संतों घर में झगरा भारी!

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कल हमने जनसत्ता संपादक ओम थानवी का लेख आवाजाही के हक मेंजनसत्ता से साभार लगाया था. फेसबुक और ब्लॉग्स पर गुंटर ग्रास की कविता, विष्णु खरे और मंगलेश डबराल को लेकर चली बहसों के सन्दर्भ में उस लेख में जो सवाल उठाये गए उसने उन बहसों को एक बात फिर बहसतलब बना दिया है. आज उसी लेख का rejoinder लिखा है कवि-संपादक गिरिराज किराडू ने- जानकी पुल.
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“खुलापन” और वाम विरासत का सवाल: गिरिराज किराडू

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ओम थानवी इन्टरनेट को संदेह से देखते रहे हैं और उसके आलोचक रहे हैं. उन्होंने ब्लॉग और फेसबुक पर की गई टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर “जनसत्ता” में लिखा है यह कुछ अचरज और कुछ प्रसन्नता की बात है. अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर इन्टरनेट पर प्रकाशित सामग्री का पुनर्प्रकाशन तो वे कुछ समय से कर ही रहे हैं. अच्छा है कि इस माध्यम को वे केवल जाहिलीके सर्वेक्षण के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहे.

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यहाँ “जानकी पुल” पर “जनसत्ता” से साभार प्रकाशित उनका लेख लोकतान्त्रिक खुलेपन और सहिष्णुता के पक्ष में तर्क करता है. उसका शीर्षक ही है: “आवाजाही के हक़ में”. उनके निशाने पर ‘मतवादी‘ लेखक और उनके संगठन हैं. अन्य पहलुओं पर विचार करने से पहले इस पर बहस होनी चाहिए कि हिन्दी का साहित्यिक वाम स्तालिनवादी और  माओवादी जनसंहारों पर या पोलपोट के अमानवीय कृत्यों को लेकर अभी भी ‘अपोलोजेटिक‘ क्यूँ हैं और संगठनों से जुड़े लेखक इन भयानक मनुष्यता विरोधी कृत्यों पर कोई साफ़ पोजीशन क्यूँ नहीं लेतेअरुंधती राय यह मान सकती हैं कि रूस में स्तालिन के शासन में और चीन में माओ के दौर में व्यापक पैमाने पर जो जानें ली गईं वेजनसंहार‘ थीं लेकिन हमारे लिए यह कह पाना अभी भी संभव नहीं है.
व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि ‘द हिस्ट्री एंड द सोशियोलाजी ऑफ जेनोसाइड‘  के लेखकों फ्रैंक चाक और कुर्ट योहानसन की परिभाषा ज्यादा उपयुक्त है. वे कहते हैं कि ‘जनसंहार किसी एक समूह को नष्ट करने के लिए राज्य या किसी अन्य सत्ता द्वारा की गई एक-तरफा सामूहिक हत्याओं का एक प्रकार है जिसमें उस समूह और उसकी सदस्यता को भी नष्ट करने वाली सत्ता ही परिभाषित करती है. इस तरह परिभाषित करने पर सुहार्तों द्वारा इन्डोनेशिया में (10 लाख)पोलपोट द्वारा कंबोडिया में (15 लाख)स्तालिन द्वारा सोवियत यूनियन में (6 करोड़) और माओ द्वारा चीन में (7 करोड़) विराट पैमाने पर किए गए अपराध जनसंहारों में शामिल होते हैं .
(अरुंधती रॉयआउटलुक पत्रिका मेंलिंक:
अरुंधती रॉय के लिए यह संभव है कि एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी की तरह उपरोक्त जनसंहारों के साथ गुजरातइजरायलरवांडा और तुर्की में हुए जनसंहारों का भी प्रतिरोध कर सकें. यह हिन्दी में न वाम के लिए संभव है न वाम विरोधियों के लिए. जैसी ‘सेलेक्टिविटी‘ ज़्यादातर वाम समर्थकों में है वैसी ही ज़्यादातर वाम विरोधियों में भी है. अरुंधती रॉय ने अब और खुल कर अपने ऊपर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है. हाल में उन्होंने कहा है कि मेरे जैसे कॉर्पोरेट रॉयल्टी पर जीवन चलाने वाले लोगों को कॉर्पोरेट दुराचारों पर पहला पत्थर फेंकने का हक़ नहीं है. इसी तरह नोम चौमस्की जो अमेरिकी विदेश नीति और उसके साम्राज्यवाद के सबसे प्रभावी आलोचकों में हैंदुनिया भर में अमेरिकी प्रभुत्व का विरोध करने वालों के लिए प्रेरणा हैंलेनिनियत और सोवियत यूनियन के इतने प्रबल आलोचक हैं कि न सिर्फ  “लेनिन को समाजवादी आंदोलन का दक्षिणपंथी विचलन” मानते हैं बल्कि सोवियत यूनियन को लेनिन के जमाने से ही समाजवाद के विरुद्ध चलने वाली व्यवस्था मानते हैं. (http://www.chomsky.info/articles/1986—-.htm)
यह ‘खुलापन‘ एक सबक है.
दुर्भाग्य से यह खुलापन हिन्दी में दोनों तरफपर्याप्त नहीं है और जो थोड़े से लोग इन दोनों से असहमति जताते हैं उन्हें ये अपने ‘प्रतिपक्षी का आदमी‘ सिद्ध करने में लग जाते हैं.
साहित्य में सारा विमर्श इस पर सिमट जाता है कि किसकी उपेक्षा हुईकिसे पुरस्कार मिला आदि. हम यह भूल जाते हैं कि किसी के नाज़ी दमन काफ़ासिज़्म का समर्थक होने का या स्तालिन को जायज ठहराने का अर्थ लाखों करोड़ों हत्याओं को जायज़ ठहराना है. ऐसे लेखकों को आदर मिलेइसकी इतनी चिंता क्यूँ की जायेउसी तरह किसी भी तरह के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या धार्मिक कट्टरपंथ  का बचाव हजारों लाखों लोगों की हत्या को सही ठहराने और उसके विरोध में लोगों के आक्रोश और मत को प्रभावित करने की कोशिश हैऐसा करने वालों को आदर मिले यह कैसा लोकतन्त्र है?
हिन्दी समाज में उदारता क्या दक्षिणपंथी मंचों पर जाने से ही आएगीक्या लोहियादियों और वामपंथियों के बीचप्रगतिशीलों और कलावादियों के बीचविचारधारावादियों और अस्मितावादियों के बीच आवाजाही नहीं रही हैउनके बीच बहसेंझड़पेंसंवाद नहीं हुआ है?
लेकिन ऐसे लेखकों के काम और जीवन काउनकी प्रसिद्धि और लोकप्रियता का गंभीर अध्ययन ज़रूर होना चाहिए ताकि यह समझ में आ सके कि आखिर वे ऐसे जनसंहारों के समर्थक कैसे हुए और होने के बावजूद लोकप्रिय कैसे हुए और समाज के किन वर्गों में हुए. “समाज” मोनोलिथ नहीं है वैसे ही जैसे ‘पश्चिम‘ भी नहीं हैं.

