उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में प्रो-एक्टिव विवेक

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गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु सुधीश पचौरी की याद आई तो युवा विमर्शकार विनीत कुमार के इस लेख की भी जो उन्होंने पचौरी साहब की आलोचना पर लिखी है. संभवतः उनकी आलोचना पर इतनी गंभीरता से लिखा गया यह पहला ही लेख है. यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी पत्रिका ‘द  बुक रिव्यू’ के लिए लिखा गया था, जहां इसका एक अंश प्रकाशित हुआ. बाद में यह लेख अपने सम्पूर्ण रूप में ‘बनास’ में छपा. नेटबाजी के इस दौर में नेट से दूर रहने वाले ‘सर’ को ही समर्पित यह लेख- जानकी पुल.
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हिन्दी में सुधीश पचौरी की पहचान समाजवाद के संकट और मार्क्सवाद की व्यावहारिक समीक्षा करते हुए उत्तर-आधुनिकता के प्रवक्ता विमर्शकार के तौर पर बनी है। हिन्दी आलोचना में विचारों की प्रतिबद्धता और रचना की कालजयिता साबित करने के नाम पर व्यक्तिकेंद्रित आस्था,अवसरवादिता और हठधर्मिता का जो दौर चलता आया है, सुधीश पचौरी विमर्श,पाठ-निर्मिति और भाषा के जरिए अपने को उस परंपरा से न केवल अलग करते हैं, बल्कि विचारों और अवधारणाओं को प्रतिबद्धता का मामला न मानकर विश्लेषण के औजार भर मानते हैं जिसके दुरुस्त करने की गुंजाईश बनी रहती है।[i]तमाम विरोधों को झेलते हुए भी मार्क्सवाद को लेकर व्यावहारिक समीक्षा का साहस उनकी इसी समझदारी का हिस्सा है। ये हिन्दी के गुरु-शिष्य-परंपरा पीढ़ी के या फिर अवधरणाग्रस्त आलोचक से अलग स्थितियों के लगातार ऑव्जर्वेशन के अनुसार विश्लेषण करनेवाले स्वतंत्र विमर्शकार हैं।

सुधीश पचौरी की अपनी समझ है कि किसी रचना को कालयजी करार देने से ज्यादा जरुरी है कि उसके भीतर लगातार विखंडित और विकेन्द्रित करके देखने-पढ़ने की संभावनाओं की तलाश की जाए। ऐसा किए जाने से रचना जहां विचारधाराओं की जकड़बंदी से राहत पाती है, रचनाएं विचारधाराओं की परखनली और आलोचक के निर्देशन से मुक्त होकर लिखी जान पड़ती है वहीं अवधारणाएं मशीनी पाठ का हिस्सा न बनकर एक गतिशील प्रक्रिया हासिल कर पाती है। आलोचना का यह तरीका उसे अब तक के अर्थ और संदर्भ को लेकर बनी सार्वभौमिकता की समझ को ध्वस्त करती है और उसकी जगह अर्थ की बहुआयामिता और संदर्भों का खुलापन पेश करती है। ऐसे में उनका यह विमर्श आलोचना को रुटीन वर्क से निकालकर क्रिटिकल स्पेस की तरफ ले जाता है। ये विमर्श आलोचना के निर्धारित और स्थापित बिन्दुओं को रिलोकेट करते हैं,रिप्लेस करते हैं। साहित्यिक परिवेश में व्यंग्य और खीज के अंदाज में इसे भले ही साहित्यिक उपद्रव भर करार दिया गया हो[ii], लेकिन उनकी पूरी आलोचना जिसे वे स्वयं आलोचना न कहकर विमर्श का नाम देते हैं, भारी-भरकम स्थापनाओं के दावे में न पड़कर भी वस्तुस्थिति के अनुसार उसके विश्लेषण को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।

