा लेने के लिए वह मकबरे को अक्सर जाते.
टामी नाम के सबब से और शायर साहब के हाव-भाव से टामी साहब का पूरा हुलिया जानने को मैं बेचैन हो पड़ा. दो-चार हफ़्तों की छानबीन के बाद जो कुछ मालूम हुआ, उससे कभी तो हँसने को जी चाहे, कभी रोने को. हमारा अन्धविश्वास भी हमें कहाँ ले जाकर फेंक देता है.
टामी पीर की कब्र के पास ही एक पक्का बंगला था, उजाड़ और बेमरम्मत, छप्पर सड़ कर गिरा जा रहा था. चहारदीवारी की ईंटें तितर-बितर हो रही थीं. मकान की यह हालत इसलिए हो चली थी कि एक तो शहर तनज्जुली पर था, वहां का व्यापार मंदा पड़ गया था और धीरे-धीरे शहर का शहर उजड़ा जा रहा था. वह बंगला भूतों का बसेरा था. किरायेदार तो कोई आता न था, मकानमालिक भी लावारिस मर गया. उसके वंश के और लोग दूसरे शहर में जा बसे. अब गौर से देखने पर मालूम हुआ कि वह कब्र पहले उस बंगले के अहाते में बनी थी. इस वक्त जो ईंट की एक नीची सी चहारदीवारी उसके चारों तरफ खींची थी वह उस बंगले की चहारदीवारी की ईंटों से ही चुनी गई थी. लेकिन सरसरी निगाह से देखने पर यही जान पड़ता था कि बंगले से कब्र का कोई सम्बन्ध नहीं था.
बंगले और कब्र का इस तरह का ताल्लुक कायम हो गया तब मैंने यह पता लगाने की कोशिश की कि बंगले का पिछला किरायेदार कौन था. मकान मालिक के जो रिश्तेदार दूसरे शहर में चले गए थे, उनसे मिला. वहां सिर्फ इतना ही मालूम हुआ कि ७०-८० वर्ष हो गए, एक गोरा साहब किराये पर उस मकान में रहता और अफीम का व्यापार करता था. बही-खाता देखने पर पता चला कि उसका नाम रॉबिन्सन था. खोज-ढूँढ कर यह भी मालूम हुआ कि साहब अपने मुंशी से हर महीने की आठवीं तारीख को किराया भिजवा दिया करता था. मुंशी जी के दस्तखत कई चिट-पुर्जों पर था, जिनका शोध करने पर पता चला कि उनका नाम था नौरंगीलाल.
अब यह सवाल हुआ कि ये नौरंगीलाल थे कहाँ के और अब इनके घर कोई ज़िंदा है या नहीं? वहां तो और कुछ पता चला नहीं, इसलिए मैं अपने शहर को वापस आ गया. वहां बहुत पूछताछ करने पर अफीम का बूढ़ा दुकानदार मिला, जिसका बाप रॉबिन्सन के साथ कारोबार करता था.
अफीम की खेती बंद हो जाने के सबब से अफीम का व्यापार बहुत मंदा पड़ गया था, लेकिन यह दुकानदार अफीम बेचने का लाइसेंस लेकर एक छोटी सी दुकान लिए बैठा था. नौरंगीलालाल का पता तो उसको न था, लेकिन उसने बताया कि शहर का कोई एक बड़ा रईस हीरालाल है, जिसके बाप-दादों ने अफीम के व्यापार में लाखों रूपए बनाए थे. मैं हीरालाल की गद्दी पर गया. वहां उनके मुनीम से पता चला कि हीरालाल तो नौरंगीलाल का ही पोता है. मुनीम की उम्र कोई सत्तर साल की होगी. मैंने सोचा, नौरंगीलाल के घर का भेद इसे ज्यादा कौन जानता होगा. इधर-उधर की बातें करते-करते रॉबिन्सन के मुताल्लिक बातें होने लगीं- ‘नौरंगीलाल रॉबिन्सन के मुंशी थे और सच पूछिए तो बाबूजी, तो साहब को बूढ़े लाला ने बड़ा उल्लू बनाया था. ऐसे गहरे हाथ मारे कि साहब को पता भी न चला. रुपयों का ढेर उठाकर घर में धर लिया. साहब तो आखिरी दम तक मुंशी जी की ईमानदारी का गुणगान ही करता रहा.’ मैंने साहब के बंगले की बात छेड़ी. बूढ़ा मुनीम मुस्कराया, ‘बाबूजी, भूत-वूत कुछ भी नहीं था वहां. मकानमालिक के पट्टीदारों ने यह सब तमाशा रचा था, ताकि उनकी यह जायदाद खत्म हो जाये. वह बेचारा तो मिट ही गया, ससुरे खुद भी भीख मांगने लगे. दूसरों का जो बुरा करता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता बाबूजी.’
मेरी आँखों में ऐसे कई महानुभावों के चित्र नाच उठे जो दूसरों का खून पीकर मोटे बने हुए थे, लेकिन मुनीम की बातों पर मैं चुप ही रहा, बल्कि सर हिलाकर गंभीरता के साथ अपनी सहमति भी प्रकट की. कुछ देर बाद मैंने टामी पीर का ज़िक्र किया. मुनीमजी खिलखिलाकर हँस पड़े, बोले- ‘आपको नहीं मालूम उस पीर का भेद? आधा शहर तो जानता है.’
मैंने कहा- ‘मैं तो हफ़्तों से इसी छानबीन में लगा हूँ, लेकिन अब तक आपके सिवा मुझे कोई ऐसा न मिला जिसे उसका पता हो.’
बूढ़े ने मुझे अचरज भरी आँखों से देखा. एक ठंढी सांस लेकर बोला- ‘हाँ, अब पुराने लोग हैं ही कहाँ? और यह शहर भी तो उजड़ गया. तो लीजिए, मैं आपके दिल की गुदगुदी मिटाए देता हूँ. टामी पीर रॉबिन्सन साहब का एक प्यारा कुत्ता था. उस वक्त उसे पीरी न मिली थी, सिर्फ एक कुत्ता ही था, लेकिन बहुत अच्छी नस्ल का और सुनते हैं- बड़ा खूबसूरत और बहादुर था. साहब और उसकी मेम उस कुत्ते को जी-जान से प्यार करते. निःसंतान होने के कारण सारा लाड-प्यार उस कुत्ते पर ही न्योछावर कर देते. दुर्भाग्यवश, वह कुत्ता बीमार हुआ और इस दुनिया से चल बसा. साहब और उसकी मेम के शोक का आप अंदाज़ा कर सकते हैं. उन्होंने अपने अहाते के एक कोने में उसे दफनाया और उसकी समाधि का एक अच्छा सा चबूतरा बनवा दिया. सुना है, सुबह को बाग से फूल तोड़कर मियां-बीवी उस कब्र पर रोज रखा करते.’
‘अच्छा यह बात है? तो आज हम और हमारे मुसलमान भाई एक कुत्ते की पूजा कर रहे हैं. मैं तो इसका भंडाफोड किये बगैर न रहूँगा.’ मेरे ये उदगार सुन बूढ़ा मुनीम थोड़ी देर चुपचाप बैठा रहा. फिर धीरे से बोला- ‘जाने दीजिए, बाबूजी, इससे आपको क्या फायदा होगा? जो लोग टामी पीर की कब्र पर आज दुआएं मांगने और श्रद्धा के फूल चढाने जाते हैं, वे थोड़े ही जानते हैं कि वह एक कुत्ते की मज़ार है. उन्हें तो किसी नेक पाक पीर का ही ख्याल रहता होगा. सिजदे और प्रार्थनाओं से उनके दिल का मैल कुछ न कुछ धुलता ही होगा.’
सहसा मैं उस बूढ़े की बात का जवाब नहीं दे सका. कुछ देर चुप बैठा रहा. फिर मुनीम जी को बहुत धन्यवाद देकर कुछ सोचता-सोचता अनमना सा घर लौट आया.  


प्रभात खबर से साभार             

Saturday, October 23, 2010

मौन-सा अपने ही लोगों का करैक्टर हो गया.

वीकेंड  कविता में इस बार प्रस्तुत है व्यंग्य-कवि संजय गौतम की गज़लें. काका हाथरसी की तर्ज़ पर उनका अनुरोध है इनको हज़ल कहा जाए. आइये उनकी हज़लों का रंग देखते हैं.

एक
पहले जो अपना यार था, अब कैलकुलेटर हो गया,
दो जमा दो में किये, दस गिन के सैटर हो गया.

जब कभी ग़फ़लत हुई, वो देख के मुस्का दिये,
मामला संगीन भी, तत्काल बैटर हो गया.

कल ही तो उन सबने ठाना, फिर भिड़ें राम-ओ-रहीम,
मौन-सा अपने ही लोगों का करैक्टर हो गया.

कौन सी गलियों में भटका है फिरे ये पूछ्ता,
मजनूँ जी, लैला का तो न्यारा ही सैक्टर हो गया.

कल ही तो खुद से कहा था, कर लिया है फैसला,
 राह में साकी मिली, सो फिर से मैटर हो गया.

जम्हूरियत के पलँग को जनता निहारे बार-बार,
क्या हुआ दो-चार पायों में जो फ्रैक्चर हो गया.