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ओमजी की एक स्थापना यह है कि पश्चिम में लेखक के जीवन और सृजन के बीच दूरी कोउसके सामाजिक प्रतिफलनों और ‘साहित्यिकऊंचाइयों के बीच फर्क को शुरू से सम्मान दिया गयाकि वहाँ “अभेद का यह सलीका बगैर किसी गांठ के जाने कब से कायम है.” इस स्थापना में पश्चिम को एक मोनोलिथ की तरह देखा गया है. एज़रा पाउंड को पश्चिमी वामपंथ ने बल्कि बहुत सारे उदारतवादियों ने कभी स्वीकार नहीं किया. एज़रा पाउंड के बारे में यह छुपाने की कोशिश की जाती रही है कि वे मुसोलिनी के समर्थक थेवैसे ही जैसे भारत में निर्मल वर्मा के बाद के दिनों के दक्षिणपंथ पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है. नोबेल  विजेता नूट हाम्सुन को आज तक उनके देश में माफ नहीं किया गया है हिटलर का समर्थन करने के लिए. ज्यां जने को सार्त्र ने ‘सेंट जने‘ लिख कर स्वीकार्यता दिलाई लेकिन उन्हें एक महत्वपूर्ण लेखक शायद ही कोई पश्चिमी वामपंथी  मानता हो. उसी पश्चिम में जब सी.आई.ने यह उजागर किया कि वह काँग्रेस फॉर कल्चरल फ़्रीडम जैसे संगठनों की गुप्त मदद करती रही है तो स्टीफन स्पेंडर ने उसके द्वारा प्रकाशित ‘एनकाउंटर‘ पत्रिका के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया था लेकिन हिन्दी में इस प्रसंग में किसी जुड़े हुए किसी लेखक ने खेद प्रकट करना भी ज़रूरी नहीं समझा. शायद इसलिए  कि भूतपूर्व वामपंथी स्पेंडरजिनका स्तालिन और हिटलर के बीच 1939 में हुए समझौते के कारण वामपंथ से मोहभंग हो गया थाऔर कुछ भी करें अमेरिकी एजेंट नहीं कहलाना चाहते थे.
जबकि हाल ही में एक हिन्दी पत्रिका ने मेरे एक वाक्यांश  “स्टालिन के अपने पुराने सहयोगी हिटलर के खिलाफ एक अहम फतह हासिल करने” को संपादित करके “स्टालिन के हिटलर के खिलाफ एक अहम फतह हासिल करने” कर दिया. मानो यह वाक्यांश संपादित होने से इतिहास से ”मोलोतोव-रिबेनट्राप समझौता” इरेज़ हो जाएगा.
भारत के हिन्दू समाज में एकलव्य और शंबूक की कथा से लेकर बौद्धों के साथ बर्ताव में और इसके जातिवादी ढांचें में असहिष्णुता का अमानवीय रूप देखा जा सकता है. अन्य समाजों में भी गैर बराबरी और दमन के कई रूप हैं. अकादमिक रस्साकशी लाखों के दैनिक अपमान और मनुष्य से एक दर्ज़ नीचे जीने की असहनीय वेदना को कम नहीं कर सकती. लेकिन एक स्तर पर भारतीय समाज नए और विरोधी विचार को लेकर कभी उस तरह असहिष्णु नहीं रहा जैसे पश्चिमी समाज मध्यकालीन चर्च द्वारा ‘विधर्मियों‘ और उनकी पुस्तकों को जलाने से लेकर नाज़ी कैंपोंस्तालिनी शो ट्रायल्स और मैकार्थियन विच हंट में रहा है.
इसके बरक्स कबीर से लेकर कुफ़्र की शायरी करने वालों तक के साथ भारतीय समाजों ने अपेक्षाकृत रूप से सहिष्णुता दिखाई है. कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और फतवों जैसी कट्टरता एक ‘आधुनिक‘ घटना है जो बहुत हद तक पश्चिम से आई है लेकिन ‘पूरब‘ औरपश्चिम” के भेद को आत्यंतिक और अटल मानना एक किस्म का हटिंग्टनी  ‘सांस्कृतिक/ साभ्यतिक सापेक्षतावाद‘ होगा जो वहीं ले जा सकता है जहाँ  वो ले जा रहा है.
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हिन्दी में अपनी संपादकीयआयोजकीय अभिरूचियों और चयन में अज्ञेय और अशोक वाजपेयी लोकतान्त्रिक लोगों में रहे हैं सुना है विष्णु खरे ने तो एक बार अशोक वाजपेयी के विजन की तुलना नेहरू से की थी. अज्ञेय के सप्तकों में कई वामपंथी हैंअशोक वाजपेयी के सारे कामों में सभी तरह के लोग रहे हैं. बहुत सारे वामपंथी मंच और पत्रिकाएँ भी सभी तरह के लेखकों को स्थान दे रहे हैंधुर दक्षिणपंथियों को छोडकर.
अपने लेखन में ‘अहं के विलयन‘ की बात करने वाले अज्ञेय लेकिन एक नवागंतुक द्वारा की गई तीखी आलोचना से इतने आहत हुए कि उन्होंने एक सार्वजनिक संस्था का बरसों बहिष्कार किया.
जिनका आप विरोध करते हैं और सचेत करते हैं उनसे सम्मान की अपेक्षा क्यूँक्या अज्ञेय को वामपंथियों की स्वीकृति ही ‘निर्विवाद‘ रूप से एक महान लेखक सिद्ध कर सकती थी?

