Monday, April 30, 2012

देखना होगा कि ऐसे कटघरे कहाँ-कहाँ हैं?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के लेख पर पहले कवि-संपादक गिरिराज किराडू ने लिखा. अब उनके पक्ष-विपक्षों को लेकर कवि-कथाकार-सामाजिक कार्यकर्ता अशोक कुमार पांडे ने यह लेख लिखा है. इनका पक्ष इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि श्री मंगलेश डबराल अपनी 'चूक' संबंधी पत्र इनको ही भेजा था और फेसबुक पर अशोक जी ने ही उस पत्र को सार्वजनिक किया था. आइये पढते हैं- जानकी पुल.
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थानवी साहब का लेख जितना लिखे के पढ़े जाने की मांग करता है उससे कहीं अधिक अलिखे को. एक पत्थर से दो नहीं, कई-कई शिकार करने की उनकी आकांक्षा एक हद तक सफल हुई तो है लेकिन यह पत्थर कई बार उन तक लौट के भी आता है. खैर मेरी यह प्रतिक्रिया
अनामंत्रित हो सकती है कि उन्होंने कहीं मेरा नाम नही लिया था, लेकिन फेसबुक/ब्लॉग पर उपस्थित व्यापक साहित्य-समाज का एक अदना सा हिस्सा, और मंगलेश डबराल सम्बंधित उस पूरे मामले में अपने स्टैंड के साथ उपस्थित रहने के कारण मुझे इस बहस में हस्तक्षेप करना ज़रूरी लगा, सो कर रहा हूँ- अशोक कुमार पांडे
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थानवी साहब, एक मजेदार सवाल करते हैं दुर्भाव और असहिष्णुता का यह आलम हमें स्वतंत्र भारत का अहसास दिलाता है या स्तालिनकालीन रूस का?” ज़ाहिर है कि इन सबके सहारे वह अपनी घोषित पुण्य भूमि अज्ञेय तक पहुँचते हैं और वामपंथियों को अज्ञेय को उचित स्थान न देने के लिए कटघरे में खड़ा करते हैं. देखना होगा कि ऐसे कटघरे कहाँ-कहाँ हैं? वैसे अज्ञेय के संबंध में पहले भी कह चुका हूँ और अब भी कि उनकी सबसे तीखी आलोचना कलावादी खेमे के शहंशाहों ने ही की. उन्हें बूढ़ा गिद्ध किसी नामवर सिंह ने नहीं अशोक बाजपेयी ने कहा था (प्रसंगवश उसी लेख में सुमित्रा नन्द पन्त को भी अज्ञेय के साथ बूढ़ा गिद्ध कहा गया था, लेकिन बहुत बाद में नामवर सिंह के पन्त साहित्य में एक हिस्से को कूड़ा कहे जाने पर जो बवाल मचा उस दौरान अशोक बाजपेयी के कहे को किसी ने याद करना ज़रूरी नहीं समझा). अब उन कटघरों और अनुदारताओं की भी बात कर ली जाए. सीधा सवाल थानवी साहब से. पिछले साल जिन बड़े साहित्यकारों की जन्मशताब्दी थी उनमें अज्ञेय के अलावा केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, फैज़ अहमद फैज़, उपेन्द्र नाथ अश्क, गोपाल सिंह नेपाली प्रमुख थे. फिर ओम थानवी ने केवल अज्ञेय पर ही आयोजन क्यूं करवाया? अज्ञेय के अलावा इनमें से किसी और पर उन्होंने इस साल या इसके पहले कौन सा आयोजन करवाया, कौन सी किताब संपादित की, क्या लिखा?

ज़ाहिर है कि उन्हें अपना नायक चुनने का हक है. बाक़ी कवियों/लेखकों की उनके द्वारा जो उपेक्षा हुई, उसकी शिकायत कोई पंथी उनसे करने नहीं गया. हम उन वजूहात को अच्छी तरह से जानते हैं, जिनकी वजह से केदार नाथ अग्रवाल या नागार्जुन को छूने में बकौल नागार्जुन, अशोक बाजपेयी या थानवी साहब को घिन आयेगी. लेकिन थानवी साहब या उनके लगुओं/भगुओं को यह अनुदारता कभी दिखाई नहीं देगी. वह अशोक बाजपेयी से यह सवाल पूछने की हिम्मत कभी नहीं कर पायेंगे कि उन्हें अज्ञेय के अलावा सिर्फ शमशेर ही क्यूं दिखे और उन्हें भी अपने चश्में के अलावा किसी रंग से देखना उनसे संभव क्यों नहीं होता? (इस मुद्दे पर आप मेरा लेख यहाँ देख सकते हैं). उनसे यह पूछने कि हिम्मत कभी किसी की नहीं होगी कि वामपंथ को लेकर जो उनका हठी रवैया है उसे अनुदारता क्यूं न कहा जाए? क्या थानवी या बाजपेयी की तरह हमें भी अपने कवि चुनने का हक नहीं? क्या कभी थानवी या अशोक बाजपेयी या उनके लोग किसी अदम गोंडवी पर कोई आयोजन करेंगे? नहीं करेंगे. तो जाहिर है हमें भी कुछ कवियों से घिन आती है. यह हमारा हक है. जिन्हें आप या अज्ञेय जीवन भर विरोधी घोषित किये रहे उनसे किसी समर्थन की उम्मीद क्यूं (और जो समर्थन में जाके दुदुम्भी या पिपिहरी बजा रहे हैं, वे क्यूं बजा रहे हैं इसका उत्तर उन्हीं के पास होगा, मैं इसे उदारता नहीं अवसरवाद मानता हूँ)

आवाजाही का समर्थन करने वाले कभी अपनी ब्लैक लिस्टों का विवरण नहीं देंगे. यह एक खास तरह का दुहरापन है, जिसमें दुश्मन से खुद के लिए सर्टिफिकेट न जारी होने पर सीने पीटे जाते हैं. यह कौन सी उदारता है जिसका सर्टिफिकेट हत्यारों के मंचों पर बैठ कर ही हासिल होता है? हत्यारे और उसके आइडियोलाग में अगर फर्क करना हो तो मैं आइडियोलाग को अधिक खतरनाक मानूंगा. एक आइडियोलाग हजार हत्यारे पैदा कर सकता है, हजार हत्यारे मिल कर भी एक आइडियोलाग पैदा नहीं कर सकते. मुझे नहीं पता हिटलर या मुसोलिनी ने अपनी पिस्तौल से किसी की ह्त्या की थी या नहीं...मैं मुतमईन हूँ कि हेडगेवार या मुंजे या सावरकर या गोलवरकर ने किसी की ह्त्या नहीं की थी. क्या फासिस्ट विचारधारा का समर्थन करने वालों से सच में कोई सार्थक बहस संभव है? क्या वे अपने मंचों पर आपको इसलिए बुलाते हैं कि वे आपसे कोई सार्थक संवाद करना चाहते हैं?  ऐसा भोला विश्वास संघ या दूसरे फासिस्ट संगठनों के इतिहास से पूरी तरह अपरिचित या फिर उनकी साजिश में शामिल लोगों को ही हो सकता है. विदेश का उदाहरण थानवी साहब इस तरह दे रहे हैं मानो वाम-दक्षिण की बहस शुद्ध भारतीय फेनामना हो. उस पर इतना कह देना काफी होगा कि वह शायद पश्चिम अभिभूतता से पैदा हुई समझ है. केवल काँग्रेस फॉर कल्चरल फ़्रीडम के सी आई ए द्वारा वित्तपोषण और इसके खुलासे के बाद मचे हडकंप का भी अध्ययन कोई कर ले, या ब्रेख्त जैसे लेखक की आजीवन निर्वासन वाली स्थिति को समझने की कोशिश कर ले तो यह वैचारिक विभाजन साफ़ दिखेगा. चार्ली चैप्लिन के ज़रा से समाजवादी हो जाने पर क्या हुआ था, यह कोई छुपी हुई बात नहीं है. दुनिया भर की सत्ताओं ने वामपंथी लेखकों के साथ क्या सुलूक किया है वह भी कोई छुपी बात नहीं है, बशर्ते कोई देखना चाहे.

