भगत सिंह और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के नाम दो कविताएँ

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शहीदी दिवस पर विपिन चौधरी की कविताएँ- जानकी पुल.

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१.शहीद-आज़म के  नाम एक कविता


उस वक़्त भी होंगे तुम्हारी बेचैन करवटों के बरक्स

चैन से सोने वाले
आज भी बिलों में कुलबुलाते हैं
तुम्हारी जुनून मिजाज़ी  को “खून की गर्मी” कहने वाले

तुमने भी तो दुनिया को बिना परखे ही जान लिया  होगा

जब
कई लंगोटिए यार तुम्हारी उठा-पटक से
परेशान हो

कहीं दूर छिटक गए होंगे
तुम्हारी भीगी मसों की गर्म तासीर से

शीशमहलों में रहने वालों की

दही जम जाया करती होगी

दिमागी नसों की कुण्डी खोले बिना ही तुम
समझ गए होगे कि
इन्सान- इन्सान में जमीन आसमान जितना असीम
फर्क भी हो सकता  है

अपने चारों ओर  बंधी बेड़ियों
के भार को संभालते हुए
कोयले से जो लिखा होगा तुमने

उसे पढ़
कईयों ने जानबूझ कर अनजान बन

अपनी गर्दन घुमा ली होगा
कई ठूंठ बन गए होंगे और
कई बहरे, काने और लंगडे बन

अपनी बेबसियों का बखान करने लगें होंगे
परेशान आज भी बहुत है दुनिया,
ज़रा सा कुरेदने पर

लहू के आंसूओं की

खड़ी नदियाँ बहा सकती है
पर क्रांति की बात दूसरी-तीसरी है

जनेऊ अब भी खीज में उतार दे कोई
पर वह बात नहीं बनती
जो मसीहाई की गली की ओर मुडती हो

’क्रांति’ बोल-वचन का मीठा और सूफियाना मुहावरा बन
कईयों के सर पर चढ

आज भी बेलगाम हो

भिनभिनाता है

लहू में पंगे शेरे-पंजाब  की

दिलावरी को याद करने के लिए
पंजों के बल खडे होना पड़ता है
पर

हमारी तो शुरुआ़त ही लड़खडाने से होती है
हम हर पन्ने को शुरू से लेकर अंत तक पढते हैं
और
लकीर को लकीर ही कहते है

रटे-रटाये प्रश्नों के बीच आये

एक टेढे प्रश्न को बीच में ही छोड़

भाग खडे होते हैं

जब क्रांति का अर्थ समझने के लिए इतिहास की पुस्तके उठाते हैं

और सिर्फ उनकी धुल ही झडती है हमसे

हमारे समझने बूझने का

पिरामिड अब इतना बौना हो गया है
कि हमारी मुंडी क्रांति की चौखट से

टकराने लगती है

रात-बेरात का चौकनापन और
लहू को निचोड़ कर

बर्फ की सिल्ली बना देंने
का सिद्धहस्त शऊर

अब कारोबारी धंदे पर ही अपनी सान चढाता है

शहीद – ए –आज़म,

इंसान से  पिस्सु बनने की प्रक्रिया को

तुम नही देख पाए

पाए
यही शुक्र है

घुटनों के बल पर खडे हो

शुक्र की इन्ही सूखी रोटियों को

खा-खा कर

हमारी नस्लें अपने आगे का

रोजगार बढ़ाएगी

 

२.बिस्मिल का गोल चेहरा और खुदा की विभाजक अदाएं

राम प्रसाद और

राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ में

ज्यादा नहीं तो

इतना अंतर तो है ही

कि मंदिरों में माथा टेकने

और रेल डकैती के बीच विभाजन किया जा सके

सांध्यकालीन वंदना के मन्त्र उच्चारण

की मंगल ध्वनियों के बीच से

खड़खड़ाती हुयी रेलगाडी

 

आप कुछ समझे कि नहीं

साफ़ स्लेट पर

सीधे-सीधे ‘बिस्मिल’ लिखने का साहस खुदा भी

नहीं कर सकता था

तब उसे

धरती के बन्दों को धोखा देने का तुच्छ काम किया

ऐसी आडी-तिरछी गल्तियाँ प्रभु

जान-बूझ कर करता आया था

ताकि उसकी जवाबदेही पर कोई आंच ना आये

समय आज भी गवाही दे सकता है कि

‘बागी’ पान सिंह तोमर बनाने के लिए

खुदा को

‘खिलाडी पान सिंह’ का सहारा लेना पडा था

जबकि उसे सबकी तयशुदा तकदीर अच्छे से मालूम है

वह जानता है कि राम प्रसाद की

‘सरफरोशी की तम्मनाओ’

को ग्रहण लगने से बचाने के लिए

मौलानाओं और पंडितों से टकराना होगा

फकीरों की टोली से भिडना पड़ेगा

इसी तरह राम प्रसाद के हाथों

नम्बर आठ की रेलगाडी को काकोरी में लूटना जरूरी हो जाता है

क्योंकि राम प्रसाद बिस्मिल

‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत है’

