लिखना समय के प्रवाह के विरुद्ध

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अपनी कहानियों और कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखे गए उपन्यास ‘शिगाफ’ के कारण चर्चा में रहनेवाली लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं. प्रस्तुत है उनकी रचनाप्रक्रिया– जानकी पुल.




आज साहित्य – जगत अति विषम – ध्रुवीयकण से ग्रस्त है. लिखना, समय के प्रवाह के विरुद्ध बहने जैसा है. मेरे ख्याल से शायद लेखकों की हर पीढ़ी ने आते हुए यही शिकायत की होगी कि हमारा समय, रचना – विरोधी समय है, मगर मेरा अनुभव यह है कि हमारा समय रचना – विरोधी नहीं रचनाकार विरोधी है. किसी समय के नए लेखकों ने व्यापक स्तर पर बाँटे जाने की पीड़ा नही झेली होगी जो हमने झेली है. यकीन मानिए, इस ध्रुवीयकरण से दम घुटता है, हम 200 लेखक से 8 – 8 के समूहों में बँट जाएँगे और एक दिन हिन्दी लेखक की विलुप्त होती प्रजाति पूर्णत: नष्ट हो जाएगी. कला के स्तर पर भी, राजनीति के स्तर पर भी. क्या अब भी कोई रास्ता है कि हम एक अच्छे संयुक्त परिवार की तरह कम से कम बाहर तो ‘एक, संतुष्ट, सौहार्दपूर्ण और ताकतवर परिवार’ की तरह दिखें. हम अंग्रेज़ीदां साहित्योत्सवों पर आँख टेढ़ी करने की जगह, समानांतर कोई आदर्श प्रस्तुत करता हिन्दी का साहित्योत्सव क्यों नहीं मनाएँ ? अपने अपने द्वीपों से निकल कर, धड़ेबाजी से निकल कर. ( विशफुल थिंकिग!!!!)

हम गिने – चुने मुट्ठी भर हिन्दी के लेखक छोटे – छोटे द्वीपों में बँट गए हैं. न केवल बँटे हैं, बल्कि द्वीपों के आगे कँटीली बाड़ भी हमने लगा ली है, किस पत्रिका में छपें, किस में नहीं, किस साहित्यिक कार्यक्रम में शिरकत करें, किस में नहीं. अजीब अविश्वास का माहौल है. इस पर अगर आप लेखिका हैं तो बात अविश्वास से उलझ कर सीधे संदिग्धता की कगार पर आ खड़ी होती है. स्त्री होकर हिन्दी में लिखना आज दुस्साहस का काम है. ईरान, अरब, तुर्की की लेखिकाओं से ज़्यादा दुस्साहस का काम. क्योंकि हमारी जेल ज़्यादा बड़ी है…और हमारी जेल के जेलर हिन्दी के वही प्रबुद्ध हैं जो स्त्री मुक्ति पर गंभीर विमर्श करते हैं.

साहित्यिक संवेदनशीलता हिन्दी साहित्य में बहुत सामंती ढंग से आती है. निज आस्थाओं को नकारते हुए, स्त्री की अस्मिता और निजता को नकारते हुए. उसके हाथ पीछे बाँधते हुए. हमसे बेहतर हैं ईरान, अरब, तुर्की की लेखिकाएँ खुल कर लिखती हैं, विरोध करती हैं, जेल जाती हैं, शायद मार भी दी जाती हो. हम जेल नहीं जाती, दोहरी तलवारों पर चलाई जाती हैं , हमें सबके सामने ज़ोर से ‘कुछ’ और कहा जाता है, वही फुसफुसा कर नेक सलाह भी देते हैं. बानगी देखिए.

प्रगतिशील बनो – ( सेमिनारों में कम दिखा करो, देखा फलां लेखिका घर बैठ कर लिखती है, कहीं दिखती नहीं. उसके बारे में बात होती है कहीं?)

