जो कलाकार सच्चा है वह चट्टान की तरह खड़ा रहेगा

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समकालीन भारतीय चित्रकला के एक तरह से पर्याय सरीखे रहे मकबूल फ़िदा हुसैन का पिछले साल आज की रात ही देहांत हो गया था. उनको याद करते हुए प्रसिद्ध कथाकार ओमा शर्मा की उनसे यह बातचीत, जो मुझे कई मायनों में महत्वपूर्ण लगती है. एक, तो ओमा शर्मा ने इस बातचीत के दौरान उनसे लगातार सामान्य आदमी के धरातल से सवाल किए हैं. यह बातचीत दुबई में निर्वासन भोग रहे हुसैन से की गई है, उस निर्वासन का चिडचिडापन भी इस बातचीत में झलक झलक जाता है. प्रस्तुत है एक लंबी बातचीत का सम्पादित अंश- जानकी पुल.
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भारतीय चित्रकला और विवादों का पर्याय बने मकबूल फिदा हुसेन का साक्षात्कार लेना-करना आसान नहीं था. वे अपनी बिंदास-वृत्ति, कला और वार्धक्य में रमी सनक के चलते कब क्या कह-कर दें,इसका कोई भरोसा नहीं. इस बातचीत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. शुरुआत में ही जब मैं उस तरफ यानी उन पेंटिंग्स के मंतव्य पर जिन पर हिन्दू-अतिवादियों ने उपद्रव मचा रखा था और जिससे तात्कालिक निजात पाने के लिए तब वे दुबई में रह रहे थे (नागरिकता के खयाल से कोसों दूर) तो वे यकायक भड़क पड़े. कृअप्रत्याशित और असहनीय ढंग से. टेपरिकॅार्डर को धक्का देकर फेंकने लगे. हैरान तो मैं था ही,डर भी गया था कि जिस प्रमुख कार्य को करने दुबई आया था वह गया खटाई में. वह गुस्सा किसी अतिवादी की तरह ही विवेक-च्युत था. किसी तरह मिन्नतों से उन्हें समझाया गया कि जनाब, ये सवाल मेरे नहीं तमाम आम लोगों और तैयब मेहता (तब वे जिन्दा थे) जैसे कलाकारों की ओर से भी हैं… जो आपसे यहाँ किये भर जा रहे हैं… इसमें पर्सनल कुछ नहीं है.
मगर वे पर्सनल रूप से बहुत आहत थे. विवादों में बीता उनका जीवन कभी इस कदर आक्रांत नहीं हुआ था. घुमक्कड़ी अब उनकी आदत या शौक नहीं, मजबूरी हो गई थी. उनके भीतर उस पंछी की तड़प लक्ष्य की जा सकती थी जो देर तक उड़ान भरने के बाद अपने जहाज(मुल्क) पर लौटने पर सुकून महसूस करता था और आज जिसे वह मुहैया नहीं था. एक जलावतन हुए बूढ़े कलाकार की पीड़ा का अंदाजा लगाना मुश्किल था क्योंकि जीवन-शैली और बाकी ताम-झाम में सब कुछ पूर्ववत-सा ही था. वे जीवन की हर छोटी-बड़ी चीज का आनंद उठाने का हौसला रखते. किसी रेस्टोरेंट में खाने की मेज पर रखे मेन्यू-कार्ड को किसी कस्बाई युवक की जिज्ञासा से पढ़ते और पसंद न आने पर दूसरी डिश अॅर्डर करते और उसका लुत्फ लेते हुए बताते कि यह सबसे अच्छी कहाँ मिलती है. नब्बे पार करती उम्र में जीवन के प्रति उनका उत्साह देखते बनता थाण. ‘अभी यहाँ(दुबई) इस्लामिक हिस्ट्री को पेन्ट करने का बड़ा प्रोजेक्ट है’ फिर भारतीय सिनेमा के इतिहास को पेन्ट करूँगा.. लंदन में… यानी उम्र के शतक पार तक तो इधर-उधर कुछ देखने तक की फुर्सत नहीं! हमारे यहाँ साठ पार तीसमार खाँ भी अकसर मुफ्त में अध्यात्म बाँटते रहते हैं,और अस्सी पार वाले के तो अंजर-पंजर ही नहीं जिजीविषा भी गंधाते हैं, मगर हुसेन साब, क्या कड़क अपवाद थे! उनकी चाल-ढाल, रोब-रुतबा और खान-पान हर लिहाज से सब किसी युवक के थेण् उन्हें देखकर यकीन हो जाता था कि दुनिया में कुछ लोग वास्तव में एक सौ दस एक सौ बीस की वय पाते हैं! अपनी शख्सियत से वे आपको पूरा एन्टरटेन करते…
सन तिहत्तर में पिकासो के साथ मेरी प्रदर्शनी हुई थी. अगले साल बेचारे की डैथ हो गई. मेरे जैसे औसत की संगत का सदमा कहाँ बर्दाश्त होता… वे तबियत से खुद पर हँसते, छेड़ते,लतीफे शेयर करते और माकूल शेर सुनाते! हल्के-फुल्के मिजाज में उनका सुनाया एक द्विअर्थी शेर आज भी याद आता है: दुखतरे दर्जिन का सीना देखकर,जी करता है मल मल दूँ!
