प्रेम की भूमि पर हमने घृणा को भी पलते हुए देखा.

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‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में पत्रकारिता से कैरियर शुरु करने वाले रुस्तम मूलतः कवि-दार्शनिक हैं. हिंदी कविता में उनका स्वर एकदम अलग है. इसीलिए शायद उनकी कविताएँ लगभग अलक्षित रह गईं. हाल में ही हार्पर कॉलिन्स प्रकाशन से उनकी कविताओं का संचयन प्रकाशित हुआ है. आप ही पढकर बताइए कि क्या इनकी कविताएँ अलक्षित रह जानी चाहिए थीं- जानकी पुल.
१.
इस रात
इस रात 
मैं अपने पिता को याद करता हूँ.
वह सुन्दर आदमी था,
वीरता से भरा हुआ.
शांत और गुस्सैल,
वह तलवार का धनी था.
दुःख को धीरज से सहन करना हमने उससे सीखा था,
और सदा न्याय का पक्ष धरना.
अंततः दुख और अन्याय ने ही उसे खत्म किया:
वह मेरी माँ की मृत्यु को सह नहीं पाया,
और अपने समय के मामूलीपन को.
२.
प्रेम सुख था,
सुख ही रहे
यही हमारी कोशिश थी;
हालांकि इस कोशिश में हम सफल नहीं हुए.
प्रेम की भूमि पर
हमने घृणा को भी पलते हुए देखा.
यह दुःख था,
और इस दुःख को
कविता में हम कह सकते थे.

३.
मुझे घृणा भी कहनी है अपनी कविता में,
और यह कहना है: मुझे घृणा भी है तुमसे.
तब भी
मैं तुम्हारा नाम नहीं लूँगा:
मैं उस लज्जा को बचाकर रखूँगा जिसे
प्रेम तक में तुमने/हमने छोड़ दिया था.
मात्र प्रेम ही नहीं,
लज्जा भी विषय है कविता में.

४.
कभी-कभी
हम प्रेम से थक भी जाते थे,
उसे बनाये रखने की निरंतर कोशिश में.
कभी-कभी
बने रहकर भी वह हमें थकाते हुए चलता था.
कुछ ऐसे भी पल थे
जब हम उसकी बहुत-बहुत बातें करते थे और वह
मात्र बातों में ही बना हुआ नज़र आता था.
तब भी हम बार-बार बोलते थे उसके बारे में,
और उसे कविताओं में लिखते थे.
कितनी बार ऐसा हुआ कि हम उसे भूल जान चाहते थे,
और भूल भी जाते थे,
याद करते थे उसे और फिर वापिस लाना चाहते थे.

५.
दुःख में
छोड़ने के लिए
मैंने
दुःख को ही चुना.
मैंने उसे छोड़ दिया था,
वह तब भी हरा था.
तब भी नाम उसका ‘दुःख’ था.
६.
मुझे याद दिलाओ
कि कुछ
याद रखने लायक था और अब भूल गया है.
यही याद है बस कि समय क्रूर था: स्मृति ने मुझे धोखा दिया है.
वहां
ज़रूर कुछ सुन्दर होगा,
सुन्दर रहा होगा,
जिसे मैं भूल गया हूँ.
मैं
मानने से डरता हूँ कि वह सब जो मुझसे छूट गया है
सब त्याज्य था.

7 COMMENTS

  1. सहज गहन मर्मस्पर्शी -अलक्षित न रहेंगी जब यहाँ आ गई !

  2. माइंड ब्लोइंग… सच में ऐसे कवि का अलक्षित रहना दुखद है… संभव होतो इनके बारे में और जानकारी उपलब्ध कराइए… शुक्रगुजार रहूँगा…

    शेषनाथ…

  3. कभी-कभी
    हम प्रेम से थक भी जाते थे,
    उसे बनाये रखने की निरंतर कोशिश में.
    कभी-कभी
    बने रहकर भी वह हमें थकाते हुए चलता था.
    कुछ ऐसे भी पल थे
    जब हम उसकी बहुत-बहुत बातें करते थे और वह
    मात्र बातों में ही बना हुआ नज़र आता था.

    बहुत सुन्दर रचना , जैसे एक ऊब अंगड़ाई लेकर
    स्वयं को खोल रही हो !

  4. prabhat ji , kitni saral aur sundar anubhootiyan hain . Rustam ji ko unke kavy sangrah ke liye badhai aur itni sundar kavitaen padhvane ke liye aapka shukriya..

  5. मुझे याद दिलाओ
    कि कुछ
    याद रखने लायक था और अब भूल गया है.
    यही याद है बस कि समय क्रूर था: स्मृति ने मुझे धोखा दिया है.
    वहां
    ज़रूर कुछ सुन्दर होगा,
    सुन्दर रहा होगा,
    जिसे मैं भूल गया हूँ.

    बहुत ही सुंदर और गहरी अनुभूतियां है..साझा करने के लिए आभार

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