स्मृतियों में ठहरे अज्ञेय

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कोलकाता में ‘अपने अपने अज्ञेय’ का लोकार्पण 

अज्ञेय की जन्मशताब्दी के साल उनकी रचनात्मकता के मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन का दौर चलता रहा. कई किताबें आई, कई इस पुस्तक मेले में आ रही हैं. लेकिन वरिष्ठ संपादक, सजग भाषाविद ओम थानवी सम्पादित पुस्तक ‘अपने-अपने अज्ञेय’ अलग तरह की है. पुस्तक से पता चलता है कि लेखक-पाठक समाज में अज्ञेय की व्याप्ति कितनी गहरी थी. इसमें अलग-अलग पीढ़ियों के 100 लेखकों ने अज्ञेय से जुड़ी अपनी स्मृतियों को संस्मरण का रूप दिया है. दो खण्डों में प्रकाशित इस पुस्तक का फ्लैप आपके लिए. पुस्तक वाणी प्रकाशन से आई है- जानकी पुल.
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अज्ञेय ने लिखा है, समय कहीं ठहरता है तो स्मृति में ठहरता है. मगर संस्मरण में स्मृति जब आकार पाती है तो ठहरा हुआ समय मानो एक बार फिर चलने लगता है. जैसे किसी ने समय को अपनी मुट्ठी में भर लिया हो और मौके पर मुट्ठी खोल दी हो. समय का यह चित्रण किसी फिल्म के फ्लैशबैक की तरह साफ़ भी नहीं होता. स्मृति के झरोखों में काफी कुछ छन जाता है. लेकिन इसी में स्मृति को फिर से रचने की संभावनाएं खड़ी होती हैं. झरोखों से छनती धूप की तरह वह स्मृति हमें गुनगुना ताप और उजास देती है.
यह पुस्तक ऐसे ही संस्मरणों का संकलन है.
व्यक्तिपरक संस्मरणों में जितना वह व्यक्ति मौजूद रहता है जिसके बारे में संस्मरण है, उतना ही संस्मरण का लेखक भी. यों तो कोई वर्णन या विवेचन शायद पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होता, पर ऐसे संस्मरण तो हर हाल में व्यक्तित्व और उसके कर्तृत्व का विशिष्ट निरूपण ही करते हैं. संस्मरण समय की मुट्ठी को खोल जरूर देते हैं, लेकिन कौन जानता है किसने समय को किस नजर से देखा और कहां, कैसे पकड़ा! जैसी हथेली, वैसी पकड़. लेकिन सौ लेखकों के संस्मरण एक जगह जमा हों तो? क्या वे एक लेखक के व्यक्तित्व और उसके रचनाकर्म की संश्लिष्टता को समझने में मददगार होंगे? इस सवाल के सकारात्मक जवाब की संभवना में प्रस्तुत उद्यम किया गया है. संकलन में ‘हिंदी साहित्य की सबसे पेचीदा शख्सियत’ करार दिए गए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की जन्मशती के मौके पर सौ लेखकों के एक सौ चार संस्मरण शामिल हैं. हर लेखक ने अज्ञेय को अपने रंग में देखा है. विविध रंगों से गुजरने के बाद, पूरी उम्मीद है, पाठक खुद अज्ञेय की अपनी स्वतंत्र छवि बनाने- या बनी छवि को जाँच सकने- में सक्षम होंगे.
अज्ञेय के लेखन और व्यक्तित्व में जितना वैविध्य रहा, उसे हिंदी ही नहीं दूसरी भाषाओं में ढूँढना भी शायद आसान काम नहीं होगा. संकलित संस्मरणों में अज्ञेय की ज्यादातर वृत्तियों की छाया आपको मिलेगी.  अलग-अलग कोण से. अनेक संस्मरणों में ऐसी जानकारियां और अनुभव हैं, जो शायद पहले कहीं सामने नहीं आये. हर लेखक हमारे सामने अपने देखे अज्ञेय को प्रस्तुत और ये अपने-अपने अज्ञेय जोड़ में हमें ऐसे लेखक और उसके जीवन से रूबरू करवाते हैं, जिसे प्रायः टुकड़ों में- और कई बार- गलत समझा गया. 

