आवाजाही के हक में

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आज ‘जनसत्ता’ के संपादक ओम थानवी ने ‘अनंतर’ में  इंटरनेट माध्यम पर चली कुछ बहसों के माध्यम से इस माध्यम पर एक विचारपरक लेख लिखा है. आपसे साझा कर रहा हूं- जानकी पुल.
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इंटरनेट बतरस का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया है। घर-परिवार से लेकर दुनिया-जहान के मसलों पर लोग सूचनाओं, जानकारियों, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं। ब्लॉग, पोर्टल या वेब-पत्रिकाएं और सार्वजनिक संवाद के सोशलठिकाने यानी फेसबुक-ट्वीटर आदि की खिड़कियां आज घर-घर में खुलती हैं। 

गली-मुहल्लों, चाय की थड़ी या कहवा-घरों, क्लबों-अड्डों या पान की दुकानों की प्रत्यक्ष बातचीत के बरक्स इंटरनेट की यह बतरस काम की कितनी है? मेरा अपना अनुभव तो यह है कि त्वरित और व्यापक संचार के बावजूद इंटरनेट के मंचों पर बात कम और चीत ज्यादा होती है। 


उदाहरण के लिए हाल में इंटरनेट पर विकट चर्चा में रहे दो कवियों का मसला लें। विष्णु खरे और मंगलेश डबराल को लेकर कुछ लोगों ने रोष प्रकट किया। उन्हीं की विचारधारा वाले सहोदरउन पर पिल पड़े। मंगलेश तो नेट-मार्गी हैं नहीं, इ-मेल भेज-भिजवा देते हैं। विष्णु खरे चौकन्ने होकर ब्लॉग-ब्लॉग की खबर रखते हैं, उन्हीं के शब्दों में- ‘‘(ताकि) देख पाऊं कि उनमें जहालत की कौन-सी ऊंचाइयां-नीचाइयां छुई जा रही हैं।’’ इसी सिलसिले में वे इंटरनेट पर नई पीढ़ी के जुझारू ब्लॉगरों- नेटवर्करों से जूझते देखे गए, डबराल नहीं। हालांकि डबराल की चुप्पी को लोग संदेह की नजर से देख रहे हैं।


हुआ यों कि विष्णु खरे एक ब्लॉग पर हिंदी कवियों पर की गई टीका से त्रस्त हुए। गुंटर ग्रास की इजराइल-विरोधी कविता जो कहा जाना चाहिएइंटरनेट के जमाने में दुनिया के कोने-कोने में चर्चित हो गई है। तब और ज्यादा, जब उस कविता में दुनिया के अमन-चैन का दुश्मनकरार दिए जाने पर भड़क उठे इजराइल ने अपने देश में गुंटर ग्रास के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने उस कविता का हिंदी अनुवाद अपने ब्लॉग जनपथपर दिया जो मेल-फेसबुक आदि के जरिए  प्रसार पा गया। कविता के साथ दी गई उनकी वह टिप्पणी विष्णु खरे को नागवार गुजरी, जिसमें कहा गया था कि साहित्य व राजनीति में दूरी बढ़ती जा रही है और कवि-लेखक सुविधापसंद खोल में सिमटते जा रहे हैं।


खरे ने- अपने स्वभाव के अनुसार- कड़े तेवर में ब्लॉग लेखक को लिखा: ‘‘जब कोई जाहिल यह लिखता है कि काश हिंदी में कवि के पास प्रतिरोध की ग्रास-जैसी सटीक बेबाकी होती तो मैं मुक्तिबोध सहित उनके बाद हिंदी की सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय-राजनीतिक प्रतिवाद की कविताएं दिखा सकता हूं, आज के युवा कवियों की भी, जो ग्रास की इस कविता से कहीं बेहतर हैं।… लेकिन वे (ग्रास) और इस मामले में उनके आप सरीखे समर्थक इसराइल की भर्त्सना करते समय यह क्यों भूल जाते हैं कि स्वयं ईरान में इस्लाम के नाम पर फासिज्म है…।’’


सार्वजनिक हुए पत्राचार में यह सवाल भी उठा कि विष्णु खरे ने दिल्ली के पुस्तक मेले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शिवसेना से जुड़े दलित कवि नामदेव ढसाल की किताब का लोकार्पण क्यों किया। लोकार्पण के वक्त उनके साथ मंगलेश डबराल भी थे।  खरे ने जवाब दिया: ‘‘नामदेव ढसाल मराठी कविता के सर्वकालिक बड़े कवियों में है। आज उसका महत्त्व अपने समय के तुकाराम से कम नहीं… मराठी में कौन नहीं जानता कि नामदेव शिव सेना और आरएसएस से संबद्ध है।… मैं मानता हूं कि अलाहाबाद में पाकिस्तान और पार्टीशन थेओरी का प्रतिपादन करने वाले अल्लामा इकबाल का फिरन निरपराध मुस्लिम-हिंदुओं के खून से रंगा हुआ है। फिर भी हम उन्हें बड़ा शायर मानते हैं और भारत के अनआॅफिशियल, जन-मन-गण से कहीं अधिक लोकप्रिय, राष्ट्र-गीत सारे जहां से अच्छाको गाते हैं या नहीं?’’


यहां यह याद करना उचित होगा कि पिछले साल के अंत में मुंबई में विष्णु खरे ने जब एक लाख रुपए का एक विवादग्रस्त ‘‘परिवार’’ पुरस्कार (जिसे स्वीकार करने के बाद उन्होंने लंबा स्पष्टीकरण भी दिया) लिया, तब भी शर्त रखी थी कि ‘‘पुरस्कार मुझे नामदेव ढसाल या चंद्रकांत पाटील के हाथों दिया जाए।’’

मंगलेश इंटरनेट पर इस तरह उलझे: महीने के पहले रविवार की बात है। इंटरनेट के बौद्धिक हिंदी साहित्य के बदलते सरोकारों पर एकाग्र थे। मंगलेश उनकी बहस के केंद्र में, बल्कि निशाने पर थे। वे एक कार्यक्रम में गए थे, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के जीवनीकार राकेश सिन्हा की संस्था भारत नीति प्रतिष्ठान (आईपीएफ) ने आयोजित किया था। कार्यक्रम समांतर सिनेमा पर केंद्रित था। मंगलेश जी ने उसकी अध्यक्षता की।  राकेश सिन्हा ने फेसबुक पर अपने पन्ने (जिस पर सजे स्थायी फोटो में सिन्हा के साथ पूर्व सरसंघ चालक केएस सुदर्शन, भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और रविशंकर प्रसाद खड़े मिलते हैं) पर उक्त कार्यक्रम की तीन तस्वीरें प्रसारित कर दीं। इनमें एक में सिन्हा (प्रतिष्ठान के निदेशक के नाते) मंगलेश डबराल को गुलाब के फूल दे रहे हैं; दूसरी तस्वीर में मंगलेश उनके साथ मंच पर बैठे हैं। 

जैसा कि फेसबुक जैसे तुरता मगर संक्षिप्त टिप्पणियों वाले माध्यम में होता है, इस प्रसार पर बेहिसाब प्रतिक्रियाएं आर्इं। सिन्हा के अपने पन्ने पर, जाहिर है, एक ढंग की। मसलन, किन्हीं अनुरोध पासवान ने लिखा: ‘‘शानदार… डबराल जाने-माने वामपंथी हैं, फिर भी उन्होंने आपके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थिंक टैंकमंच पर शिरकत की।…’’ 


मोहल्ला लाइवपोर्टल   (पत्रिका) चलाने वाले पत्रकार अविनाश दास ने फेसबुक पर सिन्हा-डबराल की तस्वीर देते हुए लिखा: ‘‘अभी उस दिन मंगलेश डबराल को कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या की साजिश के सूत्रधार शहाबुद्दीन को बरी करने के खिलाफ जंतर मंतर पर कविता पढ़ते देखा था। और अब ड्रैक्युला नरेंद्र मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी के विषैले विचारक राकेश सिन्हा के साथ मंच साझा करते हुए देख रहा हूं। ये वही मंगलेश डबराल हैं न, जिन्होंने योगी आदित्यनाथ के साथ एक मंच पर मौजूद उदय प्रकाश के खिलाफ भयानक मोर्चाबंदी कर दी थी?’’


