समकालीन कविता क्या अपने समय-समाज का रूपक है? क्या
समकालीन कवि आधुनिक हिंदी कविता की छायाओं से मुक्त हो चुका है? क्या देश की बदलती
राजनीति को समकालीन कविता के माध्यम से समझा जा सकता है? अशोक
कुमार पांडे का यह लेख कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक सवालों को उठाता है- जानकी
पुल.
नब्बे का दशक स्वतन्त्र भारत के इतिहास में एक
महत्वपूर्ण विभाजक रेखा है. सोवियत संघ के विघटन के साथ जहाँ एक तरफ समाजवादी
राज्य का स्वप्न खंडित हुआ वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर नेहरूयुगीन अर्थव्यवस्था को
तिलांजलि दे नई आर्थिक नीतियों के नाम से जो नीति लागू की गयी उसने भारत को विश्व
साम्राज्यवाद से नाभिनालबद्ध कर दिया. ऐसा नहीं कि इसके पहले जो नीतियाँ लागू थीं
वे किसी समतामूलक समाज की स्थापना के उद्देश्य से परिचालित थीं, लेकिन दो-ध्रुवीय
विश्व अर्थव्यवस्था में सोवियत ब्लाक की उपस्थिति और देश में एक मजबूत समाजवादी
आंदोलन की उपस्थिति ने राज्य पर थोड़ा नियंत्रण तो रखा ही था. हालाँकि भारतीय
लोकतंत्र से मोहभंग तो साठ के दशक में ही शुरू हो गया था और सत्तर का दशक आते-आते
नक्सलबारी के रूप में जो जनउभार सामने आया था उसका प्रतिबिम्बन साहित्य में भी साफ़
दिखाई दिया था. मुक्तिबोध अगर रक्तपायी वर्ग से बुद्धिजीवियों की नाभिनालबद्धता देख
पा रहे थे तो सत्तर और अस्सी के दशक का कवि उसके खिलाफ पूरे दम-ख़म के साथ खड़ा था
और सत्ता व्यवस्था को चुनौती दे रहा था. कुमार विकल, गोरख पांडे, आलोक धन्वा जैसे
वामपंथी और नक्सल समर्थक कवि ही नहीं अपितु धूमिल जैसे गैर वामपंथी कवियों का स्वर
भी व्यवस्था के प्रखर विरोध से भरा हुआ था. लेकिन इस विरोध की खासियत थी इसमें
अन्तर्निहित एक प्रचंड आशावाद. दुनिया के शीघ्र बदल जाने का एक आत्मविश्वास और
इसका हिस्सा होने की जिद. ज़ाहिर तौर पर यह उस दौर की राजनीतिक हकीक़त से उपजा था. नक्सलवादी
आंदोलन की विफलता फिर आपातकाल और उसके बाद सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर चले आंदोलन
की विफलता, सोवियत संघ का बिखराव, एक ध्रुवीय विश्व के सरगना के रूप में विश्व
साम्राज्यवाद के अनन्य नायक की तरह अमेरिका के उद्भव तथा भारतीय शासक वर्ग के उसके
समक्ष सम्पूर्ण समर्पण ने नब्बे के दशक में जो सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक
परिस्थितियाँ उपस्थित कीं उनके प्रभाव में उसका चेहरा और उसकी अंतर्वस्तु को अपने
पिछले दौर से अलग होना ही था. यहाँ उस प्रचंड आशावाद का ताप मद्धम पड़ा, चिंताएँ और
गहरे रूप में सामने आईं, एक निराशा और दुःख का प्रतिबद्ध कवियों की कविताओं में
दिखाई दी तों तमाम लोगों के विश्वास सोवियत संघ के विघटित होने के साथ ही खंडित
हुए और उन्होंने किसी आमूलचूल परिवर्तन की उम्मीद छोडकर अपनी दूसरी राह चुन ली. हम
आगे उन नयी प्रवृतियों और कमजोर पड़ चुकी कुछ पुरानी प्रवृतियों के उद्भव और उनके
स्रोतों पर भी विस्तार से बात करेंगे.
नब्बे के दशक के बिल्कुल आरंभिक दौर में
इंडिया टुडे में प्रकाशित अस्सी के दशक के प्रमुख कवि कुमार अम्बुज की कविता
‘क्रूरता’ इस दौर की कविताओं की प्रवृति को स्पष्टतः रेखांकित करती है. अपनी
पूर्ववर्ती कविता के तीव्र स्वर से अलग यह कविता समाज में वर्चस्व जमाती जा रही
शक्तियों की मंशा का खुलासा करती है. अपने बेहद सब्लाइम ट्रीटमेंट के साथ यह कविता
नव उदारवाद के मानवविरोधी चरित्र को रेशा-रेशा खोलती है.
तब आएगी क्रूरता
पहले ह्रदय में आएगी और चेहरे पर न दिखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथो की व्याख्या में
फिर इतिहास में और
भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
....वह संस्कृति की तरह आएगी,
उसका कोई विरोधी नहीं होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी
किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
...यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना
पहले ह्रदय में आएगी और चेहरे पर न दिखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथो की व्याख्या में
फिर इतिहास में और
भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
....वह संस्कृति की तरह आएगी,
उसका कोई विरोधी नहीं होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी
किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
...यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना
यहाँ नब्बे के दशक में पैर जमाते सांस्कृतिक
साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दोनों की पदचाप साफ़ सुनाई देती है और साथ
ही इसके प्रभावों को जिस तरह अम्बुज रेखांकित करते हैं वह कविता की उस ताक़त को
बताता है जिससे वह भविष्य के खतरों को देख-समझ पाती है तथा समाज को उसके प्रति
आगाह करती है. इस कविता में दिख रही निराशा को समझने के लिए हमें डा नामवर सिंह के
भाषण की इन पंक्तियों को याद करना होगा – ‘जो लोग कलकत्ते में हैं और इस वामपंथी
सरकार को देखकर समझते हैं कि हिन्दुस्तान में भी क्रान्ति या समाजवाद आया हुआ है तो
मैं उनसे कहूँगा कि थोड़ी सी निराशा बचाए रखो. वह समझ देगी, विवेक देगी और ताक़त
देगी. घनघोर आशावाद तुम्हें धाराशायी करेगा. कवि है जो सतर्क रहता है. आत्म
प्रवंचना है आशावाद, इसीलिए उस निराशावाद को बचाए रखो.’[i]
नब्बे के दशक के बाद की कविता इसी ‘सतर्क निराशावाद’ की कविता है. यह अलग बात है
कि कहीं-कहीं ‘सतर्कता’ सयानेपन में बदल जाती है तों कहीं-कहीं ‘निराशावाद’
अवसरवाद में.