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(साहित्यिक) वाम की दीर्घकालीन राजनीति क्या हैलंबे समय में वे क्या करना चाह रहे हैंक्या साहित्य अकादमी ‘सही‘ लोगों को मिलता रहेराजा राम मोहन रॉय में ‘सही‘ किताबें खरीदी जाती रहेंजी.एन.यू.डीयूवर्धा में ‘सही‘ लोगों को नौकरी मिलती रहेराजकमल आदि में ‘सही‘ लेखक भी छपते रहें यही दीर्घकालीन राजनीति हैया इसके परे भी लेखक कुछ कर सकते हैं?
क्या वे इसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को और समतामूलक और सहनीय बनाने के लिए काम कर रहे हैं या ‘साम्यवादी सर्वहारा क्रांति‘ के लिए?यदि सर्वहारा क्रांति ही लक्ष्य है तो उसके लिए जनता के बीच में क्या तैयारी हैनक्सल इलाकों को छोडकर क्या यह कहीं और अंश मात्र भी संभाव्य और वास्तविक लक्ष्य हैसरकारी या कॉर्पोरेट नौकरी करने और उसके बीच साहित्य की यह भारी दुनियादारी संभालने के बाद कितने लोग कितना समय ‘साम्यवादी सर्वहारा क्रांति‘ के लिए दे रहे हैंया लेखन ही काफ़ी है उसे लाने के लिएइस बार ‘रेवोल्यूशनरी सबजेक्ट‘ कौन होगासर्वहारा क्या वही है या कोई नया सर्वहारा इस बीच आ गया हैइन प्रश्नों का जवाब निश्चयात्मक रूप से देना भारत में ही नहीं कहीं के भी प्रतिबद्ध के लिए बेहद मुश्किल है. समाजऔर पूंजीवाद ही इस बीच इतना बदल गया है.
इसलिए किसी फ्यूचर मॉडल के लिए खाका बनाते हुए भी वर्तमान में  प्रतिरोध‘ ही सबसे प्रभावी रणनीती भी हैराजनीति भीलेकिन प्रतिरोध सच्चा होना चाहिएअवसरवादी नहीं. कभी किसी संस्था का बहिष्कार करना कभी वहाँ चले जानादक्षिणपंथी शासन में राज्य स्तरीय ठुकरा देना केंद्रीय अकादेमी का ले लेनाकभी शीलाजी के फोटो वाली पत्रिकाएँ छापना कभी रमन सिंह जी कीकभी मायावती जी की,  कभी अर्जुन सिंह की गोद में बैठना कभी दुर्जन सिंह जी की जब तक यह चलता रहेगा समाज में तो क्या साहित्यिक समाज में विश्वसनीयता नहीं बन पाएगी.
पर इसके बावजूद भविष्य की कोई भी जन-पक्षी राजनीति बिना वाम के हो सकती है?

