वाल्ट डिज्नी की जीवन-यात्रा हिंदी में

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पिछले बरसों में हिंदी के प्रकाशन-जगत में तेजी से बदलाव हुए हैं. हाल के दो उदाहरणों का ध्यान इस सन्दर्भ में आता है- एक, स्टीव जॉब्स की जीवनी, जिसके हिंदी अनुवाद को हिंद पॉकेट बुक्स ने प्रकाशित किया. दूसरे, ‘सदा समय के साथ’ रहने वाले वाणी प्रकाशन ने एनिमेशन के पर्याय बन चुके वाल्ट डिज्नी की जीवन-यात्रा को लेकर २८४ पृष्ठों की एक पुस्तक का प्रकाशन किया, जिसे विजय शर्मा ने मूल रूप से हिंदी में लिखा है.  मुझे नहीं लगता कि पहले इस तरह की पुस्तकों के पाठक हिंदी में मिलते. हिंदी के पाठक-वर्ग का विस्तार हो रहा है. ‘वाल्ट डिज्नी: एनिमेशन का बादशाह’ उसी नए विकसित होते पाठक-वर्ग की रुचियों को ध्यान में रख कर लिखी गई है. दुर्भाग्य की बात है कि इस तरह के साहसिक प्रयासों का जिस तरह से स्वागत होना चाहिए हिंदी में हो नहीं पाता है. अक्सर इस प्रकार की श्रमसाध्य और सुशोधित कृतियाँ हिंदी में अलक्षित ही चली जाती हैं.

बहरहाल, ‘मिकी माउस’ जैसे एनिमेशन पात्र के सर्जक को सम्पूर्णता में समझने-समझाने की एक कोशिश की तरह है यह पुस्तक. किस तरह लंबे संघर्ष के बाद वाल्ट डिज्नी जैसा फिनोमिना बना, जिसने २० वीं शताब्दी में एनिमेशन फिल्मों को मनोरंजन के एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित किया. कहानियां सुनाने-दिखाने का एक ऐसा माध्यम दिया, ऐसे पात्र दिए, समय के साथ जिनके प्रति दीवानगी बढ़ती गई. केवल बच्चों की नहीं, बड़ों की भी. लेखिका ने वाल्ट डिज्नी को एक लीडर के रूप में देखा है, एक ऐसे लीडर की तरह दृश्य-कला जगत पर जिसका निर्णायक प्रभाव पड़ा. एनिमेशन कला के सदुपयोग के माध्यम से उन्होंने बच्चों की कल्पनाओं को नए-नए रूप दिए, ऐसे पात्र दिए जो एक तरह से अमर हो गए. लेखिका ने बड़े विस्तार से उनके बचपन के बारे में बारे में लिखा है और पुस्तक का सबसे बड़ा अध्याय भी यही है. लेखिका शायद यह संकेत देती हैं कि सात साल की उम्र तक स्कूल नहीं जा पाने वाले वाल्ट डिज्नी के बचपन में ही उनकी कलात्मक प्रेरणा के बीज छिपे थे. वाल्ट देर से स्कूल इसलिए जा पाए क्योंकि बचपन में उनको कोई स्कूल ले जाने वाला नहीं था. बाद में जब वे स्कूल जाने लगे तो अपनी कलाकारी के बल पर वे स्कूल में अपने कुछ हटकर होने का सबूत देते रहते थे. लेकिन उनका बचपन नाकामयाबियों का एक मुसल्सल सिलसिला बनकर रह गया. उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो एक महान प्रतिभा के संकेत दे पाता. १९ वीं शताब्दी के लेखक चार्ल्स डिकेंस के बचपन की तरह वह निरंतर संघर्षों से भरा हुआ था. लेकिन जैसा कि लेखिका ने लिखा है कि वाल्ट डिज्नी का स्वभाव ही ऐसा था कि वे निराशाओं में से आशा को ढूंड लेते थे. संघर्षों ने उन्हें नई-नई प्रेरणाएँ दी, नए प्रयोगों के लिए आइडिया दिए. बचपन और संघर्ष का हिस्सा पुस्तक में बहुत बड़ा है और कुछ हद तक उबाऊ भी. लेकिन फिर भी इसलिए जरूरी है क्योंकि उससे उस महान कलाकार की कला को समझने में मदद मिलती है.

वाल्ट ने नए प्रयोगों का साहस था, कल्पनाशक्ति थी, प्रचार-प्रसार की असाधारण क्षमता थी, आत्मविश्वास था और लोगों के मनोरंजन करने का जूनून था. सबने मिलकर वाल्ट डिज्नी को बनाया. पुस्तक में विस्तार से उसकी प्रबंधन क्षमता के बारे में लिखा है, किस तरह से अपनी योजनाओं में फेल होने के बावजूद वह हार नहीं मानता था, लोगों का पैसा डूबा देने के बाद भी आत्मविश्वास नहीं खोता था. लेखिका ने उसे एक लीडर के रूप में देखा है. इस अर्थ में मुझे यह एक प्रेरणादायी किताब लगी.

लेकिन फिर भी कुछ बातें हैं- एक, तो २८४ पेज की यह पुस्तक कुछ अधिक बड़ी लगती है, इसमें मुझे कुछ अधिक विस्तार लगा, जिसके कारण इसकी रोचकता भंग हो जाती है. पुस्तक हिंदी के सामान्य पाठकों के लिए नहीं रह जाती है. दुर्भाग्य से ऐसे विषयों की पुस्तकों का जो विशिष्ट पाठक-वर्ग हिंदी में है वह भी लेखिका की तरह अंग्रेजी भली-भांति पढ़ लेता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं इस पुस्तक के महत्व को समझ नहीं रहा हूं. निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है और आम पाठकों तक इसे पहुंचाने के लिए अगर इसका संक्षिप्त पेपरबैक संस्करण भी आए तो मुझे लगता है ‘वाल्ट डिज्नी: एनिमेशन का बादशाह’ अधिक उपयोगी साबित होगी. बहरहाल, मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में यह एक pathbreaking  किताब साबित होगी.   

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