लेकिन इस तथ्य के बावजूद इस दशक की कविता का कोई इकहरा चेहरा
प्रस्तुत करना सरलीकरण होगा. वाम की तात्कालिक पराजय, पश्चिम में इतिहास के अंत की
घोषणाओं के साथ उत्तरआधुनिकता के बढ़ते वर्चस्व, देश के तमाम हिस्सों में उग्र
आन्दोलनों के प्रभाव, बाज़ार के लगातार पूँजी केंद्रित होते जाने के साथ एक ध्रुवीय
विश्व के नेता अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारती शासक वर्ग के गठबंधन और देश में
साम्प्रदायिक शक्तियों की ताक़त में लगातार बढोत्तरी के प्रभाव में हिन्दी साहित्य
में भी अनेकानेक प्रवृतियाँ जन्मीं. यही कारण है कि इस युग के लिए कोई एक नाम दे
पाना आलोचकों के लिए संभव नहीं हुआ. उस समय से लेकर इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के
बीच तक लिखी गयी कविताओं में अलग-अलग तरह की तमाम प्रवृतियाँ दिखती हैं. एक तरफ
वाम अब भी विचार के रूप में संघर्ष तथा प्रतिरोध के आकांक्षी कवियों के लिए
महत्वपूर्ण था तो दूसरी तरफ खुद को वाम कहने वाले तमाम कवि अस्मिताओं की पहचान पर
जोर देने वाले विमर्शों की कविताएँ लिख रहे हैं. दलित और स्त्री विमर्श इस दौर में
बेहद महत्वपूर्ण होकर उभरे हैं. साथ ही सोवियत संघ के टूटने के साथ बहुत सारे
कवियों और आलोचकों ने वाम का लबादा उतार कर कला और एक खास तरह की लक्ष्यहीन परन्तु
सुन्दर कविता का सहारा लिया. इसे ठीक-ठीक कलावाद कहना सही नहीं होगा. क्योंकि अपनी
कला की गुणवत्ता के स्तर पर वह वहाँ भी नहीं पहुंचती लेकिन इसकी लाक्षणिकता इसके
वाम विरोध में है. उद्देश्यहीन नास्टेल्जिया, दार्शनिक प्रलाप, दैहिक प्रेम,
अराजनीतिक आदर्शवाद और दंत नख विहीन मानवतावाद से प्रेरित इन कविताओं को ‘वैश्विक
स्तर’ का बताने वाले आलोचकों की भी कोई कमी नहीं. हम आगे इन प्रवृतियों और इनके
उभरने के कारणों पर विस्तार से बात करने की कोशिश करेंगे.
इस दौर में स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के उभार के साथ एक और
परिघटना बेहद महत्वपूर्ण तरीके से सामने आई है. वाम कही जाने वाली धारा का
साम्प्रदायिकता विमर्श तक सिमटते जाना. नब्बे के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस और
देश भर में लगातार गहराती जा रही साम्प्रदायिकता के बरक्स कविता में इसकी मुखालफत
ज़रूरी भी थी और अपरिहार्य भी. और यह कहना होगा कि हमारे कवियों ने यह भूमिका निभाई
भी पूरी ताक़त से. एकांत श्रीवास्तव की ‘दंगे के बाद’ हो, बोधिसत्व की ‘पागलदास’
या पवन करण की ‘मुसलमान लड़के’ या फिर गोधरा के बाद लिखी गयी निरंजन श्रोत्रिय की
कविता ‘जुगलबंदी’, इस दौर के लगभग सभी कवियों ने साम्प्रदायिकता के विरोध में बेहद
सशक्त कविताएँ लिखी हैं. लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि इस दौर में वाम होने का
अर्थ लगातार साम्प्रदायिकता विरोधी होने तक संकुचित होता चला गया. इस
साम्प्रदायिकता विरोध में भी प्रमुख स्वर गाँधीवादी सर्व धर्म समभाव का विगलित
स्वर था. धर्म की संस्था के खिलाफ खड़े होने या फिर ‘रक्तपायी वर्ग से इसकी
नाभिनालबद्धता’ को रेशा-रेशा साफ़ करने की जिद यहाँ उतनी नहीं दिखती और इसीलिए स्वर
बहुत धीमा, उदास और किसी पराजित वक्तव्य सा लगता है. इनका मूल स्वर उदासी का है.
इतना कह
कर वे चुप हो गए
मुझे सरजू पार कराया और बोले-
जितना जाना मैंने
पागलदास की उदासी का कारण
कह सुनाया
अब जाने सरजू कि उसके दक्षिण तरफ
बस कर भी क्यो उदास रहे पागलदास। (बोधिसत्व की कविता पागलदास से)
मुझे सरजू पार कराया और बोले-
जितना जाना मैंने
पागलदास की उदासी का कारण
कह सुनाया
अब जाने सरजू कि उसके दक्षिण तरफ
बस कर भी क्यो उदास रहे पागलदास। (बोधिसत्व की कविता पागलदास से)
इस उदासी के कारण भी उस समय की स्थितियों में
खोजे जा सकते हैं. एक तरफ वामपंथ की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पराजय और
दूसरी तरफ देश के भीतर सत्ता और समाज पर साम्प्रदायिक तत्वों का बढ़ता जा रहा
नियंत्रण...इन दोनों के साथ ही उदारीकरण के नाम पर हो रहे आर्थिक बदलावों ने समाज
के भीतर एक गहरी निराशा और पस्ती का जो भाव भरा था उसकी यह परिणिति स्वाभाविक ही
थी. आप देखिये कि उर्दू की जुझारू परम्परा से आये कैफी आजमी भी जब अयोध्या पर अपनी
प्रसिद्द नज्म लिखते हैं तो वहाँ भी यह उदासी साफ़ झलकती है. मैं इस उदासी को
निश्चित तौर पर सकारात्मक कहना चाहूँगा. बस दिक्कत यह है कि उन कविताओं के साथ
लिखी दूसरी कविताओं में अपने समय, समाज और राजनीति की जो मुकम्मल समझ और बदलाव की
जो दिशा दिखानी चाहिए थी वह बहुत अस्पष्ट और भावुक है. इसकी एक अभिव्यक्ति बाज़ार
से बाहर होते जा रहे उन ग्रामीण प्रतीकों और वस्तुओं के कविता में प्रवेश के रूप
में हुई जो वस्तुतः पिछडी हुई तकनीकों की उपज थे और आर्थिक विकास के साथ उनका
बाज़ार से बाहर होते जाना स्वाभाविक तो था ही साथ में कई बार उन लोगों के लिए भी
मुक्तिदाता था जो इसका उपयोग कर रहे थे. लेकिन शहरों में रह रहे हमारे मध्यवर्गीय
कवियों की गाँवों से जुड़ी स्मृतियों में ये वस्तुएँ गहरे समाई हुई थीं तो कविता
में इनका प्रवेश किसी पवित्र प्रतीक की तरह हुआ. कुदाल, पिंजन, चूल्हा, कुल्हाडी
जैसे विषयों पर तमाम कविताएँ लिखीं गयीं. लेकिन इनका एक पक्ष इनसे जुड़े हुए
कारीगरों की बदहाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना भी था. नई आर्थिक नीतियों के बाद के
अंधाधुंध मशीनीकरण से जो शिल्पकार बदहाल होते जा रहे थे उनकी नियति और उनके
संघर्षों पर इनमें से कुछ कविताएँ गंभीर प्रश्न भी खडी करती हैं. लेकिन ज्यादातर
कविताएँ उन स्मृतियों को सहेजने से आगे नहीं जातीं.
