चलन्तिका टीकाओं का पूरा अर्थशास्त्र बदल चुका है

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संजीव कुमार हमारे दौर बेहतरीन गद्यकार हैं. उनका यह वृत्तान्त एक सिनेमा हॉल के बहाने पटना के आधुनिक-उत्तर-आधुनिक होने की कथा है. केवल पटना ही क्यों हमारे कस्बाई शहरों के रूपांतरण की कथा है. अद्भुत किस्सागोई, स्मृति-बिम्बों के सहारे अतीत का एक ऐसा लोक रचते हैं संजीव कुमार जिसमें अतीत का मोह नहीं है, उसके तथाकथित विकास की विडंबना है और परिवर्तन का सहज स्वीकार. दस सालों बाद इसे उत्तर-कथा के साथ दोबारा पढ़ा तो और प्रासंगिक लगा. आप भी देखिये- जानकी पुल.
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मानस चलन्तिका टीका के मटमैले पर्दे पर दास्तान-ए-वैशाली
 Memory is the only one of our mental faculties that we accept as working normally when it malfunctions- Mary Warnock
कम लोगों को पता होगा कि जिस प्रतिभाबहुल हिंदी जगत ने एक ओर टेलीविज़न के लिए दूरदर्शन, स्वीमिंग पुल के लिए तरणताल जैसे शब्द गढ़े और दूसरी ओर इंस्पेक्टर के लिए निसपिटर (नासपिटा?), लार्ड के लिए लाट, अल्युमिनियम के लिए ललमुनियां इत्यादि का आविष्कार किया, उसी ने इन दोनों परंपराओं को मिलाते हुए मूवीज़-टाकीज़ यानी चलती बोलती तस्वीरों (के प्रदर्शन की जगह) के लिए एक शब्द दिया है–चलन्तिका टीका। बदकि़स्मती से यह शब्द ख़ुद अचलन्तिका साबित हुआ, पर बिहार के बेगूसराय क़स्बे से संबंध रखने वाले लोग वहां के ऐतिहासिक सिनेमाघर श्रीकृष्ण चलन्तिका टीकाके कारण इससे परिचित हैं, भले ही वे इसे जातिवाचक संज्ञा न मानते हों। वैसे भी यह मानने से ज़्यादा जानने या पहचानने का मामला है और मेरी महीन मेधा का साधुवाद कीजिए जिसने पहली ही भिड़न्त में इसकी जातिवाचकता के पहचान लिया। तब से जो भी सिनेमाघर मुझे अपना-सा लगा, उसे मैंने इस कुलनाम के साथ ही पुकारा है। यह सब सिर्फ़ इसलिए बता रहा हूं ताकि आप मानस चलन्तिका टीका को रामचरितमानस का कोई चलताऊ किंवा प्रचलित भाष्य न समझ बैठें। यह तो कोटि-कोटि कविआए हुए जनों द्वारा कोटिशः प्रयुक्त रूपक अलंकार की एक और आज़माइश भर है। मानस चलन्तिका टीका, यानी मन रूपी टाकीज़।… फि़लहाल इसके मटमैले पर्दे पर स्मृति के मायावी प्रोजेक्टर से प्रक्षेपित एक और चलन्तिका टीका–वैशाली–की दास्तान देख-सुन रहा हूं, ज़ाहिर है, सुनाने के लोभ से। मूल में यह दास्तान काफ़ी कुछ धुंधली और विशृंखल है… और इस लिहाज़ से षायद वह दास्तान है ही नहीं। दिक़्क़त ये है कि उस धुंध और विशृंखलता को दूर किए बग़ैर सुनाने का काम हो नहीं सकता। इसलिए कुछ तो उस मायावी प्रोजेक्टर के चलते, जो माध्यम होने के साथ-साथ बहुधा हमारी ज़रूरत को भांप कर संपादक और सर्जक की भूमिका अखि़्तयार कर लेता है, और कुछ मेरी सचेत कोशिशों के चलते, अपने शब्दावतार में यह दास्तान काफ़ी हद तक सुसंबद्ध दिखाई पड़ेगी।
काश, स्मृति मूलतः इतनी व्यवस्था-प्रिय होती!
