फणीश्वरनाथ रेणु का दुर्लभ रिपोर्ताज ‘जय गंगा!’

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आज महान गद्यकार फणीश्वर नाथ रेणु जी का स्मृति दिवस है- इस अवसर पर उनका यह दुर्लभ रिपोर्ताज जय गंगा   प्रस्तुत है- जो रेणु रचनावली में भी उपलब्ध नहीं है- रेणु साहित्य के अध्येता श्री अनंत ने अपनी साईट www.phanishwarnathrenu.com पर इसे  प्रस्तुत किया है- इसकी ओर हमारा ध्यान दिलाया पुष्पराज जी ने- सबका आभार—– जानकी पुल  
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जै गंगा …
                इस दिन आधी रात को मनहरना’ दियारा के बिखरे गांवों और दूर दूर के टोलों में अचानक एक सम्मिलित करूण पुकार मची, नींद में माती हुई हवा कांप उठी – जै गंगा मैया की जै…’ !!
        अंधेरी रात में गंगा मैया की क्रुद्ध लहरें हहराती, घहराती पछाड़ खाती और फुफकारती हुई तेजी से बढ़ रही थीं।
        लहरें उग्र होती गईं, कोलाहल बढ़ता गया –  जै गंगा मैया…  मैया रे  …  दुहाई गंगा मैया … भगवान …।
… गाय बैलों का बंधन काटो … औरतों को चुप करो भाई, कुछ सुनने भी नहीं देती है, बच्चों को देखो, ऊचला बांध पर औरतों को भेजो, अरे बाप रे, पानी बढ़ रहा है, रे बाप !  … !   … दुहाई  …     पानी ऊपर की ओर बढ़ रहा था, मानो उपर की ओर उठती हुई क्रंदन-ध्वनि को पकड़ना चाहता हो । 
         दुहाई गंगे  …
        कलकल कलकल छहर छहर – एक फूट ।‘
        – बचाओ बाबा बटेश्वरनाथ  …
        ओसारे पर पानी।
        – बाप रे, दुहाई गंगा ….
      लहरें असंख्य फन फैला कर गांव में घुसीं। घर के कोने कोने में छिपे हुए पापों को खोजती हुई पतितपावनी माता अट्ठहास कर उठी। शस्य श्यामला धरती रो पड़ी। गूंगे प्राणियों की आखिरी आवाज घिघियाती हुई पुकार, गंगाजल के कलकल छलछल में डूब गई।                                         ़  ़ ़़ दुहाई…! !
 शाम को ही मनहरना घाट से रेलवे स्टीमर को हटा कर कैसलयाबॅंड के पास लाया गया था। स्टीमर के सभी कर्मचारी, रेलवे नावों के मल्लाह, बंड ओवरसियर, बंड कर्मचारीगण, कुलियों का एक विशाल जत्था, बंड पर मेला लगा हुआ था। पानी खलासी रह रह कर जरा नाटकीय ढ़ंग से चिल्ला कर रिपोर्ट देता – दो …।
अरे धुत्त  साला… कान फाड़ डाला । सब हॅंस पड़ते । गंगा चिढ़ जाती हैं इस हॅंसी को सुन कर। पानी बढ़ता, लकड़ी के सुफेद खम्भे के काले काले दाग धीरे-धीरे पानी के नीचे डूबने लगे। सब हंसते रहे। स्टीमर रह-रह कर हिल उठता । बंड पर कोई कमर मटका-मटका कर गाता-छोटी सी मोरी दिल की तलैया, अरे हाँ डगमग डोले, अरे हाँ डगमग डोले…   
        चुप हरामी का बच्चा स्टीमर पर से बूढ़ा फैजू चिल्ला उठता। फैजू के दिमाग में तूफान चल रहा था। स्टीमर के छत पर वह अकेला ही टहल रहा था। डेढ़ सौ से ज्यादा सरकारी कूली दो स्टीमर और पच्चीस नावें। सब बेकार पड़े हैं। हुक्म है स्टीमरों और नावों को सुरक्षित रखो। कूलियों को तैयार रखो। जब तक कि हुक्म न मिले, कुछ मत करो। डी0 टी0 एस0 साहब कंठहारपुर जंक्शन के आरामदेह बंगले में मजे से रेडियो प्रोग्राम सुन रहे होंगे। जिला मजिस्ट्रेट को शायद खबर भी न मिली हो कि दर्जनों गांव के सैकड़ों प्राणी किसी भी क्षण मौत के मुँह में समा जा सकते हैं। आज पांच दिनों से दरिया की हालात खराब है। ओवरसियर से बार-बार कहा कि इस बार पूरब दियारा के गांवों पर आफत है। दरिया के रूझान को भला मैं नहीं समझूंगा। ओवरसियर हॅंसता था। उसने पढ लिखकर पास जरूर किया है, लेकिन मेरा जन्म ही नाव पर ही हुआ है।
                घहर घहर… छहर छररर… गंगा गरजती ।