 काठ की बेशक मगर पर  किस्मत-ए-कुर्सी अज़ीब,
'संजय' किस पर कौन बैठा, बस ये फैक्टर हो गया

दो 
कोई तो मजनूँ कहता है, कोई राँझा समझता है.
मगर बातें समोसे की तो आलू ही समझता है.

तू इतना दूर होकर भी, मेरे दिल में ही रहती है,
तेरा बापू भले खुद को तेरा जेलर समझता है.

हम इंसान ही हैं, नाम जो दे दें किसी शै को,
कहाँ कोई गधा खुद को, गधा हरदम समझता है?

चले जो चाँद पर सरपट, फिसलना तय हुआ जानो,
कि ज़ुल्फों की ज़फाओं को तो कँघा ही समझता है.

कमीजें बीस सी डाली हैं, कपड़ा, दो ही का लेकर,
‘संजय’ ग़मशुदा सेहत को तो बस टेलर समझता है.

Thursday, October 21, 2010

रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास में आखिर ऐसा क्या है?

आखिर भारतीय मूल के कनाडाई लेखक रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास सच ए लांग जर्नी  में ऐसा क्या है कि शिव सेना के २० वर्षीय युवराज आदित्य ठाकरे ने मुंबई विश्वविद्यालय के सिलेबस से बाहर करवाकर अपने राजनीतिक कैरियर के आगाज़ का घोषणापत्र लिखा.कह सकते हैं कि शिव सेना की युवा सेना के प्रमुख बनने का जश्न उन्होंने उस घटना के माध्यम से बनाया. आश्चर्य इस बात से हुआ कि महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने पाठ्यक्रम से पुस्तक हटाये जाने की इस घटना का समर्थन किया. आखिर ऐसा क्या है रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास में कि उसके विरोध को लेकर शिवसेना और कांग्रेस दोनों एकमत दिखाई दे रहे हैं?
सबसे पहले तो यह निवेदन कर दूं कि यह राजनीतिक उपन्यास नहीं है.इसमें मुंबई के खोदाबाद बिल्डिंग में रहने वाले गुस्ताद नोबेल की कहानी है जो बैंक में क्लर्क है और बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रहा है. अपनी पत्नी और तीन बच्चों को पालने के लिए संघर्ष कर रहा है. कहानी की पृष्ठभूमि ७० के दशक की है जब बंगलादेश युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी को दुर्गा के रूप में बताया जा रहा था, इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज इंदिराजैसे नारे गढे जा रहे थे. मजेदार बात यह है कि उपन्यास में गुस्ताद और उसके मित्र नेहरु-गाँधी परिवार को लेकर अधिक कटु हैं बजाय शिव सेना के. वास्तव में, कांग्रेस और नेहरु-गाँधी परिवार से मोहभंग शुरू होने का वही दौर था. उपन्यास में पारसी समाज की कहानी है इसलिए इंदिरा गाँधी के स्वर्गीय पति फिरोज गाँधी को लेकर उपन्यास में स्वाभाविक सहानुभूति है. एक जगह गुस्ताद कहता है कि नेहरु ने फिरोज गाँधी को घर से इसलिए निकलवाया क्योंकि वह प्रधानमन्त्री के घर में रहते हुए भी कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने लगा था, गरीबों-मजलूमों की बात करने लगा था जबकि नेहरु उस विचारधारा से दूर जा रहे थे. इसीलिए नेहरु ने अपनी बेटी इंदिरा और फिरोज गाँधी में दूरी पैदा की और आखिरकार उसे घर से ही निकाल दिया. अनेक सन्दर्भों में कांग्रेस सरकार और नेहरु-गाँधी परिवार पर उपन्यास के पात्र चुटकियाँ लेते दिखाई देते हैं. एक जगह पर दिन्शा और दिलनवाज़ की बातचीत के दौरान दिन्शा कहता है कि फिरोज गाँधी को नेहरु ने कभी भी पसंद नहीं किया. वह नहीं चाहते थे कि उसके प्रेम में पागल उनकी बेटी उससे शादी करे. इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी का घर उजाड़ दिया. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि फिरोज गाँधी को पड़ा दिल का दौरा भी वास्तविक नहीं था. यह भी आता है कि इंदिरा और उसका बेटा तमाम तरह के भ्रष्टाचार में संलग्न है और यहाँ तक कि स्विस बैंकों में उनके खाते भी हैं. दिलनवाज़ कहती है कि जब लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई थी तब भी तमाम तरह की बातें की जा रही थीं.
वास्तव में, जीवन के २३ साल मुंबई में बिताने वाले रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यासों में पारसी समाज समाज का गहन और यथार्थवादी चित्रण होता है और अगर इस तरह के प्रसंग उनके उपन्यासों में आते हैं तो इसका कारण भी यही है कि इसके माध्यम से वे यह दिखाना चाहते हैं कि अल्पसंख्यक समाज के सबसे बड़े हितैषी समझे जानेवाले नेहरु-गाँधी परिवार और कांग्रेस पार्टी को लेकर उस दौर में भी पारसी समाज क्या सोचती थी जब गरीबी हटाओ का नारा देकर इंदिरा गाँधी ने देश में उम्मीद की एक नई लहर पैदा कर दी थी. लेकिन अपने समुदाय के नायक फिरोज गाँधी की बर्बादी को पारसी समाज बरसों बाद भी नहीं भूल पाया था इसीलिए वह इंदिरा गाँधी को भी माफ नहीं कर पाया था. जिसने प्रधानमन्त्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए फिरोज गाँधी से किनारा कर लिया था. यह उपन्यास है कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं इसलिए इसमें से कुछ सच हो यह कोई आवश्यक नहीं क्योंकि अंततः उपन्यास का स्वरुप गल्पात्मक होता है. हो सकता है उसमें लिखी गई हर बात सच हो लेकिन उसके सच होने का दावा कदापि नहीं किया जा सकता है.
लेकिन यह सब लिखने के दौरान शायद मैं भूल ही गया कि इस उपन्यास को मुंबई विश्वविद्यालय के के वैकल्पिक पाठ्यक्रम से हटवाने में कांग्रेस की भूमिका नहीं थी बल्कि शिवसेना के यूथ आइकन २० वर्षीय आदित्य ठाकरे ने उसके माध्यम से अपना और अपने परिवार का राजनीतिक रुतबा दिखाया है. तो ज़ाहिर है उन्होंने इसलिए तो इस पुस्तक को पाठ्यक्रम में रखे जाने का विरोध नहीं किया होगा कि इसमें नेहरु-गाँधी परिवार को लेकर कटूक्तियां हैं. नहीं.
असल में उपन्यास में शिवसेना और और उसके मुखिया बाल ठाकरे की भी खबर ली गई है. लेकिन इसके लिए उस पृष्ठभूमि को भी समझना होगा. मुंबई भारत का सबसे पुराना कोस्मोपौलिटन शहर रहा है. जहाँ अलग-अलग समुदायों के लोग न सिर्फ रहते आए थे बल्कि मुंबई के उत्थान में उनका भी वैसा ही योगदान रहा है. पारसी समाज तो मुंबई की पहचान का हिस्सा रहा है. लेकिन ७० के दशक में मराठी माणूस के नाम पर शिवसेना ने अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ जिस तरह से जिहाद बोला उससे पहली बार यहाँ रहने वाले पारसियों के मन में भी मुंबई को लेकर बेगानापन का भाव भरने लगा. मन में संशय का भाव भरने लगा. एक जगह गुस्ताद अपने बेटे सोहराब के भविष्य की चिंता करते हुए कहता है कि फासिस्ट शिव सेना और मराठी भाषा की राजनीति के कारण अल्पसंख्यकों का यहाँ यानी मुंबई में कोई भविष्य नहीं रह गया है. आगे पता नहीं क्या होनेवाला है. एक और प्रसंग में शिवसेना के नेता को हिटलर और मुसोलिनी के पूजक के रूप में याद किया गया है.   
लेकिन यह उपन्यास की मूल कथा नहीं है. यह तो उसके पारसी चरित्रों के मन के संशय हैं, अविश्वास है, मन में बढ़ता बेगानापन है जो इस तरह के संवादों के माध्यम से प्रकट होता है. बात रोहिंटन मिस्त्री और उनके उपन्यास की हो रही है तो मैं बता दूं १९९१ में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास सच ए लांग जर्नी को पढते हुए मुझे पता नहीं क्यों पेस्तनजी फिल्म की याद आ जाती है. शायद इसका कारण यह है कि उनके इस उपन्यास में पारसी समाज के खान-पान, उनके रहन-सहन, उनकी परम्पराओं का इतनी गहनता से वर्णन किया गया है कि उससे कहीं-कहीं तो बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है लेकिन कहीं-कहीं वह उपन्यास को बोझिल भी बना देता है. उपन्यास के आरम्भ में ही चिकन लाने और उसे पकाने का इतना लंबा वर्णन है कि कि उबाऊ लगने लगता है. वैसे अगर पारसी समाज के रीति-रिवाजों, परम्पराओं, खान-पान के बारे में जानना हो तो यह उपन्यास उसका एक विश्वसनीय स्रोत है.
पारसी समाज मुंबई की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है उसके गुस्ताद और उसके परिवार के माध्यम से उसके जीवन-संघर्ष को लेखक ने उपन्यास में बड़ी बारीकी से उकेरा है. उपन्यास को आत्मकथात्मक भी कहा जा सकता है क्योंकि कथानायक गुस्ताद की ही तरह रोहिंटन मिस्त्री भी बैंक में क्लर्क रह चुके थे. खैर, सच ए लॉन्ग जर्नी ही वह उपन्यास है जिसने रोहिंटन मिस्त्री को विश्वप्रसिद्ध बना दिया. एक कद्दावर लेखक के तौर पर स्थापित कर दिया. लेकिन फिलहाल यह चर्चा का कारण नहीं है.
मारियो वर्गास ल्योसा ने लिखा है कि उपन्यासकार अपने उपन्यास में एक कल्पित समाज की रचना करता है जो वास्तविक समाज के समतुल्य होता है तथा जितनी उसकी वास्तविक समाज से समानता होती है उतना ही वह सफल होता है. लेकिन सच ए लॉन्ग जर्नी के गल्पात्मक सत्य की वास्तवक समाज से ऐसी समतुल्यता है कि उसने परस्पर-विरुद्ध दो ध्रुवान्तों को एकमत कर दिया है. कहा जाता है कि साहित्य लेखन इसीलिए सबसे मुक्त विधा होती है क्योंकि उसमें लेखक को कुछ भी लिखने की स्वतंत्रता होती है क्योंकि अंततः उसमें सब काल्पनिक होता है. लेकिन यह घटना बताती है कि कभी-कभी कल्पना भी यथार्थ पर भारी पड़ जाता है.
सोचता हूँ कि कहीं यह नए प्रकार की सेंसरशिप की शुरुआत तो नहीं है. कुछ अरसा पहले इसी तरह लेखक कृष्ण बलदेव वैद को अश्लील ठहराने के क्रम में दिल्ली में कांग्रेस-भाजपा एक हो गए थे. उनको हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान नहीं दिया जा सका था. इस बार यह देश के सबसे बड़े कॉस्मोपोलिटन में हुआ है.