अब याद नहीं कि वह ख़बरनवीस कौन था जिसने हमारी सांध्य-सभा में यह स्कूप पेश किया कि कौमनिटी सेंटर के पिछुअत्ती ए गो हॉल बनेगा।पटना में उन दिनों हॉल कहा जाए तो मतलब होता था, सिनेमा हॉल। दूसरे स्थानों और कालों में भी यह मतलब होता होगा, पर शायद तभी जब शब्द के प्रयोग का संदर्भ स्पष्ट हो। मसलन, ‘फलां फि़ल्म किस हॉल में चल रही है?’ मैं जिस भाषिक व्यवहार की बात कर रहा हूं, उसमें बिना किसी स्पष्ट संदर्भ के भी हॉलका मतलब सिनेमा हॉल ही होता है, या कहिए, होता था। यह शायद उस ठिगने शहर का अपना तरीक़ा था,  सिनेमा घरों की विराटता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का। चारमंजि़ला इमारतें तक उन दिनों मुश्किल से मिलती थीं और हमने सुन रखा था कि बंबई में पच्चीसवीं मंजि़ल पर रहने वालों के घरों में आक्सीजन का सिलेंडर, एहतियातन, हमेशा मौजूद रहता है। इस सुनावत पर भरोसा न करने की कोई वजह नहीं थी। हम पढ़े-लिखे बालक थे और हमें पता था कि ऊंचाई के साथ-साथ वायुमंडल विरल होता जाता है।
बहरहाल, हॉल बनेगा की खुशी को अभी हम सहेज भी नहीं पाए थे कि ख़बरनवीस ने एक झटका दिया, गोया चुंबन के बाद चांटा, बक़ौल राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह। बताया, ‘बनेगा, बाकी अभी टाइम लगेगा। रिजर्व बैंक वाला लोग केस कर दिया है कि हमारा क्वार्टर के सामने हॉल नहीं बनना चाहिए। फैमिली वाला जगह है ना! हॉल बनने से त लफुआ सब का जुटान होने लगेगा।रिज़र्व बैंक वालों का इस तरह राजेंद्र नगर मोहल्ले की महान सांस्कृतिक उपलब्धि के आड़े आना हम सभी को बेहद नागवार गुज़रा। हमने सर्वसम्मति से इस लोकोक्ति को दुहराया कि ऊपर वाला सब कुछ देखता है; उसके यहां देर है, अंधेर नहीं। दो-एक ने तो लगे हाथ कभी इस बैंक में खाता न खुलवाने की क़सम खा ली और मेरी पक्की जानकारी है कि वे आज तक इस पर अडिग हैं।
अंधेर सचमुच नहीं था। रिज़र्व बैंक क्वार्टर्स वाले केस हार गये। ऐसा कुछ हक़ीक़त में हुआ था या कि अफ़सानों और अफ़वाहों में ही केस लड़ा भी गया और जीता-हारा भी गया, मैं नहीं जानता। पर यह सच है कि कुछ समय बाद हॉल बनने की शुरुआत हो गयी। यह सन् 75-77 के बीच का कोई समय रहा होगा जब संपूर्ण क्रांति की लहर के साथ शहर के तमाम लफंगों ने अपने को क्रांतिकारियों में शुमार करा लिया था और प्रतिक्रिया में भद्र समाज का एक बड़ा हिस्सा तमाम क्रांतिकारियों को लफंगों में शुमार करने लगा था। हॉल बनने की शुरुआत का जब समाचार मिला तो हममें से कइयों ने क्रांतिकारी लफंगों और लफंगे क्रांतिकारियों के मुंह से सुनी हुई बात जे. पी. जिंदाबादका उद्घोष किया। उत्साह के भाव को रसदशा तक पहुंचाने का यह माना हुआ तरीक़ा था। एक मित्र ने तो, जो उम्र में मुझसे तीन-चार साल बड़ा यानी चौदह-पंद्रह की लपेट में रहा होगा, उत्साह में क़दमकुआं थाने के गेट पर खड़े बंदूकधारी सिपाही को मामू कह कर हुलका दिया और फिर यज्जा-वज्जा शैली में भाग खड़ा हुआ। यह भी इमरजेंसी के दौर में उत्साह को व्यक्त करने की एक लोकप्रिय पद्धति थी। इसी में कभी तथाकथित मामू पीछे पड़ जाये तो पद्धति ज़रा मंहगी पड़ती थी। उस दिन भी हममें से एक को मुख़बिर बना कर मामू ने उत्साही बालक पुन्नू का घर खोज ही लिया। फिर उसे यह समझाने में पुन्नू के घर वालों को ख़ासी मेहनत करनी पड़ी कि लड़का हाॅल के साइडयानी साइटपर गया हुआ था और उसका काम चालू देख कर उत्साह में आ गया था। फिर जो कुछ हुआ, वह तो स्वाभाविक ही था। इसमें लड़के का क्या क़सूर!