        फैजू के कानों में पूरब दियारा की, खून को सर्द कर देने वाली, क्रन्दनध्वनि रह रह कर पड़ती थी। उसकी बेबसी ! वह कुछ नहीं कर सकता। वह चाहे तो उन गांवों के बच्चे को बचा सकता है, कानून ?  उसकी आँखों के कितने ही डूबते हुए प्राणियों की तस्वीरे नाच जाती। वह बचपन से ही जलचर है। मिट्टी से उसे बहुत कम नाता रहा है। बहुत बार डूबते  हुए यात्रियों की करूण पुकार को सुन कर उसने अनसुनी कर दी है। नावों को डूबते छोड़कर भागा है। स्टीमर में खतरे का भोंपा बजाने के पहले लाइफ बेल्ट उसने संभाला है। लेकिन,  उस दिन आधी रात को उसका दिमाग गर्म हो रहा था।  हुक्म है, दुनिया डूबती रहे, तुम पानी मापते रहो। रिपोर्ट दो। अजीब कानून है। 
ट्रान … ट्रान,  … ट्रान ।
बिरौली के स्टेशन के मास्टर साहब की जान आफत में है। एक ओर घाट स्टेशन बाबू हैं, दूसरी ओर चकमका के। एक जनाब घबराये हुए मिनट मिनट पर रिपोर्ट देते हैं और दूसरे साहब बेवजह की बहुत सी बातें पूछने की आदत से लाचार हैं।  ओह, एई घाटवाला और बांचने नहीं देगा।   हल्लो … चकमका। हाँ, मनहरना घाट का इस्टार्न साइड का गांव सब में पानी चला गया। स्टेशन  मास्टर का क्वाटर में पानी चला आया। कंठहारपुर बोलिये ।  क्या? गोडाउन? आरे हमारा गोडाउन में कहां जगह जगह है। तामाक से भर्ती है सो काहे?  गोडाउन का बात काहे वास्ते पूछा? अच्छा । हाँ।
        रात भर के जगे मास्टर बाबू कुर्सी पर ही सो गये हैं। प्लेटफार्म पर कोलाहल हो रहा है । घाट स्टेशन के स्टेशन मास्टर साहब बाल बच्चों और स्टाफ को लेकर ट्राली से भाग आये हैं । उनकी आसन्न प्रसूता स्त्री डर से नीली पड़ गई है । बच्चे रो रहे हैं । स्टेशन मास्टर साहब शरणार्थियों की सी मुद्रा बनाये हुए टहल रहे हैं ।
        हांफता हुआ आता है बंड का चौकीदार – मास्टर बाबू कहां हैं, मास्टर बाबू ? ओवरसियर भेजिन हैं । फैजू बिला हुकुम के पैंतीसो नाव और दोनो स्टीमर ले के चला गया है। कूली और मल्लाह लोग तैयार नहीं होता था । कसम धरा के ले गया है हिन्दु को गाय कसम, मुसलमान को क्या जाने कौन कसम, … सब महात्मा जी की जै बोल के स्टीमर खोल दिया । बोला जो रोकेगा उसको बस गंगा मइया को … टेलीफून कर दीजिये बाबू डी0 टी0 एस0 साहब को  …
        लेकिन उधर तो मुसलमानों की एक बस्ती भी नहीं है ? बिरौली स्कूल के हेड पंडित जी के समझ में फैजू की यह हरकत एकदम नहीं आती।
        भननन् ….  गड़रर  …  गरगर  …
टूटे हुए झोपड़ों के छप्परों और पेड़ों पर बैठे हुए अर्धमृतकों की निगाहें उपर की ओर ऊठती है। हवाई जहाज… हां हवाई जहाज ही है । उनके जीने की इच्छा प्रबल हो उठती है। वे चाहते हैं, चिडि़यों  वे चाहते हैं, चिडि़यों की तरह  …  हवाई जहाज से उड़ कर हरे भरे मैदानों वाली दुनिया में जाना।
        फड़रर…  गरगरर…  
        हवाई जहाज बहुत नीचे उतरकर आसमान में चक्कर काटने लगा। लोगों की निगाहें अचानक चमक उठी। मुँह से अचानक ही एक साथ निकल पड़ा – दुहाई गंगा मैया।‘ लेकिन हवाई जहाज दो तीन बार चक्कर काटकर एक ओर चला गया । सबके चेहरे मुरझा गये। उन्हें कौन समझाये कि हवाई जहाज पर जनाब जिला मजिस्ट्रेट साहब की स्थायी बाढ़ कमेटी के मंत्री के साथ बाढ़ पीडि़त इलाकों का दौरा कर रहे थे।
        धू…  धू  …  धू  … भू  … 
        जहाज ! जहाज !! छप्परवालों ने पेड़ वालों से कहा – देखो देखो, जहाज ही है क्या? कदम्ब के पेड़ पर से एक ही साथ दर्जनों गले की आवाज आई – हाँ जोड़ा जहाज ! बहुत सी नावें भी है  … जहाज आ रहा है, इधर ही…
