सृजनात्मकताएं मृत्यु का प्रतिकार हैं

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 पिछले 1 जनवरी को उदयप्रकाश 60 साल के हो गए. मुझे बहुत आश्चर्य है कि उनकी षष्ठिपूर्ति को लेकर किसी तरह की सुगबुगाहट हिंदी में नहीं हुई. जबकि एक लेखक के रूप में उनकी व्याप्ति, उनकी लोकप्रियता अपने आप में एक मिसाल है. हम युवा लेखकों के लिए प्रेरणा का संबल. जब मैं पढ़ता था तो लेखकों की षष्ठिपूर्ति मनाने की परंपरा थी. लगता है अब हम सारी परम्पराओं को पीछे छोड़ आये हैं. बहरहाल, युवा कवयित्री, आलोचक, प्राध्यापिका सुधा उपाध्याय ने उनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर यह लेख लिखा है. सच बताऊँ तो इसी लेख से मुझे भी उनके ‘साठा’ होने का ध्यान आया. इस साल हम उनकी षष्ठिपूर्ति के उपलक्ष्य में नियमित तौर पर कुछ युवाओं के लेख प्रस्तुत करेंगे. उदयप्रकाश के दीर्घायु होने की कामना के साथ- जानकी पुल.
                               

उदय प्रकाश की कहानी और अंत में प्रार्थनासे गुजरते हुए एक बार फिर वही अहसास बड़ी सिद्धत से हो रहा है कि लेखक का एकांत किसी संन्यासी या संत का एकांत नहीं है। वह मृत्यु का एकांत है। यानी मृत्यु रचना की पूर्व शर्त है। मृत्यु के बाद ही रचना संभव होती है। कैंसर और मृत्यु के आसन्न आगमन को अतिक्रमित करने या उससे टकराने की इच्छा ही उदय प्रकाश की कविताओं और कहानियों का मूल उदगम स्रोत है। जिसे उदय प्रकाश ने लंबे अरसे तक भीतर-भीतर संजोए रखा होगा, वहीं इंस्टिंक्ट या संवेग इस कहानी में भी फूट पड़ता है। इन तमाम कहानियों में एक जो आतंरिक लय विद्यमान है उसे अब आसानी से पहचाना जा सकता है। वह जीवन जगत के जटिल अनुभवों को बिना किसी तारतम्य के कहानी में फिर से जीने की चेष्टा करते हैं।

कई बार तो ऐसा भी लगता है कि उनकी सृजनात्मकता का जो कच्चा माल है वह कमोबेश हर कहीं चाहे वह कविता हो या कहानी उसी घुटन, पीड़ा और संत्रास को हराने की चेष्टा है। मेरी भी यही समझ है कि बिना किसी एक विशेष मनोदशा के कोई कालजयी रचना संभव भी नहीं होती। हां सालजयी रचनाओं को छोड़ ही दिया जाए।

अंग्रेजी भाषा के कवि एजरा पाउंड ने कभी कहा था—लेखक समाज का एंटिना होता है, वह हर संवेग हर तरंग हर संदेश को ग्रहण करता चलता है और उचित समय आने पर उन्हीं तरंगों को नए रूप में समाज को वापस लौटा देता है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए जिस समय अन्य समकालीन लेखक कल्पना का सहारा ले रहे थे उसी समय में उदय प्रकाश का यह मानना कि रचना के धरातल पर कोई प्रतिद्धंद्धिता नहीं होती समकालीन सर्जनात्मकता की अपनी, अपनी भूमिकाएं हैं फिर हम क्यों अपनी भूमिका भुलाकर प्राय: दूसरे के कैरेक्टर में घुसने की कोशिश करते हैं।

और अंत में प्रार्थना कहानी में किसी प्लाट की खोज करना, कहानी और उदय प्रकाश दोनों के साथ बेमानी ही नहीं बेईमानी भी होगी। क्योंकि सब जानते हैं उनकी कहानियों में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं। वे खालिस वास्तविकता की ऊपज हैं। अत: जो वास्तविक है उसके लिए अवास्तविक प्रमाण जुटाने की क्या जरूरत है। अवास्तविक प्रमाण से परहेज करते हुए उदय प्रकाश ठेठ वास्तविकता की हद तक पहुंच जाते हैं और उनकी तमाम रचनाधर्मिता मृत्यु का ही प्रतिकार लगती है।

