पहचानना मुश्किल अब जीवन का चेहरा

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आज निरंजन श्रोत्रिय की कविताएँ. कवि-संपादक निरंजन श्रोत्रिय की कविताओं में बदलते समय की बेचैन करने वाली छवियाँ हैं, मनुष्यता के छीजते चले जाने का दर्द है. पढते हैं उनकी छह कविताएँ- जानकी पुल.
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1
एक रंग को बचा लेने के लिये अपील
इस विविधरंगी दुनिया में
एक रंग जो सरकता जा रहा है हमारे जीवन से
उसे बचा लेने की करबद्ध अपील करता हूँ आपसे ।
दहकता हुआ एक रंग जो हिस्सा था हमारी स्मृति का
देखा था पहले-पहल
दादी माँ के पुरातत्वीय बक्स में
जहां जरी की साडि़यों,ज़र्द पड़ गये फोटो और
यादगार चिट्ठियों के वज़न से दबी पुड़िया के भीतर
फूट पड़ती थी जिससे सूर्योदय की पहली किरण
दरअसल पौ फटनाशब्द के आविष्कार के मूल में
वह बक्स ही था जिसके यदा-कदा खुलते ही
रक्तिम उजास से भर जाता था घर ।
‘केसर है यह असलीकी गर्वोक्ति के साथ
देती थी दादी कभी-कभार उत्सव-त्योहार पर माँ को
बन रही खीर या बरफी के लिये
वे दहकते हुए अंगारों का रंग लिये तंतु नहीं सिर्फ
एक याद थी जिसे लाए थे दादाजी शांत और सुकून भरे कश्मीर से
अपने बजट का अतिक्रमण कर
दूसरी बार पढ़ा था पाठ्य पुस्तक में
किसी रीतिकालीन कवि के बसंत-गीत में
कि किस तरह नहा जाती है धरती
एक खास रंग से इस ऋतु में
फिर हुआ सामना उससे फाग में
जब टेसू के फूलों से पत्थर पर घिस कर
बनाया गया था एक गाढ़ा-खुशबूदार रंग
जो भिगो देता था प्रेम में सिर से पाँव तक ।
तब देखा था उस रंग को झंडे में देश के
लहराते शीर्ष पर
लेकिन उससे भी पहले देश पर मर-मिटे किसी शहीद के चोले में ।
इन्द्रधनुष के सात रंगों में से एक
चित्रकला की कक्षा में वह था प्रतीक
प्रेम,शांति और सौहार्द का ।
मित्रो! यह सब उस रंग के बारे में है
जिसका उद्भव दादी माँ के पुरातत्वीय बक्से में
परम्परा और विश्वास के वज़न से दबी
एक पुड़िया से हुआ था ।
ये क्या हुआ अचानक
कि फिसलने लगा है वह जीवन-रंग
हमारी हथेलियों की पकड़ से
कि जितनी भी कमीजें हैं मनपसंद उस रंग की
पहनने को हिचकता है शरीर
कि तूलिकाएँ ठिठक जाती हैं सूर्योदय के लैण्डस्केप में
वह दहकता रंग भरते समय
कि उस रंग का नाम लेना
भर देता है दहशत से बाकायदा
कि आपने भी किया होगा महसूस
उस रंग के बारे में लिखी इस कविता में
प्रत्यक्ष जि़क्र नहीं है उस रंग के नाम का ।
इस पृथ्वी पर विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण की तर्ज पर
मैं
एक मनुष्य की हैसियत से
याचना करता हूँ उनसे करबद्ध
जिन्होंने हथियाया यह रंग बेशकीमती
कि बेशक न छोड़ें आप अपने और हथियार
क्योंकि आप छोड़ नहीं सकते
लेकिन बख़्श दें कृपया
इस अपहृत रंग को
उस दृष्टि की खातिर
जो अभ्यस्त हो चुकी है
इस दहकते हुए अनिवार्य रंग की
कई दिनों से सूरज कैद है
दादी माँ के बक्से में ।
2
समानुपाती
एक दिन
दस लोगों के हादसे में मरने की ख़बर
हिला कर रख देती है
अगले दिन फिर से मरते हैं दस लोग
कांप जाते हैं हम ख़बर पढ़ कर
अगले दिन फिर से दस लोगों की मौत
बमुश्किल निकाल पाती है कोई हाय मुँह  से
दस लोगों के मारे जाने की ख़बर
अब एक कॉलम है अख़बार का
पढ़ते हैं जिसे हम सहज भाव से
कई बार नहीं भी पढ़ते ।
फिर एक दिन अचानक मारे जाते हैं सौ लोग
हादसे में
ख़बर पढ़ कर हम फिर दहल उठते हैं ।
हमारा दहलना अब
मृतकों की संख्या के सीधे समानुपाती है ।
         
