भारतीय सिनेमा के कोलंबस दादा साहेब तोरणे

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रामचंद्र गोपाल दादा साहेब तोरणे का नाम इतिहास-निर्माताओं में आना चाहिए था, लेकिन ‘पुंडलीक’ फिल्म के इस निर्माता-निर्देशक के नाम गुमनामी आई. 25 मई 1912 को ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ में प्रकाशित विज्ञापन में ‘पुंडलीक’ को भारत की पहला कथा-चित्र बताया गया था और ग्रीव्स कॉटन कम्पनी में काम करने वाले रामचंद्र गोपाल को उसका पहला निर्माता. भारत में सिनेमा-निर्माण के आरम्भ के 100 वें साल में भारतीय सिनेमा के इस गुमनाम नायक को याद करने के कई कारण हैं.
सबसे पहला कारण तो ‘पुंडलीक’ ही है. दादा साहेब फाल्के के पूर्ववर्ती दादा साहेब तोरणे की इस फिल्म को पहला फीचर फिल्म न माने जाने के पीछे कई तर्क दिए जाते रहे. सबसे पहला तो यह कि असल में ‘पुंडलीक’ फीचर फिल्म है ही नहीं. वास्तव में, श्रीपाद थियेटर कंपनी द्वारा खेले जाने वाले रामराव किर्तिकार के प्रसिद्ध नाटक ‘पुंडलीक’ की रिकॉर्डिंग है, वह भी स्टिल कैमरे से. फीचर फिल्म की तरह इसकी कोई कहानी नहीं है यानी कहानी के आधार पर इसका फिल्मांकन नहीं किया गया है. दूसरा कारण यह बताया जाता रहा कि इस फिल्म की लम्बाई बहुत कम, करीब 12 मिनट, है. जबकि दादा साहेब फाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की लम्बाई तकरीबन 40 मिनट है. सबसे बड़ा कारण यह कि इस फिल्म की प्रोसेसिंग विदेश में हुई थी. इस आधार पर भी ‘पुंडलीक’ को ‘स्वदेशी’ फिल्म नहीं कहा जा सकता.
बहरहाल, 100 साल बाद फिल्म संस्था इंपा (indian motion pictures association) द्वारा इस फिल्म को उसके उचित सम्मान दिलाने के लिए प्रयास शुरु किए गए हैं. कहा जा रहा है कि शूटिंग स्क्रिप्ट सहित वह सारे प्रमाण मिल गए हैं जिनके आधार पर इसे पहली फीचर फिल्म का दर्जा मिलना चाहिए.
वह दर्जा मिले न मिले लेकिन दादा साहेब तोरणे के नाम हिंदी सिनेमा के कई अन्य अध्याय भी जुड़े हैं जिनसे इस 100 वें साल में सिने-प्रेमियों को रूबरू करवाए जाने की जरूरत है. ‘पुंडलीक’ फिल्म के बाद इनकी कंपनी कॉटन ग्रीव्स ने इनका तबादला कराची कर दिया, जहां इन्होंने फिल्म वितरण कंपनी की स्थापना की और हॉलीवुड फिल्मों के अधिकार लेकर उनको कराची में रिलीज करना शुरु किया. कुछ सिने-इतिहासकार मानते हैं कि सिनेमा के व्यवस्थित वितरण की शुरुआत भी असल में इनके प्रयासों से ही मानी जानी चाहिए.
बाद में प्रसिद्ध फिल्मकार आर्देशर ईरानी से इनकी जान-पहचान हुई और कहते हैं कि इनके कहने पर ही ईरानी ने अपने स्टुडियो और फिल्म निर्माण कंपनी की स्थापना की. जिसका मैनेजर उन्होंने दादा साहेब तोरणे को बनाया. कहते हैं कि दादा साहेब की प्रेरणा पर ही आर्देशर ईरानी ने 1931 में पहली सवाक फिल्म ‘आलम आरा’ बनाई.
बाद में इन्होंने अपनी कंपनी सरस्वती सिनेटोन बनाई और इसके बैनर तले फ़िल्में बनाने लगे. इसी सरस्वती सिनेटोन के बैनर तले बनी फिल्म ‘श्यामसुन्दर’ को पहली सिल्वर जुबिली फिल्म का श्रेय दिया जाता है. दादा साहेब तोरणे एक तरह से भारतीय सिनेमा के कोलंबस थे. सिनेमा उद्योग में उन्होंने अनेक प्रयोग किए. असल में वे विश्व सिनेमा के बड़े अच्छे जानकार थे और यूरोप-अमेरिका के सिने उद्योग से अच्छी तरह वाकिफ थे और वहां उनके संपर्क भी थे. उनका विजन था कि भारत में आम जनों को कला के इस नए माध्यम से परिचित करवाया जाए.
उनके लिए सिनेमा न तो मनोरंजन  था, न ही जल्दी-जल्दी पैसा कमाने वाला व्यवसाय. वे इसे सामाजिक परिवर्तन, समाज में शिक्षा के प्रसार के एक बहुत बड़े माध्यम के रूप में देखते थे. इसीलिए शायद उन्होंने जन-जीवन में प्रचलित महापुरुषों, पौराणिक कथाओं को सिनेमा के परदे पर उतारा. उनके अधिकांश प्रयोग सफल भी रहे. आजादी के बाद जब सिनेमा का मुहावरा बदलने लगा, हीरो-हीरोइन, गीत-संगीत के आधार पर सिनेमा मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम बनने लगा, तो उन्होंने फिल्म-निर्माण से लगभग किनारा कर लिया. भारतीय सिनेमा के 100 वें वर्ष में दादा साहेब तोरणे के सिने-प्रयासों को समझना-समझाना, सोद्देश्य सिनेमा की उनकी अवधारणा को समझना भारतीय सिनेमा के इस कोलंबस के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 

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