Saturday, April 28, 2012

तुम बहुत पहले शहर छोड़ कर चली गई थी



मूलतः डॉक्टर राजेंद्र धोड़पकर हिंदी के प्रमुख कार्टूनिस्ट के रूप में जाने-माने जाते हैं, एक सजग पत्रकार-व्यंग्यकार के रूप में. यह बात लोग भूलते जा रह हैं कि वे मूलतः कवि हैं. 1983 में उनको कविता का भारतभूषण पुरस्कार मिल चुका है. उनका एक कविता संस्करण ‘दो बारिशों के बीच’ प्रकाशित हो चुका है. शायद वे अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने एक तरह से घोषणा कर के कविताएँ लिखनी छोड़ दी. जबकि उनकी कविताओं में ८० के दशक में बदलते हुए समाज की आहट सुनाई देती है. एक ऐसा मुहावरा भी जो बाद में ९० के दशक का प्रतिनिधि मुहावरा बना. राजेंद्र जी की कुछ चुनी हुई कविताएँ- जानकी पुल.


1.
मैं एक विस्मृत आदमी होना चाहता था

मैं एक विस्मृत आदमी होना चाहता था
पहले मेरी बहुत लोगों से पहचान थी,
मैंने उनसे स्मृतियाँ पाई कविताएँ लिखीं

कविताएँ लिखीं और विद्वज्जनों की सभा में यश लूटा
मेरे अंदर एक विराट चट्टान थी जिसके आसपास पेड़ों पर
बहुत बन्दर रहते थे
जो फल खाया करते थे

मैं जब विद्वज्जनों की सभा से बाहर निकला तो
हवा में जहर फैला हुआ था
सारे बन्दर उससे मारे गए, मैं बहुत उदास हुआ
और अकेला चट्टान पर बैठा रहा
पेड़ों से हरे पत्ते और आकाश से पारदर्शी
पत्ते मुझ पर झरते रहे

मैंने कहा- मैं एक विस्मृत आदमी होना चाहता हूं
जब बन्दर ही नहीं रहे तो सारे परिश्रम का क्या अर्थ है
मैं पत्तों से पूरा ढका दो कल्पों तक बैठा रहा चट्टान पर
तपती धूप में
किसी समय हवा से नई और स्मृतियाँ गायब हो गईं
किसी युग में पेड़ भी कट गए

एक दिन एक तितली मेरे कंधे पर आकर बैठ गई
उसने कहा- सारे युद्ध समाप्त हो गए हैं
सारी विशाल इमारतें और मोटरकार आधी
धंसी पड़ी हैं जमीन में
सारे अखंड जीव नष्ट हो गए हैं
हवा से नमी और स्मृतियाँ गायब हो चुकी हैं
पीड़ा से ऐंठता मैं पहुंचा बाहर
विद्वज्जनों की सभा में पहुंचा
वहां बिना सिर और पंखों वाले लोग बैठे थे
मेरा बटोरा हुआ यश दारियों पर बिखरा पड़ा था
मैंने कहा- मैं एक विस्मृत आदमी होना चाहता था
लेकिन मैं-
लेकिन कोई फायदा नहीं था
उन लोगों के पास कोई स्मृति नहीं थी.

2.
पूर्वजन्म

पूर्वजन्म की अब कोई स्मृति बाकी नहीं है
पूर्वजन्म की सारी चीजों से धुंध की तरह लिपटी
मेरी स्मृतियाँ गायब हो गईं तो
सारी चीजें तेज धूप में साफ़ चमक रही हैं

मैं याद करता हूं
मैं कोई योद्धा था या कवि या गडरिया
किसी लड़की से प्रेम की वजह से मारा गया
या मैं मरा प्लेग से
या मैं निकल गया था यात्रा पर, फिर मेरा कुछ अता-पता नहीं चला

कितने अकाल देखे मैंने, कितने युद्ध
कितने वायदों, कितनी मौतों, कितनी बोगदों
और पुलों से गुजर मैं
मुझे कुछ याद नहीं है
कितना भयानक है यह
आसपास साफ़-साफ़ चमकती सारी दुनिया
है छाया पूर्वजन्म की
और दिन चढ़ते पूर्वजन्म की कोई स्मृति बाकी नहीं है

3.
तुम्हारा नाम

तुम्हारे नाम का एक-एक अक्षर आता है मुझ तक
एक-एक लहर पर सवार
यह विस्मृति का समुद्र है

लगातार बारिश के दिनों में जब
लगातार एक धूसर अँधेरे में
मृतकों और जीवितों के बीच फर्क मिटने लगता है
बहुत पहले झरे हुए फूल
फिर से पौधों पर खिलने लगते हैं

मैं अपने को पाता हूं एक लगातार बरसते
धुंधले समुद्र तट पर
स्मृति-विस्मृति की सीमा पर

वहां सिर्फ तुम्हारा नाम मुझ तक
लौट-लौट कर आता है.