बात वाजिब थी। हमारे इलाक़े को एक सिनेमा हॉल की जितनी सख़्त ज़रूरत थी और हॉल बनने की उम्मीद जगते ही इस ज़रूरत को जितनी शिद्दत से महसूस किया जाने लगा था, उसे देखते हुए पुन्नू का उत्साह और तज्जनित कर्म अनुचित नहीं था। उत्साह के कारणों की चर्चा आगे होगी; जहां तक तज्जनित कर्म का सवाल है, वह दौरे-जहां से मिली हुई एक रस्म की अदायगी भर थी, कोई मौलिक उद्भावना नहीं। इसके लिए भला एक बालक को क़सूरवार कैसे ठहराया जाता! दौरे-जहां का करिश्मा क्या था, यह इससे समझिए कि पप्पू के छोटे भाई (प.छो.भा.) ने, जो उन दिनों बोलना सीख ही रहा था, राइम-रटंत की शुरुआत जाॅनी जाॅनी यस पापाया मछली जल की रानी हैजगह देवकांत बरुआ, इंदू जी के … (तुक मिलाएं!)से की थी और वह भी बिना किसी के सिखाए। उम्र के थोड़े फर्क के बावजूद हमारी पीढ़ी की हालत कमोबेश प.छो.भा. जैसी ही थी। हमें भी न तो उस उथल-पुथल के टुच्चेपन की समझ थी, न ही उसके औदात्य की। तभी तो रात के आठ बजे जब हमारी गली से सौ क़दम के फ़ासले पर स्थित लोकनायक जयप्रकाष के आवास से थाली और कनस्तर बजने की आवाज़ें आनी शुरू होतीं और चंद मिनटों में पूरा पटना शहर थालियों-कनस्तरों की ढनढनाहट से गूंजने लगता, तब उसे प्रतिरोध का दिगंतव्यापी नाद मान कर नहीं, बड़ों के बचपने का इज़हार मान कर हमारी ख़ुशी सारे बांध तोड़ने लगती थी। हम उसमें काफ़ी बढ़-चढ़ कर योगदान करते थे जिसे आप चाहें तो प्रतिरोध के कोरस में हमारा ऐतिहासिक योगदान कह सकते हैं, पर जिसके पीछे हमारी प्रेरणा निहायत क्षणवादी होती थी। क्षणों में जीने की यह संकीर्णता एक बार ख़ासी मंहगी पड़ी थी जब रसोईघर से थाली-कनस्तर की मांग पर दुत्कारे जाने के बाद हमारे समवयस्क, तथापि आदरणीय मित्र मनोज जी ने हड़बड़ी में बिजली के खंभे को लोहे की छड़ से पीटना शुरू किया और ऊपर तारों के जमघट में ऐसी संपूर्ण क्रांति मची कि आस-पास के तीन-चार घरों में रात भर के लिए बत्ती गुल हो गयी।
तो कहना ये है कि हम नादान बालक थे और हमारे प्रतिनिधि पुन्नू की कारस्तानी प.छो.भा. की राइम-रटंत जितनी ही निश्पाप थी। हमें तो यह भी पता नहीं था कि सिपाही को मामू क्यों कहा जाता है। आज सोचता हूं तो इसका संबंध उस लोकविश्वास के साथ जान पड़ता है जिसके अनुसार भांजे को पीटने वाले के हाथ बुढ़ापे में कांपते हैं। उन दिनों पुलिस वालों से आंदोलनकारियों की मुठभेड़ें अक्सर हुआ करती थीं। ऐसी ही किसी घातक रूप से मज़ेदार मुठभेड़ में किसी लाठी खाते आंदोलनकारी ने किसी लाठी भांजते सिपाही को मामू कह कर उस लोकविश्वास का लाभ उठाने की कोशिश की होगी। तभी से यह मज़ाक चल पड़ा होगा और उत्साह के हर मौक़े को घातक रूप से मज़ेदार बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा होगा।