कहानी का प्रमुख पात्र डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर, जो कथानक से भी अधिक महत्वपूर्ण है उसे आरंभिक दौर से ही नितांत अकेला, अलग, एलिएटेड दिखाया जाता है। वही अनिवती उसका वही विस्थापन और एलिएशन पूरी कहानी में मौजूद है। क्योंकि वह विशिष्टों के लिए अवशिष्ट है और तंत्र का मंत्र नहीं समझ पाता। या फिर कह लें हठी स्वभाव का होने के नाते जानबूझकर व्यवस्था के तिलिस्म को बार-बार तोड़ना चाहता है, तो ऐसी चरित्र की यही परिणति संभावित है। बालक वाकणकर का बचपन दूसरे बच्चों से भी अलग था। वहां न कोई आवेग था न रंग। न आकार। बस सड़ता गुथता बचपन था जो भविष्य के लिए फर्मिंटेशन के बावजूद दूसरे बच्चों के सामने दीन हीन बीमार लगता था। मैं समझती हूं यहां अकेलेपन की समस्या पारस्परिक सम्बन्धों की समस्या है और साथियों से कटे रहकर वाकणकर का यह अकेलापन निर्मल वर्मा की कहानियों के चरित्रों का आइसोलेशन है।

डॉ वाकणकर की जिंदगी में आने वाले तमाम पात्र चरित्र और घटनाएं किसी भी फिल्म से बढ़कर हैं। लेकिन किसी फिल्म का हिस्सा नहीं। क्योंकि वे पेशे से डॉक्टर होते हुए भी संघ के प्रति ईमानदार प्रतिबद्ध और निष्ठावान हैं। इसी सिलसिले में हरवंश पंडित थुकरा महाराज से उनकी आत्मीयता बढ़ती है। संघ की शाखा में नियमित जाने, भारतीयता को नियमित समझने समझाने की उनकी अपनी अलग ही दृष्टि थी, जिसमें राजाराम मोहन राय, गांधी, नेहरु पाश्चात्य मानसिकता के हिंदू माने जाते हैं और उनके स्थान पर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोलवलकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे वीर नायकों और योद्धाओं को आज के समय और समाज के लिए ज़रूरी मानते हैं।

विधानपुर से डॉ वाकणकर को डिंगर गांव तबादला कर भेज दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों में इस तरह के गांव को ना केवल पिछड़ा, अशिक्षित, रूका हुआ, सुस्त, ठहरा माना जाता है बल्कि सजाए काला पानी के रूप में देखा जाता है। प्रधानमंत्री के दौरे से इस गांव का तथाकथित भाग्य बदलना पूरे गांव में पुलिस, सीआरपीएफ, पीएसी, तंबू छावनी, वर्दी, जीप, ट्रक, कार, मोटरसाइकिलें की भागमभाग इस कहानी का तिलिस्मी तानाबाना है। उदय प्रकाश एक साथ दो विपरीत परिस्थितियों को उभारते हैं। जहां वर्तमान में गहरे डूबकर जीना और सुंदर भविष्य के लिए सड़े वर्तमान में जीना आमने सामने रखकर अकेलेपन की समस्या को कथाकार उभारता है। मेरा मानना है कि उदय प्रकाश की सृजनात्मकता का तनाव बिंदु भी है।

और अंत में प्रार्थना कहानी का ओर (आरंभ) तो पकड़ में आता नहीं और छोर(अंत) जैसे कुछ निश्चित सा लगता है। जो कम से कम उदय प्रकाश के पाठकों को चौंकाता नहीं। क्योंकि व्यक्ति का स्वभाव उसके लड़कपन का हठ और जिद्द मनमानी की लत आजीवन बनी रहती है। इसलिए आलोचक कह सकते हैं कि वाकणकर की कहानी की आंतरिक अनिवती ही उसकी प्रामाणिकता भी है।