हिन्दी में उत्तर-आधुनिकता अब यदि मजाक उड़ाने या प्रहसन का हिस्सा नहीं रह गया है, एक गंभीर विमर्श की ओर बढ़ता हुआ पाठ्यक्रम तक जा पहुंचा है तो इस माहौल के बनने में सुधीश पचौरी के शुरुआती दौर से ही सैद्धांतिकियों की गंभीरता से की गयी चर्चाओं और लगातार की गयी चिन्हों की तलाश के योगदान को समझा जाना चाहिए।[iii]उनका ये प्रयास स्थापित करते हैं कि उत्तर-आधुनिकता अब तक कि अवधारणाओं की तरह हमारे चुनने या खारिज करने का मसला नहीं है[iv]बल्कि यह वस्तुस्थिति है जिसे हमें उबरने के चालू फार्मूले खोजने के बजाय गहनता से इसके विश्लेषण करने चाहिए।  हिन्दी में उत्तर-आधुनिकता को उन्होंने इसी रुप में प्रस्तावित किया है जो कि ल्योतार के पोस्टमार्डन कन्डीशन[v]की मान्यताओं के विश्लेषण से लेकर फ्रेडरिक जेमसन के वृद्ध पूंजीवाद के सांस्कृतिक तर्क[vi]तक विस्तार पाता है। इन सबों के बीच वे हिन्दी और भारतीय समाज परिप्रेक्ष्य में उनके चिन्हों की लगातार खोजबीन और इसमें अनंत प्रतिरोध की संभावनाओं को स्पष्ट करते हैं।

हिन्दी के अधिकांश आलोचक साहित्यिक समाज की जिन हरकतों को डिफैमीलिएशन के प्रभाव में आकर नजरअंदाज करते रहे हैं ,सुधीश पचौरी उन्हें बतौर उत्तर-आधुनिकता के चिन्ह मानते हैं। मसलन अपनाए जानेवाले रवैयों से लेकर उनके लगातार प्रासंगिक बने रहने की छटपटाहट राष्ट्रवाद, आधुनिकता, समाजवाद का दामन थामते हुए भी जिस तरह से उत्तर-आधुनिकता की ओर धकेलती है,सुधीश पचौरी इस पूरी प्रक्रिया के डिटेल्स प्रस्तुत करते चले जाते हैं।[vii]यह हिन्दी आलोचकों की अपनी विवशता या चरित्र है जिनके लिखने के एजेंडे अलग हैं और अपने जीने के लिए अलग। वे इसे चितकबरा चिंतन का नाम देते हैं। ऐसे में अवधारणाओं और विचारों की प्रतिबद्धता के एजेंड़े कैसे बुरी तरह पिटते हैं,ये चुनाव से ज्यादा कैसे वस्तुगत स्थिति में बदल जाती है,यह अपने आप में दिलचस्प आव्जर्वेशन है।

हिन्दी में पहले की बाकी अवधारणाओं की तरह ही, उत्तर-आधुनिकता को खारिज करने के चालू आधारों में से एक आधार यह भी है कि यह  बाहर से आयी हुई अवधारणा है और फिर जहां आधुनिकता तक नहीं आयी,वहां उत्तर-आधुनिकता की बात ज्यादती है। (मार्क्सवाद इस तीखी आलोचना से एक हद तक जरुर मुक्त रहा है)। यह स्वयं मौजूदा समाज और साहित्य की विडंबना है कि वह बिना आधुनिकता में शामिल हुए ही उत्तर-आधुनिक होता चला जा रहा है। इसे एक क्रमिक प्रक्रिया की तरह विश्लेषित करना समझ का धोखा ही होगा।[viii]आगे वे पाठ या रचना के स्तर पर इसके चिन्हों का विश्लेषण करते हैं।