यह बातचीत उनके सुझाव पर मुम्बई में मेरे घर होनी थी मगर बिना किसी सूचना या योजना के वे दुबई चले गये. इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था. घुमक्कड़ी उनका स्वभाव ही नहीं,जीवन भी था और इसके लिए उन्होंने खुद को पूरी तरह ढाल रखा था! कोई पैकिंग नहीं, अंग-वस्त्र भी नहीं… एक अदद बेंतनुमा ब्रश और पासपोर्ट लो, हो गई दुनिया मुट्ठी में. केनवास से लेकर कमीज,कौन सी चीज कहाँ नहीं मिलती है?अन-अफोर्डेबिलटी जैसा कुछ रहता नहीं था. राजेन्द्र यादव की तरह समाज-दर्शन की लत थी सो दुबई में भी उन्होंने अपने ठिकाने बना लिये थे. वे ऐसे चित्राकार थे जो चित्रकारी का सूफियाना आनंद लेते हुए जीवन के दूसरे सुखों में पिछड़ना नहीं चाहते थे. दूसरी कलाओं की तरह चित्रकला में मेरी विद्यार्थीनुमा दिलचस्पी है.  प्रभु जोशी और जे.पी.सिंघल जैसे समकालीन दिग्गजों की सोहबत नसीब रही है मगर चित्रकला की बारीकियों,खासियतों या उसके इतिहास से लगभग अनभिज्ञ ही हूँ. साक्षात्कार कला-शिक्षा का माध्यम हो भी नहीं सकता है इसलिए मेरे जेहन में जाहिरा किस्म के सवालों पर उनकी राय और मुमकिन हो तो उस लम्बे कला-जीवन के कुछ अक्स उकेरने की बात ज्यादा थी. लेकिन हुसेन जैसे जीनियस, वन मैन आर्ट मूवमेंट को समझना, डॅान की तर्ज पर, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. उनकी मेधा, परतों और अंतर्विरोधों की चकाचौंध उनके बारे में जतन से बनाये नतीजों पर पुनर्विचार करने को बाध्य कर जाती है. समझ को बार-बार रिवाइज करने के बावजूद मुँह की खानी पड़ती है. एक जीवनीकार ने उन्हें महाभारत के पात्रों का मिला-जुला रूप माना है… अर्जुन की तरह एकाग्र निशानेबाज, अभिमन्यु सा अकेला लड़ने वाला, कर्ण की तरह तन्हा और बेजार, भीष्म की तरह जख्म खाया और कृष्ण की तरह कूटनीतिज्ञ! हमारे एक कॅामन मित्र ने यूँ ही नहीं कह डाला था ही इज ए मास्टर हू कैन गिव मार्किटिंग टिप्स टू पीटर ड्रकर… यह बात मेरे गले कभी नहीं उतर पाती है कि अरसे से भारतीय चित्राकला के सिरमौर और दुनिया भर में शौहरत हासिल कर चुके इस चित्रकार को किसी टैक्सी वाले को अपना परिचय देना क्यों गुदगुदाता है… अमिताभ बच्चन के लीलावती अस्पताल में दाखिल हो जाने पर उसका पोट्र्रेट बनाकर उसके साथ अखबारी सुर्खियों में शामिल होना क्यों लुभाता है… गजगामिनीजैसी नितान्त कथ्यहीन, बिंबात्मक फिल्म बनाने वाला, सत्यजीत राय की फिल्म-कला का मुरीद, ‘विवाह’और ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी वैडिंग एलबमों पर घोर आसक्त कैसे हो सकता है. यकीनन एक पहेली थे हुसेन. इस उस्ताद बहुमुखी चित्राकार की शख्सियत में सादादिली और बड़प्पन भी खूब खूब भरा था. दोस्तों के साथ भरे बाजार नुक्कड़ की चाय की चुस्की लेना उनका शगल था जो अन्त तक कायम रहा.. खाकसार समेत शायद ही कोई मित्र हो जिसे फराख दिली में उन्होंने अपनी मूल ‘हुसेन’से खुशहाल न किया हो. रचनात्मक ही नहीं,उनमें मानवीय ऊर्जा भी अकूत थी. जिस मानसिकता के साथ उनसे बातचीत करने की तैयारी मैंने की थी, उनके ‘उखाड़फेंकू’ रवैये ने छिन्न-भिन्न कर दी. एक ‘टेस्ट मैच’ को ‘टी-20में सिकोड़ना पड़ा. कितने सवाल यूँ ही पडे़ रह गये. यही वजह रही कि जनवरी 2007 में दुबई की गई यह बातचीत अभी तक टेप पर ही पड़ी रही. मैंने सोचा था कि उनकी कला और व्यक्तित्व की खूबियों, और जटिलताओं पर सम्यक लिखते वक्त उनकी कही इन बातों का उपयोग करूंगा लेकिन इतना अवकाश मिल नहीं सका. ‘जब कहीं छपे तो एक कॅापी भेजना जरूर, मैंने इतनी देर किसी से बात नहीं की है’उन्होंने ताकीद की थी. हुसेन साब, सॅारी,आपकी यह जायज उम्मीद पूरी नहीं हो सकी! (ओमा शर्मा)
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ओमा शर्मा:हुसेन साहब, पंढरपुर जैसे कस्बे से चलकर बम्बई आया एक मामूली सा लड़का भारत का ही नहीं, दुनिया का एक मकबूल चित्रकार बनता है, उसके ट्रांजिशन के बारे में बताइए?