एक समय तांय-तांय बजते कानों में /सर्द संगीत
भरते पिंजन अब देह पर/दशहरा पूजन का निशान लिए देह पर/ कोनों में पड़े ताकते हैं टुकर-टुकर/कड़ेरे अब
उन्हें पूछते ही नहीं
(पवन करण की कविता ‘पिंजन’)
मेरे घर में अब भी एक पीढा/चुपचाप पड़ा है बारजे
पर.
(जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता पीढा)
यह नास्टेल्जिया कविता में उस पुराने समय की
वेदना को तो दर्ज करती है लेकिन इसके आगे किसी सार्थक बहस को जन्म नहीं देती. इसी
के साथ गाँव से शहर में बसे इन कवियों की ग्रामीण परम्पराओं और उनकी सहज मानवीयता
का चित्रण करने वाली कविताएँ भी हैं जो आधुनिक समाज की अमानवीयता का अपने ढंग से
प्रतिकार करती हैं. ऐसे ही जब नीलेश रघुवंशी ‘हंडा’ कविता में लिखती हैं ‘वह हंडा/
एक युवती लाई अपने साथ दहेज में/ देखती रही होगी रास्ते भर/ उसमें घर का
दरवाजा/बचपन उसमें अटाटूट भरा था/ भरे थे तारों में डूबे हुए दिन’ तो यह महज
नास्टेल्जिया नहीं रह जाती अपितु एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना को रेखांकित
करते हुए ऎसी स्मृति में बदल जाती है जो भविष्य के लिए दरवाजे खोलती है.
इस दौर में कविता
की नागरिकता विस्तृत होकर महिलाओं और दलितों तक पहुँचना शुरू करती है. इस दशक की
महिला कवियों का स्वर न तो ‘नीर भरी बदली’ वाला है, न ही ‘बुंदेले हरबोलों वाला’.
यहाँ स्त्री का जीवन अपने पूरे आदमकद रूप में उसके संघर्षों और प्रतिकार के साथ
आया है. ‘चौका’ कविता में अनामिका जिस तरह से ‘मैं रोटी बेलती /जैसे पृथ्वी/ ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़/ भूचाल बेलते हैं घर/ सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे
समुंदर’ लिखती हैं या ‘हे परम पिताओं /परम पुरुषों/ बख्शो अब हमें बख्शो (स्त्रियाँ)
लिखती हैं या सविता सिंह जब लिखती हैं कि ‘डरी रहती है बिस्तर में भी अपने पुरुषों के संग/
बेवजह ख़लल नहीं ड़ालती उनकी नींद में/ रहती हैं सेवारत बरसाती प्रेम सहिष्णुता/
चाहिए उन्हें वैसे भी ज्यादा शांति / बहुत कम प्रतिरोध अपने घरों में/ फिर भी/ अपने
एकांत के शब्दरहित लोक में/ एक प्रतिध्वनि – सी / मन के किसी बेचैन कोने से उठती जल की तरंग-सी /अपने चेहरे को देखा करती है /एक दूसरे के
चेहरे में /बनाती रहस्यमय ढंग से/ एक दूसरे को अपने सच
का दर्पण.’ तो यह मर्दों की दुनिया
में आजादी के लिए व्यग्र और तत्पर महिलाओं की आवाज़ बन जाती है. लेकिन दिक्कत तब
होती है जब इस नए विमर्श को एक हिट फार्मूले की तरह प्रयोग किये जाने से स्त्री
केंद्रित कविताओं की एक बाढ सी आ जाती है जिसमें स्त्री प्रश्न पर किसी गंभीर
समझदारी या किसी गहरी चिंता की जगह एक तरह की सतही भावुकता और कालान्तर में पूरे
स्त्री-मुक्ति को देह-मुक्ति के आख्यान में बदलकर उसका गुड-गोबर कर दिया जाता है.
यह कविता में धीरे-धीरे जगह जमा रहे और अपने सवालों को लेकर जूझ रहे स्त्री स्वर
को न केवल धुंधला करता है, बल्कि कई बार स्त्री विमर्श की आड़ में स्त्री-मुक्ति के
सवाल को ही सरलीकृत कर देता है.
इसी
तरह कविता में दलित स्वर का भी प्रवेश पूरे दम-ख़म के साथ होता है. अपनी एक कविता
में बद्रीनारायण जब यह कहते हैं कि ‘आकाश में मेरा एक नायक है/
राहू/ गगन
दक्षिणावर्त में जग-जग करता/ धीर मन्दराचल-सा/ सिंधा, तुरही बजा जयघोष करता/
चन्द्रमा द्वारा अपने विरुद्ध किए गए षड़यन्त्रों को/ मन में धरे/ मुंजवत पर्वत पर आक्रमण करता /एक ग्रहण के बीतने पर दूसरे ग्रहण के आने की करता तैयारी/
वक्षस्थल पर सुवर्णालंकार, जिसके कांचन के शिरस्त्राण/ ब्रज के खिलाफ़ एक अजस्र शिलाखण्ड/ भुजाओं में उठाए/ अनन्त देव-नक्षत्रों का अकेला आक्रमण झेलता/
अतल समुद्र की तरह गहरा/ और वन-वितान की तरह फैला हुआ/ तासा-डंका बजाता/ और कत्ता लहराता हुआ ....... ऋगवेद के किसी भी मण्डल के अगर किसी भी कवि ने/ उस पर लिखा होता एक भी छन्द तो मुझे/ अपनी कवि कुल परम्परा पर गर्व होता’ तो वह कविता की एक नयी परम्परा की तलाश और उसकी स्थापना का ही उद्घोष है. इसी क्रम में मुसाफिर बैठा लिखते हैं कि
चन्द्रमा द्वारा अपने विरुद्ध किए गए षड़यन्त्रों को/ मन में धरे/ मुंजवत पर्वत पर आक्रमण करता /एक ग्रहण के बीतने पर दूसरे ग्रहण के आने की करता तैयारी/
वक्षस्थल पर सुवर्णालंकार, जिसके कांचन के शिरस्त्राण/ ब्रज के खिलाफ़ एक अजस्र शिलाखण्ड/ भुजाओं में उठाए/ अनन्त देव-नक्षत्रों का अकेला आक्रमण झेलता/
अतल समुद्र की तरह गहरा/ और वन-वितान की तरह फैला हुआ/ तासा-डंका बजाता/ और कत्ता लहराता हुआ ....... ऋगवेद के किसी भी मण्डल के अगर किसी भी कवि ने/ उस पर लिखा होता एक भी छन्द तो मुझे/ अपनी कवि कुल परम्परा पर गर्व होता’ तो वह कविता की एक नयी परम्परा की तलाश और उसकी स्थापना का ही उद्घोष है. इसी क्रम में मुसाफिर बैठा लिखते हैं कि
‘मुझे क्या था मालूम
कि/ हरि पर तो कुछेक प्रभुजन का ही अधिकार है/
और इस देवी मंदिर को/
ऐसे ही प्रभुजनों ने
अपनी ख़ातिर सुरक्षित कर कब्ज़ा रखा था. (मैं उनके मंदिर गया था)
कि/ हरि पर तो कुछेक प्रभुजन का ही अधिकार है/
और इस देवी मंदिर को/
ऐसे ही प्रभुजनों ने
अपनी ख़ातिर सुरक्षित कर कब्ज़ा रखा था. (मैं उनके मंदिर गया था)
इसी
समय में प्रेमचंद गाँधी जैसे प्रतिबद्ध कवि इस पूरी अवधारणा को मानवमुक्ति की बड़ी
लड़ाई के साथ जोडकर देख रहे थे लेकिन साथ ही दलितों का जीवन संघर्ष और उनकी वंचना
भी उनकी कविताओं में जगह बना रहे थे.
