किसी की आँख में देखना उसके मन में देखना होता है

7
39
 अभी थोड़ी देर पहले प्रिय कवि बोधिसत्वने यह कविता पढ़ने के लिए भेजी. गहरे राग भाव से उपजी इस कविता में लोकगीतों सा विराग भी पढ़ा जा सकता है, जो बोधिसत्व की कविताओं की विशेषता रही है. न होने में होने का भाव. आज के दिन मैं इस कविता को आपसे साझा करने से रोक नहीं पा रहा हूँ. जब से पढ़ी है कई बार पढ़ चुका हूँ- प्रभात रंजन


बनना तुम्हारे लिए

मेरे पास कुछ बूंदें होतीं तो उनसे मैं तुम्हारे लिए फुहार बनाता
मेरे पास थोड़ा सा भी आसमान होता तो उस पर तुम्हारा नाम लिख कर 
दिखाता सारे जग को
मेरे पास थोड़ा सा लोहा होता तो जंजीर बनाता 
और तुम्हें जकड़ कर रखता
या पिंजरा बनाता और उसमें बंद रखता तुम्हें
थोड़ा धागा होता तो तुम्हें उड़ाता पतंग की तरह आसमान में 
और कटने के पहले 
उतार लेता। 

खोने से बड़ा डर और क्या भला
पाने से बड़ी खुशी क्या

थोड़ा सा अंधेरा होता जितना जेबों में होता है तो 
उसमें रख लेता तुम्हारे सारे सपने
सपने हमेशा अंधकार में अच्छे दिखते हैं 

मेरे पास सूखे गिरे शब्द हैं 
जिनसे मैं नहीं लिख पा रहा हूँ तुम्हारे लिए 
या अपने लिए कुछ भी

मैं एक मैली हो गई
नदी के तट पर खड़ा हूँ एक खिसकते हुए पत्थर सा
मैं एक डूब चुके दिन के पीछे छूटा हुआ रंग हूँ
बहुत थोड़ा सा उजाला है
लेकिन वह मेरा ही उजास है

तमाम नए कपड़ों के बाद एक कुछ पुराना कपड़ा
वह मैं हूँ
एक नई सुबह के बाद पिछले साल की सुबह के लिए कौन खड़ा रहता है
लेकिन मैं खड़ा रहा कि उधर से कोई गुजरेगा और मुझे पुकारेगा
इस उम्मीद में कि कोई एक बार देख लेगा मुझे
उम्मीद से उम्दा क्या इस असार संसार में

मेरे पास एक सुबह होती तो पूरी की पूरी 
मैं तुम्हें दे देता और बोलता कि 
ये लो ये मेरी सुबह है
किसी से उधार लेकर नहीं आया हूँ
कोई देनदारी नहीं है
इसके बदले
इसे जैसे चाहे वैसे रखो अपने पास
चाहे ओढ़नी बना लो या मौर। 

चरिंदे दरिंदे और परिंदे 
सब एक कैसे हो सकते है 
यह क्या तरीका है सोचने का
तुम्हारा
सोचना ही है तो सोचो कि जीवन का गया रंग कैसे लौटेगा
सोचो कि आग कैसे बनी रहे पूरी तरह आग।

मेरे पास एक चरागाह होता तो
मैं उसमें विचरता एक-एक कदम चलता तुम्हारे साथ 
पशुता से बचाता तुम्हें, बचता खुद भी पशु होने से
तुम्हें उड़ना सिखाता या तुमसे सीखता पंख पसारना
लेकिन ये फाड़ खाना 
चिथड़े कर देना किसी भी भाषा में कैसे सहन किया जा सकता है
किसी भी संस्कृति में
किसी भी देश में।

अनादर एक आघात है वह कोई करे
अपमान हत्या है वह कैसे भी हो
हिंसा असहनीय है वह कहीं भी हो
दीनता से बड़ा दुख क्या हो सकता है
भला क्या कोई चलन शुरू हुई है सब कुछ सहने की
ठूंठ बनने की
क्या बंजर होना अब सद्गुण माना जाएगा
क्या लोग फांसी की रस्सी बन कर गर्व करेंगे अब
क्या पूरा देश किराए के हत्यारों में बदल जाएगा
अब क्या मैं किसी और दिशा में निकल ही नहीं पाऊँगा
अब क्या मुझे तारों भरी एक रात न मिलेगी
क्या किसी पेड़ के नीचे सोकर रात नहीं बिताई जा सकेगी
क्या कोमल पौधों का कटहरा नहीं बनेगा कोई 
क्या सचमुच मुझे थोड़ा सा चावल भी नहीं मिलेगा जिसे मैं 
छिड़क सकूँ तुम पर अक्षत सा
अब क्या तुम मेरे माथे पर 
अपना माथा मुकुट की तरह नहीं रख सकोगी कभी भी