हुसेन: मैं जो पेंटिग करता हूँ वह मेरे काम का दस प्रतिशत हिस्सा है. मैं खूब घूमता हूँ,लोगों से मिलता हूँ, किताबें पढ़ता हूँ. मेरी कोई पेंटिग ऐसे ही नहीं हो जाती है. वह मेरे उस तमाम घूमे-फिरे,देखे-पढ़े का निचोड़ होती है. मैं सबके लिए टाइम देता हूँ. इकानोमिक्स,पालिटिक्स, सोसाइटी सब होता है उसमें…
ओमा शर्मा:वह ठीक है! उसपर हम बाद में बात करेंगे, लेकिन मॉडर्निजम जिस सहज तरीके से आपकी पेंटिंग्स में आया है उसके सूत्र क्या रहे. फर्नीचर की दुकान या फिल्मों के होर्डिंग्स लगाने से लेकर आधुनिक चित्रकार बनने की यात्रा …
हुसेन: जो पेंटिंग मैं कर रहा था वह सचेतन तो नहीं कर रहा था. एक वो शेर है: यही जाना कि कुछ नहीं जाना, वो भी एक उम्र में हुआ मालूम (मीर). मैंने कभी कोई प्लान नहीं बनाया. कोई छलाँग लगाने की नहीं सोची. बस, सब कुछ यूँ ही होता चला गया. कभी सोचा भी नहीं कि क्या होगा. मुझे याद है जब मैं आठवीं में था तभी मैंने अपने पिताजी को कहा कि मुझे पढ़ना नहीं है  पेंटिंग करनी है. फिल्मों का मुझे तभी से आब्सेशन है. घर वाले परेशान हुए कि ये क्या सोचा है. उस जमाने में किसी आर्टिस्ट की क्या हैसियत होती थी? ऐसे आदमी के साथ कौन अपनी लड़की व्याहेगा,इसकी चिन्ता थी. मगर मेरे पिता को संगीत और कला का शौक था. मैं जो करता रहता था वह उन्हें अच्छा लगता था. उन्होंने इजाजत दे दी. मान सकते हैं कि वह एक छलाँग थी. छह बरस का था मैं तब. हरदम पेंटिंग करता रहता था. जब ग्यारह साल का हुआ तो वे मुझे एक कालेज में ले गये. वहाँ जो अन्तिम बरस के छात्रा थे,जो चार-पाँच साल पेंटिंग सीखने में लगा चुके थे,मैंने कहा कि मैं उनसे बढि़या चित्र बना सकता हूँ. उन्होंने कहा और मैंने बना दियाण् वाकई. लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझे कोई डिग्री नहीं चाहिए. मुझे नौकरी नहीं करनी है. सिर्फ पेंटिंग करनी है. मेरे हाथ में ब्रश है, कुछ नहीं होगा तो दीवारें पेंट करके पेट भर लूँगा.