हिन्दी में रचना को लेकर उत्तर-आधुनिकता की मौजूदगी को वे क्रमशः दो स्तरों पर देख पाते हैं। एक तो यह कि रचना की रीडिंग्स के तरीके अगर बदल जाते हैं या फिर उस रचना को घटित इतिहास का हिस्सा मानने के बजाय( जिसे हिन्दी में कालजयी करार देने का प्रचलन है) वर्तमान में समझने के लिए एक प्रोजेक्ट की तरह माना जाए तो उत्तर-आधुनिकता के चिन्ह न केवल हमें दिखाई देते हैं बल्कि रचनाओं का एक जखीरा है जो कि उत्तर-आधुनिक नजरिए से पाठों की मांग करता है। रीतिकाल में फूको विचरण”,”देरिदा का विखंडन और विखंडन में कामायनी पाठ के तरीके बदलने का काम है जिससे क्रमशः रीतिकाल नायिका भेद और दरबारी साहित्य जैसे मीनिंग की फिक्सेशन से बाहर निकलकर यौनता-विमर्श तक पहुंचता है और जयशंकर प्रसाद की कामायनी मुक्तिबोध की सभ्यता समीक्षा से विस्तार पाकर अद्यतन पूंजीवादी दशा के बीच के संदर्भों से जाकर टकराती है। सुधीश पचौरी के विमर्श में चूंकि वर्तमान सबसे ज्यादा क्रियाशील और सक्रिय है इसलिए ये तमाम पाठों के बीच उसके संदर्भों की तलाश बारीकी से कर लेते हैं। इन रचनाओं के पाठ के तरीके बदलने के साथ-साथ उसे विश्लेषित करने के तरीके पर विचार करें तो यह अपने आप में उत्तर-आधुनिक पाठ तैयार करते हैं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पाक्षिक कॉलम बिंदास और अब अद्य-गद्य बिंदास(2009) में इसे भाषा और साहित्य को लेकर मुद्दों के चुनाव के स्तर पर विशेष तौर से देखा जा सकता है। यानी आलोचना या विमर्श को अगर हम स्वतंत्र रचना मान रहे होते हैं तो सुधीश पचौरी के यहां पाठ की यह निर्मिति भी हिन्दी में उत्तर-आधुनिक परिवेश निर्मिति में एक महत्वपूर्ण एक्टिविटी है। रचनाकार के स्तर पर मनोहरश्याम जोशी के प्रयोग को उत्तर-आधुनिक साहित्य की कैटेगरी में रखते हैं।  हिन्दी में इन परिदृश्यों को समझने के क्रम में आमतौर पर उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद को एक-दूसरे से कुछ इस तरह घालमेल करके देखा जाता रहा है कि दोनों  एक-दूसरे के पर्याय नजर आने लग जाते हैं। बल्कि मार्क्सवाद के आगे की तमाम विचारधाराओं को उत्तर-आधुनिकता के खाते में डाल दिया जाता है। सुधीश पचौरी इन सबों के बीच के बुनियादी और बारीक अंतर को रीडिंग्स और विश्लेषण के दौरान अलग करते हैं।  
                                              
