पारम्परिक समाजों की एक गहन अंतर्कथा

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हाल में ही राजकमल प्रकाशन से मारियो वर्गास ल्योसा के उपन्यास ‘स्टोरीटेलर'(स्पेनिश में एल आब्लादोर) का हिंदी अनुवाद आया है ‘किस्सागो‘ के नाम से. पारंपरिक समाजों के जीवन को लेकर लिखे गए इस उपन्यास और उसके अनुवाद को लेकर बहुत तर्कपूर्ण लेख अशोक कुमार पांडे ने लिखा है. पढ़ने के बाद लगा कि आपसे साझा करना चाहिए- जानकी पुल.    





परम्परा तो समीक्षा के अंत में अनुवादक की लानत-मलामत या फिर चलताऊ प्रशंसा की दो-तीन पंक्तियाँ जोड़ देने की है लेकिन मारियो वर्गास ल्योसा के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास एल आब्लादोरके हिन्दी अनुवाद किस्सागोपर कुछ भी कहने से पहले मैं इसकी अनुवादक शम्पा शाह के प्रति हिन्दी के पाठकों की ओर से आभार और कृतज्ञता ज्ञापन का जरूरी काम करना चाहता हूँ. ऐसा नहीं कि हिन्दी में अच्छे अनुवाद हैं ही नहीं, लेकिन एक आदिवासी समाज की अंतरंग पड़ताल करने वाले इस उपन्यास के ठेठ देसज और जादूई ठाठ को शम्पा शाह ने जिस तरह हिन्दी में बनाए और बचाए रखा है, वह अद्भुत है. पूरा उपन्यास पढते हुए आपको नामों और परम्पराओं से इतर इसके विदेशी होने का कोई एहसास नहीं होता. अपनी सहज रोचकता और अनुवादक की प्रवाहमय भाषा के कारण यह उपन्यास पाठक को अंतिम पन्ने तक बाँधने में कामयाब होता है.
वर्ष २०१० के नोबल पुरस्कार से सम्मानित ल्योसा आक्तेवियो पाज, मार्खेज, बोर्हेस जैसे लैटिन अमेरिकी लेखकों के समकक्ष माने जाते हैं. उनका यह उपन्यास 1987 में मूल रूप से स्पेनिश में प्रकाशित हुआ और फिर १९८९ में हेलन लेन ने इसका अंग्रेजी अनुवाद द स्टोरीटेलरके नाम से किया. पेरू के एक आदिवासी समुदाय माचीग्वेंगा के जीवन और विश्वासों पर केंद्रित यह उपन्यास दो समानांतर कथाओं के जरिये परम्परागत आदिवासी समुदाय और आधुनिक समाज के विकास के बीच के अंतर्द्वंद्व की कहानी कहता है. उन समाजों की जीवन पद्धति, विश्वासों, मूल्य-मान्यताओं, रीति-रिवाजों के विस्तृत और रोचक वर्णन के साथ-साथ उन समाजों के जीवन में आधुनिक तथा विकसित जीवनशैली के हस्तक्षेप के विभिन्न रूपों, जिनमें आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक के साथ-साथ मानव वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से किये गए हस्तक्षेप भी शामिल हैं, को भी विस्तार से वर्णित किया गया है. अपने आरम्भ से किसी रहस्य-रोमांच जैसी लगाने वाली कथा दरअसल प्राचीन सभ्यताओं, उनकी संस्कृति और अस्मिताओं के गहरे रहस्य की कथा है. वह रहस्य जो कहानी के अंत में खुलता नहीं बल्कि पाठक के अंतर्मन में अपने तमाम असुविधाजनक सवालों के साथ दस्तक देता रहता है. भारत जैसे देश में जहाँ आदिवासी समाज का विस्थापन तथा उनका प्रतिरोध समकालीन राजनीति में एक प्रमुख प्रश्न है, यह उपन्यास और ज्यादा आत्मीय तथा देशज बनकर उभरता है. किस्सागोहमारे सामने इस पूरी प्रक्रिया की कशमकश को बेहद आत्मीय तरीके से प्रस्तुत करता है.
जैसा कि मैंने पहले भी जिक्र किया, इस उपन्यास में दो समानांतर कथाएं चलती हैं. इनमें पहली कथा है उपन्यासकार के लीमा में विश्वविद्यालयीन दिनों के मित्र सुआल सूरातास की जो एक छोटे से गाँव में जन्मा और फिर अपने परिवार के साथ राजधानी में आकार बस गया. सूरातास के आधे चेहरे पर एक जन्मजात बदनुमा निशान है, जिसकी वजह से उसे मास्करीता (मुखौटा) नाम से बुलाया जाता है. यह मास्कारीता उपन्यास के पूरे विन्यास में एक व्यंजना की तरह भी आता है. उस दाग की वजह से सुआल को तरह-तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं जिसका सामना वह अपने बेहद शांत, धैर्यवान और सुलझे हुए व्यवहार तथा मुस्कान से करता है. सुआल को माचीग्वेंगा समुदाय में बेहद गहरी दिलचस्पी है. वह बार-बार वहाँ जाता है और उनके रीतिरिवाजों, विश्वासों तथा जीवन पद्धति को आत्मीय तरीके से आत्मसात करता है. वह एक तरफ मुख्यधारा की आधुनिक कहे जाने वाली व्यवस्था के उन समुदायों के जीवन में हस्तक्षेप को लेकर परेशान है तो दूसरी तरफ उसके मन में उन विश्वासों और जीवनशैलियों के प्रति अंध भक्ति भी नहीं. एक जगह वह कहता है कि अगर उसका जन्म माचिग्वेंगा समुदाय में हुआ होता तो उसे वहाँ की परम्परा के अनुसार जन्म लेते ही उस दाग की वजह से नदी में फेंक दिया गया होता.लेकिन समस्या दूसरी है. वह साफ देखता है कि आधुनिक समाज वहाँ अपने स्वार्थवश जा रहा है. उसके मन  में इन समाजों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है. उनके हस्तक्षेप का उद्देश्य इन समाजों का विकास नहीं बल्कि उनके आर्थिक स्रोतों का दोहन है. प्राकृतिक परिस्थितियों से सीखे गए उनके ज्ञान को अवैज्ञानिक बताकर उनके संसाधनों का अंधाधुंध दोहन न केवल उन समुदायों का विनाश कर रहा है बल्कि प्रकृति और मनुष्यता  को भी भयावह नुक्सान पहुंचा रहा है. विश्विद्यालयों तथा सरकारी संस्थानों द्वारा उन समुदायों के मानव-वैज्ञानिक अध्ययन को भी वह इसी व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा बताता है और धार्मिक मिशनरियों के सेवा और धर्मप्रचार को भी. इसीलिए विश्विद्यालय द्वारा उसे एक ऐसे ही अध्ययन दल का सदस्य बनाने का प्रस्ताव वह ठुकरा देता है. पढाई के बाद लेखक अपनी साहित्य की पढाई आगे जारी रखने के लिए यूरोप आ जाता है और मास्कारीता से उसके संपर्क टूट जाते हैं. संकेत इस बात के हैं कि कि वह यहूदी बनकर इजराइल चला गया. वर्षों बाद एक वीथिका में माचीग्वेंगा समुदाय के लोगों की एक तस्वीर देख लेखक को उसकी याद आती है और यह पूरी कहानी फ्लैश बैक में चलती है. दूसरी समानांतर कथा एक कथावाचक के माध्यम से चलती है. जिसमें माचीग्वेंगा समुदाय का कथावाचक अपने समुदाय कि विश्वासों पर आधारित जादूई किस्से सुनाता है. इन किस्सों में से ही उस प्राचीन पारंपरिक समाज के मनोजगत तथा जीवन में प्रवेश के रास्ते निकलते हैं. कहानी इन दोनों कथाओं के माध्यम से आगे बढती है.