वैसे इस रौशनी में तमाम कलावादियों/समाजवादियों/वामपंथियों द्वारा महात्मा गांधी हिन्दी विश्विद्यालय और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान जैसे मंचों के बहिष्कार को भी देखा जाना चाहिए (इन दोनों के बहिष्कार में मैं खुद शामिल हूँ और इसे किसी तरह की अनुदारता की जगह वैचारिक दृढता मानता हूँ)

और ऐसा भी नहीं कि हिन्दी में वैचारिक विरोधियों से संवाद की परम्परा रही ही नहीं. रघुवीर सहाय और धूमिल ही नहीं, बल्कि लोहियावादी समाजवाद की विचारधारा के मानने वाले तथा कट्टर कम्यूनिस्ट विरोधी तमाम लेखकों के बारे में वाम धारा के भीतर हमेशा एक सम्मान वाली स्थिति रही, वे मुख्यधारा की बहसों में शामिल रहे और आज भी हैं. कलावाद के साथ भी वाम का संवाद लगातार हुआ, एक ही पत्रिका में दोनों तरफ के लोग छपते और बहस करते रहे (जनसत्ता के पन्नों पर भी यह निरंतर होता रहा है), दलित विमर्श और स्त्री विमर्श जैसी धुर मार्क्सवाद विरोधी धाराओं के साथ हिन्दी के वामपंथियों का न केवल सार्थक और सीधा संवाद है, बल्कि उन्हें आदर सहित मुख्यधारा की पत्रिकाओं में लगातार स्थान मिलता रहा है. अज्ञेय पर आलेख काफी शुरू में जसम की पत्रिका में छपा. प्रभास जोशी लोहियावादी और कम्यूनिस्ट विरोधी ही थे, लेकिन क्या वाम धारा के लेखकों के साथ उनका संवाद नहीं था? क्या खुद थानवी साहब का संवाद नहीं है? फिर स्टालिन काल की याद इसलिए करना कि किसी के हिटलर के प्रशंसकों के हाथ पुरस्कार लेने की आलोचना हुई है, क्या है? मैंने कल भी लिखा था, फिर लिख रहा हूँ संवाद करना और किसी के अपने मंच पर जाकर शिरकत करना दो अलग-अलग चीजें हैं. हम ओम थानवी को इसलिए भाजपाई नहीं कहते कि उनके यहाँ तरुण विजय का कालम छपता है या इसलिए कम्यूनिस्ट नहीं कहते कि वहाँ किसी कम्यूनिस्ट का कालम छपता है. कारण यह कि जनसत्ता के न्यूट्रल मंच है. किसी टीवी कार्यक्रम में या यूनिवर्सिटी सेमीनार में आमने-सामने बहस करना और किसी संघी संस्था के मंच पर जाकर बोलना दो अलग-अलग चीजें हैं.

अब थोड़ा इस आलेख की चतुराइयों पर भी बात कर लेना ज़रूरी है. थानवी साहब बात करते हैं मंगलेश जी के वैचारिक सहोदरों के आक्रमण की, लेकिन जिन्हें कोट करते हैं (प्रभात रंजन, सुशीला पुरी, गिरिराज किराडू आदि) उनमें वामपंथी बस एक प्रेमचंद गांधी हैं और जसम का तो खैर कोई नहीं. जबकि उसी वाल पर हुई बहस में आशुतोष कुमार जैसे जसम के वरिष्ठ सदस्य और तमाम घोषित वामपंथी उपस्थित थे. लेकिन थानवी जी ने अपनी सुविधा से कमेंट्स का चयन किया.

उदय प्रकाश को कोट करते हुए यह तो स्वीकार किया कि उन्होंने आदित्यनाथ से पुरस्कार लिया था लेकिन साथ में दो पुछल्ले जोड़े पहला यह कि उदय प्रकाश को यह पता नहीं था और दूसरा कि परमानंद श्रीवास्तव जैसे लोग वहाँ सहज उपस्थित थे लेकिन हल्ला दिल्ली में मचा. दुर्भाग्य से दोनों बातें तथ्य से अधिक चतुराई से गढ़ी हुई हैं. उस घटना के तुरत बाद उठे विवाद के बीच अमर उजाला के गोरखपुर संस्करण में २० जुलाई को छपी एक परिचर्चा में आदित्यनाथ ने कहा था इस समारोह में जाने से पहले मैंने खुद आगाह किया था कि उदय प्रकाश जी को कठिनाई हो सकती है ज़ाहिर है यह वार्तालाप कार्यक्रम के पहले का था और मेरी जानकारी में उदय जी ने अब तक कहीं इसका खंडन नहीं किया है. परमानंद जी ने उसी परिचर्चा में कहा है कि जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं रचना समय नाम की एक पत्रिका में उदय प्रकाश का इंटरव्यू लेने के सिलसिले में उनसे मिलने भर गया था न कि उसमें भाग लेने के उद्देश्य से. और गोरखपुर का कोई और साहित्यकार उस समारोह में उपस्थित नहीं था, बल्कि अलग से प्रेमचंद पार्क में मीटिंग कर इसके बहिष्कार का निर्णय लिया गया था. इन सबकी रौशनी में थानवी साहब की इस अदा को क्या कहा जाना चाहिए.

खैर, बात यहीं तक नहीं. थानवी जी ने लिख दिया कि मंगलेश जी ने अब तक चुप्पी बनाई हुई है, जबकि सच यह है कि मंगलेश जी ने अपना स्पष्टीकरण मुझे मेल किया था और मैंने उसे सार्वजनिक रूप से अपनी वाल पर पोस्ट किया था जिसे अन्य मित्रों के साथ प्रभात रंजन ने भी शेयर किया था. मोहल्ला वाले अविनाश दास ने मुझसे फोन पर पूछा भी था और मैंने उन्हें यह जानकारी दी थी. जाहिर है, मंगलेश जी की चुप्पी थानवी साहब के लिए सुविधाजनक थी, अब वह थी नहीं तो गढ़ ली गयी. इसे पत्रकारिता के सन्दर्भ में गैर-जिम्मेवारी कहें या अनुदारता?

लिखने को और भी बहुत कुछ है...लेकिन यह कह कर बात खत्म करूँगा कि यह चतुराई भरा आलेख सिर्फ और सिर्फ मार्क्सवाद का मजाक उड़ाने और प्रतिबद्ध साहित्य पर कीचड़ उछलने के लिए लिखा गया है..और दुर्भाग्य से इसका मौक़ा हमारे ही लोगों ने उपलब्ध कराया है.

*इस लेख के 'रिज्वाइनडर' के रूप में छपे गिरिराज किराडू के आलेख को मैं बहसतलब मानता हूँ लेकिन फिलहाल उस पर कुछ नहीं कह रहा. उस पर अलग से लिखे जाने की ज़रूरत है और लिखा ही जाएगा.

70 comments:

  1. अशोक कुमार पाण्‍डेय ने तथ्‍यपरक और खरी बातें कही है। दरअसल जनसत्‍ता मे छपी ओम थानवी की टिप्‍पणी का शीर्षक भले 'आवाजाही के हक में' रखा गया हो, उनके सोच और बयानगी में इस आवाजाही (वस्‍तुपरक संवाद) की गुंजाइश बहुत कम है। ध्‍यान से देखें तो उनकी और गिरिराज की टिप्‍पणियां प्रकारान्‍तर से उनके जग-जाहिर
    वाम-विरोध का ही पुनराख्‍यान हैं।

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  2. आपने बहुत गहराई से हर मुद्दे की पड़ताल की है ...लेकिन मेरा कहना है कि यह आलेख व्यक्तिगत त्रुटियों को रेखांकित करने से अधिक व्यापक महत्व रखता है .ऐसे समय में जब लोग कदम कदम पर एक नया रूप धर रहें हैं ,तब यह आलेख कलई खोलने वाला है . इस बहुरुपिया समय में वैचारिक प्रतिबद्धता का महत्व कतई कम नहीं हुआ है ,इसलिए भी हमें हर 'कटघरे ' को ध्यान में रखना जरूरी है .

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  3. आपने इस आलेख में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात की है हत्यारे और उसके आइडियोलाग के सन्दर्भ में . आपके शब्दों में इसे देखता हूँ -- "मैं आइडियोलाग को अधिक खतरनाक मानूंगा. एक आइडियोलाग हजार हत्यारे पैदा कर सकता है, हजार हत्यारे मिल कर भी एक आइडियोलाग पैदा नहीं कर सकते. मुझे नहीं पता हिटलर या मुसोलिनी ने अपनी पिस्तौल से किसी की ह्त्या की थी या नहीं...मैं मुतमईन हूँ कि हेडगेवार या मुंजे या सावरकर या गोलवरकर ने किसी की ह्त्या नहीं की थी. क्या फासिस्ट विचारधारा का समर्थन करने वालों से सच में कोई सार्थक बहस संभव है? "

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  4. इस टिप्पणी में उद्धृत शमशेर बहादुर सिंह पर लिखा आलेख यहाँ है

    http://samalochan.blogspot.in/2011/08/blog-post_09.html

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  5. जरूरी हस्तक्षेप. आवाजाही बहुत अच्छी चीज़ है , लेकिन वहीं तो हो सकती है , जो सचमुच आवाजाही के हक में हों . जिहोने हुसैन जैसे जगत्प्रसिद्ध कलाकार को अपने ही देश में जीने और मरने का हक नहीं दिया , जिन्होंने गांधी जी जैसे आवाजाही के महानतम समर्थक को ज़िंदा रहने का हक नहीं दिया , जो अरुंधती और प्रशांत भूषन को बोलने नहीं देते , जो यासीन मलिक को मार -पीट कर भगा देते हैं , जब वो निहत्था अपनी बात कहने के लिए लोगों के बीच आता है , जो संजय काक की फिल्मों का निजी प्रदर्शन तक नहीं होने देते , उन के साथ आवाजाही, आवाजाही नहीं, लीपापोती है . किसी से 'रणनीतिक भूल' हो सकती है , किसी से 'गलत जानकारी के कारण निर्णय की चूक' हो सकती है ( विवाद में आये लेखकों ने यही कहा है ), लेकिन इस भूल- चूक को सराहनीय रणनीति के रूप में पेश किया जाए तो कहना पडेगा -भूल-ग़लती आज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर तख्त पर दिल के, चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक....

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  6. वाकई ......हो हल्ला की बजाये वैचारिक उदारता की ज़रूरत है जो दिन पर दिन गायब ही होती जा रही है ....एक भ्रामक लेख के जबाब में लिखा गया तथ्यपरक , खरा और ईमानदार लेख !