आप को स्त्री के पक्ष में खुल कर लिखना चाहिए, आप तो प्रगतिशील महिला हैं – ( आपकी कमी बस यह है कि आप स्त्री हैं, उस पर सुन्दर)


मैं ने न जाने कितनी बार अकेले में खुद से बहस की है, मनीषा तुम्हारा निजी गुनाह तो बस इतना है कि न केवल तुमने लिखना चुना, लिखना चुना तो घर में बैठती न….अपने कदो – बुत के साथ बाहर क्यों आ गईं? सबसे हाथ मिलाया, नज़र उठा कर बात की. तुमने सोचा कैसे यहाँ वही सम्मान मिलेगा जो तुम्हें फौज में मिलता है! यहाँ कैसे तुम किसी वरिष्ठ को उसके पहले नाम से पुकार सकोगी? खुल कर हँसोगी, साहित्य के किसी अंग्रेज़ीदाँ महोत्सव में देश – विदेश के तमाम लेखकों के साथ संगीत पर  थिरक उठोगी….इडियट! भूलो मत तुम हिन्दी के लेखिका हो. जींस के साथ – साथ सौजन्यता “नॉट अलाउड” !

मैंने आज तक अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता को हरसम्भव बचाने की कोशिश की है. सहज ही या लड़ कर, छीन कर और बहला – फुसला कर मैंने इसकी डोर अपने हाथ में रखी है. विचारों की, अभिव्यक्ति की, पहनावे की, खान – पान की या अपने आलस और कामचोरी की आज़ादी भी. विवाह को ‘व्यवस्था’ न बनने देने की ज़िद की आज़ादी. ज़िन्दगी का मोह, आज़ादी का स्वाद, जीवन और मनोलोक को लेकर अनवरत जिज्ञासाओं के उत्तर ढूँढने का पागलपन, इमानदार अभिव्यक्ति का साहस ही मुझे ‘मैं’ बनाता है. तो मैं हिन्दी – जगत में आकर ‘कोई और’ क्यों बन जाऊँ?

आप किसी अच्छे कार्यक्रम में इसलिए नहीं जा सकते कि वह विपरीत धड़े वाले करा रहे हैं. यूँ भी लेखिकाएँ स्त्री होने का प्रतिरोध हर तरफ से झेलती हैं, ऎसे में साहित्य का कँटीला माहौल उनके लिए लिखना भी कठिन बनाता जा रहा है. अकसर गोष्ठियों में मंच पर बोलने वालों में लेखिकाओं की संख्या नगण्य होती है, उस पर साहित्य जगत का ही संकीर्ण रवैय्या उन्हें और पीछे धकेल देता है. साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में आपका मन हो तो आप नहीं जा सकते, हमारे सीनियर (ज़्यादातर पुरुष) तुरंत सलाह देंगे कि किसी लेखिका के लिए ओवर एक्सपोज़र घातक है. किसी उभरती नई लेखिका को डराने, बाहर से समाज नहीं आता, साहित्य के भीतर बैठे तथाकथित उदार प्रगतिशील लेखक आते हैं, आलोचक आते हैं, वही जो स्त्रीलेखन को प्रश्रय देने का ढोंग करते हैं. हमें हमारे वरिष्ठ विरासत में बहुरेखीय, बहुस्तरीय विभाजन देकर और व्यवहार में अविश्वास भर कर जाएँगे.

कभी साहित्य में एक जो बारीक छन्नी हुआ करती थी वह भी तार – तार हो गई है, सम्पादकों की भूमिका का क्या हुआ? लगता तो नहीं कि वे अब भी ‘ख़ेद सहित’ रचनाएँ वापस करते होंगे?  साहित्यगत कलात्मकता को कूट – पीट कर समतल बनाने के षड्यंत्र में स्वयं हमारे संपादक शामिल होते जा रहे हैं.  अकसर मुझे सुनने को मिलता है, अपनी या अपने समकालीनों की रचनाओं को लेकर, बहुत क्लिष्ट  हो गया, या अकादमिक हो गया है? हम सही मायनों में सजग पाठक होते हैं तो ढूँढते हैं किसी खास शब्द का अर्थ और संदर्भ. मज़ा आता है उसमें. मैं जाने – बूझे ज्ञान – बघारू क्लिष्ट साहित्य की पैरवी चाहे न करूँ मगर मुझे अपनी रचना प्रक्रिया में पाठकों की सीमा को ख्याल में रख अपनी रचना को सरलीकृत करना पसन्द नहीं. एक नया शब्द खोज कर जानना, अच्छा है पाठक के लिए, इसमें रस – बाधा नहीं होती बल्कि नया शब्द जान लेने का सुख और फिर एक अच्छे ब्रेक के बाद फिर नए सिरे से रस – प्रवाह होता है कहानी का, नए संदर्भ के साथ.

  

भाषा, शिल्प, रचना और कला का सरलीकरण कला को डायल्यूट करना है.

