कौमें नाश्ते की मे़ज पर नहीं पैदा हुआ करतीं

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प्रसिद्ध पत्रकार, इतिहासकार एम. जे. अकबर ने अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी थी- Tinderbox. उसका हिंदी अनुवाद हार्पर कॉलिंस से आया है ‘चिंगारी’ नाम से. पाकिस्तान के सन्दर्भ में लिखी गई यह पुस्तक एक तरह से भारतीय उप-महाद्वीप में इस्लामिक राजनीति का इतिहास है. बेहद रोचक अंदाज में, गहरी सूझबूझ के साथ लिखी गई. अनुवाद किया है प्रसिद्ध अनुवादक नीलाभ ने. प्रस्तुत है उसी पुस्तक की भूमिका- जानकी पुल.

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यह उन सुझावों में से एक था जो कराची में किसी प्यारे दोस्त के घर पर चल रही जोश-खरोश-भरी बातचीत के दौरान बिलकुल वाजिब और अक्लमंदी से भरे जान पड़ते हैं। एक साथी मेहमान ने, जो एक भूतपूर्व पदाधिकारी थे, मुझे बिनोरी मस्जिद और मदरसे पर ले चलने की दावत दी, जिसे 1947 में आ़जादी के कुछ ही दिन बाद मौलाना यूसु़फ बिनोरी ने कायम किया था; इस बात का भी कुछ महत्व था कि मेरे साथी मेहमान ने भी उसे नहीं देख रखा था। हम किसी स्थानीय ताजमहल को देखने की कल्पनाओं से प्रेरित नहीं थे, बल्कि बड़े पैमाने पर प्रचलित उस विश्वास से कि यही मस्जिद और मदरसा सोवियत संघ के खिला़फ अ़फ़गानों के जिहाद और अमरीका के खिला़फ ओसामा बिन लादेन की जंग के ऐलान के बीच के बंजर बरसों के दौरान ओसामा की पनाहगाह थी। 1998 में बिनोरी के तत्कालीन आध्यात्मिक गुरु मु़फ्ती नि़जामुद्दीन शम़जई ने एक फतवा जारी किया था कि अमरीकियों को हला़क कर देना जाय़ज था। कुछ व़क्त बाद, लश्कर-ए-तैयबा ने भी, जो २६ नवम्बर २००८ को मुम्बई के हमलों की सा़जिश करने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय अछूत बना, ऐसा ही फरमान जारी किया था। अ़फ़गानिस्तान में तालिबान बिनोरी से आने वाले किसी भी मुसा़फिर को शाही मेहमान का-सा सम्मान देते थे। कार का स़फर रोमांचरहित था, मस्जिद शानदार नहीं, बल्कि लम्बी-चौड़ी और विशाल थी। हम सीढ़ियाँ चढ़ कर एक खुले, कुशादा आयताकार आँगन में दा़खिल हुए जिसे चारों तऱफ से कमरों ने घेर रखा था। कुछ तालिबे-इल्म मटरगश्ती कर रहे थे, क्योंकि यह व़क्त न तो पढ़ाई का था, न प्रार्थना का; उनकी पोशाक उपमहाद्वीप के किसी भी इस्लामी मदरसे जैसी ही थीट़खनों से दो इंच ऊपर तक के स़फेद पाजामे, सफ़ेद कुर्ते,सिर पर चुस्त स़फेद टोपी। अपने जूतों के तस्मे खोलने के लिए झुकते समय, मैंने बेचैनी की हल्की-सी लहर को खारिज कर दिया, यह कुबूल करने को रा़जी न होते हुए कि मैं डर महसूस कर रहा था। बहरहाल, यह महसूस न करना नामुमकिन था कि हम एक बिलकुल अलहदा दुनिया की दहली़ज पर खड़े थे, जहाँ एक अलग कानून और एक अलग ़कायदा हावी था। कराची की पुलिस इस खयाल पर शायद कह़कहे लगाती कि उन्हें उस मस्जिद में बन्धक