कथाकार प्रभात रंजन इंटरनेट की जानकीपुलपत्रिका के संपादक हैं। उन्होंने भी फेसबुक पर लिखा: ‘‘मैं हेडगेवार के जीवनीकार राकेश सिन्हा के साथ अपने प्रिय कवि मंगलेश डबराल को मंच पर देखकर हतप्रभ हूं।… कॉमरेड तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’’


दोनों टिप्पणियों पर कोई तीन सौ प्रतिक्रियाएं एक ही रोज में आ गर्इं। सौ प्रतिक्रियाएं तो टिप्पणियों को महज लाइकबता कर सहमति जताने वाली थीं। बाकी की बानगी देखिए- गिरिराज किराडू: ‘‘समांतर सिनेमा पर बात करने के लिए क्या यही मंच बचा था?’’ प्रकाश राय: ‘‘कूढ़मगज और बूढ़मगज प्रगतिशील बौद्धिकों की यही नियति है।’’ शारदा दुबे: ‘‘बौद्धिक गिरगिट हर जगह मौजूद हैं।’’ नवनीत बेदार: ‘‘कृष्ण करें तो लीला, हम करें तो…?’’ सुशीला पुरी: ‘‘पहाड़ पर लालटेन जलाने और वास्तव में रोशनी होने में बहुत फर्क है…।’’ प्रेमचंद गांधी: ‘‘संकट यह विकराल है, कहां बैठे डबराल हैं!’’ 


सबसे आक्रामक तेवर में वहां उदय प्रकाश मौजूद थे। लंबी टिप्पणी में उन्होंने लिखा: ‘‘मैं इन दैत्यों, सत्ता के तिकड़मबाजों और मनोरोगियों को जानता हूं… मानवीय सरोकारों वाली विचारधाराओं से उनका कोई लेना-देना नहीं है…। वे घोर जातिवादी हैं…मैं, मेरा परिवार, लाखों अल्पसंख्यक, वंचित, सत्ताहीन और पिछड़े वर्ग के लोग बुरी तरह इन दगाबाजों के कृत्यों के शिकार बने हैं।…’’  उदय प्रकाश की दूसरी टिप्पणी: ‘‘क्या हम हिंदी के अप्रतिम कवि- और प्रगतिशील कविता की वृहत्रयी में से एक- त्रिलोचन को याद करें, जो पहले स्वयं वामपंथी संगठन से निकाले गए, फिर दिल्ली से उनको शहर बदर करके हिंदू तीर्थ-स्थल हरिद्वार भेज दिया गया। अत्यंत विषम परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई…। क्या हम शैलेश मटियानी को याद करें, जिन्हें जिंदा रहने और अपना परिवार पालने के लिए कसाई (चिकवा-गीरी) का काम करना पड़ा, ढाबों में बर्तन मांजने पड़े?… क्या हम स्वदेश दीपक के बारे में सोचें, जो दास्तान-ए-लापताहैं?.. सच यह है कि हिंदी कविता, साहित्य, अकादेमिकता, मीडिया, अखबार… सब कुछ इन्हीं के अधीन है, इनमें से अधिकांश अर्ध-शिक्षित या अशिक्षित हैं, मीडियोकर और अयोग्य हैं… ये शहीद चंद्रशेखर की स्मृति में आयोजित सभाओं में कविताएं पढ़ते हैं और सत्ताओं द्वारा फूल-मालाओं से लाद दिए जाते हैं। हम मार्क्स या बुद्ध का नाम लेते हैं और औलिया से अपनी खैरियत की दुआ मांगते हैं!…’’


उदय प्रकाश की उत्तेजना का कारण है। वे सोलह साल सीपीआई के पूर्णकालिक सदस्य रहे हैं। उससे भी ज्यादा- बाईस वर्ष- सीपीएम से जुड़े जनवादी लेखक संघ में सक्रिय रहे। सात साल पहले उनका मोहभंग हुआ, जब मार्क्सवादी लेखकों को अर्जुन सिंह जैसे नेताओं की गोद में जा बैठते पाया। वे अब भी वामपंथी हैं, लेकिन किसी पार्टी या पार्टी के पोशीदा अखाड़े के सदस्य नहीं हैं। उनकी देश और देश से बाहर बढ़ी प्रसिद्धि से रश्क करने वाले साथी अब उनकी निंदा के मौके ढूंढ़ते हैं। तीन साल पहले गोरखपुर में उदय के फुफेरे भाई का निधन हो गया। वे जिस कॉलेज के प्राचार्य थे, वहां उनकी बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में कॉलेज की कार्यकारिणी के अध्यक्ष और विवादग्रस्त सांसद योगी आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश को उनके भाई की स्मृति में स्थापित पुरस्कार दिया। परमानंद श्रीवास्तव सरीखे शहर के वरिष्ठ लेखक वहां सहज मौजूद थे, पर दिल्ली में जैसे भूचाल आ गया। 


लेखकों के एक बड़े समूह ने उदय प्रकाश के खिलाफ एक विरोध-पत्रजारी किया जिसमें लिखा था: ‘‘… हम अपने लेखकों से एक जिम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं।’’ बयान पर मंगलेश डबराल और विष्णु खरे के अलावा ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, असद जैदी, लीलाधर जगूड़ी, आनंदस्वरूप वर्मा, पंकज बिष्ट, वीरेन डंगवाल, आलोकधन्वा आदि कोई साठ लेखकों के नाम थे।


एक लेखक के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के विरोध में इतनी बड़ी तादाद में हिंदी लेखक न कभी पहले एकजुट हुए, न बाद में। उदय बार-बार कहते रहे कि उन्हें खबर नहीं थी, न अंदाजा कि उनके और भाई की स्मृति के बीच वहां योगी आदित्यनाथ आ जाएंगे। यह भी कि उनके विचार मंच पर योगी के साथ बैठने से नहीं बदले हैं। पर उनकी बात नहीं सुनी गई। 


कुछ लेखक-पत्रकार जरूर तब उदय प्रकाश के समर्थन में आए। दिलीप मंडल (अब हिंदी इंडिया टुडे के संपादक) ने आदित्यनाथ की मौजूदगी पर लामबंद होने वाले लेखकों के प.बंगाल की (तत्कालीन) जनवादी सरकार की हिंसा पर चुप्पी साधने को आड़े हाथों लिया: ‘‘अच्छा होता अगर योगी आदित्यनाथ के हाथों उदय प्रकाश कोई सम्मान न लेते।… (पर) शायद उससे भी अच्छा होता कि उदय प्रकाश के आदित्यनाथ से सम्मान लेने के खिलाफ गोलबंदी   दिखाने वाले साहित्यकारों ने लालगढ़ में आदिवासियों के संहार के खिलाफ या नंदीग्राम और सिंगुर में राजकीय हिंसा के खिलाफ भी ऐसा ही वक्तव्य जारी किया होता…।’’