एक समीक्षक के तौर पर मैं कहना चाहूंगी कि कहानी वास्तविकता से जुड़ी हो यह तो ठीक है लेकिन जीवन के सभी तथ्यों का रचना में भी उसी रूप में समावेश हो सके ऐसा कोई जरूरी नहीं। उदय प्रकाश जैसे किसी फिल्म निर्माण में जुटे हों। जहां कई फ्लैशबैक हैं। कई घटनाओं, प्रति घटनाओं का पूरा संजाल है। किंतु वे उन सब को पकड़ते छोड़ते कहानी का तयशुदा अंत पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में दे देते हैं। जिस रिपोर्ट पर सबकी नजर है। कहानी के पात्रों की भी, पाठकों की भी और समीक्षक की भी। सब उत्सुक हैं जानने के लिए कि डॉ वाकणकर इस घुटन के बाद कॉज ऑफ डेथ क्या लिखते हैं—-
….सेरेब्रल हेड इंजुरी, प्रूव्ड फैटल, कॉज्ड बाय दि गन शॉट, टाइम ऑफ डेथ: फाइव मिनिट्स टु फोर, पी. एम…
इसके बाद नीचे दस्तख्त—डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर।

यह दुविधा कहानी के चरित्रों और पात्रों में होगी लेकिन उदय प्रकाश के पाठकों में नहीं क्योंकि बार-बार होने वाले तबादले उनकी कर्तव्यनिष्ठा, सत्य और ईमानदारी पर मिलने वाली व्यवस्था की चोट, उन्हीं पर उनके परिवार की शंका, मित्रों और सहकर्मियों का अलगाव और प्रधानमंत्री के दौरे में डॉ वाकणकर की दृढ़ संकल्पशक्ति कहानी के अंत के लिए जिम्मेवार है। वैराग्य, निराशा, आध्यात्मिकता और असहायता जैसे बोधों को अपने में समोये हुए डॉ वाकणकर देश दुनिया में फैले तमाम रोगों का अनुसंधान करने के पश्चात जिन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं या उनको ताउम्र कार्यान्वित नहीं कर पाने की जो विवशता झेलते हैं वहां राजनीतिक पर्यावरण के प्रदूषण की तह तक जाने का अवसर उदय प्रकाश के पाठकों को मिलता है।

      विज्ञान और अनुसंधान से जुड़ा हुआ जब एक पढ़ा लिखा व्यक्ति उन्हीं सिद्धांतों को व्यावहारिक प्रतिफलन में लाने की कोशिश करता है तो अपने आप को असमर्थ पाता है क्योंकि पूरी की पूरी सत्ता, राजनीतिक व्यवस्था और शासन तंत्र उसे नेस्तनाबूद करने पर तुला है। प्रकारांतर से डॉ वाकणकर को अपने तर्क ज्ञान और विवेक की हत्या करने के लिए बार-बार उकसाया जाता है। ऐसे में पूरी राजनीतिक चेतना और सामाजिक दायित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

                डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर  मेडिकल साइंस पर भी कटाक्ष करते हैं।  वे पेशे से डॉक्टर जरूर हैं किंतु मनुष्य के ज्ञान को प्रकृति के नाश का कारण बताते हैं। ईश्वर की परिभाषा गजब के शब्दों में की है—अफीम, मार्फिन, एस्प्रीन, एनेस्थेसिया, या ट्रैंक्वेलाइजर के रूप में ईश्वर को मानते हैं जो पीड़ा, यंत्रणा, चीख और मृत्यु को सहिष्णु बनाता है। वस्तुत: डॉ वाकणकर का बहुपठित और बहुज्ञ होना ही उऩकी दुविधा और उनकी उलझन का कारण है। नीत्शे, काफ़ को, मेडेल, डार्विन को पढ़ते-पढ़ते उनका ह्दय और मस्तिष्क जूझ रहा है। अंतत: थुकरा महाराज की मृत्यु उन्हें क़ानूनन अपराध(हत्या) और मनुष्यता हिंदू धर्म के लिए कलंक भारतीय दंड संहिता के अनुसार होमिसाइड का लगा।