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  7. चालाकी छिप नहीं सकती. अशोक ने सारे प्रकरण से धूल हटाकर स्थिति साफ की है. सवाल किसी के पक्ष या विपक्ष में लिखने का नहीं, अपने स्टेंड का है. जाहिर है, यह स्टैंड कोई भी नहीं ले सकता, वही ले सकता है जिसे लेखन की ताकत पर भरोसा है. और यह भरोसा सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें कर देने से या बड़े लोगों के उद्धरण दे देने से नहीं पैदा होता, उसी में आ सकता है जो जमीन से जुड़ा हो, जो अपने समय की सच्चाई के साथ हो. अशोक का यह लेख दिल से निकला है.

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  8. साहित्य जगत में भी कितना छल-कपट भरा है यह देख कर आश्चर्य होता है ! बहुत अच्छी तरह इस कपट को उजागर किया गया है लेख में ! अशोक कुमार पांडे जी को इसके लिए बधाई !

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  9. वाह.. बेबाक और दो टूक नजरिया। दरअसल, अज्ञेय को लेकर कुछ लोग प्रगतिशील वैचारिक आधारों पर वैमनस्‍यपूर्ण हमले कर रहे हैं, इनका वाजिब प्रतिरोध जरूरी है। बधाई अशोक जी..

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  10. इस लेख के लिए दिल से बधाई आपको......हमारे यहाँ जनसता एक दिन बाद आता है ...कल ही मिला और कल ही उस लेख को देखा ...सचमुच उस लेख में चतुराई के साथ अपने समर्थन वाली बाते उठाई गयी हैं ...मंगलेश जी वाले प्रकरण पर चली बहस में से कुछ ऐसे ही कमेन्ट उठाये गये हैं , जो उन्हें सूट करते हैं | ..बाकि बाते जैसे फेसबुक पर हुई नहीं हों ....| कहने के लिए तो वह लेख आवाजाही की बात करता हैं , लेकिन स्थापनाए अपनी बातो को मनवाने और उन्हें सही साबित करने की हैं |.....अशोक ने बेहतरीन तरीके से इस लेख में अज्ञेय विवाद से लेकर विचारधारा तक के सवालों को भी रखा है ...| एक बार पुनः बधाई आपको ...

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  11. इस देश में एक ऐसा वर्ग भी है जो चीजों को सिर्फ" सही "ओर "गलत" के परिपेक्ष्य में देखता है . जो ये नहीं देखता उसे कहना वाला कौन है .किस वाद का है ? उसे प्रवीण तोगड़िया से भी उतनी नफरत है जितनी बुखारी से ,उसके लिए भगत सिंह सिर्फ भगत सिंह है मार्क्सवादी भगत सिंह नहीं , वो सुभाष चन्द्र बोस को भी प्यार करता है ओर वल्लब भाई पटेल को भी . उसके मन में विनायक सेन के लिए भी सम्मान है ओर उस क्षेत्र में काम करने वाले कलेक्टर की भी वो हिम्मत की दाद देता है ओर उन आदिवासियों के लिए वो घुटता है . उसके लिए कश्मीरी सिर्फ कश्मीर में रहने वाले मुसलमान नहीं कश्मीरी पंडित भी है वो सेना के उस शहीद जवान पर भी आंसू बहाता है ..कही भी चली गोली उसे उतना ही दुःख देती है . उसके पास शब्दों को सलीके से रखने का अदब नहीं है हुनर नहीं आर्ट नहीं है वो एक आम आदमी है रोजमर्रा की जिंदगी की ज़द्दोज़हद में उलझा हुआ पर उसने कही पढ़ा था "अदब ओर आर्ट कभी तटस्थ नहीं हो सकते . उसके लिए तटस्थता की कोई "एक तय डाईमेंशन" नहीं होती .
    बौद्धिकता जब किसी वाद के प्रति पूर्वाग्रह रखती है तो वो अपनी ईमानदारी ओर निष्पक्षता खो देती है , सीमीत हो जाती है . सरोकार के प्रति अनुशासन नहीं रख पाती. सर्जनात्मक प्रव्रति के ये इस दुर्भाग्यपूर्ण विस्थापन कहाँ जा कर रुकेगे ??
    गुंटर ग्रास की साधारण सी कविता से उपजी" आयातित क्रांति " के विमर्श कहाँ किस मोड़ पर पहुंचे है ? मुआफ कीजिये ओर बस कीजिये हिंदी का पाठक भाषा के जंगल में शब्दों से लड़े जाने वाले इन अनिर्णीत युद्दो से उब गया है .इन अहंकारो की परिणति क्या है ? .भाषाई कौशल की ऐसी जुगलबंदिया देखकर लगता है बुद्धिजीवियों में एक किस्म का रुढ़िवाद है ,?पढ़े लिखो लोगो में एक खास किस्म का" छूआ छूत "पसर गया है . बुझ जाता है उसका मन जब वो देखता है कितना "क्रत्रिम " है रचनाकार का निजी संसार ! कितना आसान है विम्बो ओर प्रतीकों से दंद ओर आत्म संघर्षो की काव्यात्मक बनावट तैयार कर कागजो में उकेरना !! कितना मुश्किल है ठीक चीजों को व्योव्हार में उतारना . क्या निजी जीवन में साहित्यकार हर झूठ बोलने वाले व्यक्ति से सम्बन्ध काट लेता है ? हर भ्रष्टाचारी इंसान से सारे सम्बन्ध तोड़ लेता है ? . क्षमा करे ऐसा लगता है हिंदी का संसार कितना छोटा है

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  12. बिना "वाद" की बौद्धिकता का एक तयशुदा वाद होता है "अवसरवाद". विचारधारा का अर्थ ही होता है विचारों का सुसंगत प्रवाह. जो सुभाष चन्द्र बोस से प्यार करते हुए अंग्रजों को भगाने की जल्दबाजी में हिटलर से लेकर मुसोलिनी और तोजो तक से गठबंधन करने के प्रयास के उनके विचलन की आलोचना नहीं कर सकता, जो वल्लभ भाई पटेल से प्यार करते हुए उनके दक्षिणपंथी भटकावों और तिलंगाना के क्रूर दमन में उनकी या नेहरु की भूमिका की आलोचना नहीं कर सकता, जो बिनायक सेन का सिर्फ "सम्मान" कर सकता है और उनके पक्ष में आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता. जिसे "कहीं भी चली गोली" बराबर दुःख देती है, बिना यह देखे कि सीना किसका है...मैं उसे अचूक अवसरवाद से भरा एक लिजलिजा और बेहद चतुर व्यक्ति कहूँगा. अगर थोड़ा सम्मान से कहें तो "भावुक अवसरवादी" कह लें. जब देश भर में बकौल अदम "अमीरी और गरीबी के बीच एक जंग" छिड़ी हो तो ऐसी सार्वजनीन आस्थाओं और भावुकताओं से आप सिर्फ कातिल की मदद कर रहे होते हैं.

    इतिहास में परिवर्तनकारी हस्तक्षेप लिजलिजी भावुकता से नहीं, अपना पक्ष तय करने से होता है. जब युद्ध चल रहा हो तो नो मैन्स लैंड में बाँसुरी नहीं बजाई जाती.

    और गुंटर ग्रास हों या ब्रेख्त या मुक्तिबोध...ज्ञान किसी एक देश की सीमा में नहीं बंधता. किसी जुकेरबर्ग की खोज "फेसबुक" और किसी अन्य की तलाश "ब्लॉग" को किसी अन्य देश की तकनीक से बने लैपटाप पर आपरेट करते हुए अपनी सक्रियता से आत्ममुग्ध लोग जब किसी कविता पर चली बहस में अपना पक्ष तय न कर पाने पर उसे "आयातित" कहते हैं तो बस उन पर हंसा जा सकता है.

    हाँ, 'पढ़े-लिखों' के प्रति उपजी इस कुंठा के स्रोत तलाशना मुश्किल है. अब कुछ लोगों की तरह सबके "निजी संसार" को देख-जान-समझ लेने का दावा तो नहीं ही किया जा सकता.

    कितना आसान है सबके लिए मानक तय कर देना - "हर भ्रष्टाचारी से संबंध तर्क कर देना, हर झूठ बोलने वाले से संबंध तर्क कर देना" क्या कहने हैं...कौन न मर जाए इस सादगी पर. कल तक हत्यारों के यहाँ आवाजाही के समर्थन में पन्ने रंग रहे अब उन आवाजाहियों पर सवाल उठा रहे हैं!

    ऐसे जबानी जमाखर्च से ओढ़े गए महान लबादों की असलियत बार-बार देखी गयी है. जब पक्ष चुनना मुश्किल हो तो ऐसी ही कुछ गोल-मोल बातें कर, कुछ वैयक्तिक लफ्फाजियाँ कर मुक्ति पा ली जाती है. अचूक अवसरवाद की ये जानी-मानी प्रविधियां हैं...

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  13. अच्छा यह है सारी बहस आवाजाही के हक में हो रही है. लेकिन आवाजाही की जैसी व्याख्या अशोक जी ने की है, वह अब तक की बहस को नई दिशा दे रही है.

