क्या सचमुच लेखक की भूमिका भौंकते हुए कुत्ते सरीखी है?

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साहित्यिक पत्रिका ‘तद्भव’ द्वारा लखनऊ में 2122 अप्रैल को सेमिनार का आयोजन हुआ, जिसमें आदरणीय नामवर सिंह और श्री काशीनाथ सिंह के वक्तव्यों को लेकर बड़ा बवाल हुआ. नामवर जी ने कहा कि सत्ता के समक्ष साहित्यकार की हैसियत कांता यानी जोरू जैसी है तथा काशीनाथ जी ने कहा कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुँह  ऊपर उठाकार भूंकता हुआ कूकुर है. इन्हीं बयानों के सन्दर्भ में प्रसिद्ध लेखक शिवमूर्ति ने वक्तव्य दिया. प्रस्तुत है उसी वक्तव्य का एक सम्पादित अंश- जानकी पुल
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……प्रथम सत्र में बोलते हुए डा. काशीनाथ सिंह ने कहा कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुँह  ऊपर उठाकार भूंकता हुआ कूकुर है। सुनकर मैं सकते में आ गया हूं। क्या सचमुच लेखक की भूमिका भौंकते हुए कुत्ते सरीखी है?  पहले पता चल गया होता तो इस योनि में प्रवेश से बच सकता था, लेकिन तब तो उसी बनारस से कहे गये प्रेमचंद का कथन सुनने को मिल रहा था – साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। अब कह रहे हैं….

साहित्कार को मैं प्रथम श्रेणी का व्यक्ति नहीं मानता। प्रथम श्रेणी में उनको गिनता हूं जो जीवन संघर्ष में सीधे-सीधे उतरते हैं। जनहित के लिए आन्दोलन प्रदर्शन करने वाले, हाथ पैर तुड़वाने, लाठी गोली खाने वाले। साहित्यकार को मैं द्वितीय श्रेणी में रखता हूँ। वह अपने कमरे में सुरक्षित बैठ कर लिखता है। लेकिन भाई, वह कुकुर भी नहीं है। कुत्ता वह तब होता है जब पद-पुरस्कार के लिए छुछुआता घूमता है। चरण-चापन करता है। जोर जुगाड़ करता है। लेकिन अभी भी बहुत से लोग ऐसा नहीं करते। इसलिए पूरी साहित्यिक बिरादरी को कुत्ता कहना मैं ठीक नहीं मानता। डा.काशीनाथ सिंह से मेरा अनुरोध है कि यहाँ तो कह दिया, और कहीं मत कहिएगा।

                कल के सत्र में डा. नामवर सिंह ने किसी पुराने ग्रन्थ का हवाला देते हुए कहा कि सत्ता के समक्ष साहित्यकार की हैसियत कांता यानी जोरू जैसी है। कहा कि जैसे शाम को साथ बैठने का मौका मिलने पर पत्नी पति से चिरौरी करती है- जरा यह काम भी देख लीजिए। और पति अवहेलना से कहता है- ठीक है, ठीक है। देख लेंगे। उसी तरह साहित्यकार भी…

                सत्ता या बादशाह के सामने साहित्यकार की हैसियत पुराने जमाने में रही होगी कांता या जोरू की। तब राजाश्रय की जरूरत रहती थी। वैसे उस समय भी तुलसीदास, कबीरदास जैसे साहित्यकार थे जो राम के अलावा प्राकृत जन की बहुरिया, कांता या मनसबदार बनना स्वीकार नहीं किए। कुछ आज भी होंगे जो कांता बनने में सुरक्षा मानते हों, लेकिन ऐसे लोगों को साहित्यकार की श्रेणी में रखना उचित होगा या चारण की?

                साहित्कार की भूमिका प्रतिपक्ष की मानी जाती है। वह सीधे-सीधे क्रान्ति भले न करता हो लेकिन अपने लेखन से परिवर्तन के लिए जमीन तैयार करता है। समाज में प्रगतिशील मूल्यों को कल्चर करता है। ऐसे समय में जब समाज में अविश्वास, भय और हिंसा बढ़ रही है, ‘स्टेटकी बर्दास्त की क्षमता शून्य हो चली है, प्रतिपक्ष के रूप में उसकी भूमिका दिनोदिन चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। और जब तक वह इन चुनौतियों से  दो-दो हाथ करने को तैयार है,  न किसी की जोरू हो सकता है न किसी का कुत्ता।
शिवमूर्ति
9450178673

8 COMMENTS

  1. नामवर जी या काशीनाथ जी की बातों पर चि‍ढ्ने वाले मित्रों से अनुरोध है कि‍ वे लेखको और साहि‍त्‍य के बारे मे कही जाने वाली बडी बडी बातों की खुश्‍फहमी से जरा बाहर नि‍कलें और सोचें कि‍ लेखक की आवाज या उसका लि‍खा हमारे समाज में क्‍या हैसि‍यत रखता हैा नामवर जी बडे आलोचक हैं वे अगर सि‍दद्धान्‍त जानते हैं तो हकीकत भी उनकी नजर के सामने हैा ऐसा कह सकने का साहस वही कह सकता है जो अपनी भाषा के लेखन और लेखकों की दशा पर गहराई से चि‍न्‍तन करता होा काशीनाथ जी ने जि‍स रूपक की रचना की है वह हमारे लेखकों की वस्‍तुस्‍ि‍थति‍ को और सुदंर ढंग से उपस्‍ि‍थत करता हैा