दूसरा स्तर है जहां वे हिन्दी समाज के बीच रचना और उसके पाठ को लेकर जो प्रक्रिया अपनायी जा रही है, उसकी चर्चा करते हैं। इस प्रक्रिया में साहित्य सबकुछ से निस्संग होकर एक रचनात्मक प्रक्रिया ही नहीं बल्कि उसमें राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक,सत्ता और अस्मिता के बनने की प्रक्रिया भी शामिल होती है। इस संदर्भ में वे दलित आलोचक डॉ. धर्मवीर के प्रेमचंद की रचना गोदान और भक्तिकालीन कवि कबीर की पाठ प्रक्रिया का उदाहरण देते हैं। कालजयी मानी जानेवाली रचना गोदान का पाठ जब एक दलित चिंतक करता है तो कैसे उसके भीतर की कालजयिता ध्वस्त होती है और जो अर्थ निकलकर आते हैं वह प्रेमचंद को लेकर स्वीकृत मान्यताओं को ध्वस्त करते हैं?[ix] इस तरह ओमप्रकाश वाल्मीकि,चंद्रभान प्रसाद जैसे लोग जो हिन्दी साहित्य की स्थापित और स्वीकृत मान्यताओं से अलग करके देख रहे हैं वह दरअसल उत्तर-आधुनिक परिदृश्यों के बीच की सक्रियता है जो आधुनिकता के सार्वभौमिक सत्य के एजेंड़े से अलग है।[x]यह स्वयं इतिहास का अंत की बहस से आगे की बात है जहां वे इतिहास की सत्ता खत्म होने के बजाय अस्मिता विमर्श और उसके बीच पनपनेवाली सत्ता की बात करते हैं। यह काम उनके सामयिक विमर्शों में सक्रिय बने रहने की वजह से सामने आए हैं।  सुधीश पचौरी मानते हैं जिसकी कल्चरल स्टडीज(अस्मिता विमर्श,माध्यम संस्कृति और अद्यतन बदलावों के लिहाज से एक स्वतंत्र अध्ययन क्षेत्र बन गया है) में विस्तार से चर्चा भी है कि उत्तर-आधुनिकता के अपने प्रतिरोधात्मक स्पेस हैं और फिर तीसरी दुनिया में इसके अपने प्रतिरोध बनते हैं।[xi]यहां पर आकर वे उत्तर-आधुनिकता के प्रस्थान बिन्दुओं की एक लंबी फेहरिस्त जारी करते हैं लेकिन हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत इसे कहां से माना जाए,यह काम बाकी है और यह हिन्दी आलोचकों के लिए बड़ा प्रोजेक्ट है। ऐसे में अपनी अवधारणों के अनुसार समाज और साहित्य के बदलने की कामना करने से ज्यादा जरुरी है कि तेजी से हो रहे बदलावों को समझने के औजार विकसित किए जाएं।[xii] तब स्वाभाविक है कि रचना के स्वयं अवधारणा और वस्तुस्थिति दोनों विश्लेषण के दायरे में समाहित हो जाएंगे।  दूसरा कि जिन स्थितियों को विश्लेषण करने के दायरे में शामिल करने की बात करते हैं,वे सिर्फ साहित्यिक स्थितियां नहीं होगी।

सुधीश पचौरी की उत्तर-आधुनिकता की यह समझ समाजवाद के संकटों से गुजरते हुए मार्क्सवाद की व्यावहारिक समीक्षा करते हुई विकसित हुई है। पूरी कल्चर स्टडीज के विमर्श में जाएं तो वहां भी अधिकांश उत्तर-आधुनिकता,उत्तर-संरचना और अस्मितामूलक विमर्श के पैरोकार इस तरह से आगे बढ़े हैं जिनके एक बड़े हिस्से को मार्क्सवाद से असहमत होते हुए भी नव्य-मार्क्सवाद के तहत रखा गया। इसलिए यह औजार किन-किन स्तरों पर कारगर और नाकाम साबित होते हैं, इसकी विस्तार से चर्चा वो अपनी किताब उत्तर आधुनिक समय और  मार्क्सवाद (2009) में करते हैं। मार्क्सवाद की व्यावहारिक समीक्षा खासकर हिन्दी क्षेत्र के संदर्भ में समझने के लिए यह एक अनिवार्य किताब है। इस किताब में उन्होंने मार्क्सवाद की क्लासिकल व्याख्या  या मशीनी पाठ न करके उसकी प्रैक्टिस के बाद यह विचारधारा कितनी मतलब की रह जाती है,इसकी चर्चा ज्यादा की है। हां,यह जरुर है कि वे मार्क्सवाद के क्लासिकल पाठ मसलन कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और इकॉनमिक एंड पॉलिटिकल मैनुस्क्रिप्ट 1844 को जरुरी पाठ के तौर पर शामिल करते हैं।[xiii]इस क्रम में स्वयं मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद की कुछ बुनियादी समझ को नजरअंदाज करके या न ग्रहण कर पाने की स्थिति में इसका कैसे नुकसान किया,इसकी भी चर्चा करते हैं।
 इस क्रम में सबसे जरुरी सवाल है कि मार्क्सवाद शर्तें स्वयं मार्क्सवाद पर अप्लाय क्यों न हो?[xiv]यहीं से मार्क्सवाद की प्रस्तावना और उसके व्यवहार यानी प्रैक्टिस का अंतर जाहिर होने लग जाता है।