अपने अपने अज्ञेय का बुकमार्क 



2 COMMENTS

  1. पुस्तक :अपने-अपने अज्ञेय
    सम्पादक: ओम थानवी
    प्रकाशक:वाणी
    संस्मरण : पुस्तक में अलग-अलग पीढ़ियों के 100 लेखकों ने अज्ञेय से जुड़ी अपनी स्मृति लिखी है |
    यशस्वी संपादक ओम थानवी का यह कार्य 'अज्ञेय' के व्यक्तित्व एवं रचना संसार को समझने में एक सार्थक प्रयास है । जानकीपुल एवं प्रभात रंजन का धन्यवाद

  2. संस्मरण दरअसल एक बार फिर बीती हुई गलियों से गुजरना ही है ज्ञात-अज्ञात आत्मीयता और निर्दोषिता के बीच से |मार्खेज़ ने कहा है कि लेखन दुनियां का सबसे तनहा पेशा होता है’’ सच है ये एक ऐसा तनहा पेशा जो किसी युग-विशेष,आत्मानुभूति और स्मृतियों /अनुभवों के सैलाब का मुहाना (स्त्रोत) भी हैं |अर्थात बावजूद इस व्यक्तिपरिक तन्हाई के विचारों और स्मृतियों के कोलाहल से नहीं बचा जा सकता |संस्मरण और आत्म जीवनी स्मर्तियों के दो ऐसे पड़ाव हैं जिसमे द्रश्य और घटनाएं अपने खंडित टुकड़ों को मिलाकर एक सम्पूर्ण संतृप्ति व पूर्ण ठहराव पाती हैं |
    जैसा कि ज्यां वोद्रिलाई सिम्लेस्हंस में कहते हैं कि ‘’यह उत्तर आधुनिक दौर एक ऐसी कार्बन कॉपी है जिसकी मूल कॉपी है ही नहीं ‘लेकिन ये संस्मरण और आत्मकथ्य जैसी विधाएं भले ही मूल कॉपी ना हों पर कतरनों के कुछ भूले बिसरे अवशेष तो हैं ही ’| वस्तुतः ,संस्मरण रचनात्मकता की वो निर्मल राह है जिसपर व्यक्तिपरक और लेखक दौनों हाथ में हाथ डालकर यात्रा कर रहे होते हैं जहाँ स्मृति को फिर से रचने की संभावनाएं खड़ी होती हैं. झरोखों से छनती धूप की तरह वह स्मृति हमें गुनगुना ताप और उजास देती है.
    बकौल अशोक बाजपेई ‘’यह स्मृति शिथिल समय है’’| पर कहीं आदमी जो चीज़ छोड़ जाता है उन चीज़ों के सहारे हम उस आदमी के पास लौटते हैं ये भी सच है | संस्मरण में स्मृतियों के ग्लेशियर गलने लगते हैं और एक नदी बहने लगती है अतीत की | |दिल्ली साहित्यकारों की एक बड़ी शरण स्थली रही है | अज्ञेय जब दिल्ली से निकलने वाली ‘’दिनमान ‘’नामक पत्रिका के संपादक थे ये उन पत्रिकाओं में थी जिसने अगली आने वाली पत्रिकाओं की दिशा निर्धारित की थी | साहित्य की कोई भी विधा अपने भीतर असंख्य व्याख्याएं , अर्थ और संभावनाएं समाहित रखती है| पाठक के लिए ये अद्भुत संयोग और अनुभव होगा कि हीरानंद वात्सायन अज्ञेय जैसे एक महान लेखक के लेखन और व्यक्तित्व के वैविध्य के सौ संस्मरणों को एक साथ पढ़ना | निश्चित रूप से ये लेखक के व्यक्तित्व और उसके रचनाकर्म की संश्लिष्टता को समझने में मददगार होंगे एक अनुभव और स्मृतियों के रंग बिरंगे पुष्पों का एक नायाब गुलदस्ता |

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