Monday, October 18, 2010

बिना अपनी परम्परा को जाने उससे विद्रोह की बात काफी निरर्थक लगती है


मनोहर श्याम जोशी के जन्मदिन पर प्रस्तुत है यह साक्षात्कार जो सन २००४  में आकाशवाणी के अभिलेखगार के लिए की गई उनकी लंबी बातचीत का अंश है. उसमें उन्होंने अपने जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को लेकर बात की थी। यहां एक अंश प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने अपने जीवन और लेखन के कुछ निर्णायक पहलुओं को लेकर खुलकर बातें की हैं. पूरी ईमानदारी से. उनके अपने शब्दों में कहें तो बायोग्राफी पॉइंट ऑफ व्यू से- प्रभात रंजन
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प्रश्न- आपके उपन्यास हों चाहे सीरियल उनमें चरित्र-चित्रण भी जबर्दस्त होता है और किस्सागोई भी सशक्त होता है। भाषा पात्रों के अनुकूल होती है। बड़ा जीवंत परिवेश होता है. यह गुण आपको कहाँ से मिला?
  
जोशीजी- माँ से। बल्कि मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हालांकि मेरी माँ कभी स्कूल नहीं गई मुझे अपना बुनियादी साहित्य-संस्कार और तेवर उसी से विरासत में मिला है। उसे पढ़ने की इतनी ललक थी कि उसने भाइयों की किताबें देख-देखकर स्वयं को अक्षर ज्ञान कराया। धार्मिक ग्रंथ ही नहीं उपन्यास भी वह बहुत चाव से पढ़ती थी। शरत साहित्यरवीन्द्र साहित्यचंद्रकांतासरस्वती सीरिज की किताबें ये सब हमारे घर में हुआ करती थी। प्रसंगवशमेरे एक मामा लक्ष्मीदत्त जोशी को हिन्दी साहित्य के कुछ इतिहासों में बांग्ला साहित्य के हिन्दी में अनुवाद करने के लिए औरजवाकुसुम नामक एक उपन्यास लिखने के लिए याद किया गया है। मतलब यह कि ननिहाल में अच्छा साहित्यिक माहौल था। 

मेरी माँ कुशल किस्सागो और नक्काल थी। हर घटना का वह बहुत ही सजीव वर्णन करती थी और उसके बीच-बीच में पात्रों के संवादों के हूबहू नकल उतारकर प्रस्तुत किया करती थी। हमारे यहां बारात के रवाना हो जाने के बाद रतजगे में मेरी माँ के आइटमों की धूम रहती थी। हम सब भाई-बहनों को घटनाओं का सजीव वर्णन करने का और उससे संबद्ध लोगों की नकलें उतार सकने का गुण अपनी माँ से विरासत में मिला है। मैं खुद ही कितनी ही आवाजें बदल करके और कितनी ही आवाजों में बोल सकता हूं। जवानी के नादानी भरे दिनों में इस क्षमता का मैंने टेलिफोन पर मित्रों को बेवकूफ बनाने में अक्सर दुरुपयोग किया। आज जब मेरा सबसे छोटा बेटा फोन पर इस तरह बेवकूफ बनाता है तो जबर्दस्त खीज होती है। 

प्रश्न- आपकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य प्रबल होता है। आपे नेताजी कहिन जैसा व्यंग्य का लोकप्रिय स्तंभ लिखा। तो दूसरी तरफ आपके उपन्यासों में इसी व्यंग्य के साथ एक त्रासदी भी चलती रहती है। यह नजरिया आपने कहां से पाया?

जोशीजी- अपनी मां से ही। उनका व्यक्तित्व विचित्र प्रकार का था। एक तरफ वह बहुत धर्मपरायण और धर्मभीरु महिला थीं। निहायत दबी-ढकीनपी-तुली जिंदगी जीने वाली। हमें धर्मभीरुता का संस्कार भी उसी से मिला। उसी के चलते अपने तमाम तथाकथित विद्रोह के बावजूदजनेऊ को कील पर टांग देने और मुसलमानों के घड़े से पानी पी लेने के बावजूद कर्मकांड को कभी पूरी तरह से अस्वीकार नहीं कर पाया हूं। और इस मामले में मेरी माननेवालों और न माननेवालों के बीच की स्थिति बन गई।

एक ओर मेरी मां का व्यक्तित्व दबा-ढका था तो दूसरी ओर इतने जबर्दस्त ढंग से खिलंदड़ भी कि मध्यवर्गीय मानकों की ऐसी-तैसी कर जाए। खुद अपना और दूसरों का हास्यास्पद पक्ष उसे साफ नजर आता था। उस पर वह खिलखिलाकर हंस सकती थी और हंसा भी सकती थी।

वे बहुत ऊंचे परिवार की थी। दीवान-राठ थे मेरे ननिहाल वाले। गोया उस परिवार केजिसके सदस्य राजाओं के दीवान होते आए थे। मेरे मां के परदादा थे हर्षदेव जोशी जिनका कुमाऊंगढ़वालहिमाचल प्रदेश और रूहेलखंड के ब्रिटिशकालीन इतिहास में जिक्र आता है- कहीं नायक और कहीं खलनायक के रूप में। वे पंडितराजनीतिज्ञ कूटनीतिक और सेनापति सभी कुछ थे। वे बराबर इस जोड़-तोड़ में रहे कि कुमाऊं के शासन की बागडोर कुमाउंनियों हाथ में आ जाए। इसीलिए जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने गोरखाओं से दगा करके अंग्रेजों का साथ दिया। उन्हें गोरखाओं को हराने की विधि बताई। लेकिन इससे कुमाऊं का राज कुमाउंनियों को मिलने के बजाय अंग्रेजों को मिला। उनकी गिनती गद्दारों में हुईं वे राजनीति से विरक्त होकर आध्यात्म की शरण में गए। 

प्रश्न- आपने हर्षदेव जोशी के चरित्र का कोई आधार बनायाकभी उनके बारे में कुछ लिखने के बारे में सोचा?

जोशीजी- मैं हर्षदेव जोशी को लेकर एक नाटक लिखना चाहता था लेकिन मैं उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का काम ही पूरा नहीं कर सका। कहा जाता है कि हर्षदेव जोशी को किसी ने वंश-नाश का शाप दिया था। मेरे ननिहाल में पुत्र बहुत कम हुए और उस वंश का जो ताजातरीन इकलौता मर्द वारिस है-मेरे मामा का पोता- उसके कोई पुत्र नहीं है। इसलिए लोग कहते हैं श्राप पूरा हो गया। मिथकीय किस्म के कैरेक्टर थे लेकिन उन पर कुछ लिखना नहीं हो पाया।
प्रश्न- आपने अपने पिता के बारे में विस्तार से नहीं लिखा है। केवल कुरु कुरु स्वाहा में उनके बारे में कुछ सूचनाएं आती हैं?