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  14. इतना क्रोध किस बात का ? क्या असहमतिया संवाद का हिस्सा नहीं ? .पीड़ा यही थी की गुंटर ग्रास की साधारण सी कविता से इजराइल ओर इरान पर बहस करने वाला बौद्धिक समाज सुकुमा के कलेक्टर के अपरहण के बाद नक्सलवाद पर इतनी त्रीवता से इतनी बहसे नहीं करता ? देश के दूसरे मुख्य सरोकारों पर इतनी त्रीवता ओर तात्कालिकता से बहस नहीं करता ओर देखिये कविता से उपजी बहस किस परिणिति पर पहुँच रही है ? व्यक्तिगत स्तर पर ? पिछले तीन दिनों से एक दूसरे पर वार तलवार सब उछाले जा रहे है. क्या ये सर्जनात्मक प्रव्रति का दुर्भाग्यपूर्ण विस्थापन नहीं है ?? खैर इन "वादों "की लड़ाई से अब उब पैदा कर रही है . "बड़ो -बड़ो" के इस संवाद में अंतिम संवाद रखता हूँ .

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    1. Krodh kahe ka? aapne kuch saval uthaye badle me maine javab diye. ab krodh-vodh ka jikr kyoon? maine tark diye hain, ideological positions saaf ki hain aap unko counter kijiye. Bahas me ek-doosre ko counter nahi karenge to kyaa "vaah", "adbhut", "kyaa kahne hain" se kaam chalaayenge? yah ideological discourse hai isme vaad-prativad to honge hi. Pahle javab par hi aap itne emotional kyon ho rahe hain?

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  15. अशोक ,अनुराग. गत चार वर्षॉं मे जो गम्भीर पाठक मुझे नेट पर दिखें हैं आप दोनो उन मे सब से महत्वपूर्ण हो. एक तीसरा नाम भे जेहन मे गड़ा हुआ है संजय ग्रोवर. आप दोनो की प्रतिक्र्याओ मे मुझे एक चीज़ कॉमन दिख रही है -- लफ्फाज़ी का विरोध . और यह अजीब है कि शब्द का हर प्रेमी अंततः लफ्फाज़ी से उबरना चाहता है. खुद मैं भी . हम इसे कैसे जस्टिफाई करें ? विचार धारा को ऐसा नाम शायद इस लिए दिया गया है कि वहाँ किसी क़िस्म की परतों या पपड़ियों को जमने नही दिया जाता .... समय समय पर मंथन / निरीक्षण ज़रूरी है ..... वाद इन्ही अर्थों मे लिए संदिग्ध होते हैं. अतः मै6 समझता हूँ कि बहस वादों पर न हो सीधे विचारों पर हो ताकि विचारधारा शब्द की सार्थकता बनी रहे . ताकि प्रवाह जीवंत बना रहे . प्लीज़, कोई भी संवाद अंतिम नही हो सकता . इन प्सोटों पर आखिर हम संवाद की सम्भावनाएं ही तो तलाश रहे हैं ..... चाहे जो हो जाए ..... लफ्ज़ आज भी सब से विश्वसनीय मींज़ ऑफ कम्युनिकेशन हैं .... चर्चा जारी रहे.

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    1. agar vah agambhir hote to main unka javab hi kyoon deta? maine jo javab diya hai vah kisi gusse kii upaj nahin siidha tark hai. Unke submissions ka point to point javab.

      ek bahas me aap kya chahte hain? asahmati aate hi SWAGAT likhkar smiley bana di jaye aur apna paksh rkha hi n jaay? unhone apna paksh rakha hai aur maine apna javab diya hai. Ab un savalon ka javab dene ki jagah vah mere "krodh" par hatprabh hain to yah bata doon ki ham yahan "mitha-mitha gap, kadva-kadva thoo" karne nahi aate. Jab bahs hogi to talkh bhi hogi

      raha saval GUNTER GRASS ki kavita ka to bhaiya mere liye yah bahas gunter grass se judi hi nahin hai, maine us par ek shabd kaha hi nahi hai. mere liye yah bahas Dabral sahab ke us karykram me jane aur us par OM Thanvi tatha Giriraj ke submissions ke sath chalti hai jismen maine hastakshep kiya hai.

      maine bakayda ideological positions lin hain. Inme vyaktigat vah kaise dekh paa rahe hain yah unki samsya hai. Desh ke mukhy sarokaron par mera hastakshep unhen nahin dikhai deta to ilaj ki salah to nahin de sakta n? abhi apke blog par hi Irom Sharmila ki kavita lagi hai. baki kaa hisab kya doon aur kise doon. aur main yah saval nahi pooch raha ki saval karne vale un muddon par khud kitne skriy hain.

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    2. अजेय जी शुक्रिया ! कभी कभी तात्कालिक प्रतिक्रिया देने की आक्रामक मुद्रा वाली हड़बड़ी में हम मूल प्रश्नों को वही छोड़ देते है . विवेक इमोशन ओर ब्लाइंड फेथ का "एंटीडोट" है . खैर दो मूल प्रश्नों पर आता हूँ क्या जरूरी है हर "असहमति" को वाम / दक्षिणी टैग लगाकर देखा जाये ? क्या विचारो के पूर्वाग्रह किसी व्यक्ति को ओर अधिक इन्टोलेरेंट नहीं बनाते ?
      दूसरा प्रशन था सृजन के सामाजिक आधारों / विमर्शो के लिए इस देश में कोई समकालीन गंभीर परिस्थिति नहीं थी ? जितनी उर्जा / आवेश से पिछले तीन दिनों से इस मुद्दे पर बहसे हो रही है की फलां व्यक्ति किस समय कहाँ बैठा था /किसके साथ बैठा था उतनी प्रबद्ता /उर्जा /हड़बड़ी सामानन्तर चल रही देश की एक तात्कालीन समस्या जो सुकुमा के कलेक्टर से उपजे एक जरूरी प्रशन के कारण उपजती है उसके प्रति नहीं दिखती ? क्यों ? क्या ये रचनात्मक उर्जा का गलत दिशा में विस्थापन नहीं है ? इससे पाठको के भीतर क्या मेसेज जायेगा ?? यही कि हिंदी का धीर गंभीर दिखने वाला समाज वास्तव में कितनी उथली चीजों में उलझा है ?

      अंत में एक जरूरी बात ओम थानवी जी जब कहते है
      "लेकिन क्या ये प्रसंग सचमुच ऐसे हैं, जिन्हें लेकर इतना हल्ला होना चाहिए? क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जिसमें उन्हीं के बीच संवाद हो जो हमारे मत के हों? विरोधी लोगों के बीच जाना और अपनी बात कहना क्यों आपत्तिजनक होना चाहिए? क्या अलग संगत में हमें अपनी विचारधारा बदल जाने का भय है? क्या स्वस्थ संवाद में दोनों पक्षों का लाभ नहीं होता? यह बोध किस आधार पर कि हमारा विचार श्रेष्ठ है, दूसरे का इतना पतित कि लगभग अछूत है! पतित है तो उस पर संवाद बेहतर होगा या पलायन? क्या संघ परिवार और उसके हमजात शिवसैनिकों ने पहले ही हमारे यहां प्रतिकूल विचार या सृजन को कुचलने का कुचक्र नहीं छेड़ रखा है? असहिष्णुता की काट के लिए एक उदार और सहिष्णु रवैया असरदार होगा या उसी असहिष्णुता का जो किसी एकांगी विचारधारा या (लेखक) संघ की राजनीति से संचालित होती है? एक मतवादी घेरे में पनपने वाला समाज कितना लोकतांत्रिक होगा? दुर्भाव और असहिष्णुता का यह आलम हमें स्वतंत्र भारत का अहसास दिलाता है या स्तालिनकालीन रूस का?"
      तो मै उनसे सहमत होता हूँ .क्यों ऐसा है मंगलेश डबराल जी जैसे सम्मानित व्यक्ति को साहित्यिक समाज में आइसोलेटेड ज़ोन में फेकने कि उसी नीति के तहत माफ़ी मांगने को बाध्य किया जाता है जैसे पूर्व में उदय प्रकाश जी को किया गया था ? क्या हिंदी साहित्य में लोकतंत्र ख़त्म हो गया है ? या ये एक किस्म कि "साहित्यिक दादागिरी "नहीं है ?

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    3. थानवी जी का जवाब मैंने ऊपर दिया है.

      जिस प्रदेश में रोज आदिवासी महिलाओं के अपहरण और बलात्कार पर आपको कुछ भी बहसतलब नहीं लगता वहाँ एक अधिकारी का अपहरण आपको इतना उद्वेलित करता है? यह "वर्ग पक्षधरता" का मामला है. मुझे नहीं लगता कि उसमें कुछ इतना बहसतलब था. वहाँ एक अनैतिक युद्ध चल रहा है दोनों तरफ से. इस पर पता नहीं कितनी बार लिखा जा चुका है. वह बहस अलग-अलग स्टार पर लगातार चल रही है.