      ढींगर गांव में तबादले के साथ डॉ को लगने लगा था सुस्त शांत और नैसर्गिक जीवन ही असली जीवन है। क्योंकि जंगलों को उजाड़ने और बाहरी या सरकारी लोगों की दखलअंदाजी आदिवासियों को भी पसंद नहीं थी। प्रधानमंत्री के दौरे के कारण जिस विकास, चौड़ी सड़कों का प्रपंच फैलाया गया-बात एकदम साफ थी(अगर सड़कें आदिवासियों के विकास के लिए बनाई गई होती तो उनके पास सड़क पर चलने वाली कोई न कोई चीज जरूर होती, मगर ऐसा नहीं है)

      ढींगर गांव और उसके आस पास के इलाकों जैसे पोंडी तथा खांडा में हैजा फैल चुका था। मरने वालों की संख्या तेरह से आगे निकलती जा रही थी। गांव में पीने के पानी की व्यवस्था एक प्रदूषित तालाब से था वही पांच छह गावों की प्यास बुझाने का जरिया था। महामारी फैलती जा रही थी और डॉक्टर वाकणकर ने जब जिलाधीश एनएस खरे को पांच छह गावों में हैजा फैलने और अबतक हुई सोलह मौतों के बारे में बताया तो इसे पॉलिटिक्स बतलाकर धुत्तकारा गया। मौजूदा जो सरकारी ढांचा है वहां किसी भी प्रकार की दखलअंदाजी सरकारी नुमाइंदे बर्दाश्त नहीं करते। डॉक्टर वाकणकर की डायरी का हिस्सा चीख-चीख तक तत्कालीन सर्वग्रासी राजनीति का पर्दाफाश करता है कही ऐसा तो नहीं कि जो तंत्र या व्यवस्था यहां बनी हुई है वह अपने आप में एक समानांतर प्रणाली है, वह सिर्फ अपनी ही दुनिया की चिंताओं में व्यस्त है। शायद उसका हित ही इसमें जुड़ा हुआ हो तो लोग भूख गरीबी महामारी से मरें, कहीं हमारे देश में लोकतंत्र का असली अर्थ जनता द्वारा अपनी शत्रु व्यवस्था का चुनाव तो नहीं है’

      उदय प्रकाश तमाम आधुनिक विसंगतियों से निजात पाने में सफल हो जाते हैं और उत्तर आधुनिक पेंच को खोलने की कोशिश करते हैं। डॉक्टर वाकणकर पेशेवर ईमानदार बेहतर भविष्य, बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर लोकतंत्र मुहैया कराना चाहता है पर अव्यवहारिक करार कर दिया जाता है। अपने अपनों में ही पराजित, असहाय और अकेला महसूस करता है। प्रधानमंत्री का सामिप्य या साक्षात्कार किसी फैंटेसी से कम नहीं। वह पचास वर्ष के आसपास का थुलथुल सा थका हुआ आदमी भारतवर्ष का प्रधानमंत्री है जो न केवल शरीर की चर्बी से परेशान है बल्कि पुरानी कब्ज और पाइल्स का मरीज भी है। ऐसा तनावग्रस्त चिढ़ा हुआ चरित्र विशाल भू-भाग, भाषाओं, जातीयों, राष्ट्रीयताओं, पहाड़ नगरों का स्वामी थी xxxxx
इस शहरीकरण, औद्योगिकरण विकास के नारों में किस नसल का भला होने जा रहा है। भारतीय राजनीति का सौभाग्य या सर्वग्रासी शक्तियों का दुर्भाग्य, पीएम के फूड टेस्टिंग की जिम्मेदारी डॉक्टर वाकणकर एमबीबीएस एमडी द्वारा होनी थी। जो मरीज की नब्ज टटोलने वाले तथा आंखों ही आंखों में रायते, मूंग की दाल और एक दो फुल्के पर पीएम को रिझा लेते हैं। यह अपराधियों का पूरा का पूरा संयुक्त परिवार है जिसमें तांत्रिक, बंबइया एक्टर, भारतीय प्रशासन का भ्रष्ट निकम्मा रिश्वतखोर अफसर, तस्कर दलाल, बेईमान, ठेकेदार, गिरोह के हत्या, सरगना दारू, भट्टे के ठेकेदार, पत्रकार और इन सब का मुखिया प्रधानमंत्री….जो ढींगर गांव के हरे भरे आदिवासी इलाके को कारखानों के उजाड़ और विषाक्त मैदान में बदल देने के लिए आया हुआ था। सत्ताधारी छद्म जाल फैलाता है। अंगोछा पहनकर उनका माझी(दुखहरण) बनने का झूठा प्रपंच करता है और आदिवासियों को उनके घर जमीन से उजाड़कर उन्हें अंतहीन गुलामी में हमेशा के लिए झोंक देता है—सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा का पाखंड पर्व शुरू होता है…