हम क्षत्रिय नहीं थे लेकिन
पीढ़ियों तक लड़ते रहे गाँव की ख़ातिर
उस गाँव की ख़ातिर
जहाँ हमारे लिए कुँए के पास जाना भी वर्जित था
मंदिर को भी हम फ़ासले से ही धोक पाते थे
वह भी दरवाज़ा बंद होने के बाद
हमारा और गाँव के मवेशियों का एक ही जल-स्रोत था
गाँव के मवेशी भी हम नहीं छू सकते थे
उनके मरने से पहले
यूँ गाँव-भर के खेतों में
उम्र भर खटती रहीं हमारी पीढ़ियाँ
यूँ खटते-खटते ही आ गई आज़ादी
हमारे बुज़ुर्गों को आज तक पता नहीं आज़ादी का (हमारा गाँव)
पीढ़ियों तक लड़ते रहे गाँव की ख़ातिर
उस गाँव की ख़ातिर
जहाँ हमारे लिए कुँए के पास जाना भी वर्जित था
मंदिर को भी हम फ़ासले से ही धोक पाते थे
वह भी दरवाज़ा बंद होने के बाद
हमारा और गाँव के मवेशियों का एक ही जल-स्रोत था
गाँव के मवेशी भी हम नहीं छू सकते थे
उनके मरने से पहले
यूँ गाँव-भर के खेतों में
उम्र भर खटती रहीं हमारी पीढ़ियाँ
यूँ खटते-खटते ही आ गई आज़ादी
हमारे बुज़ुर्गों को आज तक पता नहीं आज़ादी का (हमारा गाँव)
नब्बे
के दशक के बाद ये प्रवृतियाँ विस्तार भी लेती हैं और कविता की नागरिकता के विस्तृत
होने के साथ-साथ कुछ और नई प्रवृतियाँ साफ़ दिखाई देने लगती हैं. सोवियत संघ के
विघटन का ‘हैंग़ ओवर’ कमजोर पडता है, बाज़ार का मनुष्यविरोधी रूप साफ़ सामने आने
लगता है, सामाजिक न्याय की विसंगतियाँ दिखती हैं और संपदा की लूट के साथ-साथ
सरकारों का जो क्रूर और दमनकारी चेहरा दिखाई देता है वह कवियों को अपने तरीके से
प्रभावित करता है. एक तरफ राजेन्द्र यादव जैसे तमाम लोग कविता को खारिज कर रहे हैं
तों दूसरी तरफ विजय बहादुर सिंह जैसे तमाम लोग छंद की वापसी की बात कर रहे हैं.
कविता के वजूद को लेकर ही एक नई बहस शुरू होती है. इसी दौर में इंटरनेट एक प्रमुख
माध्यम के रूप में सामने आता है और पाठकों के खत्म होते जाने के भयावह शोर के बीच
कवियों की एक पूरी नयी और ताज़ा खेप सामने दिखाई देती है. इस दौर में जिन कवियों ने
अपनी पहचान बनाई और हिन्दी कविता को प्रभावित किया उनमें शिरीष कुमार मौर्य, गीत
चतुर्वेदी, विशाल श्रीवास्तव, गिरिराज किराडू, कुमार अनुपम, आर चेतनक्रांति, अंशु
मालवीय, नीलोत्पल, राकेश रंजन, संज्ञा सिंह, राजुला शाह, रंजना जायसवाल, रंजना श्रीवास्तव, व्योमेश शुक्ल, तुषार धवल, अजेय, रंजना जायसवाल, उमाशंकर
चौधरी, अरुण देव, निर्मला पुतुल, पंकज चतुर्वेदी, हरे प्रकाश उपाध्याय, प्रदीप जिलवाने,
पीयूष दईया, मनोज कुमार झा, प्रांजल धर, विजय सिंह, मनोज कुमार झा, बहादुर पटेल, महेश
चन्द्र पुनेठा, रविकांत, अंशु मालवीय, अंशुल त्रिपाठी, विमलेश त्रिपाठी, निशांत,
मुकेश मानस, अमित मनोज, अनुज लुगून, ज्योति चावला आदि प्रमुख हैं. अगर इसी दौर में
इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय उन कवियों को भी शामिल कर लें जो अभी पत्रिकाओं में
यथेष्ट स्थान नहीं पा सके हैं तो यह सूची और लंबी हो जायेगी.
इस दौर की कविता में दो तरह के स्वर साफ़ सुने जा सकते हैं. पहला उन कवियों का जिनका अब किसी महाकाव्यात्मक आमूलचूल परिवर्तन में कोई विश्वास नहीं रह गया और दूसरा जिनका धीमे स्वरों में उदासी या पस्ती के गीत गाने से काम नहीं चलता और वे पूरी तल्खी के साथ व्यवस्था के विरोध में खड़े होते हैं. साथ ही इस दौर में बिल्कुल नए क्षेत्रों और नए अनुभवों के कवि अपनी ताज़ा संवेदनाओं के साथ सामने आते हैं. निर्मला पुतुल सुदूर झारखंड से बिल्कुल नई तरह की कविताएँ लेकर आती हैं (यह अलग बात है कि वे अपने पहले संकलन के बाद अचानक अपनी सारी चमक खो देती हैं) तो अजेय सुदूर हिमालयी क्षेत्र से जिन कविताओं के साथ सामने आते हैं उन्हें सिर्फ पहाड़ की कविताएँ कह कर खारिज नहीं किया जा सकता. पिछले साल अकार में प्रकाशित उनकी कविता ‘एक बुद्ध कविता में करुणा ढूंढ रहा है’ समकालीन कविता की एक विशिष्ट उपलब्धि है.