इकहरी कहानियाँ, इकहरी कविताएँ, आत्मकेन्द्रित वैचारिक लेखन, समूह केन्द्रित आलोचना. भाषा की गुणवत्ता में क्षरण और शिल्पगत कला का अर्थ सम्पादक की छलनी में से समूचा छन कर बह जाता है..बचता है क्या फिर? वादों/ विमर्शों और लेखन के चलताऊ अतिसरलीकृत फार्मूलों के बीच कई बार शब्द की गरिमा पर से विश्वास उठता है, मगर सजग होकर उसे सँभालना होता है, यहाँ सम्पादक और प्रचलन को उपेक्षित करना होता है. एक कथाकार के जो अनुभव आंतरिक व चेतनात्मक स्तर पर होते हैं वही महत्वपूर्ण होते हैं, वे अनुभव कतई महत्वपूर्ण नहीं होते जो कि लेखक – सम्पादक, लेखक – आलोचक के या लेखक – प्रशंसक – पाठक के बीच होते हैं.

मैं बहुत बरस पहले लिखे निर्मल वर्मा के इस वाक्य पर क्यों ठिठक गई हूँ? 

जब किसी साहित्य में सार्थक, जीवंत और संयत समीक्षा पद्धत्ति मुरझाने लगती है तो उसके साथ एक अनिवार्यत: एक परजीवी वर्ग, एक साहित्यिक माफिया पनपने लगता है. ऎसी विकट स्थिति में लेखक अपने खोल में चला जाता है.”


सुशील सिद्धार्थ के संपादन में सामायिक प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित पुस्तक ‘नई सदी की हिंदी कहानी’ में शामिल.

25 COMMENTS

  1. भाषा, शिल्प, रचना और कला का सरलीकरण कला को डायल्यूट करना है.

  2. i agree with it:-
    some body said above–
    ''The most essential gift for a good writer is a built-in shock-proof, shit detector. This is the writer's radar and all great writers have had it.”
    Ernest Hemingway said it.
    forget everyone's opinion
    Manisha keep on going.''
    regds
    -om sapra, delhi-9

  3. मनीषा कुलश्रेष्ठ से बड़ा लाबीस्ट हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कोई नहीं है ..आप उनकी सिर्फ तारीफ़ करें तभी वह खुश रहती है ,अगर उनकी थोड़ी भी आलोचना कर दे तो वो बौखला जाती है ..हो सकता है वो तकनीकी रूप से लेखिका हो लेकिन विचारों ,इंसानियत के स्तर पर तो बेहद घमंडी ,संवेदनहीन ,सिर्फ चापलूसी ,तारीफ पसंद करने वाली है ..हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनका जो भी स्थान है वो सिर्फ चापलूसी ,चुगलखोरी और लाबिंग की वजह से है ..लेखक या लेखिका के लिए पहली और अनिवार्य शर्त उसमे इंसानियत /मानवता का होना है अगर उसमे ये तत्व नहीं है तो ऐसे लोगों को क्या कहूँ ..बस ज्यादा कहना नहीं चाहता …मनीषा कुलश्रेष्ठ के शब्दों ,लेखों और रचनाओं पर ना जाइये वो बिना किसी मानवीय भावना के लिखी जाती है जहाँ सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ तत्व की प्रधानता होती है ..जब तक आप उनकी तारीफ,चापलूसी करेंगे बस तभी तक वो आप के साथ है नहीं तो सिर्फ उनका झूठा घमंड ,बौखलाहट यानी उनका असली चेहरा …

  4. मर्मज्ञ वही है जो साहित्‍य को साधना समझकर अपने समय की नब्‍ज पर उंगलियां जमाने की कोशिश कर रहे हैं.. समय के प्रवाह में आगे वही बचेंगे भी जिनकी रोशनी दूर से पहचानी जायेगी। सच्‍चा साहित्‍य लिंगभेद नहीं करता, न ही बाजार की जुगत करता है।

  5. The most essential gift for a good writer is a built-in shock-proof, shit detector. This is the writer's radar and all great writers have had it.”
    Ernest Hemingway said it.
    forget everyone's opinion
    Manisha keep on going.