जोशीजी- मैं कुल 7-8 बरस का था जब मेरे पिता गुजर गए। इसलिए मैं उन्हें एक अनुपस्थिति के रूप में ही जानता हूं। एक ऐसी अनुपस्थिति जिसे मैंने उनके बारे में अपनी चंद यादों सेघर में उपलब्ध उनके चित्रों से और दूसरी सुनी-सुनाई बातों से- जो अक्सर परस्पर विरुद्ध होतीं मैंने दूर करने की कोशिश की। अपने पिता के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी मुझे अपने भाई साहब से प्राप्त हुई। विडंबना यह है कि हम भाइयों में पिता के बारे में लंबी बातचीत तब हुई जब वह गंभीर रूप से बीमार थे। उनका इरादा पिता और अन्य पूर्वजों को लेकर एक वृहद उपन्यास लिखने का था। दुर्भाग्य से उसी बीमारी में उनकी असमय मृत्यु हो गई।

प्रश्न- आपके पिता की आपके अंदर कैसी छवि रही है?
जोशीजी- मेरे पिता राय साहब प्रेमवल्लभ जोशी कद-काठी, आवाज़, उपलब्धि हर दृष्टि से बहुत रोब-दाब वाले आदमी थे. गोया उनके बच्चों के लिए उनसे प्रभावित होने से ज्यादा उनसे आतंकित होने वाली स्थिति थी. मेरे भाई दुर्गादत्त एक तरह हमारे पिता की छवि से लड़ते हुए या होड़ करते हुए अपना जीवन बर्बाद करते रहे और असमय गुजर गए.

प्रश्न- रोब-दाब माने? क्या वे बहुत गुस्सैल थे?

जोशीजी- सवाल उनके गुस्सैल होने का नहीं है. इस बात का भी नहीं कि अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद अधेडावस्था में मारे भग्नाशा के वे शराबी ही गए थे. सवाल है उनकी बहुमुखी प्रतिभा और उपलब्धियों का, जिनके सामने दूसरे लोग बौने नज़र आते थे. सवाल है उनके दबंग व्यक्तित्व का, उनकी महत्वाकांक्षा और आगे बढ़ने की धकापेल कोशिशों का. उनके सामने औसत दबा-ढका जीवन जीने वाले मध्यवर्गीय लोग हीन भावना का शिकार हो सकते थे. हमारे कुटुंब में वे पहले व्यक्ति थे जो प्रसिद्ध हुए. इसलिए उन्हें लगभग मिथकीय दर्ज़ा मिला परिवार-गाथा में. वे इतने योग्य माने गए कि हम उनके अयोग्य पुत्र-पुत्री ही हो सकते थे. आज भी परिवार के बुज़ुर्ग लोग जब पिता की चर्चा मेरे सामने करते हैं तो उसमें यह ध्वनि ज़रूर होती है कि बेटा हीरो तू अपने बाप के मुकाबले में जीरो है. 

प्रश्न- आपने कहा कि आपके पिता प्रसिद्ध हुए, किस क्षेत्र में उनको प्रसिद्धि मिली?

जोशीजी- एक नहीं अनेक क्षेत्रों में. कुमाऊँनी ब्राह्मणों में पिछली सदी से ही आधुनिक शिक्षा का खूब प्रचार-प्रसार रहा था. मेरे पिता पढ़ने में बहुत होशियार थे और अल्मोड़ा से विज्ञान में इंटरमीडिएट करके आगे की पढाई के लिए उस समय इलाहाबाद गए जब वहाँ विश्वविद्यालय नहीं था केवल म्योर सेंट्रल कॉलेज था जो कलकत्ता विश्वविद्यालय की परीक्षा दिलवाता था. मेरे पिताजी ने बीएससी तब किया जब भारत में स्नातक इतने कम होते थे कि ग्रेजुएट असोसिएशन ऑफ इंडिया जैसी एक संस्था हुआ करती थी. मेरे पिता की विज्ञान में गहरी रुचि थी और उन्होंने उसी ज़माने में अपने सहपाठी डॉ. गोरख प्रसाद के साथ मिलकर प्रयाग विज्ञान परिषद की स्थापना की थी. उन्होंने तब पदार्थों के स्वभाव और गुण नामक एक पुस्तक लिखी थी जो शायद हिंदी में लिखी हुई विज्ञान की सबसे पुरानी पुस्तकों में से हो. तभी उन्होंने स्कूली छात्रों के लिए हिंदी में विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें लिखी थी जो नवल किशोर बुक डिपो ने छापी थी.

बहरहाल, मेरे पिता स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए क़ानून का विषय लेना चाहते थे. उनका ख़याल था, उनके प्रशंसकों का आज भी है कि अगर वह एलएलबी कर लेते तो न केवल नामी वकील बनते बल्कि अपने एक अन्य सहपाठी गोविन्दवल्लभ पन्त की तरह चोटी के नेता भी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में उन्होंने अपनी आधुनिकता का परिचय देने के लिए अल्मोड़ा के भरे बाज़ार में अनुसूचित जाती की तब एकमात्र पढ़ी-लिखी महिला से हाथ मिला लिया और ब्राह्मणों के रोष से बचने के लिए उन्हें अल्मोड़ा छोड़कर सुदूर अजमेर जाना पडा. वकालत पढ़ने की बात धरी रह गई.

इसीलिए आगे चलकर उन्होंने बहुत जिद की कि उनका बड़ा बेटा दुर्गादत्त एलएलबी करे. जबकि भाई साहब साहित्य में एमए करना चाहते थे. एलएलबी होकर भी वकालत न करके भाई साहब ने पिता के आतंक के विरुद्ध वह विद्रोह शुरू किया जी अंततः उनके लिए बर्बादी का कारण बना. मेरे पिता अपने नैनीताल निवासी चाचा की सहायता से अजमेर गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल हैरिस के पास पहुंचे थे. वह लाइब्रेरियन नियुक्त हुए और उन्होंने हिस्ट्री में एमए किया. वहीँ कॉलेज में हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर बने. हिस्ट्री की भी किताबें लिखी और इतिहासकारों की बिरादरी में भी सम्मान का स्थान पाया.

प्रश्न- यानी आपके पिता आलराउंडर थे? कई विधाओं में पारंगत?

जोशीजी- गज़ब के. जिस क्षेत्र में भी वे घुसे उसमें चोटी तक पहुँचने की कोशिश में लगे और अक्सर कामयाब रहे. राजस्थान में रहते हुए उन्हें राजपूत चित्रकारी के नमूने देखने को मिले और देखते ही देखते वह राजपूत और मुग़ल शैली की चित्रकारी के विशेषज्ञ बन गए. खुद उन्होंने उनका बहुत अच्छा संग्रह किया जो वह मरने से पहले अल्मोड़ा में नए-नए खुले उदयशंकर के केंद्र को भेंट कर आए. आज वह हमारे पास होता तो लाखों-करोड़ों का होता.

इसी तरह वे एम्बुलेंस और रेडक्रॉस के काम में घुसे. वे इतनी तेज़ी से आगे बढे कि अगर जीवित रहते और चाहते तो भारतीय रेडक्रॉस के पहले भारतीय अध्यक्ष बन जाते. तथाकथित सीक्रे सोसाइटी फ्रीमेंसंस में भी उन्हें उच्च पद प्राप्त हुआ. अब जब मेरे भांजे को इंग्लैंड में फ्रीमेंसन बनना था तो वह अपने नानाजी की मेसोनिक लॉज की सदस्यता के प्रमाण-तस्वीरें वगैरह साथ ले गया था.

मेरे पिता ने सबसे अधिक नाम संगीत के क्षेत्र में कमाया. उनसे पहले हमारे कुटुंब में गाने-बजाने की कोई परम्परा नहीं थी. कहना यह चाहिए कि यह शौक उन्हें ब्राह्मण बिरादरी से अलग भी करता था. भले ही उन्होंने कभी विधिवत संगीत की दीक्षा नहीं ली, उनकी गणना देश के शीर्षस्थ संगीत-शास्त्रियों में हुई. भारतीय शिक्षा सेवा के सदस्य के नाते अजमेर में नियुक्त होने के कारण सारा राजस्थान, मध्य भारत और ग्वालियर उनके कार्यक्षेत्र में शामिल था. यहाँ के रजवाडों से उन्हें न सिर्फ चित्रकला के बेहतरीन नमूने मिले बल्कि दरबारी संगीतज्ञों को निकट से जानने का अवसर भी.

इसके चलते वे हिन्दुस्तानी संगीत के पुनरोद्धारक भातखंडे जी के बहुत काम के साबित हुए. पुरानी बंदिशें जमा करने और उनकी स्वर लिपि दर्ज कर लेने के अभियान में मेरे पिता भातखंडे जी के सहयोगी बने. जनसंपर्क और संगठन में मेरे पिता अत्यंत कुशल थे. लखनऊ में मौरिस कॉलेज की स्थापना में उनका बड़ा हाथ था, जो अब भातखंडे संगीत विद्यालय कहलाता है. इसी तरह उन्होंने अखिल भारतीय संगीत-नृत्य सम्मेलनों का आयोजन किया जिससे शास्त्रीय संगीत दरबारों से बाहर निकलकर जनता के बीच पहुंचा. उनके जीवन का अंतिम काम हिस्ट्री ऑफ इंडो-पर्शियन म्यूजिक नामक ग्रन्थ लिखना था. 

प्रश्न- क्या वह किताब प्रकाशित हुई?

