विजेंद्र नारायण सिंह का जाना एक अकेले व्यक्ति का जाना नहीं है

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प्रसिद्ध आलोचक विजेंद्र नारायण सिंह को याद कर रही हैं वरिष्ठ कवयित्री रश्मिरेखा– जानकी पुल.
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हिंदी के जाने-माने आलोचक, प्रखर चिन्तक और विद्वान वक्ता विजेंद्र नारायण सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. १३ अगस्त को देर रात पटना के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया. उनकी उम्र ७६ साल थी. वे ह्रदय और सांस संबंधी रोगों से ग्रस्त थे और पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. पर इस तरह से अचानक हमारे बीच से वे चले जायेंगे यह हम लोगों ने नहीं सोचा था. महज चार वर्ष पूर्व उन्होंने मुजफ्फरपुर को अपना स्थायी निवास बनाया था. हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय से अवकाश प्राप्त करने के बाद वे इससे पहले पटना में रह रहे थे. मुजफ्फरपुर की साहित्यिक गतिविधियों के लिए यह बड़ी बात थी. बेहद सरल और सहज व्यक्तित्व था उनका और छोटी-छोटी गोष्ठियों में भी वे हमेशा प्रस्तुत रहते थे. उनसे मिलना, बातें करना रचनात्मकता के समृद्ध संसार से गुजरना था. एक बार उनके साथ पटना की किसी गोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला था. रास्ते भर इतनी तरह की साहित्यिक बातें होती रहीं कि पता ही नहीं चला कि समय कैसे बीत गया. बड़ी-बड़ी बातों के साथ-साथ स्मृतियों का समृद्ध खजाना था उनके पास. उन्होंने कभी भी अपनी बीमारी को अपने लेखन पर हावी नहीं होने दिया. ताज्जुब की बात है कि इतने शारीरिक कष्टों के बीच भी वे एक युवा लेखक की तरह सक्रिय रहे- लेखन में भी और राष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियों-सेमिनारों में भी. शायद ये यात्राएं ही उन्हें रचनात्मक ऊर्जा और जीने के उत्साह से भरती हों. पहले प्रकाशित नवजागरण संबंधी आलेखों से उनसे मेरा परिचय हुआ. उनके विचार इतने सुलझे हुए, अकाट्य और चुम्बक की तरह आकर्षित करने वाले थे. उन आलेखों ने मुझे नवजागरण को नए तरह से समझने की दृष्टि दी. उनकी भाषा में एक प्रवाह था जो गंभीर आलेखों को भी पठनीय बनाता था. फोन पर तो एक-दो बार उनसे बात हुई थी लेकिन पहली मुलाकात मुजफ्फरपुर में एक सेमिनार में हुई, जिसमें शम्भुनाथ जी, खगेन्द्र ठाकुर के साथ विजेंद्र नारायण सिंह भी वक्ताओं में थे. उनकी सबसे खास बात यह थी कि वे कभी अपने आलोचकीय ज्ञान से सामने वाले को आतंकित नहीं करते थे और जब तक उनसे कुछ पूछा ना जाए वे प्रायः श्रोता की मुद्रा में ही रहते थे. लेखकों को प्रोत्साहित करने का उनका ढंग निराला था. जब भी वे किसी की रचना पढते या रचना से संबंधित कोई टिप्पणी तो फोन करके वे सूचना देते, उत्साहित करते और जरूरत पड़ने पर सामग्री भी उपलब्ध करवा देते. आभार व्यक्त करने पर कहते- मुझे पता है एक लेखक को इससे बढ़कर प्रसन्नता किसी दूसरी बात से नहीं हो सकती. हम लेखकों का यह दायित्व होना चाहिए. यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू है जिसे भूलना असंभव है. हमें उनका सान्निध्य बहुत कम समय के लिए मिला. इस शहर के अतीत और वर्तमान के प्रति उनमें बच्चों सी जिज्ञासा थी.

६ जनवरी १९३६ को समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर नामक गाँव में इनका जन्म हुआ. जी.डी. कॉलेज, बेगुसराय से इन्होंने अपना अध्यापन कार्य आरम्भ किया. भागलपुर विश्वविद्यालय में भी रहे और उसके बाद हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अवकाश ग्रहण करने तक पढ़ाते रहे. विजेंद्र नारायण सिंह को आलोचना के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि के लिए राष्ट्रपति की ओर से ‘सुब्रमण्यम भारती पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था. इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में ‘वक्रोक्ति सिद्धांत और छायावाद’ है. इनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में ‘उर्वशी: उपलब्धि और सीमा’ अलग से रेखांकित करने योग्य हैं. इन कृतियों से उनकी व्यापक दृष्टि और नए दृष्टिकोण का पता चलता है.

विजेंद्र नारायण सिंह का जाना एक अकेले व्यक्ति का जाना नहीं है बल्कि उस गंभीर आलोचक का जाना है जिसने आलोचकीय कार्य को अपने जीवन का ध्येय बना लिया था. उन्होंने बिना किसी तैयारी के ना एक शब्द लिखा ना ही किसी विषय पर कुछ बोला. मार्क्सवादी विचार ने उन्हने देखने की नई दृष्टि दी, उनके सरोकारों को व्यापक बनाया. पर कभी वे इसकी संकीर्णता में नहीं बंधे. आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ हैं, किताबें हैं. उनकी आवाज अभी भी हमारे आसपास गूँज रही है, उनकी उपस्थिति का अहसास करवाती. उनकी तमाम रचनात्मक स्मृतियों के साथ मैं उनको नमन करती हूं. इन शब्दों के साथ-

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना
तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते. 

चित्र: यशवंत पाराशर के सौजन्य से.

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