मैंने तुमसे कितनी बार कहा कि मनुष्य का शीश एक खिला हुआ पुष्प है
उसे खिला ही रहना चाहिए अंत तक
या अंत के बाद भी
क्या तुम मुझे एक खिला हुआ पुष्प न दोगी
मेरे पास कुछ तरु-पल्लव होते तो मैं तुम्हारे लिए 
कुछ बनाता
क्या बनाता कह नहीं सकता
किंतु बनाता कुछ यह तय है।

थोड़ी लकड़ी से बन जाती है नाव
उतनी लकड़ी से भी जितने से जलती है चिता किसी की
थोड़े से पत्थर चूने से बन जाता है घर 
उतने से ही बनती है समाधि किसी की
थोड़ी आग से सिक जाती है रोटी
उतने से ही जल जाते हैं घर

किसी की आँख में देखना उसके मन में देखना होता है
यदि मन जैसा कुछ होता हो तो
थोड़े उजाले में भी पढ़ ली जाती हैं आँखें
मेरे पास थोड़ा उजाला होता तो मैं 
तुम्हारी आँखों को फिर पढ़ता एक बार
और तुम्हें बताता कि तुम्हारी आँखों में क्या है तुम्हारे लिए 
या हमारे लिए
जिनकी आँखों में कुछ नहीं होता उनके जीवन में भी कुछ नहीं होता
ऐसा नहीं मानता मैं
लेकिन जिनके मन में कुछ नहीं होता 
सचमुच उनके जीवन में कुछ नहीं होता
यकीन करो
मेरे जीवन में कुछ होता तो मैं 
तुम्हारे लिए उससे कुछ बनाता

थोड़ी सी मिट्टी से बनता है दीपक
थोड़ी सी मिट्टी से बनता है चूल्हा
थोड़ी मिट्टी से बनती है कब्र 
मेरे पास थोड़ी सी भी मिट्टी होती तो मैं 
उससे तुम्हारे लिए कुछ बनाता
यकीन करो।

7 COMMENTS

  1. बहुत सुन्दर कविता ……….बहती हुई भाव-धारा ! किसी के लिए कुछ अच्छा सिरजने की अभिलाषा ………….

    मैं एक मैली हो गई
    नदी के तट पर खड़ा हूँ एक खिसकते हुए पत्थर सा
    मैं एक डूब चुके दिन के पीछे छूटा हुआ रंग हूँ
    बहुत थोड़ा सा उजाला है
    लेकिन वह मेरा ही उजास है

    कैसी है यह विवशता ??

  2. आप सब का आभार कहूँ या चुप रहूँ। लेकिन अच्छा तो लगती है शुभकामनाएँ, तारीफ। बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन बुरी तरह उलझा हूँ। यह इसका लगभग पहला ही ड्राफ्ट है। समझ नहीं पा रहा कि इसपर काम करूँ या रहने दूँ।

  3. जबर्दस्त अच्छी कविता है…

    थोड़ी लकड़ी से बन जाती है नाव
    उतनी लकड़ी से भी जितने से जलती है चिता किसी की
    थोड़े से पत्थर चूने से बन जाता है घर
    उतने से ही बनती है समाधि किसी की
    थोड़ी आग से सिक जाती है रोटी
    उतने से ही जल जाते हैं घर

  4. बेहतरीन ….मारक और सार्थक….मजा आ गया पढकर…इतनी बड़ी होते हुए भी ऐसा लगता है कि कितनी जल्दी खत्म हो गयी…बिलकुल डूबा देती है यह कविता …बधाई मित्र…

  5. अच्छी कविता है बोधि भाई. विस्तार है पर कसावट भी.
    थोड़ी सी मिट्टी से बनता है दीपक
    थोड़ी सी मिट्टी से बनता है चूल्हा
    थोड़ी मिट्टी से बनती है कब्र
    मेरे पास थोड़ी सी भी मिट्टी होती तो मैं
    उससे तुम्हारे लिए कुछ बनाता
    यकीन करो।

  6. "मेरे पास एक सुबह होती तो पूरी की पूरी
    मैं तुम्हें दे देता और बोलता कि
    ये लो ये मेरी सुबह है
    किसी से उधार लेकर नहीं आया हूँ
    कोई देनदारी नहीं है
    इसके बदले
    इसे जैसे चाहे वैसे रखो अपने पास
    चाहे ओढ़नी बना लो या मौर।"

    "लेकिन जिनके मन में कुछ नहीं होता
    सचमुच उनके जीवन में कुछ नहीं होता
    यकीन करो
    मेरे जीवन में कुछ होता तो मैं
    तुम्हारे लिए उससे कुछ बनाता

    "मेरे पास थोड़ी सी भी मिट्टी होती तो मैं
    उससे तुम्हारे लिए कुछ बनाता
    यकीन करो।"
    क्या शानदार कविता लिखी है बोधि ने ! यह भी नहीं, वह भी नहीं से लेकर यह होता, वह होता तो वह क्या-क्या कर देते. अद्भुत अनुराग की अद्भुत कविता.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here