सबसे पहली बात तो यह कि यह सवाल महत्वपूर्ण क्यों नहीं है कि किसी सामान्य मनुष्य की तरह कम्युनिस्ट क्यों असफल नहीं हो सकते?[xv] अव्वल तो यह मार्क्सवाद हो ही नहीं सकता जो अपने आप से सवाल पूछना भूलने लग जाए और आत्म-समीक्षा की जगह ब्लेमगेम में व्यस्त हो जाए।[xvi]अगर वह सवाल करे तो साफ है कि जिस पूंजीवाद को उसने शुरुआती दौर से ही संकटग्रस्त बताया कि यह अब गिरा कि तब गिरा,आज पूंजीवाद का तो लगातार विकास जारी है लेकिन गिरा तो मार्क्सवाद।[xvii] दूसरी बात कि जिस सोवियत संघ के विकास का विस्तृत इतिहास हमारे पास है,उसके पतन की कहानी के डीटेल्स हमारे पास नहीं है,ऐसा क्यों है,इसका कहीं कोई जबाब नहीं है।[xviii]भारत के संदर्भ में तो कम्युनिस्टों का इतिहास ज्यादातर असफलताओं का रहा है जिसे कि मुक्तिबोध की काव्य पंक्तियों में कहें तोअतिभव्य असफलताएं[xix]लेकिन इन असफलताओं को लेकर गहन चिंतन या दस्तावेजी काम नदारद क्यों है? हिन्दी साहित्य में मार्क्सवादी आलोचना से असहमति का लेखन है,वह भी विचारधारा के प्रति असहमति और उससे बहस करने के बजाय व्यक्तिकेंद्रित कहा-सुनी ज्यादा है। बाकी कलावादी आलोचना का अपना ही राग है। और तीसरी बात कि इसके लगातार उदार होने के पीछे की क्या रणनीति है? चीन में जहां लंबे समय तक समाजवाद का शासन रहा,आज क्यों पूंजीवाद को आगे बढ़कर स्वागत कर रहा है? जिस कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने यहां एक कामरेड को लोकसभा अध्यक्ष बनाया,उसी पार्टी के एक नेता कामरेड बीटी रणदिवे ने कहा था कि इस संविधान को आमूलचूल बदल देना चाहिए। ये मार्क्सवाद के नकारात्मक पक्ष न होकर व्यवहारिक एप्रोच है फिर भी उन कारणों की पड़ताल तो होनी ही चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों बनी या बन रही है?[xx]    आगे वे मानते हैं कि असल दिक्कत यह है कि मार्क्सवाद को बरतने के क्रम में सबसे अच्छा और सबसे बेहतर कहकर जो महामिथ खड़े किए,वे मिथ आगे चलकर मार्क्सवाद के भीतर आत्म-समीक्षा की क्षमता को क्षीण करते चले गए और सच्चे मार्क्सवादी की परिभाषा पूरी तरह पार्टी सदस्य होने तक आकर स्थिर हो गयी।[xxi]कम्युनिस्टों की संख्या में बढ़ोतरी होने के वावजूद बदलाव और विचार के स्तर पर वे कबाड़खाने में तब्दील होकर रह गए। इस बीच मार्क्सवाद के बीच जो स्थितियों के लगातार बदलते जाने से,पूंजी के प्रवाह से लेकर उसकी सक्रियता के तरीके के तेजी से बदलते जाने से जो बारीकी आनी चाहिए थी,उन तमाम संभावनाओं पर पानी फिरते चले गए।[xxii]