      फिर यह हम लेखकों का अपने सीनियर्स से संवाद है. मंगलेश जी हमारे सीनियर हैं. हम उनके पाठक हैं और खुद को उनकी परम्परा में मानते हैं. अगर हमें उनसे सवाल पूछना है तो पूछेंगे...अगर उन्हें यह उत्तर देने लायक लगेगा तो वह उत्तर देंगे. इसमें किसी को क्या दिक्कत? इससे उनका सम्मान कहाँ कम होता है? यहाँ कोई सामंती समाज नहीं. हम सबके उनसे व्यक्तिगत संबंध भी हैं...अपार सम्मान है और वह हमें इस लोकतांत्रिक बहस का अधिकार देता है. उदय जी को हम साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक आइकन मानते थे. उनका वह कदम हमें आपत्तिजनक लगा. हमने सवाल किया. उन्होंने जैसे रिएक्ट किया हमारा भ्रम टूटा. इस लेख में चतुर वाक्यों के सहारे जिस तरह मंगलेश डबराल और खरे को कटघरे में खड़ा कर उदय जी को मासूम बताने का खेल किया गया उसके अर्धसत्यों पर विस्तार से लिख चुका हूँ.

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  16. और थानवी जी का लेख भी देखना चाहता हूँ . लिंक मिलेगा क्या ?

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    1. Isi blog par hai mere bhai...do baar older post vala button dabaiye

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  17. From Anurodh Paswan (anurodhpaswan@in.com)
    ओम थानवी जी के लेखा ने जीवंत बहश को जन्म दिया है. थानवी जी ने बड़े सधे शब्दों में भारत की वैचारिक जगत की समसामयिक स्थिति का जिक्र किया है. तिलमिलाहट स्वाभाविक है. उन्होंने उस विचार जगत को झाक्झोप्रा है जो अभी भी मानकर चल रहा है कि वह जो सोचता है वही सही है.. आर एस एस को फासीवादी संगठन कहकर और राकेश सिन्हा को गाँधी हतारो का ideologue बताकर विमर्श करने वाले सोच समझा, अध्ययन और अनुभव में अपने आप को अदना सवित कर रहे हैं.राकेश सिन्हा ने तिन वर्षो में एक think Tank खड़ा किया है जहा वाम दक्षिण और स्वतंत्र चिन्तक ख़ुशी ख़ुशी आते जाते हैं. क्या प्रो अमिताव कुंडू को पता नहीं था कि सिन्हा संघ विचारधारा के सबसे अधिक तेज त्ररार विचारक हैं. वे भाजपा या संघ के किसी पद पर न थे न रहे हैं. जिस प्रतिष्ठान को संघ का कहा जा रहा है उसकी आयु मात्र तिन साल कि है. फिर secularist media यदि सिन्हा को TV चैनलो पर बुलाती है तो इसका कारण उनकी अपनी समझ है जो संघ कि परम्परागत paradigm से भिन्न है इसीलिए हमारे जैसे दलितों को भी वे आकृष्ट करते हैं. दिखिए उभोने अपने Facebook पर बंगारू लक्ष्मण के ऊपर क्या लिखा है? "एक दलित को सामाजिक जीवन में कितना संघर्ष कर राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाना होता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है." उन्होंने बंगारू को सन्देश दिया है कि अपने में बदलाव कर पुनः राजनितिक जीकें को जड़ी रखे. भ्रष्ट्राचार में फसे इस व्यक्ति के सामाजिक पृष्ठभूमि कि चिंता से उन्होंने ईण७ के debate कि धर बदल ड़ी थी. वामपंथी होने का मतलब यह नहीं है वह ब्र्ह्मंवादी नहीं है. ऐसे सकारो वामपंथी है जो मनुवादी सोच के निजी प्रवक्ता हैं.
    साझा मंच भारत को साझा सोच देगी . यही बात प्रतिष्ठान ने शुरू किया है. आपत्ति तो संघवालो को होना चाहिए था कि सिन्हा वामपंथियों को बुलाकर मंच दे रहे हैं! अशोक पाण्डेय ने तो सिन्हा कि बुअद्धिकता पर सवाल खाद किया है. उन्हें तो यह भी पता नहीं है कि autobiography or biography में क्या अंतर है. प्रतोश्थान के वेबसाइट पर मैंने जब देखा तो पाया कि दर्जनों वामपंथी विचारक वह गए है. फिर इन लाल इन्टरनेट आतंकवादियों को मंगलेश डबराल क्यों सुझा. वस्तुतः आपस कि खुंदक नकला जा रहा है. दूसरा संघ का थिंक टैंक प्रबल हो यह बर्दाश्त नहीं हो परः है. भारत के थिंक टैंक कि स्थिति पर इसने दो बड़ी संगोष्टी करायी जिनमे कौन नहीं आया ! उदहारण के लिए सैबल गुप्ता , अब सालेह शरीफ जो सच्चर कोम्मित्ती के सदस्य सचिव थे सब के सब आये. क्या वे सब नासमझ थे और अशोक पंडय जैसे ब्राह्मणवादी सोच के कथित वामपंथी ही समझदार हैं? क्या अभय कुमार दुबे को अब पाण्डेय जैसे लोगो से कहीं जाने के लिए गाते पास लेना होगा. हमने राकेश सिन्हा का अनुसरण इसलिए किया कि वे इमानदार बुद्धिवी है, संकीर्णता उनमे नहीं है, भले ही वाम्प्नाथियो के लिए चरित्र का महत्व नहीं हो राकेश सिन्हा अपने तर्कशक्ति, अध्ययन और सामाजिक सरोकारों के कारण कितने लोकप्रिय हिं इसका अनुमान तो लगाने के लिए ह्रदय और मष्तिष्क दोनों चाहिए. भाई पंडय जी एक सवाल आपसे है : आर एस एस के हेडगेवार ने किस स्थान पर गाँधी कि आलोचना कि है? जादा संदर्भा बता दे तो मै अनुगृहित रहूँगा . नहीं तो लफ्फाजी कर वामपंथ कि जो ईमानदारी से पढने लिखने, शोध करने कि छवि है कमसेकम उसमे तो बट्टा नहीं लगाइए महाराज .
    ओम थानवी जी ने बहस कि दिशा ड़ी है. उन्होंने मुझे भी उद्धृत किया है, मै संघ का स्वयमसेवक नहीं हूँ पर राकेश सिन्हा के साथ मानसिक रूप से जुदा हूँ. उनकी प्रगतिशील सोच में ईमानदारी है . वे सिर्फ जुबान से प्रगतिशील नहीं हैं. दक्षिण और वाम एवं स्वतंत्र विचारको के बीच बहस क्यों नहीं हो? आखिर विचारो के आदान प्रदान से ही तो रास्ता निकालता है. अगर ऐसा हो तो तमाम दलित jihdi activists मुझे भी कोसते हैं कि तुम राकेश सिन्हा के facebook पर सकारात्मक क्यों लिखते हो. तब तो उनकी बात मानकर दलित विमर्श को तमाम मनुवादियों वे जिसमे गाँधी को भी है शामिल कर लेते हैं से बचाना चाहिए. एक अच्छी पहल हुई उसे क्यों अंकुरित होने से पहले मारना चाहते हैं? राकेश सिन्हा ने जब राजनितिक पत्रकारिता पर पुस्तक लिखी तब भी कुच्छ वामपंथियों को शिकायत थी. अब तक संघ विचारक संघ के दायरे में बाद रहता था आज पहली बार सिन्हा जी मुख्यधारा में खड़े होकर अपनी बात रख रहे है. तकलीफ तो होगी ही. मुझे भी प्रतीक्षा है राकेशजी के जवाब का. उन्हें भी चुप्पी तोड़नी चाहिए. थानवी जी ने जिस बहस को जन्म दिया वह लम्बा चलेगा और रास्ता दिखायेगा.
    (i have choosen anonymous because my account is not in gmail, i wrote my dientity,)

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    1. हेडगेवार की लिखी कोई किताब उपलब्ध नहीं. हाँ उनके बयान तमाम जगहों पर हैं. गोलवरकर द्वारा उद्धृत यह किस्सा गांधी के नेतृत्व में चलने वाले आंदोलन के प्रति हेडगेवार के रवैये की एक झलक देता है

      ‘रोज़मर्रा के कामों में हमेशा उलझे रहने की ज़रूरत के पीछे एक और कारण है। देश में समय-समय पर विकसित होने वाली स्थितियों के कारण लोगों के दिमाग़ में कुछ बैचैनी बनी रहती है। 1942 में ऐसी ही उथल-पुथल थी। उसके पहले 1930-31 का आंदोलन (असहयोग आंदोलन) था। उस समय कई दूसरे लोग डाक्टर जी के पास गये थे। इस प्रतिनिधिमण्डल ने डाक्टर जी से अनुरोध किया कि यह आंदोलन स्वाधीनता दिलायेगा और संघ को भी पीछे नहीं रहना चाहिये। उस समय जब एक सज्जन ने डाक्टर जी से कहा कि वह जेल जाने को तैयार है तो डाक्टर जी ने कहा, ‘ज़रूर जाइये। लेकिन फिर आपके परिवार का ख़्याल कौन रखेगा? उस सज्जन ने जवाब दिया, ‘मैने न केवल दो वर्षों तक घर चल जाने लायक अपितु आवश्यकतानुसार आर्थिक दण्ड के भुगतान की भी पर्याप्त व्यवस्था कर दी है।’ इस पर डाक्टर जी ने उनसे कहा, ‘अगर आपने पर्याप्त धन की व्यवस्था कर ली है तो दो वर्षों तक संघ का कार्य करने के लिये आ जाईये।’ घर लौटने के बाद वह सज्जन न तो जेल गये और न ही संघ कार्य करने के लिये आगे आये। (देखें ‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’, खण्ड-4, पेज़-39-40, प्रकाशक- भारतीय विचार साधना, नागपुर, 1981)