खैबर के उस पार से बामियान की ताज़ा रेत आ रही है कविता में मेरी आँखों को चुभ रही है करआ-कोरम के नुकीले खंजर मेरी पसलियों में खुभ रहे हैं कविता में दहाड़ रहा है टोरा बोरा एक मासूम फिदायीन चेहरा जो दिल्ली के संसद भवन तक पहुँच गया है कविता का सिर उड़ा दिया गया है फिर भी ज़िन्दा है कविता सियाचिन के बंकर में बैठे एक सिपाही की आँखें भिगो रहा है कविता में एक धर्म है नफरत का कविता में क़ाबुल और काश्मीर के बाद तुरत जो नाम आता है तिब्बत का कविता के पठारों से गायब है शङरीला कविता के कोहरे से झाँक रहा शंभाला कविता के रहस्य को मिल गया शांति का नोबेल पुरस्कार जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.
इस कविता के साथ ही बहुत कम लिखने वाले कवि तुषार धवल की चर्चित लंबी कविता ‘काला राक्षस’ का जिक्र करना भी उचित होगा जो हमारे समय के काले पक्ष को इतनी शिद्दत से दिखाती और व्याख्यायित करती है कि इसे पढकर मुक्तिबोध की याद आना स्वाभाविक है.
देखो, तुम्हारे
मुँह पर जो मक्खियों-से भिनभिनाते हैं
हमारे सपने हैं
वो जो पिटा हुआ आदमी अभी गिरा पड़ा है
वही खडा होकर पुकारेगा बिखरी हुई भीड़ को
आस्था के जंगल उजड़ते नहीं हैं
काले राक्षस
अभी हाल में झारखंड के कवि अनुज लुगून की कविताएँ आदिवासी क्षेत्रों की हालिया लूट के बरक्स प्रतिरोध की कविताएँ तो हैं ही, साथ में वे इस पहचान के बाहरी और भीतरी स्रोतों की तलाश करती ताज़ा और आथेन्टिक कविताएँ भी हैं.
वे जो सुविधाभोगी हैं
या मौक़ा परस्त हैं
या जिन्हें आरक्षण चाहिए
कहते हैं हम आदिवासी हैं,
वे जो वोट चाहते हैं
कहते हैं तुम आदिवासी हो,
वे जो धर्म प्रचारक हैं
कहते हैं
तुम आदिवासी जंगली हो ।
वे जिनकी मानसिकता यह है
कि हम ही आदि निवासी हैं
कहते हैं तुम वनवासी हो,
और वे जो नंगे पैर
चुपचाप चले जाते हैं जंगली पगडंडियों में
कभी नहीं कहते कि
हम आदिवासी हैं
वे जानते हैं जंगली जड़ी-बूटियों से
अपना इलाज करना
वे जानते हैं जंतुओं की हरकतों से
मौसम का मिजाज समझना
सारे पेड़-पौधे,
पर्वत-पहाड़
नदी-झरने जानते हैं
कि वे कौन हैं (आदिवासी)
अपनी एक चर्चित कविता ‘यह पलाश के फूलने का समय
है’ में अनुज कहते हैं – ‘जंगल में पलाश के फूल को देख/ आप भ्रमित हो सकते / हैं कि/ जंगल जल
रहा है/ जंगल में जलते आग को देख/ आप कतई न समझें पलाश फूल रहा है/ यह पलाश के
फूलने का समय है/ और, जंगल जल रहा है।‘
साथ ही इस दौर में कविता में एक तरफ शिल्पगत
प्रयोगों के नए-नए रूप भी देखने को मिलते हैं. गीत चतुर्वेदी, व्योमेश शुक्ल,
कुमार अनुपम, गिरिराज किराडू, प्रभात, पीयूष दईया, मनोज कुमार झा जैसे कवियों के
पास एक बेहद ख़ूबसूरत और ताज़ा शिल्प है जिसका वे अपने-अपने तरीके से प्रयोग करते हैं.
शिराओं पे तीखी धार जगाती है ख़ून में उन्माद आँखें मूंदता हूँ
और अब यह मेरे मरने के बाद की पृथ्वी है
उतनी ही सुंदर उतनी ही असुंदर
यह मेरे न रहने के बाद होती हुई बारिश है
उतना ही खिलाती हुई उतना ही ढहाती हुई
यह मेरे न रहने के बाद मरती हुई दुनिया है
उतनी ही सम्मोहक उतनी ही अवसन्न
ख़ून धार से मिलने को ऐसे उद्धत जैसे मैं तुमसे
आँखें खोलता हूँ पर वे नहीं खुलतीं
सुंदर भी वैसे ही नष्ट करता है जैसे कि वह जो नहीं है सुंदर
और अब यह मेरे मरने के बाद की पृथ्वी है
उतनी ही सुंदर उतनी ही असुंदर
यह मेरे न रहने के बाद होती हुई बारिश है
उतना ही खिलाती हुई उतना ही ढहाती हुई
यह मेरे न रहने के बाद मरती हुई दुनिया है
उतनी ही सम्मोहक उतनी ही अवसन्न
ख़ून धार से मिलने को ऐसे उद्धत जैसे मैं तुमसे
आँखें खोलता हूँ पर वे नहीं खुलतीं
सुंदर भी वैसे ही नष्ट करता है जैसे कि वह जो नहीं है सुंदर
(सुंदर भी वैसे ही नष्ट
करता है, गिरिराज किराडू )
यहाँ हिन्दी कविता अपने शिल्पगत तथा भाषाई उरूज
पर दिखती है. हालाँकि यह भी एक पक्ष है कि शिल्प के अतिरिक्त आग्रह के चलते अकसर
कथ्य धुंधलाया है और कई बार तो यह सायास लगता है.
इसी दौर में राकेश रंजन जिस छंद में लिखते हैं
उसे छंद से अधिक ‘तालबद्ध’ कविता कहना उचित होगा उनकी अधिकतर कविताओं का शिल्प
नागार्जुन की तरह कहरवा या दादरा की चार या तीन मात्राओं से निर्मित है. छंद और
ताल के साथ वह अपनी कविता में समकालीन समय पर तीखा व्यंग्य संभव करते हैं और यह
उनकी कविता की ताक़त तो है ही साथ में छंद की शक्ति के सतर्क और उपयोगी प्रयोग के
लिए भी रास्ते खोलता है.
हल्लो राजा!
कभी-कभी तो कठिन धूप में
चल्लो राजा!
कभी-कभी तो चिन्ता-भय से
गल्लो राजा!
कभी-कभी तो जठरागिन में
जल्लो राजा! (हल्लो राजा)
कभी-कभी तो कठिन धूप में
चल्लो राजा!