  2. नामवर जी या काशीनाथ जी की बातों पर चि‍ढ्ने वाले मित्रों से अनुरोध है कि‍ वे लेखको और साहि‍त्‍य के बारे मे कही जाने वाली बडी बडी बातों की खुश्‍फहमी से जरा बाहर नि‍कलें और सोचें कि‍ लेखक की आवाज या उसका लि‍खा हमारे समाज में क्‍या हैसि‍यत रखता हैा नामवर जी बडे आलोचक हैं वे अगर सि‍दद्धान्‍त जानते हैं तो हकीकत भी उनकी नजर के सामने हैा ऐसा कह सकने का साहस वही कह सकता है जो अपनी भाषा के लेखन और लेखकों की दशा पर गहराई से चि‍न्‍तन करता होा काशीनाथ जी ने जि‍स रूपक की रचना की है वह हमारे लेखकों की वस्‍तुस्‍ि‍थति‍ को और सुदंर ढंग से उपस्‍ि‍थत करता हैा

  3. At least its correct for Hindi sahitya, hindi belt and salaritariat intellectuals. … The whole hindiwallas' lot is undeserving ,overhyped, outdated n nonsensical . At best their position is similar to lalu , mulayam ,mayawati, left leaders who has some following for illegitimate reasons. Patronage politics, favour-ism, cheap populism will always have some supporters in a poor , uninformed ,self seeking ghetto society…

  4. भूमिका स्वरूप कहूँ तो नामवर जी के साहित्यिक विश्लेषणों और विचारों से अधिकांश में नाइत्तफाकी ही रही सदा । लेकिन उनकी साहित्य-निष्ठा में कभी कोई संदेह नहीं रहा । साहित्य के प्रति उनके जैसी प्रतिबद्धता विरल है ।
    इसलिए लगता है, उनके वक्तव्य को लेकर या तो प्रतिक्रियाओं में बहुत जल्दबाजी हो रही है या उन्हें संदर्भ से अलग करके पढ़ा जा रहा है । वहाँ होना-न होना अधिक महत्व नहीं रखता क्योंकि समझने की गलती तो हर स्थिति में हो ही सकती है ।
    नामवर जैसा लेखक यदि इस तरह की तल्ख बात कहता है तो अभिधा में लेकर हमेशा खड़्गहस्त होकर फाँसी पर लटका देने वाले अंदाज में बात करने की जरूरत नहीं है । आज अधिकांश लेखक सत्ता और व्यवस्था की और माहौल की संवेदनहीनता के सामने अपने कर्म की अर्थहीनता को अक्सर महसूस करता है । अगर लेखन का वांछित असर हो रहा होता तो न जाने कब का ये निजाम बदल चुका होता । अगर नामवर जैसे लेखक ने भी वैसा महसूस किया हो और अपने कर्म की निरर्थकता को इस तल्खी से कहा हो तो उसे एक बार-बार पछाड़ खाए लेखक की पुकार के रूप में क्यों नहीं देखा जा सकता ! माना कि वे सत्ता से बहुत कुछ पाए हैं, लेकिन सत्ता के सर्वग्रासी चरित्र को न समझते हों और उससे आक्रोश न महसूस करते हों, यह कैसे कहा जा सकता है !
    वैसे आपको अभियान चलाने का और हर दूसरे को फांसी पर लटकाने का शौक है तो भला कोई क्या कर सकता है ।

  5. नन्द सर, शिवमूर्ति जी ने यह वक्तव्य उसी आयोजन में दिया था. जानकी पुल पर उसका सम्पादित अंश दिया गया है.

  6. जैसी जानकारी दी गई है, दोनों वरिष्‍ठ लेखकों ने अपने वक्‍तव्‍य एक साहित्यिक आयोजन में संजीदा लेखकों और गुणी श्रोताओं के सम्‍मुख ही दिये हैं और वहां उपस्थित आयोजकों और श्रोता-दर्शकों को उन पर कोई ऐतराज नहीं हुआ। जाहिर है, या तो उनके वक्‍तव्‍यों में ऐसी ऐतराज करने लायक कोई बात नहीं हुई, यह भी संभावना है कि उन्‍हें संदर्भ से काटकर गलत ढंग से पेश किया जा रहा हो, शिवमूर्तिजी के वक्‍तव्‍य से यह आभास नहीं होता कि वे स्‍वयं वहां मौजूद रहे हों और उन्‍होंने या किसी और ने इसका मौके पर कोई विरोध दर्ज करवाया हो। ऐसे में इन वक्‍तव्‍यों की विश्‍वसनीयता मुझे संदिग्‍ध लगती है। और अगर वाकई ये बातें इसी रूप में कही गई हैं, तो इससे अधिक दुर्भाग्‍यपूर्ण और क्‍या हो सकता है? बेहतर यही है कि इससे संबंधित पक्ष (आयोजक और स्‍वयं वक्‍ता)आगे आएं और अविलंब स्थिति का खुलासा करें।

  7. दोनों भाई बौरा गए लगते हैं. इनके बीच आदर्श भ्रातृत्व के घनिष्ठ संबंध तो पहले ही किम्वदंती बन गए हैं, पर साहित्यकार की हैसियत बयान करने के लिए वे निंदनीय'समान अभिव्यक्ति'पर उतर आएंगे, यह तो कभी सोचा भी नहीं था. जो कुछ ये 'पा' गए हैं, उससे 'अघाये' से भी लगने लगे हैं. लेखकों को इन वक्तव्यों की खुली निंदा करनी चाहिए.

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