इस संबंध में, सुधीश पचौरी स्थितियों के प्रति नॉनसीरियस होने के साथ-साथ पाठ के प्रति लापरवाही को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। मार्क्सवाद की व्यावहारिक समीक्षा के क्रम में अंधश्रद्धा में खो देनेवाले ऐसे पाठों को भी शामिल करने की बात करते हैं। उनके ऐसा करने से मार्क्सवादियों के वर्गीकरण- रद्दी और काम के पाठों के क्रम एकदम से बदल जाते हैं। कुज़नेत्सोव कीफिलॉसफी ऑफ ऑप्टिमिज्म(1977),एल गोर्डन की मैन आफ्टर वर्क(1975) और मिकेशिन की हिस्ट्री वर्सेज एंटी हिस्ट्री(1977) आदि किताबें अचानक से झूठी ज्ञात होती है जबकि डेनियल बैल की दि  कमिंग ऑफ पोस्ट इंडस्ट्रियल सोसायटी(1973) ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।[xxiii]फ्रायड का मनोविश्लेषणवाद और अब देरिदा का विखंडनवाद और फूको के विश्लेषण को शामिल करने की अनिवार्यता बढ़ जाती है। यहां वे मार्क्सवाद की व्यावहारिक समीक्षा और पाठ को लेकर लापरवाही के बीच उत्तर-आधुनिक संबंधों को रेखांकित करते हैं। 

इस प्रयास में वे  उत्तर आधुनिक समय और मार्क्सवाद(2009) में वे उन तमाम अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों और ग्लोबल बहसों को शामिल करते हुए[xxiv]इन संबंधों का ठोस आधार रखते हैं जो आगे चलकर साबित करता है कि पूंजीवाद का संकट दरअसल समाजवाद के खुद की चूक और स्थितियों को ठीक-ठीक न समझ पाने का संकट है।[xxv]समाजवाद के भीतर भी पूंजी का वर्चस्व तेजी से पनप रहा था और उसे लगातार प्रोत्साहन भी मिल रहे थे और नई स्थितियां बन रही थीं।
इस दृष्टि से हिन्दी में वे मुक्तिबोध को अकेले रचनाकार मानते हैं जिसने कि मार्क्सवाद को सपाट  ढंग से समझने के बजाय अपने तरीके से समझा।[xxvi]मुक्तिबोध का मार्क्सवाद भारतीय स्थितियों में एप्लाइड अ-सरल औ बेहद टेढ़ा-मेढ़ा मार्क्सवाद था। जबकि उनके आजू-बाजू दो दूनी चार मार्का पहाड़ों में मार्क्सवाद तब्दील हो चुका था।[xxvii] मुक्तिबोध ने पूंजीवाद के भीतर के जिस आत्मसंघर्ष,अजनबीपन की बात की उसे देखते हुए उसे मार्क्सवाद की समझ से अलग मान लिया गया और आलोचक अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे पर लट्टू होते रहे वे सारी सारी बातें 1844 की पांडुलिपियों में विस्तार से दर्ज है जो कि स्वयं मार्क्सवाद के भीतर बहुत सक्रिय तौर पर विश्लेषित नहीं किया गया। इस तरह  समाजवाद के संकट में जा फंसने की चूक की एक लंबी फेहरिस्त सामने रखते हैं।                                                                                                                    

समाजवाद के संकट से ठीक उलट मार्क्सवाद ने तो सामंतवाद के ढांचे को गिराने में जो थोड़ी बहुत मदद भी की लेकिन पूंजीवाद ने व्यक्ति के भीतर जिस आजादी को प्रस्तावित किया,वह समाजवाद के सपनों पर भारी पड़ा।[xxviii]निम्न वर्ग के निम्न मध्यवर्ग में,निम्न मध्यवर्ग के मध्यवर्ग में और इसी तरह आगे की स्टेज में खिसककर शामिल होते जाने की तमन्ना इसी आजादी और उपभोग के स्तर पर समान हो जाने का आकर्षण है।[xxix]यहां तक आकर सवाल पूंजीवाद या समाजवाद का न होकर व्यक्ति की इसी आजादी की तमन्ना और अपने वर्ग से मुक्त होने की बनने लग जाती है। सुधीश पचौरी इन गतिविधियों और तेजी से हो रहे बदलावों को प्रो-एक्टिव विवेक से पकड़ने की कोशिश करते हैं।