कभी-कभी तो चिन्ता-भय से
गल्लो राजा!
कभी-कभी तो जठरागिन में
जल्लो राजा! (हल्लो राजा)
शिरीष कुमार मौर्य इस दौर के अपने तरह के विशिष्ट कवि हैं जिनका
संवेदना संसार प्रगतिशील-क्रांतिकारी जीवन मूल्यों से निर्मित है और अत्यंत
विस्तृत है. उनके पास एक समृद्ध भाषा भी है और एक विकसित शिल्प भी जिसके सहारे वे
प्रतिरोध की सार्थक कविताओं के साथ-साथ एक पाठक को उसके अकेलेपन में बोलने-बतियाने
और संभालने वाली कविताएँ भी रचते हैं.
कभी हम कह सकते हैं प्रेम
और जिसे प्रेम कहते ही खलबली मच जाती है उस आँगन में जहाँ माँ माँ की तरह पेश आती थी
और पिता पिता की तरह
और जिसे प्रेम कहते ही खलबली मच जाती है उस आँगन में जहाँ माँ माँ की तरह पेश आती थी
और पिता पिता की तरह
भाइयों की दुनिया में चाकू की तरह प्रवेश
करता है
बहन का प्रेम
जिसे वे उनके और उनके प्रेमियों के हृदय में गहरे तक उतार
अपने आँगन और उसके ऊपर के टुकड़ा भर आकाश की लाज बचाना चाहते हैं
बहन का प्रेम
जिसे वे उनके और उनके प्रेमियों के हृदय में गहरे तक उतार
अपने आँगन और उसके ऊपर के टुकड़ा भर आकाश की लाज बचाना चाहते हैं
(‘एक मध्यप्रदेशीय
सामंती कस्बे के आकाश पर..’ से)
विमर्शों की दलदली जमीन से अलग शिरीष, अंशु मालवीय या आर चेतनक्रान्ति
जैसे कवि एक आमूलचूल बदलाव की पक्षधर कविताएँ लिखते हैं जो किसी दशक की वापसी की
जगह इक्कीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण आख्यान रचती हैं. अंशु मालवीय एक ऐसे कवि हैं
जिन पर आलोचकों का ध्यान बिल्कुल नहीं गया है – बावजूद इसके कि बिना किसी समीक्षा
के इतिहासबोध प्रकाशन से छपे उनके इकलौते संकलन ‘दक्खिन टोला’ के दो संस्करण खत्म
हो चुके हैं. चेतनक्रांति, अंशु, विशाल श्रीवास्तव, कुमार अनुपम जैसे अनेक युवा कवि बिना किसी शोर शराबे और
आलोचकीय-सम्पादकीय संरक्षण के चुपचाप और लगातार जनता के पक्ष में आवाज़ बुलंद करने
वाले कवि हैं. मानवीय रिश्तों पर अंशु का विश्वास अटूट है और उसी के बल पर वह लिख
पाते हैं कि
आश्वसित
मुँह से क्या कहूँ,
मेरा तो पूरा वजूद
तेरे लिये शुभकामना है मेरे दोस्त !
तुझे क्या बताऊँ
कि बिना दोस्त के नास्तिक नहीं हुआ जा
सकता –
समाज में असुरक्षा है बहुत,
आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर
और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती
तुझसे क्या क़रार लूँ,
तेरा पूरा वजूद ही
मेरे लिये आश्वस्ति है
(दोस्त)
ज़ाहिर तौर पर इस एक आलेख की सीमा में समकालीन
कविता के पूरे परिदृश्य को समेट पाना कम से कम मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संभव
नहीं. साफ़ कहूँ तो यह मेरे बूते का काम भी नहीं. एक तरफ तो मेरा सीमित अध्ययन
दूसरे तरफ इस समकालीन कविता का एक अदना सा हिस्सा होना, दोनों ही मेरी सीमाएँ तय
करते हैं. साथ ही समकालीन कविता में इतने आयाम, इतने स्वर और इतनी विविधताएं नज़र
आती हैं कि इसे किसी एक फ्रेम में बाँध देना मुश्किल लगता है. लेकिन मैं इसे कविता
के लिए शुभ मानता हूँ. इस बहुरंगी कविता में हमारा विविधतापूर्ण समाज अपनी सारी
लाक्षणिकताओं के साथ साँसे लेता है.
दुनिया भर में संकट के समय में बेहतर रचनाएं
सामने आई हैं और मुझे लगता है कि संकट के इस समय में हिन्दी कविता अपने तरह से
विकास कर रही है. नब्बे के दशक में जो आर्थिक-राजनीतिक नीतियां सामने आईं थीं वे
इक्कीसवीं सदी के इस पहले दशक में अपनी पूरी विभीषिका के साथ सामने आईं तो कविता
में इनका अपने तरीके से प्रतिरोध भी दर्ज हो रहा है. साम्प्रदायिकता, उपभोक्तावाद,
किसानों की आत्महत्या, सामाजिक विभाजन, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की समस्या, समाज के
भीतर अकेले पड़ते जा रहे मनुष्य के दर्द, छीजते रिश्ते और नई तकनीक के साथ बदलते
मानवीय संबंधों को आज की कविता न केवल दर्ज कर रही है बल्कि इसका एक प्रतिआख्यान
भी रच रही है. मेरा प्रयास समकालीन कविता के इन विविध पक्षों को आपके सामने रख
देने का था.
यह भी एक सच है कि कविता के पाठक कम हुए हैं और
इस पर कुछ कहे बिना निकल जाना कविता के केवल एक हिस्से पर बात करना ही होगा. बाज़ार
में कविता की जगह नहीं है. लेकिन इसका कारण कविता के भीतर से अधिक बाहर है. जेरेमी
स्क्मेल अपने एक आलेख में इसे बहुत साफगोई से पेश करते हैं जब वे कहते हैं कि ‘कविता जिस रूप में आज अस्तित्वमान है, वह सहज,
आत्मआयोजित और संस्कृति के पूरी तरह अलाभकारी स्रोत के रूप में उत्पादन और
पूंजीवादी विनियोजन के बीच के गैप में उपस्थित है ; यह विशिष्ट रूप में उस गैप में
है जहाँ यह भूमंडलीकरण की व्यापक परियोजना को, जिसे अपनी उत्पादकता और उपभोक्ता
क्षमताओं को लगातार एक क्षतिमान छितिज की ओर विस्तारित करना ही होता है, अधिकतम
संभव क्षति पहुँचा सकती है. कोई भी चीज़ जिसमे भूमंडलीकरण के इस व्यापक प्रबंधन को
बाधित करने की ताक़त है – जो हमें इसके स्वचालन से विचलित कर सकती है और वास्तव
में सोचने तथा अपनी कल्पनाओं के प्रयोग पर मजबूर कर सकती है – वह हमारी आवश्यक
मानवता के परिक्षेत्र में हमें फिर से
स्थापित कर सकती है’........’बुरी तरह से प्रतिकूल बाज़ार की ताकतों के बावजूद
कविता का सतत अस्तित्व मानवता के लिए हमारे अकसर विस्मयकारी अस्तित्व के उद्देश्य
को परिभाषित करने वाले के रूप में इसके महत्व को प्रदर्शित करता है. लोकप्रिय
संस्कृति कवियों के प्रति कोई सम्मान नहीं रखती, यह वास्तविक कल्पनाशील काम को
खारिज करती है – ये बातें हमारे वर्त्तमान राजनीतिक तथा आर्थिक संकट के वातावरण
में आश्चर्यजनक नहीं लगानी चाहिए. हमारी हालिया रूचि, मुख्य रूप से इस सवाल के हल
की और केंद्रित हो गयी है कि किस तरह पैसे को और अधिक पैसे में तबदील किया जाए. वह
इस बात पर कोई खास ध्यान नहीं देती कि अंतिम परिणाम कैसा हो सकता है और इसकी तो
बात ही मत कीजिए कि यह कैसा होना चाहिए.’[ii]
जो लोग छंद की वापसी के नारे से पाठक को फिर से हासिल करने की बात करते हैं उन्हें
देखना होगा कि आज छंद में लिखी जा रही रचनाओं के पास भी पाठक कितने हैं?