बनाये गये किसी हिन्दुस्तानी के बारे में कुछ करने की जरूरत थी। बेव़कू़फों का यही हश्र होता है, वे इसी लाय़क होते हैं। फिर बिना एक ल़फ़्ज कहे, मेरे साथी ने सिर के झटके से इशारा किया कि इस नासमझी को खत्म करने का व़क्त आ गया था। हम घबरा कर भागने से बाल बराबर पहले ही ते़ज-ते़ज कदम बढ़ाते, कार की तऱफ लौट आये। खयालों की जुगाली करने का व़क्त बाद में आने वाला था। लेकिन य़कीनन एक फौरी और जाहिर सवाल था जो जवाब की माँग कर रहा था। बरतानवी हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने १९४७ में एक अलग वतन के विकल्प को मंजूरी दी थी, एक धर्मनिरपेक्ष हिन्दुस्तान की सम्भावना को नष्ट करते हुए, जिसमें हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रह सवेंâगे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे पाकिस्तान नामक नये राष्ट्र में अपनी जान-माल के साथ मह़पूâज रहेंगे और उनका म़जहब सुरक्षित रहेगा। इसकी बजाय, साठ बरस के अन्दर पाकिस्तान दुनिया के सबसे हिंसक राष्ट्रों में से एक बन गया है, इसलिए नहीं कि हिन्दू मुसलमानों की जानें ले रहे हैं, बल्कि इसलिए कि मुसलमान मुसलमानों को मार रहे हैं। कौमें नाश्ते की मे़ज पर नहीं पैदा हुआ करतीं। उनकी पैदाइश की अवधि निश्चय ही इतिहास के अध्ययन के निस्बतन ज्यादा दिलचस्प अध्यायों में से एक है। शह-मात की बा़जी के उस्ताद, मुहम्मद अली जिन्ना की निर्विवाद हैसियत और कद ने इस धारणा को जन्म दिया है कि पाकिस्तान लाहौर में मार्च १९४० में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पारित किये गये एक प्रस्ताव से वजूद में आया था। असलियत कहीं अधिक पेचीदा है। पाकिस्तान भविष्य के प्रति एक भय और अतीत के प्रति एक गर्व की भावना से उपजा था,लेकिन यह भय अट्ठारहवीं सदी में मु़गल सल्तनत के लम्बे अवसान के दौरान मुस्लिम शुऱफा के बीच उद्विग्नता की मन:स्थिति के रूप में शुरू हुआ था। इस हमल का एक लम्बा और हलचल-भरा वजूद रहा था,खास तौर पर उन पीढ़ियों के दौरान जब उसने आकार नहीं लिया था। यह किताब एक विचार का इतिहास हैज्यों-ज्यों वह दुर्लभ जीवट से काम ले कर नाटकीय घटनाओं के बीच से बचता-बचाता, कूदता-फाँदता अपनी राह तय करता रहा; कभी-कभी ऩजर से ओझल होता हुआ, मगर हमेशा या तो अपने हिमायतियों के इरादे या विरोधियों की गलतियों के बल पर फिर-फिर िजन्दा किया जाता हुआ। उसकी शुरुआत हिचकिचाते कदमों से, १७५० के दशक में, गिरावट के काल की परछार्इं-तले हुई, जब मु़गल साम्राज्य के पतन और उसके नतीजे के तौर पर हिन्दुस्तान में कथित मुस्लिम हुकूमतके विखण्डन को आगे के दौर में स़फाइयों, सिद्धान्तों या बचे रहने की उम्मीदों से छिपाना सम्भव न रहा। पाकिस्तान, मु़गल साम्राज्य का वारिस राज्य है, उस स़फर की आखरी मंिजल जो मुस्लिम हुकूमत के बाद की व्यवस्था में मुस्लिम जगहकी तलाश के तौर पर शुरू हुआ था, एक आशंका से पोषित जो य़कीन में बदल गयी : कि एक अल्पसंख्यक बिरादरी खुद अपनी या अपने म़जहब की हि़फा़जत तब तक नहीं कर पायेगी जब तक वह भारी हिन्दू मौजूदगी से सांस्कृतिक और राजनैतिक फासला न कायम कर ले। मुसलमान, जो पाँच सदियों से हिन्दुस्तान में बड़प्पन की भावना के साथ रहते आये थे, अचानक हिचकोले खा कर हीन भाव के खा जाने वाले शुब्हे में जा गिरे जो उथल-पुथल-भरी औपनिवेशिक हुकूमत के अलग-अलग चरणों के दौरान हर चुनौती के साथ खुद को बढ़ाता चलने लगा। इस विचार की कम़जोरियाँ कभी पहचानी नहीं गयीं, क्योंकि वे अमल में लायी जाने पर ही उजागर हो सकती थीं।

एक अस्तित्ववादी सवाल बिलकुल ऩजरन्दा़ज कर दिया गया: क्या इस्लाम इतना कम़जोर था कि वह अल्पसंख्यक मौजूदगी में जीवित नहीं रह सकता था? उसके जगमगाते अतीत में ऐसा कुछ नहीं था जो इसका संकेत देता, लेकिन जिन्होंने यह सवाल उठाया, मसलन मेधावी विद्वान-राजनेता मौलाना अबुल कलाम आ़जाद, उन्हें,यह विडम्बना ही है कि इस्लाम के गद्दारों के रूप में खारिज कर दिया गया। पहला दौर सन १७३९ और १७५७ के बीच के बरसों का है। १७३९ में, एक ईरानी लुटेरा-सुल्तान, नादिर शाह दिल्ली में मु़गल शहंशाह मुहम्मद शाह के मेहमानके तौर पर दा़खिल हुआ। दो दिन बाद नादिरशाह ने एक कच्चे-से बहाने का सहारा लेते हुए कत्ले-आम का हुक्म दिया जिसमें हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं किया गया। अन्दा़जन २०,००० लोग मारे गये, औरतों के साथ बलात्कार किया गया और शाही और निजी सम्पत्ति लूट ली गयी। अट्ठावन दिन तक आतंक बरपा करने के बाद नादिरशाह बेश़कीमती जवाहरात, सोने-चाँदी और सिक्कों के ख़जाने के साथ रु़खसत हुआ, जिसमें कोहेनूर हीरा और शाहजहाँ का त़ख्ते-ताऊस भी था। मु़गल साम्राज्य, जो तीन दशक पहले एक महाशक्ति था, इस िजल्लत से कभी उबर नहीं पाया; वह अपने बुनियादी फ़र्ज अपनी रियाया की जान-माल की हि़फा़जतको अदा करने में नाकाम रहा था।
अपने समय के प्रमुख सुन्नी धर्मवेत्ता और बुद्धिजीवी शाह वलीउल्लाह ने इस हादसे के कई मतलब निकाले। मुसलमानों ने जिस सलामती को पहले से दिया-दिलाया मान रखा था, वह खत्म हो चुकी थी। खण्ड-खण्ड होते साम्राज्य की जगह ता़कतवर क्षेत्रीय राजवंश लेने लगे थे जो अधिकतर मामलों में, हिन्दू थे। सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम राज्यअवधशियाओं के कब्जे में था, एक भटका हुआसम्प्रदाय जिस पर इस्लाम की बहबूदी के सिलसिले में भरोसा नहीं किया जा सकता था और जो शाह वलीउल्लाह की ऩजरों में का़फिरों से बदतर थे। नादिरशाह, जिसने मु़गलों की झुकी हुई कमर तोड़ दी थी, शिया था। शाह वलीउल्लाह ने उस समुदाय के लिए, जो का़फिरों की सांस्कृतिक शक्ति और ़फौजी ता़कत की चुनौती के जेरे-साया था,फासले के और इस्लामी शुद्धताके उसूल की पेशकश की। खुद अपनी नसों में बह रहे खून को पाकऔर अरबीरखने के