  6. ANNA HAZARE PAR JAB LOGON KEE UNGLIYAN UTHNE
    LAGEE TO UNHONNE MAUN VRAT DHAARAN KARNA BEHTAR
    SAMJHA . MANEESHA JI ,MAUN VRAT DHAARAN KARNE MEIN HEE AB AAPKEE BHALAAEE HAI –

    BAAT UNKO KYAA SUNAAYEE JAAN KAR APNA USE
    BAAT JAESE PAR LAGAA KAR HAR TARAF UDNE LAGEE

    JAB – JAB AAP APNAA DARD SUNAAYENGEE TAB – TAB
    BKAUL ANAND BAKSHI ` KUCHH TO LOG KAHENGE —`

  7. नन्द भारद्वाज जी , ज्ञानेश उपाध्याय जी , डा. दीप्ति गुप्ता तथा और लोगों के विचार पढ़े.. मनीषा जी के इस वक्तव्य को ‘जानकीपुल’ में रचना-प्रक्रिया शीर्षक के साथ डाला गया है. जो वास्तव में रचना-प्रक्रिया है ही नहीं. यहाँ कुछ सवाल हैं-

    १) ध्रुवीयकण से ग्रस्त समय में क्या लेखिका स्वयं इस ध्रुवीयकण से मुक्त है? इस ध्रुवीयकारण को लेकर लेखिका ने लिखा है- "क्या अब भी कोई रास्ता है कि हम एक अच्छे संयुक्त परिवार की तरह कम से कम बाहर तो ‘एक, संतुष्ट, सौहार्दपूर्ण और ताकतवर परिवार’ की तरह दिखें."
    कम से कम बाहर से एक होने का मतलब समझ में नहीं आया ! क्या हमें अंदर से ‘एक, संतुष्ट, सौहार्दपूर्ण और ताकतवर परिवार’ की तरह' नहीं होना चाहिए? फिर बाहर से यह नौटंकी करने की जरुरत क्या है? आखिर लेखिका इस नौटंकी को प्रश्रय क्यों दे रही है? ये नौटंकी कही उनके सृजन का मूलमंत्र तो नहीं?

    २) क्या लेखिका स्वयं द्वीपों और धड़ेबाजी से मुक्त है? क्या रचनाकार कभी मुक्त हो सकता है? और फिर उनकी रचनाओं पर जो निश्चित लोगों के प्रशास्तिगान, ‘मित्र कशीदा और प्रायोजित समीक्षाएँ’ (स्वयं प्रकाशजी के शब्द ) होते हैं, क्या वे धड़ेबाजी से मुक्त होते हैं? wall पर प्रकाशित post-comnt पढ़ कर कोई भी धड़ेबाजी और ध्रुवियकरण का अंदाज़ा लगा सकता है.

    ३) स्त्री मुक्ति के प्रसंग पर लेखिका खुद कितनी गंभीर है. ‘ज्ञानपीठ’ के विभूति-प्रकरण पर लेखिका ने कितना विरोध किया था? क्या ‘कठपुतलियां’ का प्रकाशन ‘ज्ञानपीठ’ से होने की वजह से लेखिका चुप थी ? इस प्रसंग पर जितना मुखर होना चाहिए था क्या लेखिका हुई ? उन्हें तब पुरुषों पर नालत-मनालत करने का पूरा अधिकार था तब वे चुप्पी मार गयी, आखिर क्यों? यही नहीं कई मुद्दों पर तो घातक श्रूढता भी अपनाई! लीपापोती वाला बयान दिया.

    ४) लेखिका ने लिखा है – “इकहरी कहानियाँ, इकहरी कविताएँ, आत्मकेन्द्रित वैचारिक लेखन, समूह केन्द्रित आलोचना. भाषा की गुणवत्ता में क्षरण और शिल्पगत कला का अर्थ सम्पादक की छलनी में से समूचा छन कर बह जाता है..बचता है क्या फिर? वादों/ विमर्शों और लेखन के चलताऊ अतिसरलीकृत फार्मूलों के बीच कई बार शब्द की गरिमा पर से विश्वास उठता है,”
    क्या इन सब से लेखिका का लेखन बच पाया है? जिन जुमलों को लेकर लेखिका आगबबूली होती रहती हैं , क्या वे खुद इन जुमलों से बच पाई है. लेखिका को “जुमला” शब्द ज्यादा ही प्रिय है, हर बात को-हर विचार को झट से जुमला कह देना लेखिका का शगल है, यह दीगर बात है कि लेखिका स्वयं कभी इनसे बच नहीं पाती !

    ये कथन -“जींस के साथ – साथ सौजन्यता “नॉट अलाउड” !” जिसने भी किया है शर्म नाक और निंदनीय है. ये उस ‘पुरुष या पितृ सत्ता’ का मानदंड है जिसे मनीषा जी को भी फिर से देखना-परखना पड़ेगा. उस पर दोहरे आयामों-मानदंडों से मुक्त होकर सोचना पड़ेगा.