लेकिन असल सवाल यह कि उन समाजों के साथ क्या किया जाय? क्या उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाय? क्या उन्हें पुरातात्विक वस्तुओंकी तरह संरक्षित किया जाय? क्या उनका मनुष्यता के विकसित स्वरूप पर कोई हक नहीं? आखिर सभ्य समाज का उनके साथ रिश्ता हो कैसा? उपन्यास के आरम्भ में लेखक के साथ बातचीत में सुआल सूरातास (मास्कारीता) यह सवाल करता है क्या हमारी कारें, बंदूकें, जहाज, और कोकोकोला हमें यह अधिकार देते हैं कि हम उन्हें खत्म कर डालें क्योंकि उनके पास ये तमाम वस्तुएँ नहीं हैं? या कि तुम जंगलियों को सभ्यबनाने में विश्वास रखते हो, दोस्त? कैसे? उन्हें सैनिक बनाकर? या उन्हें फिद्ल…परेरा की तरह क्रियोल के खेतों में मजदूर बनाकर? उन्हें अपनी भाषा, धर्म, रीति-रिवाज बदलने को मजबूर करके, जैसा कि मिशनरी करने की कोशिश कर रहे हैं? इस सबसे क्या मिलेगा? सिर्फ इतना ही न कि हम उनका दोहन आसानी से कर सकेंगे. ऐसा करके हम उन्हें मानव जाति के चलते-फिरते विद्रूप में बदल देंगे, उन अर्ध भ्रष्ट इंडियनों की तरह, जिन्हें हम लीमा में देखते हैं.इसके पहले एक और सन्दर्भ में उसका स्वीकार है कि उच्चतर, नहीं. ऐसा मैंने न तो कभी कहा न सोचा है दृ बंधु’’…निम्नतरय शायद हाँ, यदि यह प्रश्न बच्चों की मृत्युदर, औरतों की स्थिति, बहुविवाह या एक विवाह, हस्तशिल्प या उद्योग के सन्दर्भ में पूछा जाए तो. यह मत समझो कि मैं उन्हें आदर्श की तरह देखता हूँ. कदापि नहीं.’’ इसी की सततता में वह कुछ आदिवासी समाजों के क्रूर रिवाजों के बारे में भी बताता है. 
अब इन दो तथ्यों की रौशनी में रास्ता क्या हो? दुर्भाग्य से अपनी अत्यंत रोचक कथावस्तु और विस्तृत विवरणों के बीच यह उपन्यास इस पर कुछ खास कहता दिखाई नहीं देता. दो समानांतर कथाओं के जरिये उस जनजाति के पूरे जीवन क्षेत्र में फैले इसे उपन्यास में अनेकों आख्यान-उपाख्यान हैं, जिनसे आप मनचाहे निष्कर्ष निकाल सकते हैं. जो कथावाचक है वह अगर मूल रूप से कथावाचक है तो लेखक भी गौण रूप से कथावाचक ही है और ल्योसा उपन्यास के अंत में खुद कहते हैं कि एक कथावाचक की तरह बोलने का अर्थ होता है उस संस्कृति के मर्म में पैठ कर जीना, उसे महसूस कर पाना, यानी उसके मर्म को भेदते हुए उसके इतिहास और पुराण में पैठ पाना, उसके गोदने, छबियों, पूर्वजों की आकांक्षाओं और भय को मूर्त स्वरूप प्रदान करना’. इस रूप में वह  सारा जोर वह मूर्त स्वरूपप्रस्तुत करने में ही लगा देते हैं. माचीग्वेंगा समुदाय का कथावाचक उस समुदाय का एक महत्वपूर्ण और सम्माननीय हिस्सा है क्योंकि वह पीढ़ी दर पीढ़ी अपने समुदाय के किस्से हस्तांतरित करता रहता है, खतरों के समय उन्हें आगाह करता है और उनके बीच लगभग एक धर्मगुरु जैसी हैसियत रखता है. वह कथावाचक देवताओं, सजाओं, पुरस्कारों और चमत्कारों की जादूई कथाएं सुनाता है. ये कथाएं लैटिन अमेरीकी साहित्य के जादूई यथार्थवाद का सुन्दर उदाहरण हैं. इन कथाओं में किसी सहानुभूति की अतिरिक्त मांग नहीं है. ये निर्लिप्त और