उनकी इस प्रस्तावना से हिन्दी आलोचना में उनका विरोध भी हुआ। उन्हें पूंजीवाद का समर्थक,बाजार का पक्षधर तक करार दिया गया लेकिन पूंजीवाद के साकारात्मक पहलुओं पर चर्चा अनिवार्य है। यही पर आकर वे हिन्दी के बाकी आलोचकों से अलग होकर क्रिटिकल स्पेस को विस्तार देते हैं।  

सुधीश पचौरी अपने पूरे लेखन,खासकर इधर पिछले सालों में मार्क्सवाद की आधार और अधिरचना के जरिए भाषा,संस्कृति,मीडिया और समाज को समझने से अपने को अलग करते हैं। यह मानते हुए कि मौजूदा सांस्कृतिक परिवेश पूंजी के आधार पर निर्मित है,वे इसकी व्याख्या एडोर्नों के संस्कृति उद्योग या फिर फ्रैंक्फर्ट स्कूल की मान्यताओं के आधार पर नहीं करते । हिन्दी में मीडिया और मौजूदा संस्कृति की व्याख्या या तो क्लासकिल मार्क्सवादी व्याख्या के तहत या इसी रुप में होती आयी है। इस मामले में वे बाल्टर बेंजामिन सहित परवर्ती उन सिद्धांतकारों के ज्यादा करीब हैं जो यह मानते हुए भी कि मौजूदा संस्कृति पूंजीवाद प्रक्रिया का ही हिस्सा है,लेकिन इससे नए-नए अर्थ पैदा हो रहे हैं और उनमें से कई  अर्थ डेमोक्रेटिक और सेकुलर अर्थों के ज्यादा करीब हैं। बल्कि इसी साल प्रकाशित अपनी किताब पपलू संस्कृति( 2010) में इसे वे अर्थ यानी मीनिंग से निकलकर उपभोग और आनंद क्षेत्र में दाखिल होकर कैसे पॉपुलर कल्चर का निर्माण कर रहे हैं,इसे विस्तार से बताते हैं।[xxx]फिर अगर इसकी आलोचना भी करते हैं तो उसका आधार महज नैतिक आग्रह न होकर वे शर्तें हैं जिसे कि बाजार और मीडिया ने स्वयं अपने लिए निर्धारित किए हैं और जिस आलोचना में एक उपभोक्ता और दर्शक की शिकायत भी शामिल है।[xxxi]भारतीय मीडिया के संदर्भ में इसे विश्लेषित करने का सबसे बड़ा आधार बिल्वर श्रैम की वह अवधारणा है जिसके अनुसार विकासशील देशों में संचार माध्यमों का काम अनिवार्यतः सामाजिक विकास करना है। ये बातें प्रसार भारती ने भी संहिता के तौर पर लागू की है लेकिन सुधीश पचौरी उदारवादी अर्थव्यवस्था के बीच माध्यमों को जिस रुप में विकसित होते देख रहे हैं,उनके विश्लेषण के लिए यह अवधारणा काम लायक नहीं रह जाती। आज आइस-उद्योग( इन्फॉर्मेशन,कन्ज्यूमरिज्म और एन्टर्नटेन्मेंट) के जरिए जो संस्कृति विकसित हो रही है संचार माध्यम की भूमिका स्नेहक के तौर पर हो गयी है जो कि इसकी गति को तेज करता है। ये तीनों मिलकर एक-दूसरे के चरित्र को इतना ब्लर करते हैं कि अलग-अलग इनका विश्लेषण लगभग असंभव है। यह पूंजी और साधनों का बहुत ही संश्लिष्ट प्रयोग है। 
                                                        