    ५) मनीषा जी ने लिखा है- “साहित्यिक संवेदनशीलता हिन्दी साहित्य में बहुत सामंती ढंग से आती है” यहाँ सामंती के साथ ब्राह्मणवादी ढंग और नत्थी कर लिया जाना चाहिए था.

    सवाल यह है कि यह साहित्यिक संवेदनशीलता क्या केवल पाठक, आलोचक या संपादक के लिए ही है, क्या लेखक से इसका इत्तेफाक रखना ज़रुरी नहीं है?
    और मनीषाजी आज जिस ‘मुकाम’ पर है उसमें क्या संपादक-पाठक- प्रशंसक-आलोचक-प्रकाशक (स्त्री-पुरुष दोनों) का कोई योगदान नहीं हैं.

    मनीषा जी अपनी रचनाओं को लेकर बहुत हठी और सामंती ढंग से सोचती हैं. उनकी तारीफ (झूठी-सच्ची) चाहे जीतनी करो, वे गदगद हो जाती हैं पर अगर कहीं आपने आलोचना कर दी तो वे बौखला जाती हैं. उनको केवल विरुदावली भली लगती है, ये सामंती सोच नहीं तो क्या है? उनकी इस टिपण्णी में भी वे इसका परिचय दे ही देती हैं- “यहाँ सम्पादक और प्रचलन को उपेक्षित करना होता है. एक कथाकार के जो अनुभव आंतरिक व चेतनात्मक स्तर पर होते हैं वही महत्वपूर्ण होते हैं, वे अनुभव कतई महत्वपूर्ण नहीं होते जो कि लेखक – सम्पादक, लेखक – आलोचक के या लेखक – प्रशंसक – पाठक के बीच होते हैं.”
    ये शब्द की गरिमा को बचाने का नहीं लेखिका के निरा दंभ का प्रमाण है.

    फिर ये साहित्य है … कितने महारथी धराशायी होते देखे गए हैं. समय बड़ा क्रूर होता है किसी को नहीं बक्श्ता. कई लेखकों का कोई नामलेवा नहीं बचा! समय की छलनी सब तार-निथार देती है.

  8. ड़ा अनुराग के कथन से मैं पूर्णता: सहमत हूँ – 'एक अच्छा लेखक होने से महत्वपूर्ण है एक अच्छा इंसान होना'!
    अगर आप खुद दोगली नहीं हैं तो किसी भी पुरुष लेखक, आलोचक, सम्पादक और साहित्यिक गुट की न तो हिम्मत होगी, न ही आत्मा गंवारा करेगी कि वह आपको अपने (पुरुष आलोचकों के)दोहरे मानदंडों के तहत 'नारी सुरक्षा' का पाठ पढाए!
    मनीषा जी, आप साहित्यिक संवेदनशीलता के जिस सामंती दृष्टिकोण की बात कर रही है – उसके तहत कौन सी लेखिका को आज तक लिखने से रोका गया है ?अभी आप अपने को देख लीजिए, आप बेबाकी से पुरुष वर्ग की खुली आलोचना कर रही है, उन्हें तडित कर रही हैं यह आपकी और हम सब नारी लेखिकाओं की लेखकीय ही नही अपितु पारिवारिक सामाजिक, आर्थिक आजादी का प्रमाण है ! जहां तक आलोचना का सवाल है , तो वो तो गलत बोलने, करने, लिखने वाले पुरुष की भी होती है ! अगर आप सच में अपने में सही है और जैसा कि अनुराग जी ने कहा – 'अच्छी इंसान' हैं तो कोई ईर्ष्यावश कितनी भी लानत-मलानत करने की जुर्रत करे,आपको अपने लक्ष्य यानी लेखन-धर्म से डिगा ही नहीं सकेगा!यदि आप निष्ठा से, सच्चे दिल से कुछ 'रचनात्मक' पाठकों को, साहित्य जगत को, समाज को परोस रही हैं तो निश्चित ही आपका स्वागत होगा ! जैसा कि आपने आरोप लगाया है – 'आपका पहनावा', 'आपकी सुंदरता और असुन्दरता', गौण बन कर रह जाएगी अगर आपकी लेखनी में, आपकी बातों में दम है तो ! साहित्य जगत की वरिष्ठ हस्तियाँ महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी,उषा प्रियम्वदा,सुधा अरोरा, मृदुला गर्ग, राजी सेठ, अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं जो अपने समय की संकीर्ण मान्यताओं के चलते भी बेबाक होकर शानदार और जानदार लेखन करती रही और आज तक सराही जाती हैं उसी पुरुष वर्ग द्वारा जिसकी बातों पर आप विलाप कर रही हैं! 'कहने को बहुत कुछ है,अगर कहने पे आते' – फिलहाल इतना ही ! चलते-चलते एक बार फिर ड़ा अनुराग के इस अमूल्य कथन को – 'एक अच्छा लेखक होने से महत्वपूर्ण है एक अच्छा इंसान होना' हमारा सलाम !
    दीप्ति