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देरीदा जैसे उम्र भर वाम से दूरी रखने वाले दार्शनिक ने कहा था बिना मार्क्स केबिना मार्क्स के किसी एक संस्करण के कोई भविष्य नहीं हो सकता. यह उन्होंने रूस के पतन के बाद कहा था. वाम को कुछ खास तरह के वामपंथियों से बचाना अंदर बाहर सभी तरह के लोगों की ज़िम्मेवारी है. वाम-समता मूल्यों वालावर्तमान लोकतन्त्र से ज़्यादा स्वाधीन और बराबरी वाला और पुरानी वाम व्यवस्थाओं के सर्वसत्तावादी दमन से मुक्त समाज बनने के लिए यह ज़रूरी है. वाम विचारक ज़िजेक ने ईसाईयत के बारे में कहा है कि इसकी विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे केवल ईसाईयों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकता वैसे ही वाम-विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे केवल संस्थागत वामपंथियों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकता. 
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खुद ओम थानवी की राजनीति क्या हैइधर कभी उन्होंने “जनसत्ता” के बारे में लिखा कि वह एक वाम-समर्थक अखबार रहा है और रहेगा. खुद वे क्यूंकि अज्ञेय को लेकर एक अभियान चला रहे हैं उनके बारे में यह धारणा बन गई  है कि वे प्रतिगामी मूल्यों के हैं. उनके द्वारा वामपंथी लेखकों के आचरण पर दो टूक टीका टिप्पणी से भी ऐसा माहौल है. लेकिन वामपंथी लेखक= वामपंथ नहीं हैं. जिन लेखकों को लगता है वही वामपंथ हैं और उनकीउनके व्यक्तिगत आचरण की आलोचना विचारधारा की आलोचना है उन्हें खुद के वामपंथी होने का द्वन्द्वात्मक दर्शन में विश्वास करने वाला होने का दावा फिर से परख लेना चाहिए.
ओम थानवी की राजनीति के लिए उनका बेहतरीन यात्रा वृतांत ‘मुअनजोदडो‘ पढ़ना चाहिए. उन्होंने उसमें भारतीय इतिहास के बार में जहाँ  जहाँ  भी ज़रूरत पड़ी है दक्षिणपंथी दकियानूसियों का स्पष्ट प्रतिवाद किया है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित इतिहास दृष्टि का समर्थन किया है.