      मंदिर का चरणामृत कंटामिनेटेड पानी से बना है। जिसे पीकर बाईस से अधिक आदिवासी महामारी के शिकार हो चुके हैं। इस एब्सर्ड नाटक के निर्देशक, लेखक, सूत्रधार डॉक्टर वाकणकर चुपचाप भारतीय प्रशासन के इस मामूले को पुर्जे(आईएएस अफसर) के होश फाख्ता होते देख रहे थे। पर यह विशाल अंत का अत्यंत नगण्य नटबोल्ट भी नहीं रबर का एक वॉशर था जो दोनों ओर से पिसता है। पेपरमिल, आदिवासी, तांत्रिक, अपराधी, प्रधानमंत्री, तस्कर, दलाल, अफसर, नेता, पत्रकार उद्योगपति सारे चरित्रों की धज्जियां उड़ रही हैं।

एब्सर्ड रियलिटी तो यही थी कि पीएम का भाषण बदला। जिसमें हैजा है। हैजे से मरने वाले परिवारों के प्रति संवेदना है पीएम कोष से मुआवजा है, पेयजल की व्यवस्था सरकारी कल पुर्जों की झूठी मरम्मत। कुल मिलाकर प्रशासन की ओर से जो अनिश्चितता और उत्तरदायित्व परोसी जा रही है उदय प्रकाश उसकी ओर ध्यान दिलाते हैं। वहां से विस्थापित होकर डॉक्टर वाकणकर कोतमा पहुंचते हैं। तबादले की रिपोर्ट में उन्हें न केवल संघ का संचालक बल्कि नक्सलवादी गतिविधियों का भी संचालक बताया गया—-दरअसल सरकारी नौकरशाही जिस व्यक्ति विरूद्ध कोई ठोस आपराधिक प्रकरण नहीं बना सकती या सामाजिक गतिविधियों से खुद को परेशानी में महसूस करती है उसके लिए उसने नक्सलवाद की श्रेणी बना रखी है।
धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामर्थ्य पर संदेह होने लगा। परिवार और पत्नी भी उनकी ईमानदारी लगन, मूल्य निष्ठा को उनकी मूर्खता और जिद्दीपन समझने लगी। उनके अऩुसार डॉक्टर वाकणकर ने पूरे परिवार को एक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है। हर कोई उनके अंत के परिणाम देखने में इच्छुक है कि आखिर वे सामूहिक आत्मघात करते हैं या पलायन या फिर तमाम सामाजिक या असामाजिक ताकतों द्वारा निगल लिए जाते हैं।

डॉक्टर वाकणकर की सारी ईमानदारी और सच्चाई विस्थापन और अस्वीकृति पाती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा पूरा जीवन व्यर्थ चला गया। उदय प्रकाश की इस कहानी का अंत हिंदी सिनेमा की पटकथा का अंत लगता है। कुछ और भी सोचा जा सकता था कि जैसे तंत्र और व्यवस्था का शिकार डॉक्टर पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट देने से इनकार ही कर देता। या इस दमघोंटू व्यवस्था में रिजाइन कर देता या अपने मन मस्तिष्क पर पड़ने वाले दबाव को संभाल पाता और कॉज ऑफ देथ लिखकर हस्ताक्षर करने के बाद भी इस मुर्दा लोकतंत्र में जीवित रहने का साहस करता।

