‘किस्सा पौने चार यार’ का दूसरा यार’

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मनोहर श्याम जोशी के पहले लिखे जा रहे उपन्यास ‘किस्सा पौने चार यार’ का यह अंश आज दैनिक हिन्दुस्तान ने प्रकाशित किया है. दुर्भाग्य से यह उपन्यास अधूरा रह गया, लेकिन १९६० के दशक में लिखे गए इस उपन्यास में जोशी जी के गद्य का वही अंदाज है. आप भी आस्वाद लिजिये- जानकी पुल.
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किस्सा दूसरा यार
लेखक ने दूसरे यार से परिचित होने की खातिर क्रिकेट खेलनी शुरु की. दूसरा यार हरिविलासपुरी साहित्य साधन जो न कराये. दो संस्थाओं का सक्रिय सदस्य था. पहली थी दक्षिण दिल्ली बंग परिषद और दूसरी थी एम.सी.सी. और बंगाली न होने के कारण पहली संस्था में लेखक की घुसपैठ हो नहीं सकती थी लेकिन क्रिकेट प्रेमी, क्रिकेट ज्ञाता होने के नाते वह एम.सी.सी. की सदस्यता का दावेदार हो ही सकता था. भले ही लेखक क्रिकेट अच्छी न खेलता हो, किताबों में पढ़-पढ़ कर अच्छी क्रिकेट के बारे में जानता सब कुछ है. अपने छात्र जीवन में सभी तत्कालीन पढाकू लड़कों की तरह उसे भी खिलाड़ी लड़कों के सामने जबर्दस्त हीन-भावना का बोध होता रहा था और उसने कबड्डी से लेकर क्रिकेट तक हर खेल इस बेकार सी उम्मीद में सीखा-खेला था कि उसे खिलाडी मानकर टीम में लिया जाएगा और स्कूल की विजय होने पर ‘हिप हिप हुर्रे’ के बाद उए कन्धों पर उठाकर ‘मनोहर श्याम वेल प्लेड’ का नारा बुलंद किया जाएगा. अफ़सोस कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

बहरहाल, बल्ला पकड़ना तो आ ही गया था, लिहाजा लेखक एम.सी.सी. उर्फ मलिक क्रिकेट क्लब का सदस्य बना लिया गया, मलिक, जो हरिविलास्पुरी की दवाओं की दुकान के मालिक भी थे, इस क्लब के संस्थापक, संरक्षक और टीम कैप्टेन तीनों ही थे. स्वयं बहुत ही खराब खिलाडी होने के कारण मलिक महोदय को टीम में अपने से भी खराब खिलाड़ी रखना अच्छा लगता था. इसीलिए उन्होंने दूसरे यार को स्पिन बॉलर की हैसियत से टीम में ले रखा था जबकि वह एक तरह से वाइड बॉल फेंकने का विशेषज्ञ ही कहा जा सकता था. इसलिए उन्होंने लेखक को टीम में शामिल कर लिया. चूंकि लेखक बॉलर के रूप में फुलटॉस ही फेंक पाता था और बैट्समैन के रूप में फुलटॉस को भी नहीं मार सकता था, इसलिए मलिक महोदय ने उसे विकेटकीपर का पद प्रदान किया. हालांकि लेखक को नायक जैसे धीमे बॉलरों के लिए भी विकेट से सटकर खड़ा होना खतरनाक मालूम होता था.

‘जंगपुरा जिमखाना’ से एम.सी.सी. के मैच में वह घटना घाटी, जिससे लेखक को नायक के नजदीक आने का और उसका बयान ले पाने का मौका मिला. नायक कह चुके थे कि हमारे गुगली को एक बारी गुप्ते भी प्रेज किए. किसे मालूम था कि उनकी हर गुगली लेग स्टंप से परे पड़कर लेग स्टंप से दूर जाती है. नायक की पहली तीन गेंदें लेग-बाउंड्री की ओर जाती नजर आई. फिर विकेटकीपर नायक ने बॉलर नायक के आदेशानुसार “आलेक्जेंडर का माफिक डाइभ’ मार के वह हिट लपक ली, जो निश्चय ही फाइन लेग बाउंड्री पर पहुँचती. इस ‘वांडरफुल’ कैच से नायक को मिला विकेट और लेखक को उंगली का फ्रैक्चर.

लिहाजा शाम को नायक लेखक की मिजाजपुर्सी के लिए आए. मेज पर ‘मधु बंशीर गली’ रखी थी. नायक को आश्चर्य हुआ, ‘तुमि ओ बांग्ला जानो?” लेखक ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “एकटू! एकटू!” और फिर सहसा शाब्ब्जनीन दुग्गा पूजा के उद्घोषक वाले लहजे में एलान किया, “शुद्ध बांग्ला ही नहीं, मेरी प्रतिबेशी बांगाली बाला से जो व्यापार चलता है तुम्हारा, वह भी अच्छा करके बुझता हूँ.”