3
मोबाइल
मैं अभी शामला हिल्स में हूँ!
उसने कहा मोबाइल पर नंबर देखकर
हालांकि था वह एमपी नगर में
एकदम विपरीत छोर पर
वह आसानी से झूठ बोल रहा था
इस चलताउ यंत्र के सहारे
उसे पकड़ना मुश्किल था उसके ठिकाने को तो असंभव!
मोबाइल बज रहा था लगातार
वह नंबर देखता और बजने देता मुँह बिचका कर
यहां तक कि आस-पास के लोग भी नहीं टोकते अब तो
कि भाई साहब! आपका मोबाइल बज रहा है
जैसे कि टोक देते थे एक समय
कि आपके स्कूटर की लाइट जल रही है!
कभी मिलने पर कह देगा कि–
दूसरे कमरे में था- सुनाई नहीं दिया
मीटिंग में था- वाइब्रेशन पर था
ट्राफिक में फंसा था- शोर में गुम गया
मोबाइल की घंटी बजती दस्तक की तरह हमारे दरवाज़े पर
मगर कॉलर आइडी पर चमकता नंबर कई बार
पार नहीं कर पाता हमारे स्वार्थ और मक्कारी की दीवार
और हो जाता तब्दील मिस्ड कॉल में।
और उनका तो कहना ही क्या
जो केवल मोबाइल में फीड नंबर ही अटैंड करते हैं
इस असीम आकाश में मचलते असंख्य स्पंदन
उनके सीमित और प्रायवेट वृत्त से टकराकर लौट जाते हैं।
बातचीत के लिये खरीदे गये समय को
वह पूरी चालाकी से खर्च करता है
कई बार- सिग्नल नहीं मिल रहे
 बाद में बात करता हूँकह कर
संवाद की तनी डोर को अचानक बेरहमी से काट देता है।
कई बार एक-दो घंटी देकर
वह देता है उलाहना बेशर्मी से
परेशान हो गए तुम्हें कॉल कर-कर के
रिक्शा-चालक और बढ़ई के पास भी मोबाइल देखकर
करता है वह अपने महँगे हैंड-सैट पर गर्व!
इस शातिराना समय में
मोबाइल पर आँख दबा कर
झूठ आजमाता व्यक्ति कितना काईंया लगता है!
वे सो रहे हैं
वे बाथरूम में हैं
वे दूसरे फोन पर हैं
वे घर पर नहीं हैं
मोबाइल हमें वह झूठ बोलना सिखाता है
जिसे दुनियादारी कहते हैं
कुढ़ता रहता यह सब देख घर के कोने में
सुस्त-सा पड़ा लैंडलाइन फोन
याद करता अपने संघर्ष भरे सफ़र को
जो नंबर प्लीज़ से शुरू होकर
डिजीटल डायलिंग तक पहुंचा था
जिसे सुनना नहीं चाहती आज की
स्मार्ट और मोबाइल पीढ़ी।
करो एसएमएस
कि तुम्हें चुनना है देश का गायक
करो एसएमएस- हाँ या ना

3 COMMENTS

  1. ''…लौकी?
    ढाई रूपये पाव
    नाखून नहीं गड़ाता
    रक्त निकलने के भय से…''

  2. दरअसल ‘पौ फटना’शब्द के आविष्कार के मूल में
    वह बक्स ही था जिसके यदा-कदा खुलते ही
    रक्तिम उजास से भर जाता था घर ।

  3. ''मोबाइल बज रहा था लगातार
    वह नंबर देखता और बजने देता मुँह बिचका कर
    यहां तक कि आस-पास के लोग भी नहीं टोकते अब तो
    कि भाई साहब! आपका मोबाइल बज रहा है
    जैसे कि टोक देते थे एक समय
    कि आपके स्कूटर की लाइट जल रही है!''…………………………..क्या झूठ को चुपचाप देखते जाने का समय है ये..?

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