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लेखकों के खेल निराले होते हैं. भाजपाई सरकार के कार्यकाल में साहित्य अकादेमी का पुरस्कार ठुकराने वाली और कॉर्पोरेट तंत्र पर तीखा प्रहार करने वालीजयपुर में साहित्य महोसत्व के डी.एस.सी द्वारा स्पान्सर्ड होने पर व्यंग्य करने वाली अरुंधति रॉय ने बुकर जैसे कॉर्पोरेट का पुरस्कार क्यूँ लिया?
1972 में मार्क्सवादी जॉन बर्जर ने यही पुरस्कार स्वीकार करते हुए दिये गए भाषण में कंपनी द्वारा वर्षों तक बंधुआ मजदूर रखने का विरोध किया और कहा कि इस कंपनी का 130 वर्षों का शोषण ही गयाना में गरीबी का कारण है. बर्जर ने अपनी आधी पुरस्कार राशि ब्रिटिश ब्लैक पैन्थर्स को दे दी. अरुंधती ने भी इस पुरस्कार की राशि नर्मदा आंदोलन को दे दी थी.
साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उदय प्रकाश ज़बरदस्त फिनोमेना हैं. काश मैं उनके सिर्फ लेखन के बारे में जानता! उन्होंने कब क्या कहा और किससे कब क्या स्वीकार किया उसे जाने भी दें (क्यूंकि उदय एज़रा पाउंड बिलाशक नहीं हैं) तो आज मंगलेश डबराल को “दैत्यों, सत्ता के तिकड़मबाजों” में शामिल मानने वाले (और मंगलेश भी एज़रा पाउंड बिलाशक नहीं हैं) उदय ने कभी “कविता की अपनी पहली किताब” जिन लोगों को समर्पित की थी उनमें मंगलेश भी थे! 
जय हो! संतों घर में झगरा भारी!

15 COMMENTS

  1. अज्ञेय व्यक्तिवादी और प्रतिक्रियावादी थे, उपेन्द्रनाथ अश्क सर्वहारा और क्रांतिकारी थे. जैसा कि अभिषेक ने शुरू में ही कह दिया था, सब मार्क्सी सुविधाजनक खोल में घुस जाते हैं. नीलाभ जब अरुण माहेश्वरी की चाकरी करते हैं वहां का पूंजीवाद क्या अचानक समाजवाद हो जाता है?