दिलचस्प बात है कि उदय प्रकाश ही नहीं, अन्य मार्क्सवादी लेखक भी जब-तब अपने हमकलम साथियों के रोष का शिकार होते रहे हैं। मसलन, सुलभ शौचालय वाले बिंदेश्वरी पाठक से पुरस्कार लेने पर त्रिलोचन। या केदारनाथ सिंह अटल बिहारी वाजपेयी और विष्णु नागर त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी के हाथों सम्मानित होने के लिए। पंकज बिष्ट देहरादून में रमाशंकर घिल्डियाल पहाड़ीकी जन्मशती पर भाजपाई कवि रमेश पोखरियाल निशंकके साथ मंच पर बैठे तो इसकी चर्चा भी तल्खी में हुई। 


ऐसे में मंगलेश डबराल के राकेश सिन्हा के साथ उठने-बैठने की चर्चा होना स्वाभाविक था। यों मंगलेश पहले गोविंदाचार्य के साथ भी मंचासीन हो चुके हैं, लेकिन मामला बात सामने आने और मुद्दा बनने भर का है।

लेकिन क्या ये प्रसंग सचमुच ऐसे हैं, जिन्हें लेकर इतना हल्ला होना चाहिए? क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जिसमें उन्हीं के बीच संवाद हो जो हमारे मत के हों? विरोधी लोगों के बीच जाना और अपनी बात कहना क्यों आपत्तिजनक होना चाहिए? क्या अलग संगत में हमें अपनी विचारधारा बदल जाने का भय है? क्या स्वस्थ संवाद में दोनों पक्षों का लाभ नहीं होता? यह बोध किस आधार पर कि हमारा विचार श्रेष्ठ है, दूसरे का इतना पतित कि लगभग अछूत है! पतित है तो उस पर संवाद बेहतर होगा या पलायन? क्या संघ परिवार और उसके हमजात शिवसैनिकों ने पहले ही हमारे यहां प्रतिकूल विचार या सृजन को कुचलने का कुचक्र नहीं छेड़ रखा है? असहिष्णुता की काट के लिए एक उदार और सहिष्णु रवैया असरदार होगा या उसी असहिष्णुता का जो किसी एकांगी विचारधारा या (लेखक) संघ की राजनीति से संचालित होती है? एक मतवादी घेरे में पनपने वाला समाज कितना लोकतांत्रिक होगा? दुर्भाव और असहिष्णुता का यह आलम हमें स्वतंत्र भारत का अहसास दिलाता है या स्तालिनकालीन रूस का?


कहा जाएगा कि विपक्षी मंच पर जाकर प्रगतिशील विचारधारा के लोग प्रतिगामी विचारधारा को एक तरह की विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। यह भी एक खुशफहमी है। क्या इस तर्क को उलट कर यों नहीं दिया जा सकता कि आपके विचार का ही असर- यानी विश्वसनीयता- है जो विपक्षी को भी आपकी ओर देखने को विवश कर रही है!


प्रगति या जन-गण की बात करने वाले अपनी ही विचारधारा के घेरे में गोलबंद होने लगे, इसके लिए खुद विचार’-वान लेखक कम कसूरवार नहीं हैं। पहले देश में कभी एक कम्युनिस्ट पार्टी थी और उसके पीछे चलने वाला एक लेखक संघ। पार्टी टूटी तो संघ के लेखक भी टूट गए। एक और लेखक संघ बना। बाद में एक और। इन लेखक संघों ने अक्सर अपने मत केलेखकों को ऊंचा उठाने की कोशिश की है और दूसरों को गिराने की। एक ही विचारधारा के होने के बावजूद लेखक संघों में राग-विराग देखा जाता है। लेखक का स्तर या वजन भी संघ के विश्वास के अनुरूप तय होने लगा है। इसी संकीर्णता की ताजा परिणति है कि कौन लेखक कहां जाए, कहां बैठे, क्या कहे, क्या सुने- इसका निर्णय भी अब लेखक संघ या सहमत-विचारों वाले दूसरे लेखक करने लगे हैं। 

गौर करने की बात है कि हिंदी साहित्य में ऊंच-नीच या अपने-पराए का जो सांस्कृतिक जातिवाद पनप रहा है, वह कला या सिनेमा आदि की दुनिया में देखने को नहीं मिलता। वहां धुर विरोधी एक मंच, प्रदर्शनी या समारोह में शिरकत कर सकते हैं, अपने साथियों के फतवे की फिक्र किए बगैर। हमारे समाज में भी, जहां घोर जातिवाद व्याप्त है, कट्टर से कट्टर लोग विजातीय घर या घेरे में थोड़ी आवाजाही बनाए रखते हैं!

मंगलेश डबराल सिनेमा गोष्ठी के मामले में शायद इसलिए निशाना बने, क्योंकि पहले वे खुद ऐसी शिरकतों का विरोध करते आए हैं। उदय प्रकाश तो साम्यवादी लेखक ही थे, जिनके खिलाफ लामबंदी की गई। वरना गोपीचंद नारंग जब साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष बने तो मंगलेश डबराल ने अकादेमी के तमाम कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे तेवर के चलते उन्होंने राकेश सिन्हा के बुलावे को स्वीकार किया तो विवाद के बीज वहां जाते वक्त शायद वे खुद बो गए थे। वे कह सकते हैं कि राकेश सिन्हा बुद्धिजीवी हैं, आदित्यनाथ पर तो संगीन आरोप लगते रहे हैं। 


तब, अगर नामवर सिंह या विभूतिनारायण राय यह कहें कि तरुण विजय ने कभी आदित्यनाथ जैसा हिंसक बयान नहीं दिया और विजय की जिस किताब का लोकार्पण उन्होंने पुस्तक मेले की भीड़ में किया, वह सांस्कृतिक लेखों का संकलन मात्र है, तो इसमें आपत्ति क्यों हो? दूसरे, क्या राकेश सिन्हा गोपीचंद नारंग से बड़े लेखक हैं? अज्ञेय जन्मशती आयोजनों का मंगलेश और जन संस्कृति मंच के अन्य लेखकों ने बहिष्कार किया। मंच के अध्यक्ष मैनेजर पांडे ने अपने स्तर पर जरूर शिरकत की। पर इसके लिए उन्हें मंच के लोगों से सुनना पड़ा, ऐसा उन्होंने खुद बताया। क्या अज्ञेय राकेश सिन्हा से भी कमतर बुद्धिजीवी थे?