सीधे धावे से मोशाय सकपकाए, “केसका बात करता तुम?” तभी आलोच्य अल्हड बाला बालकनी में आई. लेखक ने उसकी ओर इशारा किया. नायक ने बगलें झाँकने की जगह खीसें निपोरना श्रेयस्कर समझा, “ओ! ये जी- ५५० बाला. ऐसा रकम बैपार, तुम जानते, होते रहते मेरे. अभी कोइलास कलिनी फंक्शन में देखते थे, उधर का बेस्ट माने सिंगर पीछा पद गए अमारे, अमारा बाड़ी चलो, बोले. ओ बाड़ी ले गए नेई, ओ ले गए हुआं जहां में चट्टान-पठार ऐसा कुछ. अम बोला, अमको तो बख्शो तूम. तुम्हारा वास्ते तो ओ जो लंबे केस वाले डांस मास्टर, ओ ही ठीक. मेड फार इच अदर. ओ माने गुल्ली तुम माने डोंडा. मोशाई, चालीस बरस की अनब्याही म्युजिक टीचर का माहात्म्य सुनाने लगे.

बातचीत बाबत बाला जी- ५५० फिर चलाने की गरज से लेखक ने कहा, “मेरी पड़ोसन और तुम्हारा जोड़ा तो गेंद-बल्ले जैसा है.”

“मारने से किहाँ जाइगा, कीया होगा, कुछ खबर नेई.” मोशाई ने ठहाका बुलंद किया. प्रतिक्रियास्वरूप बगल की बालकनी से वह चिरपरिचित स्वर उठा- “जो वादा कीया ओ नेभाना पोड़ेगा.” फिर मोशाई ने लाख कुर्सी पर बैठे रहना चाहा, लेकिन जमाना और खुदाई दोनों ही उन्हें रोक नहीं पाए. वह लेखक के क्वार्टर की बालकनी पर जा पहुंचे. नायक-नायिका में कुछ इशारेबाजी हुई. नायिका ने सोने का इशारा भी किया और छत के रास्ते आने का भी. कमरे में लौटकर कुछ देर मोशाई परेशान से खड़े रहे. लेखक ने पूछा, “क्या बात है?”

मोशाई बोले, बरा माने दारुण व्यापार है. ए जो लारकी मैं इसे अनेक पिटी करते क्योंकि इसका सिचुएशन बोलेगा तो वैरी-वैरी पिटीएबल. बूढ़ा, बेमार बाप. चालू रकम का सौतेला माँ. डेमाग मोस्ट ऑर्डिनरी. एक ठो नाजुक दिल जो दिया था परमात्मा, परिस्थिति उसे पत्थर का बना दिया. तो अभी बचा क्या? बौडी? उसमें भी एइसा कोई खास बात नेई. फेस तो साधारण, फिगर अभी एतना कम ओमर में होगा किधर से? और जास्ती ओमर में भी खुराक की कमी से कइसा होने सकेगा? उधर इसका सौतेला माँ, अपना साथ-साथ इसको भी बेगारना चाहता. तमाम मने गोंदा-गोंदा बात सिखा दिया है इसको. इसी मारे अम करता है पिटी, पान ओ बुझता है लव. उधर उसका सौतेला माँ चाहता है कि इसको पढाने का बहाना से अम आता रहे. एक्साइट माने इसे देख के हो पन ओ सब सौतेला माँ से करे. डीस्गास्टिंग.”

लेखक को इस डिस्गस्टिंग में शुद्ध साहित्यिक नजरिये से कुछ इंटरेस्टिंग तत्व नजर आ रहे थे. लिहाजा उसने पूछा, “इस लड़की की सौतेली माँ से पटती है कि झगड़ा-तनाव है दोनों में?”

नायक इस पहलू पर रौशनी डाल नहीं पाया क्योंकि तभी बालकनी से नायिका का कातर स्वर आया, “ आ जा अब तो आ जा, मेरी चाहत के खरीदार, अब तो आ जा.”

चाहत के खरीदार ने नितांत संकोच से लेखक से यह अनुमति ली कि वह लेखक के क्वार्टर की छत से नायिका के क्वार्टर की छत में और वहां से उसके क्वार्टर में चला जाए, ओ मने. कोई कथा बोलना चाहता अम से, सामने से जाएगा तो सौतेला माँ देख लेगा.”

लेखक ने अनुमति दी और नायक के चले जाने पर इस तथ्य पर गौर किया कि नायिका की सौतेली माँ तो कुछ ही देर पहले पंजाबी पड़ोसी के साथ अपने पति के लिए दवाई लेने गई थी. लेखक ने तय पाया कि नायिका के सोने के इशारे का मतलब था कि नायिका का पिता सोया हुआ है. मौका अच्छा है. छत के रास्ते आ जाओ, तो कैसा? छत के रास्ते, मने लेखक के क्वार्टर की छत पर पहुंचकर, नीची मुंडेर लांघकर, नायिका के क्वार्टर की छत में, और वहां से सीढ़ियों के दरवाजे की ओत में. दरवाजे की ओट में वे दोनों क्या कर रहे होंगे यह सोचते हुए लेखक ने इस कहानी में हेनरी मिलर नुमा कुछ लटके कल्पना से डालने की बात सोची लेकिन अव्वल तो इस कथा में कल्पना का निषेध था और दोयम हिंदी साहित्य में हेनरी मिलर नुमा घासलेटी चीजों का. खैर तभी नायक हांफते-हाँफते लौट आए.