  2. टिप्पणी के तौर पर सिर्फ़ एक — जिस एज़्रा पाउण्ड का हम हिन्दी वाले अक्सर बिना पढ़े विरोध करते रहे हैं, क्योन्कि यह हमारा वतीरा है, उस ने अमरीकी पूंजीवादी तन्त्र की और वहां की मुनाफ़ाख़ोरी की सबसे ज़्यादा मुख़ालफ़त की है और वह भी अपनी कविताओं में.क्या हिन्दी के लोगों ने उसकी कविताएं पढ़ी भी हैं ? क्या हिन्दी के लोग वाक़ई जानते हैं कि रोम रेडियो से जो प्रसारण पाउण्ड ने किये थे वे फ़ासीवादी थे ? क्या हिन्दी वाले जानते हैं कि अमरीकी सेना पाउण्ड को गिरफ़्तार करने के बाद कैसे अमरीका ले गयी थी — एक पिंजरे में बन्द करके ? क्या हमारे प्यारे हिन्दी वाले यह भी जानते हैं कि पाउण्ड को मुक्त कराने के लिए जो देश व्यापी अपील अमरीका में जारी हुई थी उसमें अनेक यहूदी भी थे और वे ग़द्दार नहीं थे — न अपनी क़ौम के न मानवता के. इसीलिए पाउण्ड शमशेर को भी प्रिय थे. मामले को उलझाने के लिए मेहरबानी करके न तो गिरिराज को अनावश्यक बातें करनी चाहियें न नन्द भारद्वाज को और न मित्र बटरोही को. वाम विरोध हमारे यहां एक फ़ैशन है जैसे वाम समर्थन. रूस और चीन की ग़लतियां रूसी और चीनी जनता की ग़लतियां नहीं हैं न हो सकती हैं, वैसे ही जैसे रेगन और बुश(द्वय) को सामने रख कर हम अमरीकी जनता से नफ़रत नहीं करने लग सकते.सवाल तो यह है साथियो कि आपकी कविता लोगों के पक्ष में खड़ी है या नहीं ? अगर खड़ी है तो वे इसे क़बूल क्यों नहीं कर रहे? मंगलेश को भी अब बार-बार ग़लतियां करके माफ़ियां मांगने से बचना चाहिये. रहे उदय प्रकाश तो उनका विरोध अक्सर रैबिड हो जाता है — अनावश्यक रूप से हिंसक. वे बहुत जल्दी आपा खो कर जातिवादी आरोप लगाने शुरू कर देते हैं, जैसा कि उन्होंने महन्त के सिलसिले में किया था. पर उनसे गिला क्या ? हिन्दी के दीन-हीन कवियों को जब तक पुरस्कारों और गौड फ़ादरों के सहारे की ज़रूरत रहेगी वे इस तरह की "गलतियां" करते रहेंगे. सवाल यह नहीं है कि अज्ञेय घटिया हैं या महान. सवाल यह है कि वे जैसे हैं — शुरू में सामाजिकता और मानवतावाद से प्रेरित और बाद में नितान्त व्यक्तिवादी — वैसे क्यों हैं और किन कारणों से ऐसे हुए. विपथगामियों की भी एक लम्बी परम्परा रही है मित्रो. बहस ज़रूर चलाइये पर इसलिए ताकि चीज़ें यानी हालात बेहतर हों हिन्दी के कवि अपनी कविता के बल पर लोगों में मक़बूल हों, उन्हें किसी पुरस्कार या गौड फ़ादर का सहारा न लेना पड़े, इसलिए नहीं कि सन्तों के झगरे में धरम ही बिला जाये.

  3. साहित्योत्सवों क्रांति करने के स्थल नहीं होते लेकिन वहाँ क्रांतिकारी कई होते हैं। जयपुर और हैबिटेट के महोत्सव में बहुत फर्क है। हैबिटेट महोसत्व तो मुख्यतः दलितों, स्त्रियों, क्रांतिकारियों का ही था। जयपुर में भी सजायाफ्ता कश्मीरी पत्रकारों से लेकर माओवाद-समर्थक कई थे। हमेशा होते हैं।

  4. जब बात ओम थानवी और डबराल की चल रही थी…जब बात एक खास केस में सही-गलत की चल रही थी, तब रूस-चीन और तमाम-तमाम उद्धरणों का घटाटोप पैदा कर यह "विद्वत्तापूर्ण" लेख दरअसल, पूरे मुद्दे को वाम के खिलाफ (प्रकारांतर से वाम लेखकों के खिलाफ) एक टेलर मेड बहस की ओर मोड़ने और ओम थानवी जैसों को बचाने की कोशिश करता है. देरिदा की छौंक बस अपनी 'लेजिटिमेसी" को बनाए रखने के लिए है. यह लेख कहीं यह नहीं बताता कि थानवी, बाजपेयी या खुद लेखक उस "अवश्यम्भावी" वाम संस्करण के निर्माण या उस "सर्वहारा क्रान्ति" के लिए क्या कर रहे हैं? हैबिटेट से लेकर जयपुर समारोहों तक पूंजीपतियों के पैसों से किये जा रहे आयोजनों के सहारे क्या क्रान्ति का कोई नया संस्करण तलाशा जा रहा है?