4.
प्रेम कथा का अंत

मैंने तुमसे इस कदर प्रेम किया कि
इज्जत की भी कोई परवाह नहीं की
लौटते हुए बची-खुची इज्जत चौराहे पर
बेच दी और दो सिगरेटें खरीदीं
घर आकर लंबी तान कर सो गया

अगले दिन मैंने दोस्त से कहा
सोचता हूं सिगरेट पीना छोड़ दूँ
स्वास्थ्य भी खराब होता है और इज्जत का
कचरा होता है सो अलग

ठीक यही विचार प्रेम के बारे में भी मेरे मन में आया
जब मैं
दोस्त के साथ सड़क पर घूम रहा था
हमने एक धर्मादा प्याऊ पर पानी पीया
उधारी में दो सिगरेटें लीं
उस साल बहुत ज्यादा गर्मी पड़ी थी
बाद में मालूम हुआ गाँव में भारी अकाल पड़ा था

ठीक यही विचार प्रेम के बारे में मेरे मन में आया
मैंने उसे एक किताब में रख दिया और
भूल गया, लाइब्रेरी की किताब थी, वापस कर आया

तुम बहुत पहले शहर छोड़ कर चली गई थी
मैं भटकता रहा अकेलेपन में
फिर दोस्त मिला, भावुक होकर उसने कहा
मैं तुम्हारी खातिर जान दे सकता हूं
उसने कहा- ऐसा मत करना
बचा ही क्या है तुम्हारे पास
सिर्फ जान ही तो है, वह भी दे दोगे
तो तुम्हारे पास कुछ नहीं रहेगा.

5.
दोहराना

यह दुनिया अब रहने लायक नहीं रही
फिर भी इसे छोड़कर हम जा नहीं सकते
युद्ध जितने तय थे और नहीं थे
हो चुके हैं, बादलों पर टंगे हैं असंख्य तमगे
प्रेम चटख चुका है बार-बार वसंतों और
बारिशों में

पृथ्वी की समस्त घृणा
सारी नदियों में बह चुकी है
दूसरी दुनिया से आई सारी चिड़ियाँ
वापस लौट चुकी हैं
एक पीला सांप अदृश्य हो गया है झाडियों में
कुछ होने को नहीं बचा है
किसी जर्जर बाइस्कोप की तरह
धरती वही दृश्य बार-बार दिखा रही है
यह दुनिया अपने को दोहरा रही है
हम जिसमें रह रहे हैं, न जाने कौन सी है वह?

प्रतिकृति है
हर कवि हर पल किसी मरते हुए आदमी की तरह
दोहराता रहता है अपना सारा जीवन
यही हमें करना है
इसीलिए इसे छोड़कर हम जा नहीं सकते.  
   


5 comments:

  1. अरसे बाद राजेंद्र जी की कविताएं पढ़ीं। उनकी मौलिकता से हमेशा चकित-अभिभूत रहा। इन कविताओं का अलग आस्वाद है। प्रभात जी, शुक्रिया राजेंद्र धोड़पकर की कविताएं सुलभ कराने के लिए।

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  2. aapne hamesha kee tarah hatkar es bar bhee bahut achchha kam kiya prabhat jee. kuchh dinon ke bad dhodapakar jee kee kuchh aur kavitayen yahan dijiyega. main yh nivedan kar raha hoon

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    1. इनकी एक कविता इधर लीजिए।

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  3. पत्रकार/व्यंगकार/कार्टूनिस्ट/कवि डॉ राजेन्द्र धोड़पकर चलन से हटकर एक अलग मानसिकता के कवि हैं |ये उन चुनिन्दा बुद्धिजीवियों में से एक हैं जिन्होंने बाकायदा चिकित्सा शास्त्र की डिग्री हासिल करने के बाद पत्रकारिता का पेशा अपनाया,व साहित्य में अपना अलग स्थान बनाया |इस द्रष्टि से भी वो औरों से अलग रहे जिन्हें अपनी ''पहचान ''बनाने के लिए किन्हीं विशेष माध्यमों और पुरुस्कारों आदि जैसे चमत्कारों की मोहताजी नहीं रही बल्कि उनकी छवि एक संकोची ,संतोषी और निखालिस कवि/कार्टूनिस्ट की रही |उत्तर आधुनिकता के शोर ,कविता/कहानी आदि के अंत की घोषणाओं और प्रयोगधर्मी (?)युग और माहौल के बीच राजेन्द्र जी की ये अलग आस्वाद और मौलिक कवितायेँ सचमुच हतप्रभ करती हैं राहत देती हैं निस्संदेह ''अंत''जैसी घोषणाओं को पीछे धकेल देती हैं |प्रभात जी,और जानकी पुल का आभार

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