        आ रहा है? अरे नहीं, कजरोटिया जा रहा होगा। क्या कहा बहुत धीरे-धीरे चलता है? अरे भाई, सब एक ही साथ क्यों हल्ला करते हो। कुछ सुनने भी नहीं देते।
 कुछ देर के बाद छप्पर पर के लोगो ने भी देखा कि गंगा की तरंगों पर खेलती हुई, तीर की तरह तेजी से बहुत सी नावें उनकी ओर आ रही है। खलबली मच गई ।
        छर्रर छपाक  …
        एक झोपड़ा पानी में फिर गिरा। फिर कोलाहल।  … माधो का सारा परिवार डूब रहा है रे बाप ।  …  हाय रे  …  यह देखो फुलमतिया को,  बेचारी ऊब डूब कर रही है।  …  हे भगवान  …
        किसी तरह माधो ने अपनी जान बचाई । बुढि़या भी बची । लेकिन माधो की एकलौती प्यारी बच्ची फुलमतिया डूब गई ।
        नावें करीब आती गईं । लोगों ने अगली नाव पर देखा कप्तान साहब हैं । फैजू कप्तान  …  । सुनो, कप्तान जी कुछ कह रहे हैं  …
      भाइयों जहाज यहां नहीं आ पाएगा नावों पर एक-एक कर चढ़ते जाओ  …
बाढ़ कचहरी ।
        चकमका मिडल स्कूल में अफसरों की भीड़ लगी हुई है । एक सीनियर डिपुटी मैजिस्ट्रेट साहब बाढ़ इन्चार्ज होकर आये हैं, ओवरसियर, डाक्टर, डि0 बो0 के चेयरमैन, कम्पाउन्डर । सब साहबों के अलग-अलग दफतर हैं, स्टेनों हैं, अर्दली और चपरासी हैं । स्कूल के सभी कमरों को सरकारी कर्मचारियों ने दखल कर लिया है। होस्टल में जिला, सबडिविजनल और थाना कांग्रेस कमिटियों के दफतर हैं । सभी दफतरों के सभापति, मंत्री, आफिसमंत्री और पिउन हैं। होस्टल के सभी कमरे अर्ध सरकारी साहबों के कब्जे में है। कॉमन रूम का संयुक्त बाढ़ रिलीफ कमेटी की मिटिंग के लिए सुरक्षित रखा गया है। स्वयंसेवकों के लिए सामने मैदान में कुछ तम्बू दिये गये हैं । सब मिला जुला कर एक भयावह वातावरण की सृष्टि हो गई है । जनता इस ओर भय और सम्मान की निगाह से देखती है ।  …  बाढ़ कचहरी ।
        सभी दफतर मशीन की तरह चल रहे हैं – देखिये सभी दरखास्ते प्रापर चैनल से आनी चाहिए। सबसे पहले उस पर थाना कांग्रेस कमिटी के दफ्तर का मुहर होना चाहिए, फिर स0 डि0 कांग्रेस और जिला कांग्रेस वालों का नोट। समझते हैं तो ? हां, नहीं तो पीछे मुश्किल हो जायगा। सीधे कोई दरखास्त मत लीजिए। जरा सा कुछ हो जाने से ही मामला प्राईम मिनिस्टर तक। हां, समझते हैं तो।  …  और हां, सुनिये। जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री… और हां, धर्मदेव बाबू, उनके नोट को ठिकाने से पढि़येगा।    
        चपरासी आकर सलाम करता है –  हजोर दो कांगरेसी बाबू आये हैं । साहब कुर्सी छोड़कर उठे – नमस्ते आइये ।
        हमलोग सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हैं। बाढ़ पीडि़तों की सहायता करने आये हैं। कल कलक्टर साहब से बातें हुई। उन्होंने आपसे मिलने को कहा। हमलोग के साथ तीस विद्यार्थी हैं ।
         ओ, सोशलिस्ट पार्टी के वर्कर हैं आपलोग?  – साहब को गुस्सा आ रहा था अपने चपरासी पर। बदतमीज ने सोशलिस्टों को भी कांग्रेसियों में शुमार कर दिया । नहीं तो मुझे कुर्सी छोड़कर उठने की क्या जरूरत था। – बोले – ठीक है कहिये ।
        – हमलोग स्टेशन प्लेटफार्म पर पड़े हैं। हमारे रहने के लिए जगह का इन्तजाम कर दीजिये और स्वयंसेवको के भोजन का। …
         देखिये, जगह का तो बड़ा दिक्कत है। वहां तो देख ही रहे हैं … धर्मदेव बाबू के लिए अभी तक अलग रसोई घर का बंदोबस्त नहीं हो सका है। वे मखमली परदे से दूर रहते हैं न  …
स्टेशन के प्लेटफार्म पर तो …  अच्छा देखा जायेगा ।
        और एक बात पूछनी है बिरौली स्टेशन के पास रिलीफ कम्प नहीं रखकर चकमका रखने से कोई खास सुविधा है क्या?