  5. नंदजी, स्टालिन के जनसनहारों को अब पूंजीवादी प्रैस का दुष्प्रचार कैसे कहा जा सकता है जब खुद रूसी आर्काइव खुल चुके हैं और प्रमाण दे रहे हैं। 2 अरुंधती रॉय को भी आप पूंजीवादी प्रेस के प्रचार तंत्र का हिस्सा मानते हैं जिनकी 'व्यक्तिगत' राय में रूस और चीन में व्यापक पैमाने पर जनसंहार हुए। दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत हिटलर और स्टालिन ने सहयोगियों के तौर पर की थी और उनके बीच मोलोटोव-रिबेन्त्रोप सम्झौता हुआ था यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और यह सम्झौता 1941 तक प्रभावी रहा था। अज्ञेय में जनसरोकार तो आपने ही सप्रमाण प्रस्तुत किए थे कुछ समय पूर्व। तीसरे सप्तक में केदारनाथ सिंह थे। चौमस्की तो वाम के प्रेरणा स्रोत रहे हैं पिछले कितने ही सालों में और अमेरिका द्वारा किए गए इराक़ और अफगानिस्तान के दमन के सबसे कटु, सप्रमाण आलोचक भी। एजरा पाउंड का तो सबसे ज़्यादा विरोध किया है मैंने अपने लेख में। वैसे दुनिया भर में जीजेक जैसे बहुत सारे वामपंथी हैं जो मानते हैं की रूस को वामपंथ का अंतिम सत्या मानने वाले वामपंथी ही नहीं हैं। अंतिम बात लेख के शीर्षक के बारे में। अवतरन चिन्हों में दिया गया "खुलापन" ही वहाँ संदेह के घेरे में है वाम विरासत नहीं जिसे लेख न सिर्फ महत्वपूर्ण मानता है जिसे बचाने की पुरजोर वकालत भी करता है।

  6. प्रिय गिरिराज, आपकी टिप्पणी का शीर्षक ही है ' "खुलापन" और वाम विरासत का सवाल', और इससे यही ध्वनि निकलती है कि वाम-विरासत में 'खुलेपन' के प्रति आपकी अपनी शंकाएं हैं। फिर अपनी टिप्पणी में उसी वाम-विरासत में असंगतियां तलाशते हुए जिस तरह आपने देश-दुनियां के संदर्भ-विहीन दृष्टान्त और पूंजीवादी प्रैस द्वारा प्रचारित जनसंहार के मनमाने आंकड़े प्रस्तुत किये, जिस तरह रूसी क्रान्ति, चीनी क्रान्ति, लेनिन-स्टालिन-माओ आदि को नकारात्म क छवि के रूप में पेश किया, यहां तक कि दूसरे महायुद्ध में तानाशाह हिटलर को निर्णायक शिकस्त देनेवाले स्टालिन आपको उनके सहयोगी नजर आए, ऐसे में और किस प्रमाण की आवश्यकता है?
    2- नोम चौमस्की आपको इसलिए महत्वपूर्ण लगते हैं कि वे दुनिया में समाजवाद का सपना साकार करने वाले लेनिन को ही समाजवाद का विरोधी घोषित करते हैं।
    3- अज्ञेय और अशोक वाजपेयी जैसे व्यवक्तिवादी और अभिजनप्रिय लेखक आपकी दृष्टि में सबसे बड़े लोकतांत्रिक लेखक हैं, जबकि यह बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि वे अपने संपादनों और आयोजनों में सबसे अधिक भेदभाव बरतते रहे हैं। ‘तार सप्तक’ योजना के मूल में वामपंथी लेखक-कवि ही रहे थे, अज्ञेय को संपादन की जिम्मेदारी उन्हीं के द्वारा सौंपी गई थी, इसलिए पहले सप्तक में गिरिजाकुमार माथुर और अज्ञेय के अलावा सभी कवि वामपंथी रहे, लेकिन अज्ञेयजी के संपादन में निकले बाद के किसी सप्तक में किसी वामपंथी कवि के लिए कोई स्थान नहीं था, जबकि उसी दौर में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, धूमिल, देवताले, विजेन्द्र, ॠतुराज, ज्ञानेन्द्र पति जैसे कितने ही बेहतरीन वामपंथी कवि मौजूद रहे, लेकिन उनकी ओर ध्यान तक नहीं गया।
    यह अकारण तो नहीं कि फ्रैंक चाक, कुर्त योहानन, एजरा पाउण्‍ड, नोम चौपस्की , देरिदा, अज्ञेय, अशोक वाजपेयी जेसे घोषित वाम-विरोधी लेखक ही आपको सर्वाधिक प्रिय लगते हैं और उन्हीं के हवाले आपको अपने अनुकूल लगते हैं।

  7. अशोक कुमार पांडे के कमेन्ट से मैं सहमत हूँ. जो भी कहा जाय, खुले आम कहा जाय और गंभीरता से कहा जाय. इस तरह चोरी-छिपे मजाक करने का क्या मतलब है ?

  8. एक सलाह यह कि प्रभात भाई यहाँ से एनानिमस वाला आप्शन हटा दीजिए…

  9. इश्टाइल से थानवी साहब की चम्पी की गयी है…इंकलाबी तेवर के साथ.