लिए अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए, उन्होंने यह पहचाना कि हिन्दुस्तानी मुसलमानों का बेशतर हिस्सा धर्म-परिवर्तन करके हिन्दू से मुसलमान बना था; उनकी आदतों और व्यवहार में भारी सांस्कृतिक घालमेल था। उन्हें आशंका थी कि राजनैतिक ता़कत की पुश्तपनाही के बल पर बऱकरार म़जहबी रहनुमाई के अभाव में हिन्दुस्तानी मुसलमान फिर से हिन्दू रीतिरिवाज अपनाने लगेंगे। उनकी दलील थी कि हिन्दुस्तान में इस्लाम तभी जिन्दा बचा रह सकेगा अगर मुसलमान भौतिक, वैचारिक और भावनात्मक रूप से हिन्दुओं से फासला बनाये रखेंगे। उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से इतनी दूर रहने का आग्रह किया जहाँ से वे उनकी रसोइयों का धुआँ भी न देख सकें। शाह वलीउल्लाह का मदरसा उन्नीसवीं सदी के दौरान उत्तर भारत के मुस्लिम जेहन को गढ़ने में बुनियादी और बेहद अहम भूमिका अदा करने वाला था, जब िफरंगी हुकूमत ने दक्खिनी घेरे और पूर्वी कोने से उभर कर पूरे उपमहाद्वीप पर आधिपत्य जमाया। बरतानवी शासन का बीज १७५७ में एक बेनाम-से गाँव पलासी में लड़ी गयी मामूलीमगर युग-परिवर्तनकारी लड़ाई में बोया गया था जिसने देश के सबसे समृद्ध व्यापारिक प्रान्तबंगालमें मु़गल हुकूमत का खात्मा कर दिया था। शाह वलीउल्लाह के मदरसे के तालिबे-इल्म, बहरहाल, इतनी आसानी से पराजित नहीं हुए थे। उनमें से एक, सैयद अहमद बरेलवी ने उस लम्बे जिहाद में जान फूंकी जो १८२५ में शुरू हुआ और १८३१ में उनके इन्त़काल के बहुत दिन बाद तक, बालाकोट के मैदाने-जंग में जारी रहा (जो आज पाकिस्तानी तालिबान का एक प्रमुख केन्द्र है।).

हिन्दुओं पर सन्देह, जो फासले के उसूल की बुनियाद था, मुस्लिम राजनीति का ककहरा बन गया जब उसने बीसवीं सदी की शुरुआत में बरतानवी हुकूमत की उभरती हुई राज्य-व्यवस्था में अपनी जगह तलाश करने की जद्दो-जेहद शुरू की। जब विधान-परिषदों में हिन्दुस्तानियों की नुमाइन्दगी की पेशकश की गयी तो मुस्लिम शुऱफा ने जो पहली माँग पेश की वह अनोखी थीकि मुसलमानों का चुनाव साथी मुसलमान ही करें। यही वह अलग-अलग चुनाव-क्षेत्रोंकी योजना थी जिसे अंग्रे़जों ने खुशी से पुष्ट करके कानून बना दिया। तीखी ऩजर वाले एक युवक ने, जिसे बाद में पाकिस्तान के जनक का सम्मान दिया गया, इस कदम के अभिप्रायों को फौरन पहचान लिया, चाहे उसने ब़जाते खुद इस माँग से कन्नी काट ली। जिन्ना ने बीसवीं सदी के पहले दशक ही में कह दिया था कि अलग-अलग चुनाव-क्षेत्र हिन्दुस्तान की एकता को नष्ट करने की दिशा में ले जायेंगे; और ऐसा ही हुआ। जिन्ना बरतानवी हिन्दुस्तान की एक असाधारण उपज थे। उन्हें शेक्सपियर और ऩफासत से सिले सूट पसन्द थे, अंग्रे़जी को वे अपनी मादरी जबान कहते थे, किसी अंग्रे़ज सामन्त से ज्यादा रख-रखाव के आदी थे, और जब लिंकन्स इन से कानून की डिग्री लेने के बाद वे इंग्लैण्ड में रंगमंच में शामिल