के जुमले में

विश्वास करने वाली टोली में शामिल है
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’

खुदा की इस रियायत का इस्तेमाल

करते हुए अपनी तकदीर को

फँसी के फंदे पर टिका कर

अट्टहास लगाता है

 

और खुदा के संरक्षण में पले दूसरी तरह के लोग

बसंती चोले के तिलिस्म में अटके रह जाते हैं

वे खुदा पर संदेह नहीं कर सकते थे

सो इन दस्तावेजी घटनाओं को

चंद सिरफिरो की नादान गुस्ताखियाँ समझ

कर वे अपनी-अपनी राह पकड़ने का

सस्ता और आसान काम करते आये हैं

21 COMMENTS

  1. Antarman abhibhoot hai. Shabd nahi mil rahe, pratkriya ke liye. Bus ye hi kahna chahoonga VIPIN ki LEKHNI ko BAHUT BAHUT PRANAAM………..

  2. Namskar
    Aap ki kavitayen, shahidon ke prati sachhi shradha, to dikhati hi hai, vyawasha parivartan ki ladai jo bhagat singh lad rahe the, usaki jaroorat ko rekhankit bhi karati hai. Badhai.

  3. भगत सिंह को समझने के लिए…एक बेहतर नज़रिया

    "तुम्हारी भीगी मसों की गर्म तासीर से
    शीशमहलों में रहने वालों की
    दही जम जाया करती होगी"

  4. अनचाहे भ्रमों से मुक्ति की कविताएं…सच से सीधे आमने सामने आंख मिलाकर अपना सच कहने का साहस करती रचनाएं….

  5. ”राम प्रसाद और
    राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ में
    ज्यादा नहीं तो
    इतना अंतर तो है ही
    कि मंदिरों में माथा टेकने
    और रेल डकैती के बीच विभाजन किया जा सके”
    चीज़ों को कायदे से रखना कोई विपिन से सीखे.. इतिहास पर बारीक दृष्टि के साथ वर्तमान की हलचलों और विडंबनाओं की तीखी पड़ताल इनके यहाँ बखूबी देखी जा सकती है..
    शहीद दिवस के मौके पर श्रद्धांजलि का इससे अच्छा कोई और तरीका नहीं है मेरी नज़र में..

  6. Watan pe mit jaate hai
    Mar kar bhi wo log
    Amar ho jaate hai
    Karta hoon tumhe saalam
    E-watan pe mitne walo
    Tumhari har saans mein basta
    Tirange ka naseeb hai

  7. "शहीद – ए –आज़म,
    इंसान से पिस्सु बनने की प्रक्रिया को
    तुम नही देख पाए
    पाए
    यही शुक्र है…"Vipin ko padhna ek aisi yatra hota hai jiske anvarat chalte rahne ka lobh mujhse chhootta hi nahi, vipin ko snehil badhai…..kavitayen samyik hain aur inki bahut jaroorat hai aaj…….shukriya jankipul……

  8. हमारे समझने बूझने का
    पिरामिड अब इतना बौना हो गया है
    कि हमारी मुंडी क्रांति की चौखट से
    टकराने लगती है
    इन चंद लइनों ने वर्तमान परिदृश्य को बखूबी चित्रित कर दिया है , कविता का प्रवाह और शब्द सयोंजन बढ़िया लगा. आभार आपका हम कुरेदने के लिए .

  9. कई बहरे, काने और लंगडे बन अपनी बेबसियों का बखान करने लगें होंगे bahut utprerak sadhuvad aaj bhi isthitya bilkul vesi hi hain aap ne bakhubi byan kiya hai baar baar padna padegi

  10. विपिन जी की कविताएं इतिहास का अपने समय में बहुत जरूरी ढंग से प्रत्‍याख्‍यान करती हैं और एक नये समाज निर्माण का स्‍वप्‍न देखती हैं… मुझे निरंतर उनकी कविताओं से गहरी आश्‍वस्ति होती है और मैं हर बार उनके प्रति आदर से भर जाता हूं…

  11. न इस कविता के बारे में कुछ कहने को बचता है, न इसके नायकों के बारे में। हमारे देश के असली नायकों को सलाम

  12. "शहीद – ए –आज़म,
    इंसान से पिस्सु बनने की प्रक्रिया को
    तुम नही देख पाए
    पाए
    यही शुक्र है…"

    "इसी तरह राम प्रसाद के हाथों
    नम्बर आठ की रेलगाडी को काकोरी में लूटना जरूरी हो जाता है
    क्योंकि राम प्रसाद बिस्मिल
    ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत है’
    के जुमले में
    विश्वास करने वाली टोली में शामिल है…" सलीके से किए गए पुण्यस्मरण के लिए बधाई.

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