25 COMMENTS

  1. मंगलेश डबराल जी को खुला पत्र
    आदरणीय मंगलेश डबराल जी,
    मंगलेश डबराल जी किसी कार्यक्रम में जाना या नहीं जाना यह अपका अपना फैसला है। आप भारत नीति प्रतिष्ठान के कार्यक्रम समान्तर सिनेमा, के गोष्ठी में अध्यक्ष के नाते आये थे। मैं भी श्रोताओं में था और कार्यक्रम के आयोजन से भी जुड़ा हुआ था। आपने जिस प्रकार से माफीनामा दिया और कार्यक्रम में भाग लेने को एक चुक बाताया उसे देखकर मुझे आश्चर्य एंव दुख दोनो हुआ। आपने कुछ ऐसी बाते कहीं जो तथ्यो से परे है।
    1. आपको मैने ही प्रतिष्ठान का साहित्य भेट किया आपने उसे सहर्ष स्वीकार किया साथ ही आपने प्रतिष्ठान के कार्यो के प्रशंसा भी की ।
    2. आपने अपने उदबोधन में निदेशक का नाम बड़े सम्मान से लिया।
    3. प्रतिष्ठान द्वारा इस आयोजन की भी सराहना की ।
    4. विषय पर खुली चर्चा हुई।
    कार्यक्रम के दौरान क्या आपको कही लगा की आप किसी प्रकार के दवाब में बोल रहे है? इसके बावजूद आपने प्रतिष्ठान को व्यवसायिक संस्था नहीं है जो प्रमाण पत्र दिया वह आपकी integrity पर सवाल खड़ा करता है। आप अपने बंधुओ से सीधे माफ़ी मांग लेते तो कोई हर्ज नहीं था परंतु माफ़ी मांगने के क्रम मे आपने जो तर्क दिया वह आप जैसे श्रेष्ठ विद्वान के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है। कार्यक्रम में आपका अभिनंदन हुआ, आपका परिचय दिया गया जिसमे आपके योगदान एवं व्यकित्तव की चर्चा की गई कार्यक्रम से पहले निदेशक के कमरे में अनेक लोगो के साथ आपने खुली चर्चा की इस दौरान क्या आपको लगा की आप पर विचारधारा थोपी जा रही है? आप कार्यक्रम के दौरान व बाद में भी पूर्ण संतुष्ट ऩजर आ रहे थे। कार्यक्रम के उपरान्त आपने श्रोताओं के साथ खुली चर्चा भी की। आपने स्वंय सार्वजनिक रुप से कहा था कि आप प्रतिष्ठान को आपके द्वारा संपादित दि पब्लिक एजेंडा की मेलिंग सूची में शामिल करेगें साथ आपने इसकी प्रति भी संस्थान के मानद निदेशक प़्रो राकेश सिन्हा जी को दी थी। जब मैं आप को नीचे आपकी गाड़ी तक छोड़ने गया था इस दौरान भी आपने कार्यक्रम को सार्थक बताया था। कार्यक्रम में भाग लेने के उपरांत मुझे जो प्रतीत होता है कि प्रतिष्ठान ने तो शुद्ध शैक्षणिक व व्यवसायिक द़ष्टि में चर्चा का आयोजन किया था किंतु आपने ट्रेड यूनियन के दवाब में अपने विवेक समर्पण कर दिया जो आप जैसे महान साहित्कार को शोभा नहीं देता है।
    नवनीत
    navneet.du@gmail.com

  2. बर्नवाल जी की बात सबसे सटीक और स्पष्ट है. वे वामपंथी हैं, जो उनका हक़ है अपने विचार से चलना . उनकी बात पर गौर करना चाहिए. अगर हम संघ परिवार या जलेस, प्रलेस या जसम जैसे सांकृतिक रूप से साम्प्रदायिक हो गए गुटों से अलग स्वतंत्र होकर जीना, लिखना पढना और अपनी मर्जी से कहीं आना जाना जाहते हैं तो इसी स्वतंत्रता का पक्ष लेना होगा. . ये बटरोही और पांडे जैसे अखाड़ेबाज फेल लोग हैं और अपने अजेंडा पर काम करते हैं.

  3. मै हैरान इस बात को लेकर हूँ कि समय के साथ वामपंथ कि प्रकृति अभी भी नहीं बदली है. आखिर मंगलेश डबराल जी को माफ़ी क्यों मंगनी पड़ी ? क्या यह उनकी चुक थी ? मै नहीं मानती हूँ. भारत नीति प्रतिष्ठान का वेबसाइट पर सब कुछ है. इसमें कही भी संघ समर्थक या उससे जुड़े होने का उल्लेख तक नहीं है. हा इसके निदेशक जरुर संघ विचारधारा के प्रबल समर्थक मने जाते हैं. तो क्या अब तक जितने लोग गए है इस मंच पर सबने वामपंथ कि सीमा का उल्लंघन किया है? स्तालिनवादी यह मानसिकता ही वामपंथ के पतन का कारण है. मै स्वयं वामपंथी संगठन से जुडी थी और अभी भी कई मामलों में मेरी उनसे सहमति है. राकेश सिन्हा जी से मिलने के बाद मेरे विचारो में परिवर्तन आया है. वे उतने ही प्रगतिशील हिं जितने आप अपने आपको मानते हैं. क्या मंगलेश डबराल को कार्यक्रम में प्रतीत हुआ कि उनपर कुछ आरोपित किया जा रहा है? क्या बोलने से पहले उनसे कुछ सीमाए बता ड़ी गयी थी? क्या जो पर्च पढ़ा गया उसमे निदेशक ने कोई संपादन किया या पढने कि पूर्ण स्वतंत्रता दी? ये प्रश्न आज अधिक प्रशंगिक हैं? राकेश सिन्हा सचमुच में संवाद के समर्थक है यही कारण हिया कि वे लोगो को अलग अलग मुद्दों पर इकठ्ठा कर रहे हैं. डबराल जी को सहसद दिखाना चाहिए और कहना चाहिए कि उन्होंने कोई गलती या चूक नहीं कि है. जिन्हें लगता है उन्हें लगने दे. वे तो सहस के साथ अपनी बाते कहकर आय्ठे फिर किस बात का अपराध बोध उनपर थोपा जा रहा है? उन्हें जितना आदर और सम्मान मिला किया एक वामपंथी के हैसियत से उन्हें दिया गया कि उनकी विद्वता का सम्मान किया गया ? जब मैंने राकेश जी से फ़ोन पर बात कर चर्चा कि तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अगर उन्हें पता होता कि डबराल जी कि फजीयत होगी तो वे स्वयं उन्हें नहीं बुलाते हलाकि उन्हें इस बात का दर था कि आने से पहले कुछ कट्टरपंथी वामपंथी उन्हें उसमे नहीं जाने कि सलाह देंगे. तब तो पर्वत पटनायक को विश्व बैंक की कमिटी में नहीं रहना चाहिए क्योकि भारत के वामपंथ उसे अमेरिका का पिट्ठू मानते हैं. क्या प्रतिष्ठान अमेरिकी स्मर्ज्वाद से भी खतरनाक हो गया है. वास्तव में दर तो इस बात का है की संवाद अगर इसी तरह चलता रहा तो विचारधारा की जाती व्यवस्था मिट जाएगी और अनेक लोगो का सुविधाजनक बौद्धिक दुकानदारी बंद हो जाएगी. डबराल एक लोकतान्त्रिक आस्था के व्यक्ति है पर जरुरत से ज्यादा घबरा गए. यही समय होता है परीक्षा की घरी का. संघ के अनेक कट्टरपंथी लोगो ने राकेश सिन्हा के विरुद्ध मुहीम चलयी की वामपंथियों को मंच दे रहे हैं उन्होंने पुच्छ इससे आपको क्या मिल रहा है. वे आते हैं और अपने बात कहकर चले जाते हैं. हम क्या अपराध बोध के शिकार हैं. पर वे अपनी रह अलग बनाकर संवाद खड़ा किया जिसे कुछ निथाल्लू तोड़ना चाहते हैं. वास्तव में झगडा तो यश का है , लोप्रियता का है, अधिपत्य का है और उसे सीधे नहीं कर संघ को बिच में लाया जा रहा है. राकेश सिन्हा ने प्रभाष जोशी समीरित व्यख्यान भोपाल में दिया . प्रगतिशील लोगो को उसे पढ़ना चाहिए. उन्होंने कोर्पोराते मीडिया पर आक्रमण किया , विदेशी पूंजी का विरोध किया. अगर संघ कल कार्ल मार्क्स का नाम ले लेगा तो ह=भारत के वामपंथी मार्क्स को भी गली देने लगेंगे. डबराल जी माफ़ी आपको इतिहास में कायरो की श्रेणी में खड़ा करेगा.. क्या आप राकेश सिन्हा को नहीं जानते थे? क्या उनका लेख आपने कभी नहीं पढ़ा है भले ही नहीं छापा हो ? क्या चनलो पर उन्हें बोलते हुए नहीं देखा था? आप क्यों नहीं कहते की सहर्ष निमंत्रण स्वीकार कर आप गए. आपने उस दिन लगभग तिन घंटे समय बिताये. आपको प्रतिष्ठान का प्रकाशन भेट किया गया. मेरे मित्र ने आपसे सवाल भी किया था. उसने मुझे जानकारी ड़ी की आप सहज थे , प्रसन्नमुद्रा में थे. इसलिए एक स्वाभिमानी की तरह उनसे लड़िये जो वामपंथ को एक समप्रदाय बना देना चाहते हैं. फिर ममता की बात तो सही है की मार्क्सवादियो से तालुकात नहीं रखो. मै डबराल जी को एक महँ कविमंती हूँ उनकी इज्जत करती हूँ इसलिए मुझे दुःख हुआ . आगे भी पवित्रता के साथ उनकी प्रतिभा और प्रतिबद्धता की लिए उनका सम्मान करती रहूंगी.
    — By Manushi (break your silence and give befitting reply to ultra left crusaders)