  10. जिस गुंटर ग्रास की कविता की चर्चा हो रही हैं और साहित्य समाज अभिभूत हुआ जा रहा हैं शायद वो भूल गया हैं कि गुंटर स्वयम भी नाजी मनस्थिति का शिकार रहे हैं. उनकी इसरायल को लेकर व्यक्त कि गयी चिंता का कारन कुछ भी हो सकता हैं. रही बात गिरिराज के लेख कि तो इसे ओम थान्वी जी के लेख का विस्तार ही कहा जा सकता हैं. वैसे उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बिन्दुओ को उठाया भी हैं लेकिन कहीं न कहीं वो भी अपनी निजी या व्यक्तिगत राय कि वजह से संदेह उत्पन्न कर रहे हैं. लेखक पे चर्चा का अधिकार सिर्फ एक दूसरे लेखक को ही हैं न कि उसको पढ़ने वाले का. इन दिनों वैसे वाम समर्थक बनने का चलन आया हुआ हैं…हर कोई सर्वहारा कि बात कर रहा हैं. इस चर्चा से किसी कोई कोई लाभ भले न हुआ हो लेकिन इनको लाभ जरुर पहुंचा हैं. पहले आप पुरस्कार लीजिए फिर उसका विरोध कीजिये ..मुफ्त में प्रचार हो रहा हैं. दोनों हाथ में लड्डू हैं और सर पे शहीद का ताज भी ..मुबारक हो

  11. गिरिराज किराडू का यह हस्तक्षेप जरूरी था, अच्छी बात यह है कि उन्होंने मसले को बहुत व्यापक परिप्रेक्ष में प्रस्तुत किया है. यह भी सही है कि बिना वाम के कोई सार्थक हस्तक्षेप संभव नहीं है. तो भी भारतीय सन्दर्भों में सांस्कृतिक चेतना के सरोकारों पर हमें अलग ढंग से सोचना ही होगा, जो शायद पश्चिम-प्रेरित या पश्चिमी चिंताओं से जुड़े साहित्य के माध्यम से अंकुरित संस्कारों वाली प्रतिबद्धताओं से संभव नहीं है. हालाँकि गिरिराज जी ने इस ओर संकेत किया है. उदाहरण के लिए, कहा जा सकता है, नास्तिक या आस्तिक होना आदमी का निजी मामला है. मगर भारतीय सन्दर्भ में आपको नास्तिक होने दिया ही नहीं जा सकता. जहाँ पूरी व्यवस्था से लेकर संचार माध्यमों तक पल-पल यह बता रहे हों कि राजसी खानदान का ही व्यक्ति 'राजा' हो सकता है, धोनी, सचिन, अमिताभ, अम्बानी आदि को 'भाग्य' पैदा करता है, उस समाज में, जब कि उनके पास इसी तरह के सोच की लम्बी परंपरा रही हो, कैसे आप विश्वास दिला सकते हैं कि मनुष्य का सार्थक सोच तर्कसम्मत विचारों से ही बनता है. जिस देश में आज भी युद्ध में मारे जाने को ईश्वर का प्रसाद माना जाता हो, अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी के देश के लिए 'पाखाना' या 'पेशाबघर' जैसे शब्दों का खुले आम प्रयोग होता हो, जहाँ आज भी सती या चमत्कारी देवता के लिए लोग अपने प्राण त्याग रहे हों, वहां कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे लोग देरिदा या गुंटर ग्रास के तरह की व्यवस्थित सोच को अपना सकेंगे. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि भारतीय समाज को इसी हाल में छोड़ दिया जाय, मगर हमें उस बहुसंख्यक के तर्कों को, जो उसे धीमे जहर की तरह मार रहे हैं, फिर भी वह इसे अपना सौभाग्य समझ रहा है, अलग तरीके से सोचना पड़ेगा. परंपरागत समाजों में यह काम सत्ता या पुरोहित या धनवान कर लेता था, मगर प्रजातंत्र में यदि सबको अपने ढंग से सोचने और व्यवस्थित होने का अधिकार मिला हुआ है तो वह क्यों उतनी ही श्रद्धा से दूसरों के तर्क ग्रहण करेगा. अंततः नरेंद्र कोहली के पाठकों के भी अपने तर्क तो होंगे ही. मुझे लगता है, दकियानूसी-से दिखाई देने वाले ये मुद्दे हम हिदी समाज के सोचने-समझने वाले लोगों के लिए बड़े मुद्दे होने चाहिए.

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