इस विषयान्तर के बाद अब चर्चा उस उत्साह के कारण, यानी हमारी ग़रज़मंदी की। उस समय तक पटना शहर के सभी सिनेमाघर गांधी मैदान और रेलवे स्टेशन के आस-पास थे। ये जगहें तब की यातायात सुविधाओं को देखते हुए हमारे इलाक़े से दूर पड़ती थीं। इससे हमें जो घाटे होते, वे इस प्रकार हैंः (1) अगर वाल्दैन से छुप कर फि़ल्म देखनी हो तो तीन के बजाय साढ़े चार घंटे घर से ग़ायब रहना पड़ता था, जिसमें रिस्क ड्योढ़ा था; (2) अगर अनुमति लेकर फि़ल्म देखना चाहें तो दूरी के नाम पर आवेदन को टाला जाता था। मसलन, ‘अगले महीने चाचा आयेंगे, तब जाना’; और (3) सिनेमाघरों के शो-केसमें लगे स्टिल्सको देखने जैसे छोटे, किंतु अनिवार्य कार्य के लिए इतनी दूरी तय करनी पड़ती थी। ये सभी घाटे उस इलाक़े में रहने के चलते हमें उठाने पड़ते थे जो उस समय से एकाध दशक पहले तक पटना का एक छोर हुआ करता था। राजेंद्र नगर को छूती हुई रेलवे लाइन गुज़रती थी और उसके पार बाइपास था। यही पटना की दक्षिणी सीमा थी, हमारे होश संभालने से पहले तक, ऐसा हमने सुन रखा था। हमारे होशमंद होते-होते बाइपास के उस पार कंकड़बाग़ नामक एशिया की सबसे बड़ी कालोनी तेज़ी से बसने लगी थी। कंकड़बाग़ का अतीत, वर्तमान और भविष्य हमारे इलाक़े के मध्यवर्गीय घरों में अक्सर चर्चा का विषय हुआ करता था। वहां ज़मीन ले चुके लोग किराये के मकानों में रहने वाले अपने ऐसे परिचितों पर तरस खाते थे जो वहां एक कट्ठा ज़मीन तक नहीं ले सके, और वहां ज़मीन न ले पाने वाले यह कह कर अपनी तक़दीर को कोसते थे कि जब हज़ार रुपये कट्ठा ज़मीन मिल रही थी, तब यह सोच कर नहीं ली कि कौन जायेगा उस उजाड़ में रहने! मति मारी गयी थी’–ऐसा यथार्थवादियों का निष्कर्ष होता, और भगवान को मंज़ूर नहीं था’–इस नतीजे पर वे पहुंचते जो अपनी मति का सम्मान बचाने के लिए यथार्थवाद से दूर हट गये थे। ढेर सारी भविष्यवाणियों के हवाले से तरस खाने और ढेर सारी विगत परिस्थितियों के हवाले से अफ़सोस करने का यह चलन बड़ों की बैठकों में इतना हावी था कि हमारी किषोर पीढ़ी को जब परिपक्व बातचीत का शौक चर्राता तो हम इमरजेंसी की खूबियों-ख़ामियों पर चर्चा करने के साथ-साथ कंकड़बाग़ में ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त, उर्फ़ क्या से क्या हो गयाको भी अपनी चर्चा का विशय बनाते थे। वैसे सच पूछा जाए तो हम कभी इस बात से इत्तिफ़ाक़ नहीं रख पाए कि किसी भले आदमी को कंकड़बाग़ में जा बसना चाहिए। हमें तब किसी ने यह नहीं बताया था कि कंकड़बाग़ न बस रहा होता तो हमारे इलाक़े को सिनेमाघर का उपहार भी नहीं मिलता। उसके बसने के साथ-साथ षहर का केंद्र हमारी ओर खिसकता आ रहा था और सिनेमाघर की योजना राजेंद्र नगर के इसी नये स्टेटस का नतीजा थी। अगर बाइपास, जिसका नाम अब पुराना बाइपास हो चुका है, के पार खेत-ही-खेत होते तो उससे पचास क़दम इधर सिनेमाघर बनाने का ख़याल किसी के दिमाग़ में भला क्यों आता! इस तरह हमें कंकड़बाग़ का अहसानमंद होना चाहिए था जो कि, अज्ञानतावश, हम नहीं थे।
चर्चा सिनेमाघर की ज़रूरत पर चल रही थी। तो उसका ऐसा था कि वह सिर्फ़ हम किशोरों को नहीं, हमारे वाल्दैन को भी थी। सिनेमा मनोरंजन का

5 COMMENTS

  1. मै समझता हूँ कि दास्ताँ केवल वैशाली ''हाल 'की नहीं ,स्मृतिओं में ऐसा बहुत कुछ छुपा रहता है जो आपको भान कराये बिना उपस्थित हो जाता है ,

  2. अपनी किशोरावस्‍था के दिन या आ गये। लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में सिनेमा-टीवी देखना हुआ मेरा भी। पढ़ते हुए लगा कि अरे यह तो मेरा ही अनुभव है। संजीव भाई ने लाजवाब लिखा है, बहुत-बहुत बधाई।

  3. मजा आ गया. लगा वैशाली किसी सिनेमा हॉल नहीं बल्कि किसी सत्तर के दशक की उस नायिका के यौवन की कथा सुना रहे हों जिसकी स्किप्ट डर्टी पिक्चर में जाकर चस्पा दी गई हो. मुझे अपने बिहार शरीफ का किसान सिनेमा याद हो आया. कभी हमने भी इसी तरह कचोट से याद किया था, अलबत्ता लिख नहीं पाए ऐसा..

  4. लज़ीज़ और अज़ीज़ गद्य है. मैंने वैशाली सिनेमा के दूसरे सत्र में उसमें कुछ फ़िल्म देखे. चुंकि यह पटना में हमारी रिहाइश के समीप था और कदमताल करते हुए यहां तक की दूरी नापी जा सकती थी. हाल अच्छा था इसमें कोई शक नहीं लेकिन इसके बाहर का माहौल विपरित था. नव शहराती इसी वज़ह से नहीं जाते होंगे इसमें. वैसे मुझे यह बड़ी नाईंसाफ़ी लगती थी, जब भी मैं फ़्लाईओवर से गुजरते हुए बंद वैशाली को देखता. विद्यार्थियों के लिये यह हाल सबसे प्रासंगिक था. दुबारा शुरु हुआ तो लगा चलो अब तो कुछ सुविधा मिली सिनेमचियों को गांधी मैदान का वर्चस्व टूटा हालांकि तब तक मैं पटना छोड़ चुका था. अब की साल से मौल बनने की खबर सुन रहा हूं..गया तो देखुंगा जरूर कि कैसा बना है?

  5. संजीव जी, आपका गद्य, विश्लेषण और कहन गजब का है। भरा-पूरा संसार और फिर उसी से दूरतलक निकलता एक नया संसार… बहुत खूब संजीव जी।

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