होना चाहते थे तो उनके पिता को द़खलन्दा़जी करके उन्हें उस रास्ते पर न जाने को लिए मनाना पड़ा था। वे उतनी ही शिद्दत से आ़जादी के इच्छुक थे, लेकिन राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी के विपरीत, वे इस प्रक्रिया में कानून को तोड़ने के हिमायती नहीं थे, क्योंकि वे इसे वकील के नाते अपनी पेशेवराना नैतिकता के अनुरूप नहीं पाते थे। विडम्बना यह है कि जिस आन्दोलन ने आ़जादी की लड़ाई की दिशा बदल दी, लेकिन जो अपने पीछे ऐसी निराशा भी छोड़ गया जिसने मुसलमानों के भीतर गाँधी के प्रति परायेपन की भावना पैदा कर दी, उसके शुरू होने से पहले ही जिन्ना ने गाँधी को म़जहब और राजनीति को आपस में मिलाने अगिनखोर और मुसलमान मुल्लाओं से लाड़ लड़ाने के खतरों के बारे में चेताया था।

१९१९ और फरवरी १९२२ के बीच गाँधी किसी जिहाद का नेता बनने वाले पहले गैर-मुसलमान थे। गाँधी ने डिक्टेटरशिपमंजूर कर ली (इस शब्द के उस समय भिन्न अभिप्राय थे), मगर एक शर्त पर: कि अंग्रे़जों के िखला़फ उनका जिहाद अहिंसक होगा। सबसे महत्वपूर्ण उलमा समेत मुस्लिम नेताओं ने यह शर्त मान ली और गाँधी को उस जिहाद में ज़ज्ब कर लिया जिसे िखला़फत आन्दोलनके नाम से जाना जाता है, क्योंकि वह इस्लाम के उस्मानी खली़फा और मक्का और मदीना के पवित्र शहरों पर उनके प्रभुत्व के समर्थन में शुरू किया गया था। खली़फा अंग्रे़ज और यूरोपी साम्राज्यवादी की जबरदस्त लहर के िखला़फ, मुस्लिम ता़कत का आखिरी प्रतीक था, और इसी मु़काम पर वह गाँधी की जरूरतों के साथ आ मिलता था। गाँधी ने इसी आन्दोलन के जरिये हिन्दुओं और मुसलमानों को अंग्रे़जी राज के खिला़फ एकजुट करने की सम्भावना देखी थी, चाहे उनकी शुरुआत का मु़काम जैसा भी रहा हो। हिन्दुस्तानियों के बीच एकता हासिल करने के बाद गाँधी ने एक बरस के अन्दर स्वराज का वादा किया था। इसकी बजाय, फरवरी १९२२ तक आते-आते उन्हें एहसास हो गया कि वे उस हिंसा को रोक नहीं पा रहे जो देश के कोने-कोने में फूट पड़ी थी। गाँधी ने आन्दोलन को त्यागने का इकतऱफा फैसला किया, जिससे उनके समर्थक मुसलमानों को गहरा धक्का लगा। नाकामी की कड़वाहट इतनी गहरी थी कि इसके बाद मुसलमान गाँधी की कांग्रेस में वा़कई फिर से नहीं लौटे। लेकिन यह उन्हें सीधे मुस्लिम लीग तक भी नहीं ले गया; इतना कहना का़फी है कि मुसलमानों की जगहकी तलाश ने तब तक ऱफ्तार नहीं पकड़ी जब तक कि वह इस्लाम के लिए जगहकी माँग में नहीं बदल गयी, और गाँधी को मुस्लिम लीग के नेता ऐसे काइयाँ हिन्दू बनिया के तौर पर पेश करने में कामयाब हो गये जिसकी धर्म-निरपेक्षता उपमहाद्वीप में हिन्दू उत्पीड़न और फलस्वरूप इस्लाम की तबाही का पाखण्ड-भरा नाम ही थी। इस्लाम खतरे में था और पाकिस्तान वह किला था जहाँ उसे बचाया जा सकता था। जिन्ना जैसे म़जबूत वकील के होते हुए, बहुत-से मुसलमानों को कायल कर दिया गया कि वह आदमी जिसने अपनी िजन्दगी उनकी भलाई की िफक्र में बितायी थी और आखिरकार उनके हितों की रक्षा में गँवा दी थी, दरअसल उनका छुपा हुआ दुश्मन था।