कुल मिलाकर इस रूप में नव उदारवादी पूंजीवाद
के बरक्स हिन्दी की कविता एक असुविधा की तरह उपस्थित है और इसके भीतर जनता के पक्ष
में आवाज़ बुलंद करने वाले कवियों का एक पूरा कुनबा तैयार हो रहा है जो न सिर्फ
बाजारू कविता के सामने चुनौती पेश कर रहा है, बल्कि मुख्यधारा के भीतर उन कवियों
को भी गहरी चुनौती दे रहा है जो किसी बदलाव की उम्मीद खोकर ‘कला कला के लिए’ के
बासी मन्त्र से कविता की शव साधना कर रहे हैं.

श्रमपूर्वक लिखा गया विचारोत्तेजक आलेख। बधाई...
ReplyDeleteपिछले दो दशकों की कविता पर एक सुविचारित टिप्पणी. सही सवाल, सही विश्लेषण.
ReplyDeleteबहुत अच्छा और उपयोगी लेख ! स्वयं से बहुत कुछ छूटे और टूटे को जोड़ने की प्रेरणा मिली ! आभार ,अशोक जी का और प्रभात जी का !
ReplyDeleteविविध फ़ोंट और सम्पादन का अभाव पढने की गति को कम करता है...
ReplyDeleteसीमित अध्ययन के बावजूद पूरे परिदृश्य को संतुलित रूप से समेटता एक महत्त्वपूर्ण द्स्तावेज़ी आलेख
ReplyDeletesamkaleen kavita ko theek se aankta ..jhaanchta gambheer lekh.. badhai Ashok aur prabhat bhaiya ko bhi..
ReplyDelete'' वाम होने का अर्थ लगातार साम्प्रदायिकता विरोधी होने तक संकुचित होता चला गया. इस साम्प्रदायिकता विरोध में भी प्रमुख स्वर गाँधीवादी सर्व धर्म समभाव का विगलित स्वर था. धर्म की संस्था के खिलाफ खड़े होने या फिर ‘रक्तपायी वर्ग से इसकी नाभिनालबद्धता’ को रेशा-रेशा साफ़ करने की जिद यहाँ उतनी नहीं दिखती और इसीलिए स्वर बहुत धीमा, उदास और किसी पराजित वक्तव्य सा लगता है. इनका मूल स्वर उदासी का है.''--यह कमाल का अवलोकन है. कविता में आये बदलावों को बदलते समय की चाप के साथ मिला कर पढने की खूबसूरत कोशिश. यह जरूर लगता है की बहुत सारे नामों को शामिल करने के मोह ने विश्लेषण में कहीं अन्तर्विरोध पैदा कर दिए हैं. सैद्धांतिक प्रस्तावों और व्यावहारिक विश्लेषण में कहीं कहीं अंतराल दीखता है .
ReplyDeleteफेसबुक पर यह कमेन्ट होता तो इसे लाइक करने में बेहद खुशी होती है. अंतिम पंक्ति से पढ़ने के बाद सहमत हुआ...इसका ध्यान रखना होगा...
ReplyDeleteएक गंभीर और अच्छा आलेख
ReplyDeleteजो सोचने पर विवश करता है..आभार अशोक जी और प्राभात जी...
एक फौरी टिप्पणी. कुमार विकल, गोरख पांडे, आलोक धन्वा जैसे वामपंथी और नक्सल समर्थक कवि ही नहीं अपितु धूमिल जैसे गैर वामपंथी कवियों का स्वर भी व्यवस्था के प्रखर विरोध से भरा हुआ था. यहाँ आलोक धन्वा को देखिये, वे'छिनाल' फेम के पुलिसिया हरम में भी बिना सकुचाए ओष्ठ-बंद किये बैठे रहे विचारक राजकिशोर के साथ.
ReplyDeleteआलेख जल्दबाजी में तैयार किया गया लगता है.बहुत कम कवियों पर ठहरकर सोचा गया लगता है, यह आभास होता है कि जितने कवि-नामों का जिक्रटिप्पणीकार ने किया है उनमें से ठीक से कम को ही पढ़ा है. फिर, मन के कवि भी उनको कम ही मिले हैं! हालाँकि समय और शब्द की सीमा भी एक वज़ह हो सकती है.
कुछ भ्रांत धारणाएं भी हैं. जैसे, निर्मला पुतुल शुरू में हिंदी की नहीं बल्कि संथाली कवयित्री रही हैं.उनका अबतक प्रकाशित संग्रह संथाली-हिंदी,(हिंदी में वहीं प्रस्तुत संथाली कविताओं के अनुवाद हैं) दोनों में है,और इस संग्रह तक उन्हें संथाली कवयित्री ही कहा जायेगा.पुतुल बाद में सीधे हिंदी में लिखने को उतरती हैं और तबसे हिंदी की भी कवयित्री हैं.
बिहार के एक महत्वपूर्ण कवि शरद रंजन शरद, जो कि प्रेमरंजन अनिमेष के अग्रज हैं और मेरे प्रिय कवि, उनका नामोल्लेख तक न होना चौंकाता है.मोहन डहेरिया की तरह वे भी हिंदी की ताल-में-ताल मिला संस्कृति से अलग रहने की वज़ह कम-नाम से रह गए हैं. बड़ा दूँ, डहेरिया भी मेरे पसन्दीदा कवि हैं.