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    2. संघ के प्रमुख सिद्धांतकार गोलवरकर के कुछ आप्त वचन दिए दे रहा हूँ, सन्दर्भ सहित जो उनके दलितों के प्रति "गैर ब्राह्मणवादी" अप्रोच को स्पष्ट करता है

      ‘***आजकल संकर प्रजाति के प्रयोग केवल जानवरों पर किये जाते हैं। लेकिन मानवों पर ऐसे प्रयोग करने की हिम्मत आज के तथाकथित आधुनिक विद्वानों में भी नहीं है। अगर कुछ लोगों में यह देखा भी जा रहा है तो यह किसी वैज्ञानिक प्रयोग का नहीं अपितु दैहिक वासना का परिणाम है। आइये अब हम यह देखते हैं कि हमारे पुरखों ने इस क्षेत्र में क्या प्रयोग किये। मानव नस्लों को क्रास ब्रीडिंग द्वारा बेहतर बनाने के लिये उत्तर के नंबूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया और एक नियम बनाया गया कि नंबूदरी परिवार का सबसे बड़ा लड़का केवल केरल की वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र लड़की से शादी कर सकता है। एक और इससे भी अधिक साहसी नियम यह था कि किसी भी जाति की विवाहित महिला की पहली संतान नंबूदरी ब्राह्मण से होनी चाहिये और उसके बाद ही वह अपने पति से संतानोत्पति कर सकती है। आज इस प्रयोग को व्याभिचार कहा जायेगा, पर ऐसा नहीं है क्योंकि यह तो पहली संतान तक ही सीमित है (देखें, आर्गेनाइज़र के 2 जनवरी 1961 के अंक का पेज़ 5...गोलवरकर के ये महान विचार खुले तौर पर केरल की महिलाओं और समाज के लिये अपमानजनक होने के बावज़ूद आर एस एस के मुखपत्र आर्गेनाइज़र में ‘क्रास ब्रीडिंग में हिन्दू प्रयोग’ के नाम से प्रकाशित हुए थे।[69] हालांकि हाल के दिनों में आर एस एस ने गोलवलकर की इस थीसिस को छिपाने की कोशिश की। इसने जब 2004 में श्री गुरुजी समग्र नाम से गोलवलकर के समस्त कार्यों को 12 खण्डों में प्रकाशित किया तो उनके भाषण के इस हिस्से को छोड़ दिया। खण्ड पांच (आइटम नं 10) में पेज़ 28-32 में यह भाषण संकलित है लेकिन वे दो पैराग्राफ हटा दिये गये हैं जिनमें गोलवलकर की पुरुष वर्चस्ववादी थीसिस है। दुर्भाग्य से वे पुस्तकालयों से आर्गेनाइज़र की पुरानी प्रतियां हटा पाने में सक्षम नहीं हो पाये हैं। ऐसा लगता है कि आर एस एस अब भी समझता है कि वह हमेशा और हर आदमी को उल्लू बना सकता है। आश्चर्यजनक रूप से गोलवलकर ने अपना यह नस्ली, अमानवीय, स्त्री विरोधी और समानता विरोधी दृष्टिकोण अनपढ़ों या गुण्डों की किसी भीड़ के आगे नहीं बल्कि गुजरात के एक प्रमुख विश्विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों की एक श्रेष्ठ सभा में प्रस्तुत किया। वस्तुतः, आर्गेनाइज़र में छपी रिपोर्ट के अनुसार सभागृह में पहुंचने पर उनका स्वागत एक अत्यंत प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री डा बी आर शेनाय द्वारा किया गया)

      **हिन्दू राष्ट्र एक ऐसी जगह होगी जहां लोग ख़ुद को वर्णों और आश्रमों से समृद्ध करेंगे, यानि समाज के हिन्दू ढांचे को अपनाते हुए, हिन्दू नियमों को मानते हुए, संक्षेप में हिन्दू धर्म और संस्कृति को अपनाते हुए- (देखें, गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच आफ़ थाट्स’ का पेज़-54-55, प्रकाशक- साहित्य सिंधु, बेंगलोर- 1996)

      ***‘हम इतिहास से यह जानते हैं कि हमारे उत्तर पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी इलाक़े, जहाँ बौद्ध धर्म के प्रभाव से जाति व्यवस्था बाधित हुई, आसानी से मुसलमानों के घातक प्रभाव में आ गये…लेकिन दिल्ली के आसपास के क्षेत्र जो बहुत पारम्परिक माने जाते हैं और जहाँ जाति बंधन बहुत कठोर हैं, कई सदियों तक मुसलिम सत्ता और धर्मांधता के केन्द्र बने रहने के बावज़ूद प्रभावी रूप से हिन्दू ही बने रहे। (एन एल गुप्ता की किताब ‘आर एस एस एण्ड डेमोक्रेसी’ के पेज़ 17 में उद्धृत, प्रकाशक –सांप्रदायिकता विरोधी समिति, नई दिल्ली)

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    3. कुछ और आप्त वचन उनकी विचारधारा और हिटलर के प्रति उनके सम्मान को साफ़ करने वाले

      **‘दुनिया केवल शक्तिशाली की पूजा करती है। पिछले युद्ध के पहले जब इंगलैण्ड शक्तिशाली था तो हमारे लोगों ने उसकी नक़ल करने और स्तुति करने की कोशिश की। लेकिन युद्ध के दौरान जब कुछ समय के लिये यह लगा कि ज़र्मनी जीतने वाला है तो वे हिटलर और यहां तक कि नाज़ीवाद की भी प्रशंसा करने लगे। हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो उन दिनों एक प्रशंसात्मक भाव से छिपकर अपने रेडियो पर ज़र्मन समाचार सुनते थे और अब हिटलर और नाज़ीवाद की भर्त्सना में सबसे आक्रामक हैं। बमुश्किलन दो हफ़्ते के ज़र्मन आक्रमण के भीतर फ्रांस की हार की ख़बर से वे कितने उत्साहित थे!…दुनिया ऐसी ही है। कोई कमज़ोर की आवाज़ पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता। बहुत समय पहले हमारे पुरखों ने यह घोषणा की थी कि गरीबों और कमज़ोरों की आकांक्षाये बस हवाई क़िले हैं (देखें, गोलवलकर की किताब ‘बंच आफ़ थाट्स’ के प्रथम संस्करण का पेज़-270)

      ***ज़र्मन जाति की चर्चा आज हर जगह है। अपनी संस्कृति और नस्ल की शुद्धता को बनाये रखने के लिये उसने अपने देश को सेमिटिक (सामी) नस्ल के लोगों यानि यहूदियों से स्वच्छ कर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। वहां नस्लीय गौरव के उच्चतम रूप की अभिव्यक्ति हुई है। ज़र्मनी ने यह भी सिखाया है कि कैसे जड़ तक विभिन्नता वाली नस्लों और संस्कृतियों को एक एकीकृत समग्रता में समाहित करना बिल्कुल असंभव है। यह हिंदुस्थान के संदर्भ में हमारे लिये सीखने और लाभ उठाने के लिये अच्छा अध्याय है। (देखें गोलवलकर की 1939 में नागपुर के भारत पब्लिकेशन से प्रकाशित किताब ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाईण्ड’ का पेज़ 35)

      और इन सबके बावजूद (और भी बहुत कुछ के ) आदरणीय राकेश सिन्हा जी ने अपनी किताब श्री "गुरुजी एण्ड इण्डियन मुस्लिम्स’, प्रकाशक- सुरुचि, दिल्ली-2006" में गोलवरकर को डिफेंड किया है !!!!

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    4. चाहें तो "अपने"ही किसी साथी (सी पी भिषिकर) का लिखा यह पीस भी पढ़ लें

      "The Nagpur session of the Congress at the instance of Gandhiji passed a resolution extending full support to the Khilafat movement. Hedgewar was opposed to the policy pursued by Gandhiji of overemphasizing the importance of Muslim participation in freedom struggle even to the extent of diluting the national appeal. He also made his mind known to Gandhiji. He laid great stress on the use of the term, ‘Poorna Swaraj’ in the political parleys."

      स्रोत

      http://www.google.co.in/url?sa=t&rct=j&q=&esrc=s&source=web&cd=33&ved=0CDAQFjACOB4&url=http%3A%2F%2Fwww.bauddhik.org%2FDr.Keshav%2520Baliram%2520Hedgewar%2520-%2520A%2520life%2520Sketch.doc&ei=YfafT85dg_itB5O0wcgB&usg=AFQjCNETKTLnbiz1hmZAHFaRpasn1fcPGQ&sig2=m7HSivBAoorVYPiKrrK6Zw

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  18. ashok bhai, ek shandar aur sarthak aalekh padhvaaya. isse ek achchi bahas ki shuruat bhi hui hai, jo jari rahni chahiye. kuchh behtar samne aayega.
    baharhaal kala ke sath samsya yah he ki wo kisi jamane me rajyasrya ke bharose thi aur aaj bhi uske badle hue form me... usi ke bhrose hai. matlab yah hai ki kala dikhne aur bikne wali saflata ke aanchal me basati hai. kalavadiyoN k sath bhi yahi samasya hai.