  9. स्त्री विमर्श या किसी भी विमर्श का असल अर्थ क्या है ? अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होना ! ओर यहाँ लोग अपने पूर्वाग्रहों का एक्सटेंशन किये जाते है …..वे पूर्वाग्रह अपनी अनुपस्थिति के बावजूद भी उपस्थित रहते है …ढेरो किताबे पढने के बावजूद भी .क्यों ?एक अच्छा लेखक होने से महत्वपूर्ण है एक अच्छा इंसान होना…..यूँ भी किसी एक विषय में ज्ञानी होने का अर्थ ये नहीं की व्यक्ति की सोच व्यापक हो गयी.विचार ओर संवादों की प्रक्रिया मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की एक कड़ी है …तजुरबो ओर दुनिया को देखने के बाद उसे संवेदनशील दृष्टि से देख कर उसकी व्याख्या करना ….पर सच कहूँ ये सिर्फ सिर्फ लेखन ही नहीं ये इस समाज की समस्या है ..बुद्धिमानो के बीच ध्रुवीकरण प्रोसेस ज्यादा फास्ट होता है…..अन्ना के आन्दोलन का उदारहण देखिये आधे से अधिक लोग लोकपाल का इसलिए विरोध कर रहे है क्यूंकि फलां कपडा पहने आदमी लोकपाल ला रहा है …..उन्हें आपत्ति लोकपाल से नहीं है उन्हें आपत्ति लाने की मांग करने वाले के कपडे के रंग से है …भले ही वह प्रशन एक सामाजिक हित से जुड़ा हो…..बहुत सी स्त्री लेखक मेरी मित्र है…उन्होंने स्वीकार किया है वे लिखते वक़्त अपने आप को एडिट करती है …कुछ चीजों पर नहीं लिखती….के कंट्रोवरसी खड़ी होगी .जहाँ पुरुष लेखक अपने पूर्व प्रेम प्रसंगों पर लिख कर वाहवाही लूटता है .स्त्री अपने जीवन के कुछ हिस्सों को सिर्फ सतही तौर पर सहानुभूति से याद करने पर "मार्क" हो जाती है .कही पढ़ा था
    "राम हो या गांधी घर की चौखट पर पहुँचते पहुँचते सिर्फ पुरुष रह जाते है"
    …..आदमी को इस पुरुष से मुक्त होने में कई साल लगेगे

  10. आधुनिकता विचारों से झलकनी चाहिए और वह दोनों के लिए है, किसी एक की बपौती नहीं। जिन्हें कपड़ों का खुलापन पसंद है या जो ऐसा करते है, कतई जरूरी नहीं कि उनमें वैचारिक खुलापन भी हो। व्यवहार में इसका उल्टा ही अधिक होता है। आपकी सोच ही अगर मध्यकालीन है तो फिर चाहे आप आधुनिक होने के लाख ढोंग करते रहिए, क्या फर्क पड़ता है? अधिकांश में होता यही है कि जो जितना अधिक प्रगतिशील होने का दावा करता या करती है दरअसल वह उतना ही अधिक प्रतिक्रियावादी या यथास्थितिवादी होता है। पहली स्थिति उसे दूसरी स्थिति को और अधिक पुख्ता करने के लिए जमीन प्रदान करती है, ठीक सच और छद्म की तरह।