ओमा शर्मा: आप पाँच-छह लोगों ने मिलकर जो बाम्बे ग्रुप बनाया उससे कुछ त्वरण मिला… ब्रेकिंग पाॅइंट जैसा कुछ…
हुसेन: तब तो मैं चालीस छू रहा था. वह मेरा ब्रेकिंग पाॅइंट नहीं था. उससे मुझे कुछ नहीं मिला. असल चीज तो उससे पहले स्कूल में हुई. वहाँइन्दौर मेंन कोई गैलरी थी और न कोई देखनेवाला. बस दीवानगी थी जिसके तहत मैं पेंटिंग करता जाता था. तभी हाॅलीवुड की एक फिल्म आई थी ‘रेम्ब्रां’जो मास्टर रेम्ब्रां पर थी. उसे देखकर मैं पागल हो गया था. मुझे लगा कि मुझे यही करना है क्योंकि इन्सानी भावनाओं के साथ जो चित्र वह बनाता था या जो भावनाएँ उसके चित्रों में उभरकर आती थीं उसका कहीं कोई मुकाबला नहीं था. लगा, मुझे भी वैसा ही करना चाहिए. वह मेरा गुरु हो गया. वह जबरदस्त पोर्टेªट बनाता था. सन् 1953 में जब पहली बार मैं यूरोप गया तो सबसे पहले एम्सटरडम में उसकी पेंटिंग्स ही देखने गया. किसी ने मुझे छुआ है तो बस रेम्ब्रां ने. वहाँ उसकी एक पेंटिंग थी ‘नाइटवाॅच’. ग्यारह बाई ग्यारह की. मैं उसे देखने लगा और देखता रह गया. उसे देखकर मैं रोने लगा. फूट-फूटकर रोने लगा.  
ओमा शर्मा:क्यों, रोने क्यों लगे?
हुसेन: उस पेंटिंग से जो ताकतवर इन्सानी भावनाएँ उभरकर आ रही थीं, उसे महसूस करके. उस चित्रा में अन्यथा कुछ खास नहीं था. कोई औरत नहीं थी जिसमें मैं अपनी माँ ढूँढ़ता. उसमें सिर्फ क्रिएटिव पावर थी. यह देखकर कि ऊपर वाला जो सर्जक है वह कैसे देता है. उसमें कुछ भी सेन्टीमेंटल नहीं था. फिर भी इट वाज प्योर क्रिएटिव पावर. स्टार्क. कभी लोग कहते हैं कि कला जिन्दगी से प्रेरित-प्रभावित होती है,कलाकार अपने आसपास से उठाता है,यह सब बकवास है. दुनिया को देखकर आप चित्र बनाएँगे तो वह ज्यादा दिन नहीं चलेगा. कभी अकाल पड़ा, लोगों ने उसे पेन्ट किया, ऐसे ही विश्वयुद्ध को लेकर लोगों ने खूब पेंटिंग्स की. लेकिन कला के इतिहास में ऐसे मकाम ज्यादा मानी नहीं रखते हैं. क्रिएटिव पावर से जो होता है वही टिकता है. रेम्ब्रां में थी यह पावर. रेनेसां काल में भी खूब दिखती है.
ओमा शर्मा:रेम्ब्रां के अलावा कोई और चित्रकार मसलन पिकासो का कुछ प्रभाव
हुसेन: पिकासो का भी सम्पूर्णता में कोई प्रभाव नहीं है.
ओमा शर्मा: आपके साथ जो बाम्बे ग्रुप के लोग थे- आरा सूजा उनसे कुछ जानने-सीखने को मिला
हुसेन: नहीं. बिल्कुल नहीं. पेंटिंग के स्तर पर हम सब अपने आप में ही रहते थे.  
ओमा शर्मा:आपके रंग-संयोजन में इन्दौर के डी जे जोशी का असर दिखता है.
हुसेन:डी.जे. जोशी तो थर्ड रेट पेन्टर था. उसकी कोई सिग्नीफिकेंस ही नहीं है. उसका क्या असर होता. उसका तो जिक्र भी न करें.
ओमा शर्मा:विष्णु चिंचालकर?
हुसेन:आप ऐसे नाम मत गिनाइए. इससे कुछ नहीं होने वाला है. आपको चीजों को समग्रता में देखना आना चाहिए. बड़ा विजन चाहिए होता है. (मैं स्पष्ट कर दूँ करता हूँ कि यहाँ अभिप्राय किसी के प्रभाव में आने या नकल से नहीं बल्कि अपने कला-मकाम की राह में मिले उस ‘उधार’ से है जो हर कोई जाने-अनजाने ग्रहण करता है. वे नुनखरी अदा में चुप रहते हैं. उस चुप्पी को कुछ देर जीते हुए मैं अगला सवाल करता हूँ)
ओमा शर्मा:आपके मुताबिक कला का कोई सामाजिक सरोकार होता है?
हुसेन:मैं आपको संगीत का उदाहरण देता हूँ. क्या उसमें कोई सामाजिक सन्देश होता है?ध्रुपद  सुनिये जहाँ एक भी शब्द नहीं है. उसे सुनकर आपके भीतर कुछ होने लगेगा… जो आपकी भीतरी ताकत को ‘इनवोक’ करेगा. विशुद्ध संगीत आपके भीतर उतर जाता है. किसी ट्रेजेडी पर लिखी कविता को गाना संगीत नहीं है. ये तो रोजमर्रा की बातें हैं.
ओमा शर्मा:आपके लिए कला के के क्या मायने हैं?

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