संस्कृति के इस मौजूदा रुप जिसे कि उन्होंने पॉपुलर कल्चर और अब पपलू संस्कृति के तौर पर व्याख्यायित किया उसमें उत्तर-आधुनिक परिदृश्यों के ठोस रुप में सामने की झलक साफ तौर पर दिखाई देते हैं। संस्कृति के इस रुप में पूंजीवाद की आजादी और उत्तर-आधुनिकता के विकेंद्रित भाव दोनों शामिल तो है ही इसने संस्कृति को लेकर आधुनिकता की समझ को बड़ा झटका लगने की बात भी साफ हो जाती है। इसने आधुनिकता के स्थापित उच्च संस्कृति और निम्न संस्कृति का धारणा को पूरी तरह ध्वस्त करने इसके बीच एक मुक्त प्रवाह की स्थिति पैदा कर दी है। यह एक माहौल की निर्मिति करता है जिसमें कि लोकतांत्रिक प्रोजेक्ट पर विफल होने के वावजूद सूचना,मनोरंजन और उपभोग के स्तर पर अपने को समान पाते हैं। इसमें नए विचारों,अवसरों और नए लोगों के लिए ज्यादा स्पेस है[xxxii]जो बौद्धिक मंचों की मठीधीशी को खत्म करता है। 

2 COMMENTS

  1. एक बहसतलब लेखक के रूप में सुधीश पचौरी के काम के साथ एक गंभीर संवाद बनाने की कोशिश करने के कारण यह लेख महत्वपूर्ण है . कुछ विन्दुओं पर असहमति की संभावना बनती है .
    ''हिन्दी आलोचना में विचारों की प्रतिबद्धता और रचना की कालजयिता साबित करने के नाम पर व्यक्तिकेंद्रित आस्था,अवसरवादिता और हठधर्मिता का जो दौर चलता आया है'' वह किसी आलोचक के महत्व की पहचान का उचित प्रस्थान्विंदु नहीं है .हिन्दी आलोचना का महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार का नहीं है , और जो महत्वपूर्ण नहीं है उस के बरक्श किसी खास लेखक के महत्व का निरूपण सार्थक नहींहो सकता . जड्सूत्रवादी मार्क्सवादी आलोचना पर गंभीर बहस मार्क्सवादी आलोचना के दायरे में भी शुरू से ही होती आयी है .वह मुक्तिबोध तक सीमित नहीं है. .रामविलास शर्मा से रांगेय राघव और नामवर सिंह की बहसों को इस संदर्भ में याद किया जा सकता है . स्वयं मुक्तिबोध की जिन बातों की सार्थकता १८४४ की पांडुलिपियों के हवाले
    से देखी जा रही है , उन बातों पर नामवर सिंह ने यथासमय पर्याप्त ध्यान दिया है , इस लिए मार्क्सवादी आलोचना को इस श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता .
    विनीत ने यह ठीक नोट किया है कि नये माध्यमों के जरिये विकसित हो रही नवउदार संस्कृति के विश्लेषण के लिए यह अवधारणा काम लायक नहीं है कि 'विकासशील देशों में संचार माध्यमों का काम अनिवार्यतः सामाजिक विकास करना है' .तब देखना पडेगा कि इस बनती हुयी संस्कृति में उच्च और निम्न वर्गों की सांस्कृतिक जरूरतों और छवियों की मुक्त और एकसमान आवाजाही की धारणा भी किस हद तक काम लायक है .खास तौर से तब जब हम विश्लेषण में 'वर्ग' को एक वैध श्रेणी के रूप में मंजूर करते हैं . सांस्कृतिक आवाजाही के बिल्ले के नीचे टी आर पी के नाम पर अगर सीमित किस्म की अभिरुचियों को 'जनरुचि की आजादी 'के बतौर स्थापित किया जा रहा है , तो उसे 'उत्तर आधुनिक कंडीशन ' जैसे किसी रहस्यमय जुमले से ढँक कर जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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