        जी? हां, यहां के स्टेशन का माल गोदाम अभी एकदम खाली है। रिलीफ कमिटी का गोदाम ठहरा ।  …
         नमस्ते!
        नमस्ते । अरे हां, सुनिये। कांग्रेस से अलग हो गई है न आपकी पार्टी? …  हां, सो तो ठीक है। लेकिन फिर भी  … । आपकी पार्टी के जन्मदाता तो मालवीय जी थे न? नहीं? अरे हां साहब आपको पता नहीं । आखिर हमलोग भी तो कुछ पढ़ते- लिखते हैं ।  …  नेशनलिस्ट पार्टी? हां, हां, मालवीय जी नेशनलिस्ट पार्टी के थे । ठीक ठीक। अरे साहब रोज बरोज इतनी पार्टी हो रही है कि याद रखना मुश्किल है ।  …  ओ, मार्क्स साहब  … कोई पारसी थे क्या ? …  ओ ठीक ठीक । नमस्ते ।
        हजोर सेठ कुंदनमल आये हैं ।
        आइये सेठ जी । कहिये क्या खबर लाये?  
        हजुर उदर तो ठीक है । कड़क्टर साब तो पहले कांगरेस सुबापति (सभापति) पर बात फेंक दीहिन । मैने कहा हुजुर तीन तीन सुबापति की बात है । फिर बाढ़ कुमेटी के शिकरेटरी साब हैं । भोत हंगामा है । और कड़कटर साब तो राजी हो गये । अब परस्तुती (परिस्थिति) है कि सिपड़ाई आॅफिसर (सप्लाई आॅफिसर) को राजी करना है । हुजुर से …
        ठीक है । सब ठीक हो जायगा । बताइये फिर कलकत्ते कब जा रहे हैं। मुझे एक रेडियो मंगाना है। खुद तो जा नहीं सकता । …
हुजुर कोई बात नहीं । सब ठीक हो जायगा । हम आज ही कड़कत्ता गिद्दी (गद्दी) में खबर देते हैं । डालिमचंद कड़कते हैं ।  उसके लिए आप बेफिक्र रहिये कंट्रोल के समय में डालिमचंद ने इतना रेडियो खरीदा है कि एकदम उस्ताद हो गया है।  जी? जानीवाकर? आज ही भेज देता हूँ । जी उसके लिए आप बेफिक्र रहिये । म्हारा नौकर शिवदास एकदम उस्ताद है । पांच बरस में एक-दम उस्ताद हो गया है ।
         आइये धर्मदेव बाबू ।
हुजुर, वे सोशलिस्ट पार्टी वाले कहां से आये थे? लेकिन सवाल है कि सहायता वे रिलीफ कमिटी की करने आये हैं या बाढ़ पीडि़तों की? तो गांवों में ये लोग खामख्वाह हर जगह अड़ंगा डालने पहुंच जाते हैं ।
        स्टेनों बाबू को सलाम दो ।
        हां देखिये । लाखिये टू द मैनेजर  …  न  दी, सेक्रेटरी सोशलिस्ट पार्टी । योर सर्विस  …
        अरे आप यह कह रह

3 COMMENTS

  1. गंगा मैया की भयावहता कम लगती है इनके उफनते भ्रष्टाचार और अनैतिक विचार के समक्ष ,परिवेश आज उससे भी बदतर है मगर रेनू कहाँ से लायें

  2. अद्भुत! आज भी हाल यही हैं लेकिन ऐसा कहने वाला नहीं। पढ़वाने के लिये आभार!

  3. 7 नवंबर 1948 को ‘जनता’ में प्रकाशित रेणु जी के इस दुर्लभ रिपोर्ताज को पढवाने के लिए धन्यवाद।

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