Thursday, March 1, 2012

वह बच्चा किसका है?


विश्व पुस्तक मेले में इस साल प्रसिद्ध पत्रकार, कथाकार गीताश्री की पुस्तक 'सपनों की मंडी' की बड़ी चर्चा रही. प्रस्तुत है उसी पुस्तक का एक अंश- जानकी पुल. 
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कोई सुबह-सुबह अखवार बांटता है। कोई घरों के बाहर रखे कूड़े के थैले को उठाकर ले  जाता है। कोई सब्जी बेचता है तो कोई कपड़े प्रेस करता है। कोई किराने की दुकान पर खड़ा रहता है और आर्डर पर आए सामानों को घरों में पहुंचाता है कोई रात भर किसी अपार्टमेंट के बाहर खड़े होकर चौकीदारी करता है।महानगर के बहुमंजिली संस्कृति में जीने के आदी हो चुके लोगों में शायद ही किसी को ये सोचने की फुरसत हो कि कौन हैं वे लोग,जो सुबह होते ही शुरु हो जाते हैं और देर रात के बाद कहां गायब हो जाते हैं किसी को नहीं मालूम। कौन हैं वे लोग? क्या हम उनके नाम जानते हैं? वे कहां से आते हैं? शहर में वे किस तरह गुजर-बसर करते हैं? वे कहां रहते हैं? क्या हम उनकी परवाह करते हैं? शायद नहीं, लेकिन अगर कोई परवाह करने निकले तो? तो फिर आपका सामना हाहाकार भरे ऐसे-ऐसे सच से होगा, जिसपर यकीन करना मुश्किल हो जाएगा।
मुंबई के मशहूर लियोपोर्ड की संगीत भरी रातों के सामने 10 से 12 साल के बीसयों बच्चे अक्सर खड़े मिलते हैं। शायद आपने भी उन्हें देखा हो, लेकिन क्या आपको पता है कि  वे उन शोषित बच्चों के समूह से हैं जो शहर के फुटपाथों पर जूते या कार चमकाते हैं, फूल, चाकलेट या फिर कुछ और बेचते हैं। रात को भीख मांगते हैं। और यह सब बड़े ही संगठित रूप से होता है, क्योंकि फूल या  चाकलेट बेचनेवाले बच्चे खुद बिके हुए होते हैं। एक रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ मुंबई में एक साल के अंदर 8 हजार बच्चे लापता हुए हैं। और दूसरे महानगरों के बारे में भी कुछ इसी तरह के आंकड़ों पर बात की जा सकती है ,क्योंकि भूमण्डलीकरण के जमाने में बच्चों की तस्करी को नए-नए पंख जो लग गए हैं।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आंकलन के हवाले से 2002 में दुनिया भर से करीब 12 लाख बच्चों की तस्करी हुई। वहीं युनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट आफ स्टेट के आकड़ों (2004) का दावा है कि दुनिया में तस्करी के शिकार कुल लोगों में से आधे बच्चे हैं। अकेले बच्चों की तस्करी से हर साल 10 अरब डालर के मुनाफे का अनुमान है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों (2000) का अनुमान है कि सेक्स इंडस्ट्री में 18 लाख बच्चों का शोषण हो रहा है। इनमें भी खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का यह भी अनुमान है कि घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। ऐसे बच्चों की तस्करी करने के लिए इनके परिवार वालों को अच्छी पढ़ाई-लिखाई या नौकरी का झांसा दिया जाता है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) का अनुमान है कि दुनिया के 30 से ज्यादा सशस्त्र संघर्षों में बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ बच्चों को गरीबी तो कुछ को जबरन उठाकर सेना में भर्ती किया जाता है। 1990 से 2005 के बीच सशस्त्र संघर्षों में 20 लाख से ज्यादा बच्चे मारे गए। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) ने यह भी कहा है कि अक्सर पिछड़े, अनाथ, विस्थापित, विकलांग या युद्ध क्षेत्र में रहने वाले बच्चों को सैन्य गतिविधियों में लगा दिया जाता है।