जोशीजी- अफ़सोस कि नहीं. वह उसे पूरा कर गए थे और विलायत के एक प्रकाशक ने उसे छापना मंज़ूर भी कर लिया था. उसे लिखने के सिलसिले में उन्होंने समय से पहले सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण कर लिया था और शराब पीना भी छोड़ दिया था क्योंकि उनको पता था कि जिगर इतना सड़ चुका है कि अब पियेंगे तो इधर शराब उनके गले से उतरेगी उधर वह मौत के मुंह में जायेंगे. प्रकाशक को किताब रवाना करने के बाद और अपनी सभी पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए कुछ न कुछ व्यवस्था करने के बाद वे दिल्ली गए जहाँ एक तरह से उन्होंने संगीत-कला प्रेमियों के साथ जिंदगी का अपना आखिरी जश्न मनाया. वहाँ से जिस दिन लौटे उसी रात खून की उल्टियां करते हुए मर गए. वह युद्ध का ज़माना था. बाद में प्रकाशक ने लिखा कि एक परिच्छेद नहीं मिल रहा है. जिसे पांडुलिपि पूरा करने का काम दिया गया उसने वह परिच्छेद कभी लिखकर ही नहीं दिया.  
    
प्रश्न- आपके भाई भी लेखक थे

जोशीजी- उनकी कुछ रचनाएं प्रकाशित और प्रसारित भी हुई थीं। जिन्दगी में दो मर्तबा उन्होंने पत्रकार की हैसियत से काम किया था। मेरी बड़ी बहन भगवती दी की भी एक-दो रचनाएं प्रकाशित हुई थीं। आज भी वे अगर कोई भूले-भटके पत्र लिखती हैं तो सब लोग ले-लेकर पढ़ते हैं। मेरे ताऊजी और छोटे चाचा की रचनाएं भी प्रकाशित हुईं। पढ़ने-लिखने की हमारे परिवार में जबर्दस्त परंपरा थी और सो भी उस जमाने में जब फालतू किताबें पढ़ना उतना ही खराब समझा जाता था जितना आजकल टीवी देखते रहना। 

प्रश्न- पिता की अनुपस्थिति को आप किस तरह से देखते रहे?

जोशीजी- इसके कारण मेरे जीवन में ही नहीं साहित्य में भी जबर्दस्त अनाथ काम्पलेक्स ढूंढा और दिखाया जा सकता है। मुझे खुद ही कभी-कभी आश्चर्य होता है मेरे लिए कोई व्यक्ति पिता प्रतीक बन जाता है और मुझे अपने बारे में उसकी राय अच्छी बनाने कीअपने किए पर उसकी दाद पाने की जरूरत महसूस होती है। कभी-कभी अपनी इस कमजोरी पर मैं इतना झुंझलाता हूं कि उसके द्वारा उपेक्षित किए जाने पर अपना आपा खो बैठते हुए उल्टा-सीधा कहने लगता हूं। मृत्युभय और असुरक्षा की सतत भावना भी मेरे अनाथ काम्पलेक्स के हिस्से हैं। भाई साहब की असमय मृत्यु और उनके जीवन में आए बेरोजगारी के अनेक दौर इस भावना को और भी दृढ़ कर गए। 

प्रश्न- इसका आपके जीवन पर क्या असर पड़ा?

जोशीजी- इसकी वजह से मेरे भीतर का डर कुछ और बढ़ गया। कुछ पैदाइशी डर था और कुछ परिस्थितियों ने बना दिया। कोई विद्रोह करते हुए या बड़ा खतरा मोल लेते हुए मुझे यह डर सताता रहा कि कहीं भाई साहब की तरह मेरी जिन्दगी भी तबाह न हो जाए। मध्यवर्गीय मानकों के अनुसार जब छोटे-मोटे कुछ विद्रोह किए तब यही सुनने को मिला कि अपने भाई के नक्शे-कदम पर चल रहा है। यह भी उसी तरह लायक बाप का नालायक बेटा साबित होगा। इसी के चलते विशेष महत्वाकांक्षी न होते हुए भी मैंने महत्वपूर्ण गोया लायक बनने कर कोशिश की और अपने को बराबर नालायक ही पाता रहा। इसी तरह मुझे इस बात का भी अहसास रहा कि शराब और विलासिता मेरे पिता की कमजोरी बने। अगर उनमें परिवार के संस्कारों के विरुद्ध जाने वाली यह प्रवृत्ति न होती तो वे दीर्घायु होते और जीवन में कहीं अधिक सफलता पाते। इसके कारण मैं कभी पूरी तरह विद्रोही नहीं हो सका। 

प्रश्न- तो आप अपने को अधूरी तरह के विद्रोही मानते हैं?

जोशीजी- हां. और इसी के चलते मैं न तो कलाकारों वाले सांचे में फिट हो सका और न घरेलू सांचे में. जैसा कि मैंने बहुत पहले अपने बारे में कहा था मैं एक पालतू बोहेमियन होकर रह गया. लेखक जोशीजी बेचारे घर-परिवार में थोड़े बोहेमियन होने के नाते विचित्र समझे गए और बोहेमियन बिरादरी को उनका घरेलूपन अजीब नज़र आया. यह उनके पालतू बोहेमियन, अधूरे विद्रोही होने का ही प्रमाण है कि शराब पीते हुए भी उनका सारा ध्यान इस ओर रहा कि कहीं होश न खो बैठूं. इसी के चलते उन्हें हर सुरा-संध्या के अंत में किसी लड़खड़ाते मित्र को उनके घर पहुंचाने का और उनके स्वजनों की फटकार सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा.

प्रश्न- अनाथ कॉम्प्लेक्स से आर्थिक असुरक्षा भी होती होगी?

जोशीजी- बहुत ज्यादा. मेरे पिता कि गिनती तब के मानकों के अनुसार रईसों में होती थी. घर में तब दो-दो कारें थी. उनके गुजरते ही हम एक झटके के साथ आर्थिक दृष्टि से सिफार ही गए क्योंकि ठाठ की जिंदगी जीने वाले हमारे पिता विशेष कुछ छोड़कर नहीं  गए और मेरे भाई साहब तब मामूली क्लर्की कर रहे थे जो उन्होंने सिर्फ इसलिये कर ली थी कि अफसर वर्ग के हमारे पिता के प्रति विद्रोह जता सकें. बाद में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और उनके बीच-बीच में बेरोजगार होने का सिलसिला चल निकला. इस आर्थिक असुरक्षा की भावना ने ही मुझे हमेशा लेखन से पैसे कमाते रहने के लिए बाध्य किया है. आज भी जबकि मुझे पैसा कमाने की कोई ज़रूरत नहीं है मैं व्यावसायिक लेखन को छोड़ नहीं पाता.

मैंने शुरू से ही दोनों तरह का लेखन खूब किया. छात्र जीवन से मैंने साहित्य और पत्रकारिता दोनों में एक साथ कदम रख दिया था. अनुवाद का काम भी मैंने जमकर किया. गोया मैं शुरू से उच्चभ्रू और निम्नभ्रू दोनों तरह का लेखन लगभग साथ-साथ करता आया हूँ. गोया मुझे परहेज रहा है तो मध्यभ्रू लेखन से. न मैं उसे पढ़ना शुरू करता हूँ न लिखना. जनता छाप और इंटेलेक्चुअल छाप चीज़ें पढ़ने और लिखने में मुझे रस आता है. यों इसके चलते मेरी जनता छाप कृतियों में भी थोड़ी-बहुत साहित्यिकता है और साहित्यिक कृतियाँ भी इस माने में जनता छाप हैं कि अपनी तमाम इंटेलेक्चुअलता-यह मेरे गुरु नागरजी का चहेता शब्द है- के बावजूद वे पठनीय हैं.
प्रश्न- नागर जी की शिष्यता में जाने के लिए आप लखनऊ किस प्रसंग में गए?

जोशीजी- मैं संयोग से ही लखनऊ पहुंचा और संयोग से ही लेखक बन गया. जब मैंने इंटर पास कर लिया तब मेरे चाचाओं ने, जिन्होंने पिता की मृत्यु के बाद हमें पाला-पोसा, यह सुझाव दिया कि मैं सिविल इंजीनियरिंग पढ़ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय चला जाऊं. सुझाव बहुत नेक था लेकिन मैंने इसका विरोध किया क्योंकि मेरा विश्वास था कि इंजीनियरी एक भ्रष्ट पेशा है जिसमें अच्छे लोग नहीं पनप सकते. प्रेमचंद की कहानी सज्जनता का दंड मेरे दिमाग में तब ताज़ा थी. इसलिए मैंने जिद पकड़ ली कि अपने पिता और भाई की तरह इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढूंगा. जाना था इलाहाबाद पहुँच गया लखनऊ. इसलिए कि तब तक इलाहाबाद में दाखिला लेने की तारीख निकल चुकी थी और लखनऊ में पिताजी के एक छात्र जो तब उपमंत्री थे मुझे दाखिला दिलवा सकते थे. इस तरह मैं लखनऊ पहुँच गया और एक दिन महान वैज्ञानिक बनने के सपने देखने लगा. 

प्रश्न- वैज्ञानिक बनने के सपने का क्या किस्सा है? क्या हुआ?

जोशीजी- इसके बावजूद कि हमारे घर में बड़ा साहित्यिक माहौल था खुद मुझे साहित्य में कोई रूचि नहीं थी. मैं ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें ज्यादा पढ़ा करता था. बीएससी के पहले साल में मुझे उस ज़माने के शिक्षामंत्री सम्पूर्नान्दजी ने मेरे निबंध रोमांस ऑफ इलेक्ट्रांस पर कल के वैज्ञानिक पुरस्कार दिया था. अब सोचता हूँ कि यह तो निबंध के शीर्षक से ही ज़ाहिर हो जाना चाहिए था कि यह लड़का साहित्यिक हो जाए तो हो जाए वैज्ञानिक नहीं हो सकता. 