निर्विकार रूप से पन्ने दर पन्ने फैलती चली जाती हैं. कुछ इस तरह कि आप कई बार भूल जाते हैं कि उपन्यास की मूल विषयवस्तु क्या है. ईमानदारी से कहूँ तो एक सचेत पाठक के लिए कई बार इसमें ऊब भी पैदा होती है. लेकिन इन कथाओं से कोई अन्य ध्वनि सुन पाना या लेखक की किसी पक्षधरता का अनुमान कर पाना संभव नहीं. इस प्रकार अपनी अंतर्वस्तु में यह उपन्यास उत्तर आधुनिक संरचना के करीब चला जाता है. कहानी का द्वंद्व ही यही है कि आधुनिक समाज की वैज्ञानिकता पारंपरिक समाज की मूल्य मान्यताओं से बिलकुल उलट होती है. जब ये समाज आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के करीब आते हैं तो इन्हें मालूम पड़ता है कि अभी तक जिन मूल्य मान्यताओं पर वे विश्वास करते रहे वे कपोल कल्पित हैं. सूरज के उगने और चाँद के रात में रौशन होने की वजहें उनके कथावाचक के किस्सों से इतर वैज्ञानिक तथ्यों में हैं. दूसरी तरफ आधुनिक समाज के लिए जो अवैज्ञानिक है वह सब बर्बर है. उसके मन में इन समाजों के लिए एक सतत अनादर और घृणा का भाव रहता है. उनकी मूल्य-मान्यताओं के प्रति सम्मान की जगह सारा जोर उन्हें अपने जैसा बना लेने पर होता है. यह उनकी अस्मिताओं पर ही एक प्रहार जैसा होता है. इसी के साथ पूंजीवादी लूट का विस्तार उनके संसाधनों तक पहुँच कर उनके आर्थिक स्रोतों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है. यही उनके और आधुनिक समाज के बीच के तनाव का आधार बनता है.
ल्योसा ने इस राज को अंतिम पन्नों तक बचा कर रखा है कि माचीग्वेंगा का कथावाचक या किस्सागो दरअसल मास्कारीता ही है. वैसे इसका अंदाजा उपन्यास के आरम्भ में ही लग जाता है लेकिन शायद ल्योसा इसकी रोचकता के मद्देनजर एक रहस्य अंत तक बनाए रखना चाहते हों. कुल मिलाकर ल्योसा का यह उपन्यास रोचक है, एक जरूरी द्वंद्व की और इशारा कराता है और बहुत आत्मीयता से एक अपरिचित जगत का परिचय कराता है. जैसा कि मैंने पहले भी इशारा किया कि भारत में आदिवासी समुदायों और आधुनिक समुदाय के बीच के द्वंद्व जारी बहस के बीच हिन्दी के पाठकों के लिए इसका महत्व् और बढ़ जाता है लेकिन इससे अधिक यह कुछ नहीं कहता. 

4 COMMENTS

  1. बहुत अच्छा लेख अशोक ….''किस्सागो''पढ़ना ही है अब! इस निश्चय के बाद review के बारे में कुछ कहने कि गुंजाईश ही नहीं रह जाती!धन्यवाद प्रभात रंजन जी पढवाने के लिए !

  2. prabhat aapka shukriya.. Ashok ka ye book review bahut aham muddon par prakaash daalta hai . kamobesh vishv ki sabhi janjaatiyon ki yahi avastha hai. Ashok , ne pustak ke marm ko chhu kar likha hai . ye sameeksha book padhne ke liye prerit karti hai…

  3. अशोक भाई, आप से बात कर के ही लगता है कि आप जबरदस्त पढ़ाकू लेखक हैं… आदकल लोग पढ़ना छोड़ लिखने में लगे हैं… लेकिन आप अलग है…

  4. आभार प्रभात भाई…बेहतरीन पीस। आपने तो किस्सागो पढ़ने की भूख जगा दी। शुक्रिया…

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