हालांकि अपने देश में महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक में नौकरों की जरूरत महसूस की जा रही है. इसके लिए ग़रीब और आदिवासी परिवारों की युवतियों को पसंद किया जाता है. कई बार तो मामूली जान पहचान पर ही उनके परिवार वाले घरेलू नौकर बनने के लिए उनके मालिकों को सौंप देते हैं. विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में पदस्थ सरकारी अधिकारी और कर्मचारी अपनी जान पहचान वालों के आग्रह पर घरेलू नौकर के रूप में आदिवासी बालिकाओं को उनके हवाले करा देते हैं. इन बालिकाओं के परिवार वाले भोले-भाले और अशिक्षित होते हैं, इसलिए सरकारी कर्मचारियों पर भरोसा भी कर लेते हैं. कई मामलों में नतीजे अच्छे मिलते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में धो़खे की कहानी ही सामने आई है।
बैतूल ज़िले के ठेसका गांव का खेतीहर मज़दूर हल्के खुश है, क्योंकि साहब के साथ उसकी बेटी शहर गई है. गांव में 8वीं कक्षा तक पढ़ी उसकी बेटी ने पांच साल के भीतर 12वीं पास कर ली और नर्सिंग कॉलेज में उसे एडमिशन भी मिल गया. वह साहब गुणगान करता रहता है लेकिन हल्के जैसी किस्मत सबको कहां? बैतूल के ही डिण्डौरी के पास के सूखा गांव की रमिया बताती है कि भिलाई में उसकी बेटी साहब के घर काम करती थी लेकिन अचानक गायब हो गई। पता चला कि साहब के एक रिश्तेदार उसे लेकर मुंबई चले गए हैं। अब वो कहां है, रमिया को नहीं मालूम। साहब अब सीधे मुंह बात नहीं करता।
हालांकि भारत सरकार और कई राज्य सरकारों ने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए करोड़ों रूपया खर्च कर अनेक कार्यक्रम शुरू किए हैं. इसके अलावा अगर रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरों को रोज़गार और नियमित मजदूरी मिलने की बात कही जा रही है, लेकिन अगर सचमुच ऐसा हो तो शायद ही कोई आदिवासी गांव छोड़कर जाए. इसी प्रकार यदि सस्ते राशन का पर्याप्त और नियमित वितरण होता तो भी आदिवासी पेट भरने के लिए गांव छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे। लेकिन सरकारी दावे सिर्फ दावे ही साबित हो रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि प्राकृतिक आपदाओं की ऊहापोह में बच्चों की तस्करी करने वाले गिरोहों की सक्रियता भी बढ रही है। इस दौरान यह गिरोह अपने परिवार वालों से बिछुड़े और गरीब परिवार के बच्चों को निशाना बनाते हैं। इसके अलावा गरीबी के चलते कई मां-बाप अपनी बेटी को आर्थिक संकट से रने का उपाय मानते हैं और पैसों की खातिर उसकी शादी किसी भी आदमी के साथ कर देते हैं। हाल के दिनों में औरतों की तस्करी से जुड़ी खबरों पर गौर करें तो  पता चलेगा कि इन दिनों अधेड़ या बूढ़े आदमियों के लिए नाबालिग लड़कियों की मांग बढ़ती जा रही है।
जानकार कहते हैं कि अक्सर उन बच्चों के बीच तस्करी की आशंका बढ़ जाती है जिनके जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड, बर्थ रजिस्ट्रेशन के मुताबिक 2000 में 41 प्रतिशत बच्चों के जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। बच्चों की कानूनी पहचान होने से उनकी तस्करी करने में आसानी हो जाती है। ऐसे में लापता बच्चों का पता-ठिकाना ढ़ूढ़ना मुश्किल हो जाता है। तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है, जिसमें कहा गया है कि भारत में एक साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं, इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है। तस्करी के बाद ज्यादातर बच्चों का इस्तेमाल खदानों, बगानों, रसायनिक और कीटनाशक कारखानों से लेकर खतरनाक मशीनों को चलाने के लिए किया जाता है। कई बार बच्चों को बंधुआ मजदूरी पर रखने के लिए उनके परिवार वालों को एडवांस पैसा दिया जाता है। इसके बाद ब्याज का पैसा जिस तेजी से बढ़ता है उसके हिसाब से बच्चों को वापिस खरीदना मुश्किल हो जाता है। इसके साथ-साथ अंग निकालने, भीख मांगने और नाजायज तौर से गोद लेने के लिए भी बच्चों की तस्करी के मामले बढ़ रहे हैं।