प्रश्न- वैज्ञानिक बनने के उस सपने के पूरे न हो पाने का कोई अफ़सोस होता है?

जोशीजी- मैंने पहले ही कहा कि मैं वैज्ञानिक बनने लायक था ही नहीं. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान मेरा प्रिय विषय था और आज भी है. पिछले कुछ दशकों से तो मैं कविता, कहानी, उपन्यास से कहीं ज्यादा विज्ञान की पुस्तकें पढता रहा हूँ. एक कारण तो यह भी हो सकता है कि उम्र बढ़ने के साथ किस्से-कहानी में और उस तरह की कविता में जिस तरह की आज लिखी जाती है रूचि घटने लगती है. लेकिन दूसरा बड़ा कारण यह है कि मैं समझता हूँ इस दौर के सबसे रचनात्मक लोग, सबसे बड़े दार्शनिक विज्ञान के क्षेत्र में ही कार्यरत है. अगली सदी की दुनिया की संभावनाओं और खतरों का विज्ञान से उतना ही संबंध है जितना कि राजनीति से.

प्रश्न- लखनऊ में वैज्ञानिक बनने का सपना लेखक बनने के सपने में कैसे बदल गया? लेखन की तरफ कैसे मुड़े आप?

जोशीजी- जब मैं लखनऊ पहुंचा तो मुझे उस हबीबुल्लाह हॉस्टल में जगह मिली जिसमें नवाबजादे रहा करते थे. तब मैंने पहली बार पाया कि अजमेर की तरह यहाँ मशहूर राय साहब प्रेमवल्लभ जोशी मरहूम का बेटा न होकर एक अदद हास्यास्पद किस्म का जीव हूँ. निहायत लंबा और पतला, थोड़ा उचक-उचक कर चलने वाला एक फटेहाल किशोर जो अपनी मिमियाती हुई आवाज़ में अपने पिता से विरासत में मिले हुए ऑकसोनियन लहजे में गिटपिट अंग्रेजी बोलता था. मेरा नाम माइकल सैमुएल जोशुआ रख दिया गया. रघुवीर सही बाद में कभी-कभी मुझे इस नाम से बुलाया करते थे. जवाब में मैंने उनका नाम रैग बीयर सैवाय रखा था. खैर, तो मैंने पाया कि मैं तो यहाँ हास्यास्पद हूँ. लिहाज़ा मैं अपना ज्यादा वक्त पुस्तकालय में बिताने लगा. ज़ाहिर है मुझे वहाँ इंटलैक्चुअलाने यूनिवर्सिटी मिलते रहते थे. और इंटेलेक्चुअल आप जानते हैं वामपंथी होते हैं. वामपंथियों में कुमाऊँनी छात्रों की तादाद बहुत ज्यादा थी और कुमाऊँनी होने के कारण उनसे घुल-मिल सका और अपना अकेलापन दूर कर सका. इन छात्रों में एक थे सरदार त्रिलोक सिंह, जो पीढ़ियों से नैनीताल में बसे होने के कारण मुझसे कहीं अधिक कुमाऊँनी थे. उन्होंने एक दिन मेरी बातचीत सुनकर कहा यार तू तो कहानीकार है, जैसा बोलता है वैसा लिख दिया कर. यह कल के वैज्ञानिक जोशीजी के लिए बड़ी चौंकाने वाली सूचना थी.

यों शायद उन्हें ज्यादा चौंकना नहीं चाहिए था. जब वह हाई स्कूल में पढते थे तब छोटे चाचा के यहाँ रात के खाने के लिए आने का निमंत्रण मारे डर के अस्वीकार करने पर उनसे पूछा गया कि किस चीज़ से डरता है, और उन्होंने डर पर एक निबंध लिखकर दे दिया जिसमें अंतिम पंक्ति थी- इसलिए सज्जनों, मैं डर के नतीजे के डर से सबसे ज्यादा घबराता हूँ. साथ ही बिगड़ी हुई हाफ पैंट का चित्र था. कथाकार चाचाजी ने फतवा दिया कि तू लेखक बनेगा. उनका हमेशा दावा रहा कि मैं उनका ही चेला हूँ.

इसी तरह जब मैं इंटरमीडिएट में था तब मैंने अपने अंग्रेजी अध्यापक से कहा कि आप निबंध लिखने के लिए बड़े पिटे-पिटाए विषय देते हैं. उन्होंने चुनौती दी कि तुम्हें जो विषय पसंद हो उस पर लिखकर लाओ. मैं एक निबंध ऑन माईसेल्फ लिखकर ले गया. जिसे पढकर मिस्टर सकुएरा, जिन्हें छात्र मिस्टर सकोरा पुकारते थे, गदगद हो गए. उन्होंने कॉपी पर लिखकर दिया कि तुम किसी दिन लेखक बनोगे. मैं साहित्य नहीं पढता था और मुझे इतिहास में बेहद रूचि थी, देखो, हिस्ट्री भी तो स्टोरी ही है न. 

प्रश्न- आप अपने लेखक बनने का श्रेय सरदार त्रिलोक सिंह को देते हैं? आपने उनके सुझाव पर कहानी  लिखना शुरू किया?

जोशीजी- शुरू में तो नहीं. फिर उन्होंने आर्मेनियाई मूल के अमेरिकी लेखक विलियम सारोयाँ का कहानी संग्रह लाकर दिया कि इसे पढ़ो. पढकर मुझे लगा ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ. अनाथ काम्प्लेक्स से प्रेरित मेरी पहली कहानी नीली ऑस्टिन आनन-फानन में तैयार हो गई. यह कहानी मेरे पिता की नीले रंग की ऑस्टिन कार के बारे में थी. यह मेरी पहली और आखिरी ऐसी रचना थी जो पूरी तरह आत्म-चरितात्मक थी. भले ही यह कहानी सभी जगह से सधन्यवाद लौट आई इसके नाते मैं लेखक बन गया. 

प्रश्न- लेखक तो आप बन गए लेकिन लखनऊ के साहित्यिक सर्कल में आप किस तरह शामिल हुए? अमृतलाल नागर के शिष्य कैसे बने?

जोशीजी- एक वामपंथी कि सलाह पर और वामपंथियों के सानिध्य में लेखक बना था इसलिए प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में जाने लगा. उस ज़माने में प्रगतिशील लेखक संघ की एक विश्वविद्यालय शाखा भी हुआ करती थी. लखनऊ प्रगतिशील लेखक संघ में उर्दूवालों का बोलबाला था. गोया मैंने शुरुआत ही उर्दू वालों के बीच उठने-बैठने से की. मुझे इस बात का बहुत मलाल रहा और अब भी है कि मैंने कभी बाकायदा उर्दू नहीं सीखी. हिंदी-उर्दू के लेखकों की बैठक तब सरुपरानी बख्शी के घर में हुआ करती थी और उसमें भगवती बाबू, आनंद नारायण मुल्ला शोभायमान रहा करते थे. लेकिन कांग्रेसियों की इस जमात में जाने से हम वामपंथी थोड़ा परहेज़ करते थे. वामपंथी रुझान के कुछ साहित्यकारों ने, जिनमें कृष्ण नारायण कक्कड प्रमुख थे, लेखक संघ नामक एक संस्था बना रखी थी जिसकी गोष्ठी यशपालजी के घर पर हुआ करती थी. लेखक संघ किसी दल से नहीं जुड़ा हुआ था इसलिए उसमें सभी तरह के लेखक आते थे. हिंदी के तीन बड़े उपन्यासकार- यशपाल, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर उस समय लखनऊ में थे और तीनों ही लेखक संघ की गोष्ठियों में मौजूद रहते थे.

इसी लेखक संघ की गोष्ठी में मैंने अपनी दूसरी कहानी मैडिरा मैरून पढकर सुनाई. उन दिनों न शेवरलेट कार की बड़ी धूम थी और मैडिरा वाइन के रंग की कत्थई  शेवरलेट कार खरीदना फख्र की बात समझी जाती थी. यह कहानी एक ऐसे अफसर के बारे में थी जो एक छोटे कस्बे में इसी रंग की गाडी खरीदने की बात कर ही रहा होता है कि कोई दूसरा व्यक्ति खरीदकर ले भी आता है. जहाँ नीली ऑस्टिन कहानी में भावुकता थी वहाँ मैडिरा मैरून में हास्य-व्यंग्य था. मेरी शुरू की रचनाएँ कभी खालिस भावुक कभी खालिस व्यंग्यात्मक हुआ करती थी. एक लंबे मौन के बाद जब मैंने लिखना शुरू किया तब मेरे ये दोनों ही तेवर घुल-मिल गए.

प्रश्न- लेखक संघ की उस गोष्ठी में आपकी कहानी पर किस तरह की प्रतिक्रियाँ आई. नागर जी से वहीं भेंट हुई होगी आपकी?