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  19. अशोक अपने ही रीजैंडर पर कितनी टिप्पणियां लिखेंगे? क्या ओम थानवी के लिए काम करने लगे हैं? कुछ और लिखने पढने का काम भी करो भाई. थानवी जी ऐसी अगन लगाईं है कि जो देखो आहुति दिए जा रहा है. जिन्हें बोलना चाहिए वो सब मुंह सिल कर बैठे हैं. जसम कहाँ गया. एक जन मंगलेश डबराल के हक में नहीं बोल रहा आवाजाही के हक़ में ना सही.

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  20. Manushi write: Start jihad against Rajendra Yadav his Hans published report of IPF programme carried even photograph of pooja Khillan the speaker and Dabral. mentioned rakesh sinha in its latest issue. Very sad for you people, After Thanvi ji and Darrak now you start abusing Yadav. dare it!! he is not dabral or Thanvi, he woill retrort you ,cowards.-Manushi

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  21. Manushhi: Congratualations Burnawal saheb for taking all precautions from a person. who has been descrinbed by your ilk as 'ideologue of murderers". Go ahead. don't go to IPF and meet rakesh sinha , it will definitely damage your career. after the NDA or BJP will come to power, i hope you will migrate from India since you have to mneet many RSS people who will then in government.
    why I admire Rakesh Sinha is his modest appraoch. he does not look like a director. he meet even a common and junior scolar with the same warmth and pay respect to him. the person who takes class in Communist Party of India's study circle known as party school has been engaged in one of projects of IPF. I can tell his name. he is professor in a prestigious school. Gyanendra Pandey , editor Lok sabha TV is also doing project, and soon a marxist professor from JNU is going to accept a project. A pro CPI(ML) filma maker exhibited his film Aranya rodan at IPF programme on Forest rights of tribals in which I was present. sinha opposed unequivocaly the vedanta and corporate houses, he one of lectures in front of RSS leaders and some Marxists like Shaibal Gupta, Memman mathew, the ediotr HT Patna edition, criticised BJP government sin hhttisgarh, jharkhand for not taking radical steps to improve the consition of tribals and giving permission to corporate houses to plunder the resources of these regions.Never visit IPF never meet rakesh Sinha , you will be awarded with big gold medal. manushi manushi29@gmail.com

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  22. manushi: Ashok Pandey , dont show your ignorance in public. you at one place write rakesh sinha wrote "autobiography" of Hedgewar (although you should at least know there is difference between autobiography and biography and sinha wrote the latter) and on the other place you write there is no book on Hedgewar. shameful. its a psychological disease when a person does contradictory things without unconsciously.--Manushi

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    1. you must know that there is a difference between "here is no book on Hedgewar" and "here is no book written by Hedgewar (हेडगेवार की लिखी कोई किताब उपलब्ध नहीं. )

      now you must see who is suffering from a "psychological disease" :)

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  23. यह हिन्दी की दुनिया है मैडम. यहाँ राजेन्द्र यादव हों कि नामवर सिंह...किसी को बख्शा नहीं जाता है. यह किसी फासिस्ट का घर नहीं, लोकतांत्रिक स्पेस है. यहाँ उन लोगों की कैसी-कैसी आलोचना हुई है, आप शायद नहीं जानती. राजेन्द्र यादव से हंस के कार्यक्रम में सीधे पूछा गया था भाजपाई मुख्यमंत्री निःशंक की कहानी छापने के फैसले के बारे में. हाँ, ओम थानवी जी को भी सिर्फ तरुण विजय का कालम छापने के लिए कोई भाजपाई नहीं कह रहा. यह हम लेखकों का अपने सीनियर्स से संवाद है. आपको इतनी दिक्कत क्यों हो रही है?

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  24. tell any contribution of your in journalism, literature, social service, intellectual debate except abusing other5s. frustrations are visible in your writing. it seems that your behaviour even among your own friends and family are reflctive of your writings.started abusing Prof Sinha, then Thanvi , then putting words in the mouth of Dr Hedgewar, and misquoting Golwalkar (taking help from others writings available on internet) Read at least some books. prove the meaning of being Ashok Pandy don't make your life as abusers. -Manushi

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    1. अपने गुरु को बचाने के लिए कितना झूठ बोलेंगी? एक तो ऊपर पकड़ा ही जा चुका है. मुझे आपसे या सिन्हा साहब से सोशल वर्क या लेखन का सर्टिफिकेट लेना है क्या जो यहाँ अपना बायो डाटा पेश करूँ? आप हिन्दी के लेखक जगत और लेखन के बारे में कुछ नहीं जानतीं तो मैं क्या करूँ? आप तिलमिलाई हुई हैं कि मैंने राकेश सिन्हा ही नहीं हेडगेवार से लेकर गोलवलकर का सच सामने रख दिया. वह भी उनकी मूल किताबों से कोट करके और अब जब कोई जवाब नहीं सूझ रहा तो बिलकुल असली संघी की तरह गोलमोल झूठ का सहारा ले रही हैं. मेरी ज़िंदगी की चिंता न करें. अगर आप सचमुच कोई हैं, तो एक चेले की तरह जिंदगी बिताने की जगह बेहतर हो कि अपनी आँखें खोल के दुनिया को देखें.

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    2. if you are using the term like chela it is realy objectionable, i being part of once AISF learnt that in discussion we should not use derogatory language , you are hurting women and trying tooust me from debate by calling me chela. it is really shocking. just I asked your contribution what is wrong in it? you are in public doamin, you have right to ask my contribution , i can send my papers , booklets, my work in NGOs. did you read the most authentic book on Hedgewar by Rakesh Sinha ? No , then you don't have right to make observation on Hedgewar. Where did he criticise gandhi? Sinha quoted central provinces newspaper of 1922, Hedgewar was the chief guest in Gandhi Jayanti organised by the Provincial Congress when Tilakites were attacking Gandhi for his failure in khilafat movement. hedgewar differed with BS Moonje and co. and historic onversation between Gandhi and Hedgewar in 1934 shows respect for each other. but you are trying to malign me and pl apologise or face consequences. -Manushi

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    3. "चेला" derogatory है? जहाँ गोलवलकर को "गुरु जी" कहा जाय वहाँ "चेला" derogatory कैसे है? और रहा सवाल धमकी का तो मुझे स्वीकार है. आप जो चाहें कर सकती हैं. आप एक झूठे आरोप के साथ के मुझे "psychological disease" से पीड़ित बताएं और मेरे चेला कहने पर इतना दुःख!!

      हाँ, मैंने क्या पढ़ा है-क्या नहीं, इसकी सूचना आपके पास कैसे पहुंची? मेरी लिखी किताबें बाज़ार में हैं और मैं सबको अपना बायो डाटा दिखाता नहीं फिरता. आपको नहीं पता है तो आपकी समस्या है. इस पोस्ट में प्रभात रंजन द्वारा लिखा परिचय हवा में पैदा नहीं हुआ है.

      मैंने भी गोलवलकर सहित तमाम "ओरिजिनल" किताबें कोट की हैं. जहाँ हेडगेवार गांधी के स्टैंड्स के खिलाफ खड़े हैं. साथ ही तमाम मुद्दों पर गोलवलकर के स्टैंड्स भी दिए हैं. उन पर आपकी चुप्पी क्यूं है? 1934 के हेडगेवार-गांधी के कथित संवाद पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. ज़रा सिन्हा साहब की किताब के अलावा भी कुछ पढ़ा कीजिए. उनके निजी सचिव प्यारे लाल ने अपनी किताब "महात्मा गांधी - "द लास्ट फेज" में लिखा है , "गांधीजी की टोली के एक आदमी ने रोककर कहा कि आर एस एस के लोगों ने शरणार्थी कैम्प में बहुत अच्छा काम किया है. गांधी जी ने उत्तर दिया , लेकिन भूलो मत कि हिटलर के नाज़ी और मुसोलिनी के फासिस्ट भी ऐसे ही थे. गांधी जी ने आर एस एस को 'निरंकुश दृष्टिवाला एक साम्प्रदायिक संगठन कहा था". तो आप द्वारा कोट की गयी हेडगेवार-गांधी बातचीत का सोर्स सिर्फ आर एस एस की कहानियाँ हैं. उनका कोई आधार नहीं. गांधी जी या किसी अन्य ने उसका कोई ज़िक्र नहीं किया है. संघी झूठों के और उदाहरण चाहिए तो मधु लिमये का सेकुलर डेमोक्रेसी में २ मार्च १०७९ का लिखा लेख पढ़ लें. सुभाष चन्द्र बोस को लेकर भिशीकर (केशव : संघ निर्माता) और जी एम हुद्दर (इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इंडिया, अक्टूबर 7, 1979) को आपने-सामने रख कर देख लें...यह सूची इतनी लंबी है कि क्या कहा जाए!