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे मुश्किल भरा काम यह है कि बाल तस्करी से जुडे़ सही और पर्याप्त आकड़े जमा कर पाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि तस्करी के तार अंतर्राष्ट्रीय और संगठित अपराध की बहुत बड़ी दुनिया से जुड़े हैं। यह इतनी भयानक, विकराल और अदृश्य दुनिया है कि इसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। यह शारारिक और यौन शोषण के घने जालों से जकड़ी एक ऐसी दुनिया है जिसको लेकर सटीक नतीजे तक पहुंच पाना भी मुश्किल है। कई बार आकड़ों में से ऐसे लोग छूट जाते हैं जिनकी तस्करी देश के भीतर हो रही है। फिर यह भी है कि कई जगहों पर तस्करी के शिकार लोगों की आयु या लिंग का जिक्र नहीं मिलता।
मानव तस्करी से जुड़ा एक सच यह भी है कि बच्चों की तस्करी के मामले में हर हाल में हिसा का सिलसिला जारी रहता है और ऐसे बच्चे आखिरी तक गुलामी का जीवन ढ़ोने को मजबूर रहते हैं। ऐसे बच्चे भरोसेमंद आदमियों के धोखा दिए जाने चलते खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह भी अजीब विडंबना है कि ऐसे बच्चे अपनी सुरक्षा, भोजन और आवास के लिए शोषण करने वालों के भरोसे रहते हैं। यह बच्चे तस्करी करने वाले से लेकर काम करवाने वाले, दलाल और ग्राहकों के हाथों शोषण सहते हैं।   इस बात में कोई संदेह नहीं कि  दुनिया भर में मानव तस्करी सबसे फायदेमंद धंधा बनता जा रहा है।
 क्योंकि एक तो इसमें के बराबर लागत है और फिर नशा या हथियारों की तस्करी के मुकाबले खतरा भी कम है। इस धंधे में बच्चे कीमती सामानों में बदलते हैं और मांग-पूर्ति के सिद्धांत के हिसाब से देश-विदेश के बाजारों में बिकते हैं। तस्करी में ऐसा जरूरी नहीं है कि बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के बाहर ही ले जाया जाए। एक बड़ी संख्या में बच्चों की तस्करी गांवों से शहरों में भी होती है। इसके अलावा पर्यटन से जुड़ी मांग और मौसमी पलायन के चलते भी तस्करी को बढ़ावा मिलता है। देश के भीतर या बाहर, दोनों ही प्रकार से बच्चों की तस्करी भयावह अपराध है। इसलिए बच्चों की तस्करी रोकने के लिए सार्वभौमिक न्याय का अधिकार देने वाले कानून की सख्त जरूरत है। साथ ही ऐसे बच्चों के सामने आने के बाद उसे अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने की भी जरूरत है, ताकि फिर कोई उसके बारे में यह नहीं कह सके कि वो किसका बच्चा है?
 
पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है.

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2 comments:

  1. गीताश्री जी की संवेदनशीलता का मैं पुराना कायल पाठक हूं... इस पुस्‍तक में उन्‍होंने भारतीय समाज के सबसे घिनौने पक्ष पर बहुत बेबाकी से लिखा है और कई जगह तो बेहद काव्‍यात्‍मक संवेदना के साथ उनकी कलम पाठक को रुलाती चलती है। ... पुस्‍तक के लिए गीताश्री को बधाई और आभार जानकीपुल का एक बेहतरीन अंश पढ़वाने के लिए।

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  2. गीता श्री से एक मुलाक़ात है. वह बेलौसी, वह साफगोई ह्रदय में अंकित है. जो लेखन में पढ़ा था वह जीवन में पाना अद्भुत है.

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