उनके जीवन का नमक बारिश में घुल कर बह रहा था

5
34
आज आशुतोष दूबे की कविताएँ. एक जमाने में अपने डिक्शन, अपनी किस्सागोई से उनकी कविताओं ने अलग से ध्यान आकर्षित किया था. आज भी करती हैं. उनकी कुछ चुनी हुई कविताएँ- जानकी पुल.
==============
१.
मनौती का पेड़

धागे की एक लच्छी उसे बांधकर
हम लौट आते हैं
एक झुलसती उम्मीद में
नख से शिख तक
इच्छाओं से बिंधा हुआ
जलते हुए आसमान के नीचे
एक घायल कल्पवृक्ष
खड़ा रहता है
किसी शापग्रस्त यक्ष की तरह
ईश्वर के आँगन में
उसकी जड़ों में दीमकों का घर है
पत्ते उसका साथ छोड़ चुके
पखेरू कभी से कह चुके हैं अलविदा
हमारे मनोरथों का ठूंठ
हमारी कामनाओं का वह बंजर विन्यास
अनगिनत जन्मों की
असंख्य लालसाओं से जर्जर
सांस लेता है
किसी अगले जन्म के स्वप्न में
उसके तमाम जख्म घोंसले हैं
जिनमें हमारी विपदाएं
राहत की प्रतीक्षा करती हैं
विहग-शावकों की तरह चोंच खोले
यह नीड़ वह जगह है
जहां चीजें अपनी असली शक्ल में दिखती हैं
जैसे लालच, लालच की तरह
भय, बिलकुल भय जैसा
इच्छाएं एकदम निर्वसन
एक दिन वह भी भूमिगत होगा
ईश्वर के ओसारे में
काठ की आंखों में जमी होंगी
एक नश्वर दुनिया की
अनश्वर परछाइयां
२.
अलोनी

एक दिन वह स्त्री
सब्जी में नमक डालना भूल गई
दफ्तर के लिए निकली
और भरे बरसात में हाथ में थमा
छाता खोलना भूल गई
लौटते हुए वह पता नहीं किस
बस स्टॉप पर उतर गई
एक सदमे की तरह उसने जाना
कि वह अपना पता भूल गई है
घबराहट में उसकी सांस फंसने लगी
एक दरवाजे को उसने खोल कर देखा
वहां एक आदमी बिना नमक की सब्जी के लिए
अपनी पत्नी को डान्ट रहा था
भाग कर वह सड़क पर आ गई
तेज बारिश होने लगी थी
और रास्ते पर चलती
तमाम औरतें अपने छातों से जूझ रही थीं
हाथों में अनखुले छाते लिए
भीगती हुई वे स्त्रियां
अपना-अपना पता ढूंड रही थीं
उनके जीवन का नमक
बारिश में घुल कर बह रहा था.
३.
चौथा शेर

सारनाथ के अशोक स्तंभ में चार शेर हैं
जो किसी भी तरफ से देखने पर
तीन ही दिखाई देते हैं
चौथा शेर यकीनन एक मासूम शेर होगा
भग्न ह्रदय और अवसाद-ग्रस्त
इतने-इतने बरसों में
कभी सुनाई नहीं दी उसकी दहाड़
शायद अपने चेहरे को ढूंढता हुआ वह चौथा शेर
मोहभंग का शिकार होकर
चल दिया होगा फिर से जंगल की ओर
जहां रहने के कायदे भूल जाने की वजह से
वह गिरा होगा किसी छुपे हुए गड्ढे में
और ले आया गया होगा
चिड़ियाघर के पिंजरे में
जहां अब वह अपनी भयानक बेचैनी और ऊब में
चक्कर काटता रहता है
और लोग उस पर हँसते हुए कंकड़ और
मूंगफली के छिलके फेंकते रहते हैं
वह अपनी पनीली, उदास और धुंधली आंखों से
जन-गण के इस विचित्र मन को देखता रहता है
रात में उसके रोने-डुकरने की आवाज आती है
मुमकिन है यह भी कि एक ऐसे समय में
जब सियारों और गीदड़ों के नक्कारखाने में
खुद शेर की आवाज एक तूती की हैसियत रखती हो
यह चौथा शेर अपने शेर होने की निरर्थकता पहचान
और अपने तीनों सजावटी भाइयों की बनिस्बत
उसने यही बेहतर समझा हो
कि सिर्फ एक मुहर, एक चिन्ह
एक प्रतीकनुमा मौजूदगी में गुमशुदा रहते चले आने की बजाय
त्याग देना ही उचित है यह राजसी किंतु कागजी वैभव
और फिर बुद्ध की तरह चल दिया हो
दुःख के कारणों की तलाश में
बैठा रहा हो किसी अनाम बोधि वृक्ष के नीचे
अपनी नखदंतविहीन कातर गरिमा में वह करूँ(अशेर-सा) शेर
जिसने जानी हो धीरे-धीरे
अपने दुःख की पहली और अंतिम वजह:
शेर होना
और रह न पाना

5 COMMENTS

  1. अपने प्रिय कवि को बहुत दिनों बाद पढना बड़ा सुख देने वाला होता है .ये कवितायें आशुतोष जी की काव्य प्रतिभा की अच्छी बानगी हैं

  2. बहुत अच्‍छे! इतनी सहजता… इतनी व्‍यापकता… आनंद आ गया…

  3. आशुतोष की कविता एक बड़ा प्रयास है और इस तरह एक नया उपक्रम है। मैं उनकी कविताओं को हमेशा ही बहुत ध्‍यान, उत्‍सुकता और उपलब्धि की तरह देखता-पढ़ता रहा हूँ। प्रभात, आपने इस तरह उनकी कविताओं पर ध्‍यान आकर्षित किया, इसके लिए धन्‍यवाद।

  4. आशुतोष दुबे मेरे प्रिय कवि हैं, बहुत पहले से…बहुत अनूठी बात उठाना और संयम के साथ वह कह जाना, जो किसी को सूझा न हो, उस साधारण सी चीज़, बात और दिनचर्या सी घटना के लिए. चौथा शेर उसका भग्न मन, अवसाद और बुद्ध बहुत ही अनूठी कविता है यह.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here