दलित कविता की चर्चा में मेरे अलावा दो लोगों के नाम-बद्रीनारायण और प्रेमचंद गान्धी के लिए गए हैं और काव्य-उद्धरण दिये गए हैं, संयोग या विडंबना कहिये कि दोनों ही गैरदलित कवि हैं. चौथे अन्य का नाम तक नहीं लिया गया है. मुकेश मानस का अन्य सन्दर्भ में नाम गिनाया जरूर गया है, पर शये, उनको अशोक भाई दलित कवि के रूप में जानते ही नहीं.दलित कविता पर बात करने के लिए ओमप्रकाश वाल्मीकी, मोहनदास नैमिशराय,सूरजपाल चौहान, सुदेश तनवर, मलखान सिंह, आदि का नाम भी लेना चाहिए था.खैर....
प्रेमचंद गाँधी को गैर दलित कहना आपकी अनभिज्ञता दिखाता है भाई...वैसे भी मेरा जोर दलित कवियों पर नहीं दलित विमर्श के कविता में प्रवेश पर है...ओम प्रकाश जी या सूरजपाल सिंह जी वरिष्ठ हैं और उन्हें नब्बे के दशक में शामिल करना शायद उचित नहीं होता...बाक़ी कुछ नाम ज़रूर छूटे होंगे लेकिन नाम तो गैर दलित कवियों के भी काफी छूटे हैं...विमल कुमार, अरुण देव, विजय गौड़, राजेश सकलानी....जैसे तमाम प्रिय मित्रों के भी. शरद जी की कविताएँ मुझे बहुत प्रभावित नहीं करतीं ..यह मेरे आस्वाद की सीमा हो सकती है...और भाई अपने अध्ययन की सीमाओं से मैं वाकिफ हूँ ही. आगे कोशिश करूँगा कि इसे और विस्तार दे सकूँ. आत्मीय प्रतिक्रिया का आभार.
ReplyDeleteऔर हाँ, आलोक धन्वा ने उस दौर में जो लिखा उसे मैं तो क्या कोई भी नज़र अंदाज नहीं कर सकता...
ReplyDeleteफिर जानना चाहूँगा कि दलित प्रेमचंद गान्धी की जाति क्या है अशोक भाई? या फिर, कोई अन्य सन्दर्भ या चर्चा का जिक्र बताएं जिससे गान्धीजी के दलित होने का अता-पता मालूम चले.वे दलित है, यह अभी भी नहीं जानता मैं, न पढ़ा कहीं इनको ऐसा जिक्र किये जाते हुए, दलित साहित्यकार में कहीं उनका नाम अबतक क्यों नहीं है? आश्चर्य है!
ReplyDeleteदलित विमर्श के कविता में प्रवेश पर भी यदि बात होगी तो ओम प्रकाश जी या सूरजपाल सिंह को पृष्ठभूमि में रखे बिना काम चलना नहीं चाहिए था!जैसे कि कुमार विकल, गोरख पांडे, आलोक धन्वा, धूमिल के बिना काम नहीं चला!
अच्छा और ज़रूरी लेख. इसे एक शुरुआत मान कर अन्य साथी लेखकों को भी इन दो दशकों की कविता पर अपनी बात रखनी चाहिए.
ReplyDeleteमुसाफिर भाई, प्रेमचंद जी दलित हैं. हाँ लेकिन वह अस्मिता विमर्शों की जगह वाम आंदोलन से जुड़े हैं.
ReplyDeleteयही मोहन डहेरिया के लिए भी सच है...
ReplyDeleteAshoke bhai ka prayas umda hai. Ek hi aalekh mein saari pravrittiyon evam rujhanon ko samet lena vaise bhi sambhav nahin hota. Umeed karta hoon ki Ashoke ji iss sambandh mein aage bhi aur vistrit tatha vishleshnaatmak aalekh prastut karte rahenge.
ReplyDeleteमैं कोशिश करूँगा भाई साहब...
ReplyDeleteमहेश वर्मा ,अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़)
ReplyDeleteअशोक कुमार पाण्डेय जी के इस लेख में जो गहराई और व्यापकता दिखाई दे रही है वह एक समूची किताब से कहीं अधिक है. आशुतोष दुबे जी ने ठीक ही कहा है कि अन्य साथियों को इसे एक शुरुआत मान कर इन दो दशकों की कविताओं पर लिखना चाहिए . अज्ञेय ने भी एक जगह लिखा है कि यदि समकालीन कविता को अच्छे आलोचक न मिल रहे हों तो कवियों को खुद आगे आ कर यह काम संभाल लेना चाहिए. दूसरों का लिखना इसलिए भी ज़रूरी है कि एक महत्वपूर्ण कवि ऐसा लेख लिखते हुए संकोचवश अपना ज़िक्र तक नहीं कर पाता वरना संदेह नहीं की समकालीन कविता पर लिखा हुआ कोई भी मूल्यांकनपरक लेख अशोक कुमार पाण्डेय जी की कविताओं पर ठहरे बगैर पूरा नहीं हो सकता . अपने आत्मबल और राजनैतिक संघर्ष को उन्होंने जिस तरह से अपनी कविता की आतंरिक शक्ति में ढाला है वह अपने आप हमारे समय का दस्तावेज बन जाता है ..लेकिन उनके कवि की इस अनुपस्थिति को मैं लेख की कमी नहीं उसका शिष्टाचार मानूंगा.आत्मप्रचार के इस समय में यह दुलभ होता जाता गुण है . अशोक जी को इसकी भी शामिल बधाई .
अशोक कुमार पाण्डेय जी के इस लेख में जो गहराई और व्यापकता दिखाई दे रही है वह एक समूची किताब से कहीं अधिक है. आशुतोष दुबे जी ने ठीक ही कहा है कि अन्य साथियों को इसे एक शुरुआत मान कर इन दो दशकों की कविताओं पर लिखना चाहिए . अज्ञेय ने भी एक जगह... लिखा है कि यदि समकालीन कविता को अच्छे आलोचक न मिल रहे हों तो कवियों को खुद आगे आ कर यह काम संभाल लेना चाहिए. दूसरों का लिखना इसलिए भी ज़रूरी है कि एक महत्वपूर्ण कवि ऐसा लेख लिखते हुए संकोचवश अपना ज़िक्र तक नहीं कर पाता वरना संदेह नहीं की समकालीन कविता पर लिखा हुआ कोई भी मूल्यांकनपरक लेख अशोक कुमार पाण्डेय जी की कविताओं पर ठहरे बगैर पूरा नहीं हो सकता . अपने आत्मबल और राजनैतिक संघर्ष को उन्होंने जिस तरह से अपनी कविता की आतंरिक शक्ति में ढाला है वह अपने आप हमारे समय का दस्तावेज बन जाता है ..लेकिन उनके कवि की इस अनुपस्थिति को मैं लेख की कमी नहीं उसका शिष्टाचार मानूंगा.आत्मप्रचार के इस समय में यह दुलभ होता जाता गुण है . अशोक जी को इसकी भी शामिल बधाई .
ReplyDeleteमहेश वर्मा , अम्बिकापुर (छ्त्तीसगढ़)