  4. Burnwal didn't know rakesh sinha before going to IPF. he should expalain who had invited him and why did he feel important to go hauz Khas to attend a seminar? Did he honestly not hear name of Rakesh Sinha before meeting him! according his comment he proposed rakesh sinha to work on displacement and the latter showed deep interests. What does it mean? did he ask him to present 'his' version of displacement? what do you want to prove , you decided not to have contact with Sinha will lead a uproar in the city!! it will be news in TOI and other national dailies!! you must expalin what inspired to go there ? waht was atmosphere of seminar and foundation since yu talked of bookself(savarkar's books even oin other libraries books of thesame nture are put to gether, that you don't know) this shows either you don't know library system or you were aware of IPF's pro RSS stance. soon you will find lefg leaders attending the seminar.

  5. Manushhi: Congratualations Burnawal saheb for taking all precautions from a person. who has been descrinbed by your ilk as 'ideologue of murderers". Go ahead. don't go to IPF and meet rakesh sinha , it will definitely damage your career. after the NDA or BJP will come to power, i hope you will migrate from India since you have to mneet many RSS people who will then in government.
    why I admire Rakesh Sinha is his modest appraoch. he does not look like a director. he meet even a common and junior scolar with the same warmth and pay respect to him. the person who takes class in Communist Party of India's study circle known as party school has been engaged in one of projects of IPF. I can tell his name. he is professor in a prestigious school. Gyanendra Pandey , editor Lok sabha TV is also doing project, and soon a marxist professor from JNU is going to accept a project. A pro CPI(ML) filma maker exhibited his film Aranya rodan at IPF programme on Forest rights of tribals in which I was present. sinha opposed unequivocaly the vedanta and corporate houses, he one of lectures in front of RSS leaders and some Marxists like Shaibal Gupta, Memman mathew, the ediotr HT Patna edition, criticised BJP government sin hhttisgarh, jharkhand for not taking radical steps to improve the consition of tribals and giving permission to corporate houses to plunder the resources of these regions.Never visit IPF never meet rakesh Sinha , you will be awarded with big gold medal. manushi manushi29@gmail.com

  6. Manushhi: Congratualations Burnawal saheb for taking all precautions from a person. who has been descrinbed by your ilk as 'ideologue of murderers". Go ahead. don't go to IPF and meet rakesh sinha , it will definitely damage your career. after the NDA or BJP will come to power, i hope you will migrate from India since you have to mneet many RSS people who will then in government.
    why I admire Rakesh Sinha is his modest appraoch. he does not look like a director. he meet even a common and junior scolar with the same warmth and pay respect to him. the person who takes class in Communist Party of India's study circle known as party school has been engaged in one of projects of IPF. I can tell his name. he is professor in a prestigious school. Gyanendra Pandey , editor Lok sabha TV is also doing project, and soon a marxist professor from JNU is going to accept a project. A pro CPI(ML) filma maker exhibited his film Aranya rodan at IPF programme on Forest rights of tribals in which I was present. sinha opposed unequivocaly the vedanta and corporate houses, he one of lectures in front of RSS leaders and some Marxists like Shaibal Gupta, Memman mathew, the ediotr HT Patna edition, criticised BJP government sin hhttisgarh, jharkhand for not taking radical steps to improve the consition of tribals and giving permission to corporate houses to plunder the resources of these regions.Never visit IPF never meet rakesh Sinha , you will be awarded with big gold medal. manushi manushi29@gmail.com

  7. मैं एक मामूली सा आदमी हूँ. मामूली सी हैसियत, मामूली सी समझ. मेरे लिए क्या सज़ा हो सकती है ये जानने की जिज्ञासा है. मेरा कसूर ये है कि मैं एक श्रोता के रूप में उस कार्यक्रम में बैठा था जहाँ मंच पर मंगलेश जी विराजमान थे.
    मैं मार्क्सवादी रुझान का व्यक्ति हूँ. पार्टी से किसी स्तर पर जुडाव न होने पर भी अपनी मान्यताओं के कारण अ.भा.वि.प. के कुछ लोगों से १२ साल पहले कम्युनिस्ट होने का तमगा पा चुका हूँ. पिछले महीने प्रलेस के तीन दिवसीय कार्यक्रम में 'हे परमेश्वर' नाम की एक अनीश्वरवादी कविता पढ़ी थी. और ज्यादा बोलना आत्मविज्ञापन हो जायेगा.
    मेरी कुछ दिक्क़तें हैं.
    १. ११-१२ साल पहले दिल्ली में सरस्वती पूजा के एक मंच पर कविता पाठ के एक कार्यक्रम में मैंने कविता पढ़ी थी. मेरे एक साथी मेरे वहां से कविता पढने पर नाराज़ थे. उस खरे और तर्कशील व्यक्ति की नज़रों में गिरने का मुझे भय था. मुझे अहसास हुआ कि मैं शायद अभी नादान हूँ. और काफी लोगों के बीच कविता पढने का मेरा सुख काफूर हो गया. इसके बाद ऐसे कई अवसरों पर मेरे मार्क्सवादी रुझान के बावजूद कविता पाठ के लिए मुझे बुलाया गया लेकिन मैं नहीं गया. एक डर था मुझे उस मंच पर जाने के कारण कुछ लोगों द्वारा सांप्रदायिक समझ लिए जाने का, मेरे करियर से जुड़े लोगों की भी अदृश्य नज़रें मुझे घूरा करती थीं. जबकि मेरा अनुभव है कि नागार्जुन-त्रिलोचन की-सी प्रगतिशील और सम्प्रेषणशील कवितां के प्रशंसक काफी संख्या में ऐसी जगहों पर होते हैं. हमारी कविता को कोई सेंसर नहीं करता. बल्कि विरोधियों के बीच कविता पढना शायद एक साहस का भी काम है. मेरी जिज्ञासा है कि क्या हम उन श्रोताओं को खोने और उनमे समानता और न्यायपूर्ण विचारों के प्रसार का अवसर गंवाने को एक नुकसान नहीं मानते?
    २. मंगलेश जी जिस कार्यक्रम में थे वह हिंदी सिनेमा में समान्तर सिनेमा की धारा पर एक पर्चे की प्रस्तुति थी. परचा एक युवा कवयित्री का था. मंगलेश जी 'दो शब्द' बोलने ही शायद आये थे. समान्तर सिनेमा के सामाजिक प्रभाव पर मेरे एक सवाल का उन्होंने जवाब भी दिया. इसके अलावा समान्तर सिनेमा की कई उपलब्धियां उन्होंने बतायीं, एम. एफ़. हुसैन आदि की सिनेमाई दृष्टि पर भी प्रकाश डाला. हाँ, पर्चे की कमजोरियों पर शायद शिष्टाचारवश उन्होंने कुछ नहीं कहा और परचा पढने पर युवती को बधाई दी. ये एक बुरी रस्म है जिसे स्वीकार कर लिया गया है. लेकिन इस बात पर मंगलेश जी की किसी ने आलोचना नहीं की है.
    ३. राकेश सिन्हा जी का नाम तक मैं नहीं जानता था. हाँ, वहां सेल्फ में रखी किताबें मैंने देखीं. सावरकर की रचनावली थी. और किताबों के अलावा हिटलर की 'मीन कैम्फ' भी थी. कार्यक्रम के बाद मैंने राकेश सिन्हा जी से उन किताबों की वैचारिक एकरूपता पर सवाल किया तो उन्होंने 'एकरूपता' के आरोप से इंकार किया और वहां की अन्य सामग्री और शोधकार्य देखने को भी आमंत्रित किया. मैंने विस्थापन की समस्या पर पत्नी के शोधकार्य का ज़िक्र किया तो उन्होंने गहरी रुचि ली और विस्तृत बातचीत के लिए आमंत्रित किया. वे वहां के निदेशक हैं, तो एक अच्छा प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा था, सावरकर आदि की किताबों से एक अनुमान लग जाने के बावजूद. लेकिन जब पढ़ा कि वे भाजपा और संघ के 'थिंक टैंक' हैं तो निश्चित रूप से अब उनसे कोई भी संवाद बनाने में असमर्थ हो गया हूँ.
    मेरी जिज्ञासा है कि क्या यह हम दोनों के लिए ही शुभ हुआ है?
    ४. मंगलेश जी की जगह किसी सांप्रदायिक दृष्टि वाले फिल्म समीक्षक को बुलाया जाता तो वो ज्यादा अच्छा होता? क्यूंकि इस तरह की सार्वजनिक निंदा को देखते हुए उनके जैसा कवि-विचारक-समीक्षक तो ऐसी जगहों पर जाने से बचना ही चाहेगा. मंगलेश जी तो अपनी 'चूक' भी स्वीकार कर चुके हैं. हम में से कितने लोग कल थोड़े बहुत नाम वाले हो जायेंगे और अगर हमारे विरोधी विचारों के बावजूद हमें अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया जायेगा तो… मेरी जिज्ञासा है कि हम अपनी बात अपने आग्रहों के साथ रखने के बजाय क्या फेसबुक पर आयोजक के साथ हमारी तस्वीर अवसरवादी कहकर लगा दी जाएगी इस आशंका के कारण ऐसे कार्यक्रमों में जाने से कतरायेंगे? यह हमारा साहस होगा या कायरता?