जोशीजी- उसकी काफी सराहना हुई और मुझे इस बात की खुशी हुई कि अलग-अलग नज़रिए वाले उन तीनों बड़े उपन्यासकारों ने कहानी को बहुत अच्छा बताया. नागरजी ने तो आकार बाकायदा पीठ थपथपाई और मैं बाद में बाकायदा उनका शिष्य बन गया. नागरजी भांग का सेवन करने के बाद गाव तकिये का सहारा लेकर बैठ जाते थे और अपनी रचना किसी शिष्य को बोल-बोलकर लिखवाते थे. उनसे डिक्टेशन लेने का काम सबसे ज्यादा मुद्राराक्षस ने किया जो उन दिनों सुभाष के नाम से जाने जाते थे. मैं भी इस काम में लगा. इसी मारे मुझे भी बोलकर लिखवाने की बुरी आदत पड़ गई.
प्रश्न- नागरजी उस समय क्या लिखवा रहे थे?

जोशीजी- बूँद और समुद्र. जिसने भी बूँद और समुद्र पढ़ा हो वह सहज ही देख सकता है कि उसके कुछ हिस्सों के कातिब की हैसियत से मैंने नागर जी से कितना कुछ सीखा. लिखाते-लिखाते वह बताया करते थे कि अमुक पात्र अमुक शहर का और अमुक जाती या मोहल्ले का है इसलिए इस तरह बोलता है. नागरजी फिल्मों में संवाद लेखक रह चुके थे और रंगमंच से उन्हें गहरा लगाव था लिहाजा उपन्यास लिखते हुए सभी पात्रों के संवाद ठीक उन्हीं की तरह बोलकर दिखाते थे. मुझे माँ से नकलें उतारने क जो हुनर मिला वह नागरजी की शिष्यता में और भी विकसित हो गया. बोलियों का महत्व मुझे नागर जी ने ही सिखाया. बल्कि सच कहूँ तो नागरजी ने ही मुझे हिंदी सिखाई. मैं तो खुद हिंदी में ख़ासा गोल था.

नागरजी ने ही यह अहसास करवाया कि उर्दू की तरह हिंदी जुबां भी आते-आते ही आती है. उन्होंने मुझे खड़ी बोली अच्छी तरह सीखने की सलाह दी और इस सिलसिले में रानी केतकी की कहानी, फ़साना-ए-आज़ाद, उमराव जान अदा वगैरह पढ़ने को कहा. माधुरी और सरस्वती के पुराने अंक और हिंदी के निबंधकारों के संग्रह भी पढ़ने को दिए. और हां उन्होंने ही मुझे शब्दकोश देखते रहने की आदत डलवाई. नागरजी फिल्म क्षेत्र से लौटकर साहित्य में आए थे इसलिए उनकी शैली पर पटकथा की शैली का ख़ासा प्रभाव था. इसलिए सिनेमा और पटकथा दोनों के प्रति मेरे मन में शुरू से जबर्दस्त आकर्षण हो गया. मैं तभी फिल्म लेखक बनने के लिए जाना चाहता था लेकिन नागरजी ने मना कर दिया तो नहीं गया. 

प्रश्न- आप अपनी पुस्तकों में अपने गुरु के रूप में नागरजी और अज्ञेय का उल्लेख अपने गुरु के रूप में करते रहे हैं. साहित्य में इस तरह से गुरु की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?

जोशीजी- गुरु को श्रेय तो दिया जाना चाहिए. दुर्भाग्य से हिंदी में किसी को उस्ताद बनाने या मानने की वैसी परम्परा कभी नहीं रही जैसी उर्दू में थी. यहाँ हर कोई कलम पकड़ते ही उस्तादों का उस्ताद हो जाता है. किसी स्वार्थ से, किसी अग्रज के चरणों में बिठा भी रहा करे तो कभी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि मैं जो हूँ उनकी बदौलत हूँ. दिक्कत यह है कि हिंदीवाले यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि साहित्य में भाषा और शिल्प का जो पक्ष है वह बहुत महत्वपूर्ण है और सीखा-सिखाया जा सकता है. इस तरह की बात करते ही आपको रूपवादी कहकर गोली मार दी जाती है.

प्रसंगवश, मेरे लेखकीय व्यक्तित्व के विकास में मेरे चचाजाद बड़े भाई पूरनचंद्र जोशी का भी विशिष्ट योगदान रहा. उन्होंने मुझे साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र, नृतत्व, दर्शन, मनोविज्ञान, विज्ञान, मिथक-पुराण जैसे विषयों पर लिखी हुई १०० मशहूर पुस्तकों की सूची बनाकर दी कि इन्हें पढ़ो. उन्होंने ही यह बताया कि यूरोप के किस कवि-कथाकार की कौन-कौन सी खास रचनाएँ हैं और उसके जीवन और साहित्य पर लिखी कौन सी किताब सबसे अच्छी है. काश मैंने उनके बनाए हुए पाठ्यक्रम की सभी पुस्तकों का अध्ययन किया होता. उनकी यह सलाह भी मानी होती कि कुछ महान ग्रंथों का जीवन में उसी तरह बार-बार पारायण किया जाना चाहिए जिस तरह श्रद्धालुजन धार्मिक ग्रंथों का करते हैं. लेकिन जैसा कि पूरन दा ने मेरी चंचलवृत्ति को देखकर तभी कह दिया था मुझे कल का वैज्ञानिक या विद्वान नहीं होना था. बस हर विषय की थोड़ी सुंघा-सूंघी करके काम चला लेनेवाला पत्रकार बनना था. 

प्रश्न- आप तो कई विषयों के जानकार बताये जाते हैं. किताबों में आपके परिचय में भी यही लिखा रहता है. आपने दर्शन, विज्ञान, खेलकूद, पटकथा जैसे विषयों पर किताब लिख चुके हैं.

जोशीजी- मेरी जानकारी सतही है. यह सही है कि मुझे बहुत सारे विषयों में रूचि रही और जिस लखनऊ में साहित्यिक संस्कार मिला उसमें कॉफी हाउस छाप इंटेलेक्चुअलता का बोलबाला था. कई शीर्षस्थ विद्वान विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. हमारे उपकुलपति आचार्य नरेंद्रदेव थे. नई से नई किताब पढ़ने की होड़ लगी रहती थी. जैसा कि मैंने कुरु कुरु स्वाहा में लिखा है जोशीजी भी एक साथ तीन-तीन किताबें हाथ में लेकर घूमने लगे- एक ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी, दूसरी साहित्य सम्बन्धी और तीसरी जासूसी पंजा या भांग की पकौड़ीनुमा कोई चालु किताब. आज भी मैं किसी गंभीर किताब के साथ-साथ कोई हलकी-फुलकी किताब भी उलटता-पुलटता रहता हूँ. लेकिन मुझे खेद है कि मिथक-पुराण, संस्कृत साहित्य, हिंदी के प्राचीन साहित्य जैसे तमाम विषयों पर मैंने बहुत कम पढ़ा है. बिना अपनी परम्परा को जाने उससे विद्रोह की बात काफी निरर्थक लगती है.

यह बड़ा दुर्भाग्य है कि हिंदी में ऐसी किताबें लगभग नहीं के बराबर हैं जिन्हें पढ़ने से परम्परा के बारे में मुझ जैसे व्यक्ति को थोड़ा-बहुत ज्ञान हो सके. और तो और ऐसे संग्रह भी नहीं हैं जिनसे पता चल सके कि हिंदी में शुरू से अब तक लिखी हुई श्रेष्ठ कविताएँ या कहानियाँ ये हैं. कभी बहुत पहले रामनरेश त्रिपाठी ने कविता कौमुदी ज़रूर निकाली थी मैंने इस बारे में अज्ञेय जी से कई बार चर्चा भी की कि आप उसी तरह का एक नया संकलन निकालें. हमारे यहाँ गुटबाजी, नए-पुराने का झगड़ा ये सब तो बहुत होता है लेकिन साहित्यिक मानकों के अनुसार श्रेष्ठ रचनाएं कौन सी हैं और किस क्रम से हिंदी की अपनी परम्परा का विकास हुआ है ऐसा दर्शाने वाले संकलन और सरस समीक्षा ग्रन्थ न के बराबर हैं. इससे एक बड़ी खराब सी स्थिति पैदा होती है कि जिन्हें कलम पकड़ने की तमीज न हो उन्हें गुट के प्रति वफादारी के कारण या सत्तावान होने के कारण साहित्यकार मान लिया जाता है. सता, प्रचार-प्रसार और गुटबंदियों से दूर पड़े अच्छे लेखक भी उपेक्षित रह जाते हैं. उदाहरण के लिए शमशेर जी के भाई तेज बहादुर चौधरी ने एक ज़माने में बहुत ही अच्छी कहानियाँ लिखी थी लेकिन उनका कहीं कोई ज़िक्र नहीं आता. इसी तरह चन्द्रकुंवर बर्तवाल बड़े अच्छे कवि थे लेकिन उपेक्षित ही रह गए. 

प्रश्न- अज्ञेय जी से आप कैसे जुड़े?