  11. किसी भी लाभ-हानि से ऊपर होता है लेखन। एक वही ऊर्जा है जो एक लेखक को लेखक बनाती है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू वह भी है मनीषा जी जिसकी ओर आपने कुछ खुलकर और कुछ इशारा किया है। जैसे समाज में कुछ लोग अपने दंद-फ़ंद से मठाधीश बन बैठते हैं साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। जो लेखन में जो ईमानदारी उसे शीर्ष पर बैठाती है आचार-व्यवहार में वही बेईमानी और टुच्चापन उसके खोल की पोल खोलता है। अधिसंख्य तथाकथित साहित्यिक बड़े-बड़े नामों का। हर जगह अपनी कुंडली फ़ैलाए पसरे पड़े हैं,बहुत ही दोहरा चरित्र है। एकलव्यों के अंगूठे मांगनेवाले। सिर्फ़ अपनों और अपने चहेतों-भक्तों को पनपानेवाले। शुरुआत में लेखक होते हैं बाद में तो सिर्फ़ अकादमियों,घरानों और पुरस्कारों के दलाल भर रह जाते है। फ़िर भी यह शाश्वत सत्य है कि प्रतिभा और हौसला कभी कहीं दबी-छुपी नहीं रहती। दुष्यंत कुमार के शब्दों को इस्तेमाल करूं तो ’एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो! आप में दोनों हैं, इन टुच्चों के टुच्चेपन को भूल पूरी क्षमता, ऊर्जा से अपनी प्रतिभा का पूर्ण दोहन कर उदाहरण बनें। आपका लेखन और आपके पाठक आपके साथ हैं तो फ़िर सारे विपरीत प्रवाह आपके साथ होंगे। शुभकामनाओं सहित

  12. जीवन में आप जो भी करो, उसका कोई विरोध होगा ही, पर इतना नही होगा कि आप की कोई ज़मीन छीन लेगा. क्यूंकि वों अपनी मेधा और मेहनत ही बनायेगी. पता नही क्या पहने, कैसे जिये में, अपने साथ अगर आपकी कोई धुन बनती है, तो उसी में रमिये. उसको लेकर कैसी सफाई, किसी के कुछ भी कहने से कैसा उद्दवेलन? कैसी परेशानी? हिंदी समाज और कोई भी समाज, बहुत छोटा लेखकीय समाज भी, कई परतों में है, उस पर भी क्यूं एकरंग की स्याही फिरानी है? आंशिक रूप से कविता जी से सहमत.

  13. मुझे नहीं लगता कि किसी लेखिका के वस्त्रों को लेकर नजरिया उसके लेखक होने न होने से ताल्लुक रखता है। वस्तुतः यह वह दृष्टि है जो उसके स्त्री होने के सत्य के साथ जुड़ी है; वह लेखक है, या कोई अन्य स्त्री; इस से उसके प्रति दृष्टि बदलने की अपेक्षा दूर की कौड़ी है। हिन्दी समाज में महिला लेखकों को इसका दंश जो झेलना पड़ता है उसकी जड़ें स्त्री के लेखक होने की अपेक्षा, वह जिस संसार और जिस वर्ग (हिन्दी लेखकों) में कार्यरत है, उसमें जमी हैं। क्योंकि दुर्भाग्यपूर्ण कड़वी बात यह है कि हिन्दी लेखक जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह पिछड़ा (कई अर्थों में), बचा खुचा, हीनभावना से त्रस्त, चरित्र से दोगला, मूल्यों से बेवास्ता, और बहुधा अपढ़, सामन्तवादी, दोहरा और दोगला है। हिन्दी के इने गिने लेखक ऐसे होंगे, जो यदि लेखक न होते तो और भी बहुत कुछ होते। या लेखक होने के अतिरिक्त और भी कुछ हैं। अन्यथा अधिकांश हिन्दी बिरादरी लेखक होने की धन्यता पा-भर गई है; वास्तव में हो न हो। ऐसे किसी भी समाज अथवा वर्ग में स्त्री के प्रति बर्ताव की अन्य आशाएँ ही निरर्थक हैं। वह स्त्री के पक्ष में लिख रहा है तो इसलिए नहीं कि वह स्त्री का पक्षधर है अपितु इसलिए कि यह उसके लेखक बने रहने की चुनौती है , डिमांड है। और जिस हिन्दी लेखक समाज की बात आप कर रही हैं उसमें कितने ऐसे हैं, जो दोगले नहीं है ? अलग अलग प्रसंगों में लगभग 80 प्रतिशत बिरादरी दोगली निकलेगी; क्या महिलाएँ और क्या पुरुष !