  8. ओम थानवी जी के लेखा ने जीवंत बहश को जन्म दिया है. थानवी जी ने बड़े सधे शब्दों में भारत की वैचारिक जगत की समसामयिक स्थिति का जिक्र किया है. तिलमिलाहट स्वाभाविक है. उन्होंने उस विचार जगत को झाक्झोप्रा है जो अभी भी मानकर चल रहा है कि वह जो सोचता है वही सही है.. आर एस एस को फासीवादी संगठन कहकर और राकेश सिन्हा को गाँधी हतारो का ideologue बताकर विमर्श करने वाले सोच समझा, अध्ययन और अनुभव में अपने आप को अदना सवित कर रहे हैं.राकेश सिन्हा ने तिन वर्षो में एक think Tank खड़ा किया है जहा वाम दक्षिण और स्वतंत्र चिन्तक ख़ुशी ख़ुशी आते जाते हैं. क्या प्रो अमिताव कुंडू को पता नहीं था कि सिन्हा संघ विचारधारा के सबसे अधिक तेज त्ररार विचारक हैं. वे भाजपा या संघ के किसी पद पर न थे न रहे हैं. जिस प्रतिष्ठान को संघ का कहा जा रहा है उसकी आयु मात्र तिन साल कि है. फिर secularist media यदि सिन्हा को TV चैनलो पर बुलाती है तो इसका कारण उनकी अपनी समझ है जो संघ कि परम्परागत paradigm से भिन्न है इसीलिए हमारे जैसे दलितों को भी वे आकृष्ट करते हैं. दिखिए उभोने अपने Facebook पर बंगारू लक्ष्मण के ऊपर क्या लिखा है? "एक दलित को सामाजिक जीवन में कितना संघर्ष कर राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाना होता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है." उन्होंने बंगारू को सन्देश दिया है कि अपने में बदलाव कर पुनः राजनितिक जीकें को जड़ी रखे. भ्रष्ट्राचार में फसे इस व्यक्ति के सामाजिक पृष्ठभूमि कि चिंता से उन्होंने ईण७ के debate कि धर बदल ड़ी थी. वामपंथी होने का मतलब यह नहीं है वह ब्र्ह्मंवादी नहीं है. ऐसे सकारो वामपंथी है जो मनुवादी सोच के निजी प्रवक्ता हैं.
    साझा मंच भारत को साझा सोच देगी . यही बात प्रतिष्ठान ने शुरू किया है. आपत्ति तो संघवालो को होना चाहिए था कि सिन्हा वामपंथियों को बुलाकर मंच दे रहे हैं! अशोक पाण्डेय ने तो सिन्हा कि बुअद्धिकता पर सवाल खाद किया है. उन्हें तो यह भी पता नहीं है कि autobiography or biography में क्या अंतर है. प्रतोश्थान के वेबसाइट पर मैंने जब देखा तो पाया कि दर्जनों वामपंथी विचारक वह गए है. फिर इन लाल इन्टरनेट आतंकवादियों को मंगलेश डबराल क्यों सुझा. वस्तुतः आपस कि खुंदक नकला जा रहा है. दूसरा संघ का थिंक टैंक प्रबल हो यह बर्दाश्त नहीं हो परः है. भारत के थिंक टैंक कि स्थिति पर इसने दो बड़ी संगोष्टी करायी जिनमे कौन नहीं आया ! उदहारण के लिए सैबल गुप्ता , अब सालेह शरीफ जो सच्चर कोम्मित्ती के सदस्य सचिव थे सब के सब आये. क्या वे सब नासमझ थे और अशोक पंडय जैसे ब्राह्मणवादी सोच के कथित वामपंथी ही समझदार हैं? क्या अभय कुमार दुबे को अब पाण्डेय जैसे लोगो से कहीं जाने के लिए गाते पास लेना होगा. हमने राकेश सिन्हा का अनुसरण इसलिए किया कि वे इमानदार बुद्धिवी है, संकीर्णता उनमे नहीं है, भले ही वाम्प्नाथियो के लिए चरित्र का महत्व नहीं हो राकेश सिन्हा अपने तर्कशक्ति, अध्ययन और सामाजिक सरोकारों के कारण कितने लोकप्रिय हिं इसका अनुमान तो लगाने के लिए ह्रदय और मष्तिष्क दोनों चाहिए. भाई पंडय जी एक सवाल आपसे है : आर एस एस के हेडगेवार ने किस स्थान पर गाँधी कि आलोचना कि है? जादा संदर्भा बता दे तो मै अनुगृहित रहूँगा . नहीं तो लफ्फाजी कर वामपंथ कि जो ईमानदारी से पढने लिखने, शोध करने कि छवि है कमसेकम उसमे तो बट्टा नहीं लगाइए महाराज .
    ओम थानवी जी ने बहस कि दिशा ड़ी है. उन्होंने मुझे भी उद्धृत किया है, मै संघ का स्वयमसेवक नहीं हूँ पर राकेश सिन्हा के साथ मानसिक रूप से जुदा हूँ. उनकी प्रगतिशील सोच में ईमानदारी है . वे सिर्फ जुबान से प्रगतिशील नहीं हैं. दक्षिण और वाम एवं स्वतंत्र विचारको के बीच बहस क्यों नहीं हो? आखिर विचारो के आदान प्रदान से ही तो रास्ता निकालता है. अगर ऐसा हो तो तमाम दलित jihdi activists मुझे भी कोसते हैं कि तुम राकेश सिन्हा के facebook पर सकारात्मक क्यों लिखते हो. तब तो उनकी बात मानकर दलित विमर्श को तमाम मनुवादियों वे जिसमे गाँधी को भी है शामिल कर लेते हैं से बचाना चाहिए. एक अच्छी पहल हुई उसे क्यों अंकुरित होने से पहले मारना चाहते हैं? राकेश सिन्हा ने जब राजनितिक पत्रकारिता पर पुस्तक लिखी तब भी कुच्छ वामपंथियों को शिकायत थी. अब तक संघ विचारक संघ के दायरे में बाद रहता था आज पहली बार सिन्हा जी मुख्यधारा में खड़े होकर अपनी बात रख रहे है. तकलीफ तो होगी ही. मुझे भी प्रतीक्षा है राकेशजी के जवाब का. उन्हें भी चुप्पी तोड़नी चाहिए. थानवी जी ने जिस बहस को जन्म दिया वह लम्बा चलेगा और रास्ता दिखायेगा.