जिन्ना का कानूनी कौशल जनमत की अदालत में देखने-लाय़क होता था, उस समय भी जब उनके व्यंग्य में ऩफासत का अभाव होता, मसलन जब उन्होंने गाँधी को वह हिन्दू पुनरुत्थानवादीकहा था। जिन्ना ने, जो शराब पीते थे, त़फरीहन घुड़दौड़ देखने जाते थे, रम़जान में कभी रो़जे नहीं रखते थे और कुरान की एक आयत भी सुना नहीं सकते थे, कुछ मुसलमानों पर ऐसा जादू कर दिया था कि उन्हें य़कीन था कि जिन्ना तहज्जुद की छठी और वैकल्पिक नमा़ज के लिए, जिसे सि़र्फ बड़े म़जहबी लोग ही अदा करते हैं, भोर से बहुत पहले उठ जाते हैं। स्पष्ट रूप से जिन्ना को विश्वास था कि वे उस नारे—‘इस्लाम खतरे में है’—का फायदा उठा सकते थे जिसके िखला़फ उन्होंने किसी व़क्त चेतावनी दी थी, और फिर जब वह इस्तेमाल किये जाने के बाद अपनी कीमत खो दे तो उसे अतीत की तयशुदा रद्दी की टोकरी की तऱफ रवाना भी कर सकते थे। पाकिस्तान की धारा-सभा में अपनी पहली त़करीर में जिन्ना ने धर्म-निरपेक्ष पाकिस्तान के पक्ष में ऐसी दलीलें रखी थीं जिन पर हिन्दुस्तान की धारा-सभा में तालियाँ बजी होतीं। जिन्ना की राजनीति की सबसे हमदर्दाना व्याख्या यही हो सकती है कि वे मुस्लिम बहुसंख्यकों वाले धर्म-निरपेक्ष राज्य के हामी थे, ठीक जैसे गाँधी हिन्दू-बहुसंख्यकों वाला धर्म-निरपेक्ष राज्य चाहते थे। अन्तर, लेकिन, महत्वपूर्ण थागाँधी एक सर्व-समावेशी राष्ट्र चाहते थे; जिन्ना, दूसरी ओर, एकान्तिक और बहिष्कारवादी राज्य के इच्छुक थे। जब १३ जून, १९४७ को गाँधी से पूछा गया कि क्या वे लोग, जो ईश्वर को अल्लाह की बजाय राम और कृष्ण कहते थे, पाकिस्तान के बाहर कर दिये जायेंगे तो उन्होंने सि़र्फ हिन्दुस्तान की ओर से जवाब दिया था—‘हम ईश्वर को कृष्ण और करीम,दोनों रूपों में पूजेंगे और दुनिया को दिखा देंगे कि हम पगलाने से इनकार करते हैं।१ धर्म के प्रति गाँधी की निष्ठा का मतलब किसी एक धर्म के प्रति निष्ठा कभी नहीं रहा।

जिन्ना और गाँधी, दोनों की मृत्यु १९४८ में हुई, जिन्ना तपेदि़क का शिकार हुए, गाँधी हत्यारे की गोली का। हिन्दुस्तान में राज्य की धर्म-निरपेक्ष विचारधारा के बारे में स्पष्टता थी, १९५० तक यहाँ एक स्वतन्त्र संविधान पर काम पूरा कर लिया गया था और १९५२ में पहले, आ़जाद, वयस्क मताधिकार के बल पर आयोजित चुनाव सम्पन्न हो गये थे। पाकिस्तान में देश की राज्

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  1. भूमिका ही इतनी जबर्दस्त है कि आँखें चौंधिया जाती हैं ! पूरी किताब पाकिस्तान और उसके अंदरूनी हालातों को समझने,परखने के लिए पर्याप्त प्रकाश जुटाएगी ,ऐसी आशा है ! इस जानकारी और भूमिका कि प्रस्तुति के लिए 'जानकी पल' का आभार !

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