    स्त्री होने के नाते मान कर चलना चाहिए कि यहाँ ऐसे ही विरोध, तिरस्कार, चरित्र हनन, सबक, बॉयकॉट, लेखक के रूप में निष्कासन किन्तु स्त्री के रूप में बगलगिरी, आदि आदि आदि ही हैं। यह इसलिए नहीं कि आप, वह, मैं स्त्री हैं; अपितु इसलिए कि वे पुरुष हैं, उनकी दृष्टि कुत्सित है, वे दोगले हैं, वे लेखक न होते तो और किसी लायक नहीं हैं, उनका असली चरित्र यही है, वे जाने कैसी जोड़ तोड़ के कारण लेखक बने हैं, वे (अस्तित्व की एकमात्र पहचान) लेखक बने रहने की बाध्यता के चलते कुछ भी लिखते हैं, उनके संस्कार उनके व्यवहार को बाध्य करते हैं, उनका चरित्र उन्हें उकसाता है, वे जिस भी पद या स्थान पर हैं – हैं तो एक ही बिरादरी के, और वे यदि ये न करें तो क्या करें !!

  14. देरी से पढ़ पायी मनीषा …लेकिन सहमत हूँ मैं जैसी हूँ वैसी हूँ अपनी स्वतंत्रता खाने-पीने, पहनावें, जीने, हंसने-रोने की ये मेरा अधिकार है मुझे हासिल करना है क्यूंकि मैंने अपने आपको पहचान लिया है… मैं हूँ और जियूंगी.. हिन्दी में लिखना मेरे लियें अभिशाप नहीं …. वरदान बने..

    शुभ कामनाएँ…

  15. हिंदी-रचना-संसार पर तीखी और बेबाक टिप्पणी है.
    बहादुरी के लिये साधुवाद !

  16. भले ही यह किसी को रचना-प्रक्रिया न लगे परंतु आज के समय में लिखे जा रहे और "रचे " जा रहे साहित्य साथ ही साथ खेमे-बाजी पर बेहद ही साफ़गोई से लिखा गया व्यक्तव्य है…. आज बिना पढे ही समीक्षा कर दी जाती है …. पुरस्कार दे दिया जाता है………..
    दूसरी तरफ महिला लेखक होने की दोहरी चुनौती …. आप खुल के नहीं लिखतीं तो प्रगतिशील नहीं हैं…. और खुल के लिखती हैं तो कुछ और हो जाने का जोखिम है….

    …इडियट! भूलो मत तुम हिन्दी के लेखिका हो. “जींस के साथ – साथ सौजन्यता “नॉट अलाउड” !”

    मैंने आज तक अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता को हरसम्भव बचाने की कोशिश की है. सहज ही या लड़ कर, छीन कर और बहला – फुसला कर मैंने इसकी डोर अपने हाथ में रखी है. विचारों की, अभिव्यक्ति की, पहनावे की, खान – पान की या अपने आलस और कामचोरी की आज़ादी भी. विवाह को ‘व्यवस्था’ न बनने देने की ज़िद की आज़ादी. ज़िन्दगी का मोह, आज़ादी का स्वाद, जीवन और मनोलोक को लेकर अनवरत जिज्ञासाओं के उत्तर ढूँढने का पागलपन, इमानदार अभिव्यक्ति का साहस ही मुझे ‘मैं’ बनाता है. तो मैं हिन्दी – जगत में आकर ‘कोई और’ क्यों बन जाऊँ?

  17. साहित्यिक संवेदनशीलता हिन्दी साहित्य में बहुत सामंती ढंग से आती है. निज आस्थाओं को नकारते हुए, स्त्री की अस्मिता और निजता को नकारते हुए. उसके हाथ पीछे बाँधते हुए. sach kaha

  18. मनीषा जी, आपकी बेबाकी मुझ तक जरा देर से पहुंची, कायल हो गई, ढूंढ रही थी आप जैसी महिला रचनाकारों को जो कहे सच कहें, बहुत दबाव होते हैं हर क्षेत्र में स्त्री पर, जो नारी विमर्श की बातें करते हैं या उस के आधार पर अपने नाम बड़े करते हैं क्या कभी हमारे सहयोग की भी सोचते हैं. पता नहीं वे कौनसी स्त्रियाँ हैं जिनके बारे में वे सोच सोच कर आधे हुए जाते हैं. दूसरे हम कब तक एक मंच पर खड़े होने से बचते रहेंगे? आप की मित्रता प्राप्त हो इसी कामना के साथ.

  19. बकौल गिरिराज – रोज़ लिखने की कोशिश होती है..जिस दिन लिख लिया उस दिन रचना और जिस दिन नहीं लिख पाए उस दिन प्रक्रिया 🙂

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