  9. एनानिमस जी, उन्होंने किसे भेजा वह उनका फैसला था. जनपथ या मोहल्ला लाइव पर भेजा जाना ही ज़रूरी क्यूं था? ताकि आप जैसे अनानिमासों को वहाँ आकर गालियाँ देने का मौक़ा मिले? इसके पहले भी विभूति राय के खिलाफ छिनाल प्रकरण पर चली बहस में हमने मोहल्ला को शामिल नहीं किया था. गाली-गलौज के सहारे टी आर पी बटोरने वाली उस कुटिल व्यावसायिक वेबसाईट को एक और टी आर पी जुगाडू पोस्ट न मिलने पर आपका दुःख तमाम इशारे कर रहा है.

    उन्होंने भेजा मैंने सार्वजनिक किया, प्रभात रंजन सहित कई मित्रों ने शेयर किया, चन्दन पाण्डेय सहित तमाम लोगों ने बहस की…आप नहीं देख पाए तो वह आपकी समस्या है. उदय जी के इन झूठों को मैं इसी ब्लॉग पर थानवी साहब के जवाब में स्पष्ट कर चुका हूँ. उदय वहाँ कार्यक्रम के पहले पहुँच चुके थे, कार्ड छापा था जिस पर कुंअर उदय प्रताप सिंह के साथ ही पुरस्कार प्रदाता का भी नाम था. आदित्यनाथ ने २० जुलाई को अमर उजाला में छपी बहस में लिखा है कि "मैंने पहले ही आशंका ज़ाहिर की थी कि मेरे वहाँ जाने से उदय प्रताप जी को दिक्कत हो सकती है". स्मृति सभा नहीं सम्मान समारोह था जहाँ उदय प्रकाश ने पुरस्कार लिया, इतना तो थानवी ही स्वीकार कर चुके हैं. जब सवाल उठाये गए तो पछतावे की जगह विरोधियों की बातों को "पाखाने का फुस्कारा" कहा गया…और भी क्या-क्या. साथ में सीना पीट "हाय बेचारा मै" तो था ही. कुछ चीजें नेट पर मिल जायेंगी बाकी जो प्रेस में है उसकी कटिंग मैं उपलब्ध करा दूंगा. मंगलेश डबराल गए थे तो उनकी आलोचना की गयी. अपनी चूक मानी तो हमने उसे स्वीकार भी किया, उदय भी करते तो माना जाता, लेकिन वह तो लगातार झूठ बोलकर यही साबित करने पर लगे हैं कि वहाँ कोई पुरस्कार मिला ही नहीं था.

  10. पाण्डेय जी, 'डबराल साहब' ने पूछने पर ही सफाई क्यों दी? और जब उन्होंने वहां चले जाने की अपनी गलती स्वीकार कर ली तो उसे जनपथ या मोहल्ला लाइव को भी क्यों नहीं भेज दिया जहाँ लम्बी लम्बी बहस चल रही थी? डबराल साहब को आपने चूक कहते ही माफ़ कर दिया पर उदय प्रकाश को अब तक हड़का रहे हैं. उदय कभी आदित्यनाथ के बुलावे पर वहां नहीं गए. उन्होंने कहा कि उन्हें पहले नहीं बताया गया था कि आदित्य वहां होंगे. याने उदय ने आदित्य के साथ अचानक हो जाने को भी उचित नहीं बताया. वे बुनियादी स्टार पर अपने दिवंगत भाई के परिवार के बुलावे पर भाई की याद आयोजित स्मृति सभा में भाग लेने के लिए गोरखपुर गए थे. परन्तु डबराल तो सिन्हा के स्वयं के बुलावे पर सिन्हा के ही मंच पर गए थे. अब मार पड़ी तो पछतावा व्यक्त कर दिया, तो यह कैसा पछतावा है?

  11. क्या हिंदी का लेखक एक-दूसरे को पढ़ता भी है? नहीं, उसका काम लिखना है, पढ़ना पाठक का काम है, अगर उसे गरज होगी तो खोज कर पढ़ ही लेगा, वरना दोस्ती जिंदाबाद.

  12. ओम थानवी जी के इस लेख से सिर्फ एक बात साफ हुयी हैं और वो हैं की अब इन्टरनेट और सोशल साइट्स को भी मुख्य धारा में मान लिया गया हैं. बाकि सब कुछ उनका अपना आत्मप्रचार जैसा हैं. लेख के अंत तक शायद वो निष्कर्ष पे नहीं पहुँच पाए. उन्हें किसे महिमामंडित करना था उलझा गए थे. मंगलेश डबराल या उदय प्रकाश दोनों ही हमारे समय के महत्वपूर्ण लोग हैं और उनसे हम ऐसी उम्मीद नहीं करते. उदय जी ने योगी से पुरस्कार स्वीकार किया और मंगलेश जी ने राकेश सिन्हा का निमंत्रण, वैसे भी ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं हैं. जितने तलाशेंगे मिल जायेंगे. जब ओम थानवी अज्ञेय का महिमा मंडन कर रहे हो और भूल गए हो की ये सिर्फ उनकी जन्मशती नहीं थी…और भी कई महत्वपूर्ण लोग हैं जिन्हें बाकि सब भूले बैठे हैं. कौन किसकी पुस्तक पे चर्चा कर रहा हैं और कौन किसका लोकार्पण ..इससे साहित्य समाज को कोई लाभ हो रहा हैं अगर हैं तो खुल के बताएं. नामवर जी हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष हैं और जब जिसे चाहे ऊँचे बिठा सकते हैं, कमोबेश यही हालत बाकि बड़े लोगो की भी हैं. जितने भी बड़े नाम लिए गए हैं इस आलेख में उनमे से सभी की अपनी एक वैचारिक प्रतिबधिता हैं,लेकिन सबने ठेंगा दिखाया हैं समय समय पर.

  13. Abusing Prof Sinha? Who is abusing him? We are criticising him because he is a RSS man and this institution is an RSS institution or rather an institution to promote the rightist ideology of RSS. Now what is the so-called academic contribution of Prof Sinha? He has written an autobiography of Hedgevar, played an "important" role in defending Golvarkar when his book "we or our nationhood defined" was being criticised and thus gained a think-tank type position in the rightist circle! The funding of this "platform" has been discussed in detail in Samyantar and various other places and confirm its rightist roots. Even Mr Dabral, in his submission after our criticism,has accepted that its an ultra-rightist platform which uses the name of some "liberal and leftist" names to legitimize its position. This is why they invite people like Dabral or Joshi, who without knowing about its real purpose attended its programmes.