डॉक्टर वाकणकर की मौत न तो हत्या कही जा सकती है ना तो आत्महत्या। किंतु यह एक स्वाभाविक मौत तो नहीं। पाठक समाज समझ रहा है कि अपने मन और मस्तिष्क, आदर्शों और सिद्धांतों, समय और समाज की जद्दोजहद को महसूस करता हुआ एक सत्यनिष्ठ डॉक्टर व्यवस्था के क्रूर जाल में फंसकर दम तोड़ देता है। फिर उसे हत्या क्यों न कही जाए। या फिर अपने बार-बार के तबादले, एलिएशन, तंत्र की टकराहट, देश व लोकतंत्र से क्षुब्ध, नाराज मरते हुए मूल्यों को पचा न पाना आत्महत्या भी तो है। डॉक्टर की बुदबुदाहट और अंत में प्रार्थना
      प्रणम्य शिरसा देवम् गौरीपुत्रं विनायकम्
      भक्तावासम् स्मरेनित्येमायु: कामार्थसिद्धये….
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लंबोदमरम पंचमम् षष्ठम विकट मेव च
सप्तमम् विध्नराजम् ध्रूमवर्णम् तथाष्टमम्
नवम्….
इस प्रार्थना में न कोई कंपन है न भय। किसी ठंढे धातु सी आवाज दूसरे ग्रह से आते हुई अलौकिक। प्रार्थना खत्म होते होते डॉक्टर वाकणकर फर्श पर गिर गए।

यह उलझाव और अस्पष्टता कहानी को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने के लिए है। उदय प्रकाश पर प्राय: पाठकों की रूढ़ अभिरुचि में बाधा पहुंचाने का आरोप लगता है। उनकी कहानियों में कथानक से बड़े चरित्र हो जाते हैं वे बिना कथावस्तु का सहारा लिए आगे बढ़ने लगते हैं। उदय प्रकाश नित नए प्रयोग कर रहे हैं। यह ठीक भी है पुराने को दोहराना उचित भी नहीं। लेकिन एक समीक्षक होने के नाते मैं ये जरूर कहूंगी कि कथानक और चरित्र का तालमेल होना ही चाहिए। पाठक अपने को घटनाक्रम से कथ्य संवेद्य से जोड़ नहीं पाता तो उसकी एकाग्रता भंग होती है। सांकेतिक स्थानों पर उदय प्रकाश डाक्यूमेंटरी सा विस्तार दे देते हैं। कभी तो अपने पाठकों की समझ पर भरोसा करके देखें। कुल मिलाकर इनकी ये कहानी नौस्टेल्जिक होने से नहीं बच पाती है।

     
       

10 COMMENTS

  1. itnii sundar aalochanaa drshti ke lie badhaaii sweekaaren..aisaa lagtaa hai ki jaise aalochak ne kahaanii kaa punarsrijan hii kar daalaa ho..ek baar punah badhaaii..

  2. शुभकामनाएं आप सभी सहृदय मित्रों का हृदय से आभार क्यूंकि संवेदनशून्यता के इस दौर में जब की एक सही आलोचना लुप्त होती जा रही है मैंने पूरी तटस्थ संलग्नता से एक संलग्न तटस्थता निबाही है प्रयास जारी रहेगा साभार डॉ, सुधा उपाध्याय

  3. उदय प्रकाश की षष्ठीपूर्ति पर धूमधाम नहीं हुई। यह ठीक ही हुआ। जिसके लाखों-लाख पाठक हों, उसे इस तरह की शोशेबाज़ी से क्या लेना-देना।
    ’रचना समय’ पत्रिका उदय प्रकाश पर एक विशेषांक शीघ्र ही प्रकाशित करने जा रही है।
    यह लेख अच्छा है।

  4. अच्छा आलेख है. उदय प्रकाश की संश्लिष्ट रचना प्रक्रिया की शिनाख्त की चेष्टा का, और उसे काफ़ी सरल ढंग से पकड़ने के प्रयास का साक्ष्य प्रस्तुत करने वाला. बधाई.

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