जोशीजी- मैं दिल्ली आया तो रघुवीर सहाय ने मेरी मदद करने के क्रम में अज्ञेय जी से मेरी सिफारिश की. वे पहले मेरी कहानी अपनी पत्रिका में छाप भी चुके थे. मैं शुरू-शुरू में उनसे बिदकता रहा. वह बहुत श्रद्धास्पद थे और मैं थोड़ा अश्रद्धालु था शुरू से. कुछ ऐसा भी दुराग्रह था कि भले मैं आपका शिष्य बन गया होऊं लेकिन हूँ मैं आपका राजनैतिक विरोधी.मुझे याद है मैंने उन्हें एक बार कविता लिखकर दी थी हम नहीं कहते कि हम नदी के द्वीप हैं. इसी तरह जब उन्होंने मेरी सहायता करने के लिए मुझे अमेरिकी सूचना सेवा से अनुवाद कार्य दिलवाने की पेशकश की तो यह जानते हुए भी कि तमाम और लेखक बड़ी खुशी से यह काम आकर रहे हैं, मैंने इनकार कर दिया. उन्होंने मुझे समझाया भी कि अनुवाद के लिए दी गई पुस्तक ललित कला सम्बन्धी है, फिर आपको क्या आपत्ति है? लेकिन मैं नहीं माना.

अज्ञेय जी उस समय आकाशवाणी के समाचार विभाग में हिंदी सलाहकार का काम कर रहे थे मुझे हिंदी यूनिट में स्टाफ आर्टिस्ट उपसंपादक का काम दिला दिया. इस तरह करियर के शुरुआत से ही अज्ञेय जी की मेरे जीवन में बड़ी भूमिका रही. पिछले दिनों अमेरिका से एक किताब छपी है जिसमें संयोगों को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है. तो इसे संयोग ही कहिये अपने स्कूल में हिंदी वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिंदी बनाम हिन्दुस्तानी वाली बहस में हिंदी के खिलाफ जोरदार तक़रीर फरमाने पर मुझे प्रथम पुरस्कार स्वरुप एक किताब मिली थी शेखर एक जीवनी. उसे मैंने खोलकर भी नहीं देखा था. और जब मेरे एक साहित्यानुरागी चचाज़ाद भाई ने मुझसे वह पुस्तक मांगी तो मैंने सहर्ष दे दी.

बाद में लखनऊ आने पर परगतिशील बिरादरी में मैंने अज्ञेय का नाम हम लोगों के सबसे बड़े साहित्यिक शत्रु के रूप में सुना. उस दौर में प्रगतिशीलों में अपने शत्रुओं की किताबें ज़रूरी तौर से पढ़ी जाती थी. सो मैं भी अज्ञेय साहित्य का विद्यार्थी बन गया. उसके अभिजात, उसकी अंग्रेजियत, उसकी आधुनिकता तीनों से बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन उसकी रूमानियत से नहीं. मैं तब खुद अंत और आदि नाम से एक उपन्यास लिखने बैठ गया, जो एक तरह से मनहर एक जीवनी ही था. वह अब भी मेरे पास सुरक्षित है. प्रसंगवश, इस उपन्यास के कुछ अंश मैंने करोलबाग वालों की साहित्यिक संस्था कल्चरल फोरम में पढकर सुनाये थे. वहाँ पहली बार भीष्म साहनी, कृष्ण बलदेव वैद, और निर्मल वर्मा से मुलाकात हुई थी. निर्मल तब लिखते नहीं थे. उनके भाई रामकुमार को चित्रकार के साथ-साथ अलबत्ता लेखक भी माना जाता था. निर्मल से उन दिनों मेरी बहुत दोस्ती हुई और मैंने एक लंबी कविता निर्मल के नाम लिखी. 

प्रश्न- आपने अपनी कविता की बात की, इससे याद आया कि आपने लंबे दौर तक कविताएँ लिखीं. फिर एकदम छोड़ दिया. कभी कविताओं का कोई संकलन नहीं छपवाया...?

जोशीजी- अज्ञेय को गुरु बना लिया था लो कविता लिखना लाजिमी था. वैसे भी आज की तरह तब भी यही स्थिति थी कि आंदोलन-वान्दोलन, चर्चा-वर्चा कविता के ही संबंध में होती थी. मैं तीन तरह की कविताएँ लिखने लगा. पहली वे जो लोकगीतों से प्रभावित थी और उनके छंद में ही लिखी गई थी. दूसरी चार-चार, छः-छः लाइनों की कविताएँ जैसी आज भीपेड़चिड़िया जैसे शीर्षकों से लिखी जा रही हैं. तीसरी वे जो टीएस एलिअट, हार्टक्रेन और ऑडेन जैसे अंग्रेजी कवियों के प्रभाव में लिखी गई थीं तथा जिनका आकार आमतौर पर बहुत बड़ा होता था. इन कविताओं में से एक निवृत्तिनाम से कल्पना में कई अंकों में धारावाहिक रूप से छपी थी. अज्ञेय जी को मेरी पहली दो तरह कविताएँ बहुत पसंद थी लेकिन तीसरी तरह की नहीं. वह मुझे अपने तीसरा सप्तक में रखना चाहते थे लेकिन मैंने उन्हें वे छोटी कविताएँ छापने को नहीं दी. 

प्रश्न- लेकिन संग्रह क्यों नहीं छपवाया.- पहली और दूसरी तरह की कविताओं का भी नहीं?

जोशीजी- मुझे अपना लिखा अक्सर पसंद नहीं आता है. कविताएँ तो बिलकुल ही पसंद नहीं आती थी. इसीलिए मैं उनको कूर्मान्चली के उपनाम से छपवाया करता था. कुछ ही वषों बाद मझे लगा कि मैं मूलतः क्या भूलतः भी कवि नहीं हूँ. इसलिए संग्रह नहीं छपवाया. कुछ मित्रों ने पेशकश ज़रूर की थी. लेकिन बाद में वे भी पीछे हट गए.

प्रश्न- आपने कहा कि अमृतलाल नागर कि शिष्यता में आपने हिंदी भाषा को विधिवत ग्रहण किया, अज्ञेय की शिष्यता में आपने क्या सीखा?

जोशीजी- आधुनिक साहित्य की सारी समझ उनसे ही मिली मुझे. भाषा का आरंभिक ज्ञान नागर जी ने कराया तो उसका उच्चतर ज्ञान कह सकते हो कि उन्होंने दिया. मैं उनके आगे लाख विद्रोही बना रहा लेकिन वे मेरे लिए पिता प्रतीक भी थे. उनका भी मेरे लिए वैसा ही आतंक था जैसा कि अपने पिता के बारे में सुनी हुई बातों का. शायद मेरा यह कहना बहुत न हो उनके आसपास के लोगों में मेरी ही पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी थी जो उनके जैसी थी. भले ही मैं कभी उनके बहुत निकट नहीं आया लेकिन उनसे एक तरह की आतंरिक निकटता हमेशा रही.

प्रश्न- आपको उपन्यासकार-धारावाहिक लेखक के रूप में सफलता मिली. उत्तर-आधुनिक ढंग के लेखक के तौर पर आपको जाना गया. लेकिन आपने सबसे अंत में उपन्यास को लेखक के तौर पर अपनाया?

जोशीजी- एक लंबे अरसे तक मैं सोचता रहा कि शायद जोशीजी एक ठो वार एंड पीस और एक ठो वेस्टलैंड हिन्दी साहित्य को दे सकेंगे आगे चलकर कभी। जब ऐसा लगा कि आगे तो जिन्दगी ही बहुत नहीं रह गई है तो लेखनी फिर उठा ली। पहले बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा कि रचनाकार अपनी पैतृक विरासतअपने संस्कारअपने आरंभिक परिवेश को दरकिनार करते हुए कुछ रच सकता है। बहुत बाद में यह समझ आया यह लगभग असंभव है। मैं चाहे कुछ भी कर लूं अपने लेखन में बुनियादी तौर से एक खास कुमाउंनी ब्राह्मण के घर मेंएक खास परिस्थिति में पैदा हुआ और पला-बढ़ा व्यक्ति ही रहूंगा। इस समझ के बाद लेखन शुरु किया।

वैसे मुझे अपने लेखन से बिलकुल संतोष नहीं है, न व्यावसायिक लेखन से न रचनात्मक लेखन से. मेरे रचनात्मक लेखन से तो औरों को भी कुल मिलाकर कोई संतोष नहीं है. मेरे लिखे धारावाहिकों की तारीफ़ ज़रूर हुई है लेकिन वे भी मुझे कोई खास धांसू नहीं लगते. अपना सोचा हुआ लिख डालने पर बुरा ही लगा है मुझे हमेशा. इसलिए न जाने कितनी रचनाएं ऐसी हैं जो मैंने सिर्फ दिमाग में लिखी और कागज़ पर उतारी नहीं. दिमाग ससुरा ऐसा कम्पूटर भी नहीं होता कि अब उससे पूछूं तो तब का दर्ज किया हुआ ज्यों का त्यों सारा उगल दे. लिखे हुए को काटते जाना और बार-बार लिखते जाना मेरी पुरानी आदत है. उसको ध्यान में रखते हुए प्रेस वाले मेरे हाथ से कॉपी छीनकर ले जाते थे और प्रूफ मुझे पढ़ने के लिए नहीं देते थे. मुझे अपने लेखन से असंतोष होता रहा है और अपने साथी लेखकों की रचनाओं से भी. मुझे अपने ही मानकों से अव्वल दर्जे का लेखक सिद्ध न होने का बहुत ज्यादा अफ़सोस और बहुत गहरा अवसाद है