    Now, by repeatedly chanting these names to prove the credentials of this otherwise defamed rightist institution you are proving my point.

    Since sinha is your " revered thought leader and moral guide" this dedication of yours is very natural. I really appreciate you for you GURUBHAKTI:).

    Now, your question about our "intellectual" credentials. Well, in place of presenting my/our bio-data, I will like to present a rather democratic argument. (I know that your training makes it difficult to understand this word "democracy" :). Being a "common man", a "pathak", a Citizen of this country gives anyone enough authority to raise a question. That is why a petty professor like Sinha gets an authority to criticise Left and liberal intellectual giants in his books. That is why a petty leader like hedgevar gets a right to criticise someone like Gandhi. so please don't get so carried away in you "gurubhakti"..and while quoting these names, remember that at least one of the has said sorry for this "CHOOK".

  14. Do you want to know my name , get it : I am Manushi Rana(my email id manushi29@gmail.com ) I am also available at Facebook. Pl try to comprehend ;the real issue is now who is writing, but what is being written. By abusing Prof Rakesh Sinha you are trying to attract the attention and get some identity, forget it. He created a platform which atracts people of various school of thoughts and ideologies. who else has done so in the capital? IPF is merely three years old organisation with Pro Sinha as its director. he opened a process for mutual understanding, cooperation, dialogues.
    another point , those who are calling the name to sinha , my question is what is your own contribution in pulic life, academic field or social work which gives you some authority to make such assertive guidance, diktat to people like Thanvi, Dabral, Uday Prakash , all of ar emen of eminence and some of you are using abusive polemices!!A shameful.
    Today I talked to Prof Sinha , who is my revered thought leader and moral guide, and requested him to respond, he said, "such things happen when transition takes place". Not only Dabral, Prof Amitav Kundu, my profesor from JNU and known as Guru of Sitaram yechury, presented a paepr at IPF, released its monograph at IIC and praised Rakesh Sinha in presence of hundreds of participants!! are you greater scholar and activist than Kundu!! can you imagine to get his height in this life? Abhay Kr Dubey from CSDS, was a speaker, he visited IPF due to Rakesh Sinha, I was present there and Sinha supported his arguments when he was disrupted by one pro BJP lawyer Meenakshi Lekhi!!Ramsharan Joshi, Qmar Agha, Arif Md Khan, Prof Jagannath Ambagudia, Asha Das, member secretary Rangnath Mishra Commission,Balendu Dadhich, Alok Mehta, Prof Vivek Kumar, and the list is long, allof them spoke at IPF , Dr Ramji Singh, a Gandhian spoke thrice at IPF platform. "Grapes are sour" for such frustrated people who have only weapon to use ,i.e., abusive assertiveness and polemics.God Bless you.

  15. मेरा नाम असली है इसको मुझे सिद्ध नहीं करना है. वैसे ही जैसे ओम थानवी या प्रभात रंजन को अपने होने को सिद्ध नहीं करना है. नाम से फर्क पड़ता है. सबसे अधिक तब जब सारी बहस को अंततः व्यक्तिगत बना दिया जाता है.

    डबराल या खरे गए क्यों यह सवाल उनसे पूछिए. हमने भी पूछा था डबराल साहब से. जो जवाब उन्होंने दिया उसे पोस्ट किया और उस पर अपना पक्ष भी रखा.

    खरे गर्वोन्मत हैं तो यह उनका मामला है. इसका जवाब उन्हें देना है. हम तो इसे गलत और हर हाल में ही गलत कहेंगे.

  16. आपका नाम असली है इसका क्या प्रमाण है? कोई अज्ञात नाम से लिखे, उसे अंग्रेजी में एनोनिमस लिख दे क्या फर्क पड़ा? आप बात को देखिये, नाम में कुछ नहीं रखा है. ओम थानवी की चतुराई हम समझते हैं. रोज़ संघ और भाजपा को टीवी पर गरियाते हैं, जनसत्ता भी यही करता है, अब मार्क्सवाद को एक्सपोज करने में लगे है. समझते हैं इसी से लोहियावाद फिर जिंदा हो जाएगा. लेकिन पाण्डेय जी, डबराल और खरे संघ समर्थक के यहाँ गए क्यों? डबराल पछता गए हैं पर खरे गर्वोन्मत्त हैं. इस पर क्या कहियेगा?

  17. सुधार –
    मंगलेश जी से जो शिकायत थी वह साफ़ थी कि आप अपने वैचारिक विरोधी के मंच पर जाकर लेजिटिमेसी दी जाती है (खुद उन्होंने कहा कि वे गए तो इसलिए कि उस संस्था की वेबसाईट पर भागीदारों में कुछ प्रगतिशील शामिल थे).

    की जगह

    मंगलेश जी से जो शिकायत थी वह साफ़ थी कि आप अपने वैचारिक विरोधी के मंच पर जाकर उसे लेजिटिमेसी देते हैं (खुद उन्होंने कहा कि वे गए तो इसलिए कि उस संस्था की वेबसाईट पर भागीदारों में कुछ प्रगतिशील शामिल थे).

    पढ़ा जाय

  18. ऊपर मेरे कमेन्ट का जवाब देखिये…किस तरह वहाँ जाने वाले नाम लेजिटिमेसी देते हैं…वह स्पष्ट है.

  19. हमारी बहस की हिम्मत का सवाल छोड़िये भाई …अपना चेहरा दिखाने की हिम्मत तो ले आइये पहले. 🙂

  20. थानवी जी ने सुन्दर लेख लिखा है. उन्होंने उन छ्छ्ले कमेंट्स भी अपने लेख में शामिल किया है जिसमे प्रो राकेश सिन्हा को टार्गेट किया गया है. ऐसा छ्छ्ला लिखने वाले थानवी , डबराल, उदय प्रकाश , विष्णु खरे जैसे सहिय्त्याकारो का सहारा लेकर इन्टरनेट पर कुकुरमुत्ते की तरह जीवित हैं. कोई संघ के विचारक को दक्षिणपंथी तो कोई विशिला विचारक कह रहा है. यही है स्टार संवाद का. ऐसे लोग ही दस बीस साल बाद थानवी, विष्णु खरे , उदय प्रकाश और डबराल का स्थान लेंगे? भारत नीति प्रतिष्ठान (i pf) संवाद का एक विश्वशनीय मंच बनकर उभरा है. रामशरण जोशी, आशुतोष , डा रामजी सिंह , ज्ञानेंद्र पाण्डेय, प्रोफ अमिताव कुंडू , आशा दस, आलोक मेहता, अभय कुमार दुबे जैसे लोग प्रतिष्ठान के कार्यक्रम में शिरकत कर चुके है. कुकुरमुत्तो के चलाने से हाथी की चल रुकता नहीं है, लोग प्रतिष्ठान के मंच पर आने के लिए तैयार बैठे हैं. संघ को जो लोग हत्य्रार और दक्षिणपंथी मानते हैं उन्हें अकेले राकेश सिन्हा जबाब देने के लिए तैयार बैठे हैं. किसी में औकाद है तो सर से बहश करने की हिम्मत दिखाए. उनसे मिलकर देखि तुम्हारी प्रगतिशीलता धरी की धरी रह जाएगी .

  21. और यह चतुराई भरा आलेख सिर्फ और सिर्फ मार्क्सवाद का मजाक उड़ाने और प्रतिबद्ध साहित्य पर कीचड़ उछलने के लिए लिखा गया है..और दुर्भाग्य से इसका मौक़ा हमारे ही लोगों ने उपलब्ध कराया है..

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