      खिलाफत आंदोलन पर हेडगेवार का स्टैंड गोलवरकर की किताब "द मैं एंड हिज मिशन" के पेज २४-२५ पर है -

      "डाक्टर जी ने सोचा, यह 'खिलाफत' है या 'अखिल आफत'...."(यह)सिद्ध हो गया कि भारत में हिन्दू ही राष्ट्र है और हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है. यथार्थ की ओर से आँखे मूंदने वाले विचारकों ने राष्ट्र की वास्तविक राजनीतिक वास्तविकता को देखने से इनकार कर दिया, लेकिन यथार्थवादी डा हेडगेवार स्वप्न जगत में विचरण करने वाले जीव नहीं थे. सत्य प्रकट हो चुका था. हिन्दू ही हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कर सकते थे. हिन्दू संस्कृति की रक्षा वे ही कर सकते थे. देश को हिन्दू शक्ति ही बचा सकती थी. तथ्य यही बता रहे थे. व्यक्तिगत चरित्र और मातृभूमि के प्रति अखंड प्रेम के आधार पर हन्दू युवकों को संगठित करना ही था. महान आत्मा की पीड़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के रूप मके अभिव्यक्त हो उठी. पांच मित्रों के साथ उन्होंने आर एस एस का दैनिक कार्यक्रम शुरू किया."...............तो खिलाफत आंदोलन और उसके समर्थक गांधी जी के प्रति हेडगेवार और संघ का अप्रोच जो है वह सामने है. अब गोलवरकर झूठ बोल रहे थे या फिर आप या...यह आप तय कर लें.

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    4. सुधार - गोलवरकर की किताब "द मैं एंड हिज मिशन" की जगह 'द मैन एंड हिज मिशन" पढ़ें

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  25. इस लेख के लिए दिल से बधाई आपको....

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  26. no body is answering about Hans patrika and Rajendra Yadav who published IPF news and mentioned Rakesh Sinha .what is your plan for him?issue lal fatawa!!Manushi

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  27. Mr pandey, you are illiterate, not knowing anything, quoting irrelevent protion, if you stand on your word and calling me chela of Rakesh sinha in a very dergatory manner then I will take legal recourse. Are you accepting? You made a gender remark. it is a very serious issue .-Manushi(manushi29@gmail.com)

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    1. चूंकि मेरे किसी सवाल का आपके पास जवाब नहीं है तो आपकी झल्लाहट स्वाभाविक है. मैंने पहले भी कहा है और अब भी कह रहा हूँ कि आप जो चाहें कर सकती हैं. ऐसी धमकियों से डरने वालों में मैं नहीं हूँ.

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    2. मानुषी जी ! पहले ऊपर अशोक जी द्वारा दिए गए तर्कों और सन्दर्भों की काट खोज के लाइए फिर उन्हें अनपढ़ साबित कीजिये ! आप स्त्री हैं इसका मतलब ये नहीं कि किसी गंभीर बहस में आपको केवल स्त्री होने की वजह से छूट प्रदान की जाय ! बहस कीजिये, बहस !

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  28. क्या दलील है अशोक कुमार जी! गुरु कहा तो चेला भी कहा जा सकता है. किसी को पुलिस कहोगे तो उसे तुमको चोर कहने की छूट मिल जायेगी?

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  29. @ pandey you are anti women and also anti dalit. the way u justified you bad intentionally written terms and firmly stands on that leaves me with no option but to take legal recourse.

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  30. above comment is not a threat but a protest against attack on gender. -manushi

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  31. आप सौ बार लिखेंगी तो मै डर नहीं जाउंगा. आप बिलकुल कोर्ट में आइये...स्वागत है. दलित और स्त्री विरोधी संघ के गुरुजी गोलवलकर साहब के वे आप्त वचन हैं जिन्हें यहाँ पोस्ट कर दिए जाने से आप बौखलाई हुई हैं. अब संवाद कोर्ट में ही होगा. यहाँ कमेन्ट दर कमेन्ट धमकियों से नहीं.

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  32. मानुषी जी ! तर्क करिए ! मैं देख रहा हूँ कि अशोक जी परस्पर सन्दर्भों और कोट के साथ बात कर रहे हैं और आप तर्क की जगह व्यक्तिगत हमले कर रही हैं ! सवाल ये उठता है कि आखिर क्यूँ ?? ऐसे में यदि कोई आपको राकेश सिन्हा का चेला कहे तो क्या बुराई है ? बहस कीजिये, बहस ! बच्चों की तरह रुठिये नहीं !

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  33. कोई भी मोहतरमा पुरुष वर्चस्व वाले समाज में केवल तभी धम्की दे सकती है जब उसके पीछे निहित स्वार्थ में लिपटे पुरुषों का समूह हो और जो कायर हो । महिला जब सही बात पर अड़ती है तो या तो गार्गी होती है या फूलन देवी । धमकी देनेवाले लड़ते नहीं इस्तेमाल होते हैं या करते हैं ।

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  34. आप जो भी हें मानुषीजी स्त्री या पुरुष अव्वल तो आप फेक हें एक झूठे इंसान को बोध्हिक बहस में भाग लेने का कोई हक नहीं संघियो की ये आदत हें शिखंडियो की तरह लदानी की में अशोक जी के साथ हूँ ,,आपकी आपतियो को ख़ारिज करता हूँ पहले आप अपनी पहचान के साथ प्रकट हो .

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  35. माननीय मानुषी जी जो जी में आये बोले जा रही है बिना जानकारी के. बहस की तमीज़ ही नहीं है आपमें. राजेंद्र जी से मैंने ही पूछा था हंस के कार्यक्रम में निशंक की कहानी को लेकर. इस बारे में भी बहस कर लिया जायगा. वैसे राकेश सिन्हा का हमारे लिए इतना महत्व है नहीं. मुझे तो लगता है राकेश सिन्हा ही लिख रहा है इसकी तरफ से . बोखलाहट से तो यही लगता है. आप भी अशोक भाई गीदर भभकी को इतना सीरियसली लेते हैं.

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  36. मानुषी जी चेला शब्द में जेंडर बायस नज़र आ रहा हो तो उसे चेलिन पढले ......शिष्यत्व पढ़ ले disciple पढ़ ले ......और दो चार मुकदमा इन् शब्दों पे आपत्ति हो तो और ठोंक दे .....हाँ गुरु चेला और पुलिस चोर का सादृश्य निरूपण ठीक नहीं है मेरी कमअक्ली पे ध्यान न दीजियेगा ...किसी विद्वान या राकेश सिन्हा जी से ही पूछ लीजियेगा ............की ये अनोलोजी दुरस्त है या नहीं

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  37. भाई लोगों और बहनों, इस अंतहीन बहस को विराम दीजिए अब. अगर आप सीरियसली कुछ बहस करना चाहते हैं तो जानकी पुल के लिए लेख लिख दीजिए. व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से क्या हासिल होता है? शब्दों का संयम बना रहे तभी बहस का आनंद है. आप सब लोगों से सविनय निवेदन है.

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  38. यह ऊपर anonymous और नीचे एक नाम क्या है और किसका व्यक्तित्व है समझ नहीं पा रहा हूँ. अपने संस्कृत - हिन्दी के सारे ज्ञान/ अज्ञान के बावजूद " चेला " शब्द का जेंडर बायस भी मेरी समझ से बाहर है. बहस तथ्यात्मक तो हो सकती है लेकिन जहां बहस का स्थान धमकियां लेने लगें वहाँ किसी सार्थक बात की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? ऐसे बहस अंतहीन है और इसे आगे चलाने का कोई लाभ नहीं है.

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  39. kya bakwaas laga rakhee hai yaar, histroy padhee hai Ashok Babu, kewal 100 saal puranee nahee hai, shuru se padho, pichle 1000 saalon ka itihaas (The Mughal World by Ebrham Early)bakwaas karnaa band kar doge khud hee

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  40. I just read this whole futile and contemptuous post and ongoing comments. Let me clear it forever, Mr. Pandey ji that I've never received any 'puraskaar' (award) on the first first death anniversary of my close cousin. It was accepting a memento (in Hindi usually called 'sammaan').
    Secondly, you Mr. Pandey quote a Hindi news paper (edited certainly by your own kin and caste) to validate your 'accusations' and (strangely) you also quote Yogi Adityanath's statement as a preferred authentic source to prove me again communal. Don't you frankly agree that this all was an organized assault on an author, who had just made a mistake - 'attending a 'barakhi'.
    Thirdly, entire Indian society is not that way absolutely 'politicized' as you think. People still attend funerals, cremations, marriages etc. without being aware what are the political interpretations and consequences of it.
    Fourthly, can you cite another incidence where more than 60 (actually 66) Hindi writers came out for condemnations without even asking or calling me about the truths and so on.
    Fifth, persistent lies, contained with hatred and contempt against anyone, is a proven sign of 'Fascists' ....
    And that you all are !! There is no reason to doubt it so far...!
    You keep on carrying hate campaign, and we'll keep on encountering it. I know, Hindi as a language belongs to you, and certainly I'm an outsider, but I've strong believe that finally it's the truth, which prevails.
    Here, I stand and express my solidarity with Om Thanvi. (Now think with your mind that I want some favor from him!)
    ----Uday Prakash
    (I use 'anonymous' as I don't have a 'google account' opened here)

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    1. I have posted an answer on my fb wall, with the scan copies of paper cuttings. and your translation of SAMMAN as MOMENTO is really "original" :)

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  43. हमे भी कुछ कवियों से "घिन" आती है, इसका हमे हक है.. वाह! अशोक भाई! बहुत बड़ी, सही और आइने दिखानेवाली बात कह दी है आपने..

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  44. ओम थानवी जी का पूरा लेख epaper 22 april के जनसत्ता पर पढा जा सकता है।

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  45. http://jantakapaksh.blogspot.in/2012/06/blog-post_13.html

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