“ओ उसका बाबा जाग गिया इसी से लौट आया अम.” शायद लेखक का डेल कार्नेगी इस मौके पर जवाब दे गया, ईर्ष्याजन्य तिरस्कार का भाव लेखक के चेहरे पर शायद खेल ही गया. नयाक सकुचाए, मधुबंशीर गली उठाकर कवि ज्योतिन्द्र मोहज के बारे में प्रवचन देने के मूड में नजर आए. लेखक को अपने पाठकों का आम तौर से और क़स्बा-पाठिकाओं का खास तौर से स्मरण हो आया. उसने कहा, “आज नहीं तो फिर कभी सही. छत का रास्ता तुम्हारे लिए हमेशा खुला रहेगा. यह सब जवानी में नहीं करोगे, तो कब करोगे भला.”

नायक आश्वस्त हुए, बोले, “किया अम बहुत, लेकिन एतना माने छोट लड़की से नेह, मात्र इसी से, माने अब अमको करने के एच्छा भी नेह. साच जो बोलेगा तो हियाँ अमसे लरकी के माँ फंसाते थे, अम फंसे नेई. बेशी अमर बाला से करेगा कऊन, और ओ भी टाका देके. अब निश्चय नेई. करते थे कभी, तभी दूसरे थे बात. एन्डिया में क्या है, बेशी भूख, पेट के आर उससे भी, बूझे तो? जब अम लरका था, अमको कीतना एच्छे होते, लेकन शाला कुछ मिलताई नेई. टाका दरकार तो, किहाँ का भी भूख हो. फैमली अमारे बहुत माने हाय क्लास. बाबा था एक्साइज में माने बड़ा नउकरी. लेकिन परिवार बड़ा होने से पैसा-टाका कमी पड़ते. कॉलेज का छोकरी मरते मेरे रूप पर, बिना टाका उनसे दोस्ती बनाएगा कैसा? बादमाश छोकरी था, नौकरानी, ऐसा-वैसा, दूसरा, तीसरा लेकन टाका उसके लिए भी दरकार तो. फिर बोलो ओ जो सारा यूथ कहां में जाइगा? जो मेलेगा ओ लेयेगा. हँसेंगे तुम. अमारा बिल्डिंग में हुआ पाटना में हिजां बाबा था अमारा तब, हुआं हम कउन एक जून फिफ्टी एयर ओल्ड से दोस्ती बनाया. बुझे तो? ओ माने पोनचास अम माने पोनचीस. साइकोलॉजी देखे तो? बोलेगा तो कीतना दारुन. एई जो मिडिल क्लास ट्रेजेडी फ्रास्ट्रेशन, कउन भी फील्ड में भीषण फ्रास्ट्रेशन. भूखे रहेंगे, आर जदि मेटेंगे भूख, आधे मेटेंगे किम्बा मेटेंगे बासी भोजन सेई. फ्रायड-मार्क्स तुम्हारा ओ सारा अमारा पढ़ा-लेखा. उनके पास कउन भी समाधान तो नेई. ओ वार्किंग क्लास स्टेट कैसा रकम बनेगा, जो जीसका डेमाग खाराप है कैसा सुधारेगा, ओ सब प्रयोजन नेई. प्रश्न है, ए जे मेरा भूख है, एसका भी ततखन शमाधान किया होगा? अम कोई पागल नेई, कॉम्प्लेक्स कुछ नेई अमको, नार्मल हेल्दी भूख है अमारा, इस भूख का मेटाने को किया करेगा तुम? अमको समान्नो भूख दिया भागोवान, तुम अमको देता असामान्नो भग्नाशा, भीषण फ्रास्ट्रेशन. कउन भी फील्ड में येई नेराशा. अम पढ़ने में था माने ब्रिलियंट, बी.ए. फस्ट क्लास, एम. ए. तीन नंबर कम माने फस्ट क्लास. किया हुआ ओ सका? अम गाते थे, खेलते थे, नाटक करते थे, किया नेई करते थे अम, लेकिन हुआ किया? तुमई बोलो किया हुआ? अमारे मिडिल क्लास एन्डियन लोग के जेनगी में है किया? नाच? गाना? धर्म? दर्शन? सूख? बाशना? आनंदो? किया है, बोलो तो? सांस्कार, शुद्ध सांस्कार. देशी संस्कार, बिदेशी माने बिचार. माने सोने का कमरा में सांस्कार, गुसलखाना में हस्तमैथुन. ए जे अमारे संस्कृति. अमारा बाबा आर नेई, होने से पूछते थे अम, ओ सब शेखा-बताके अमको तुम हियाँ में भेजा कियूं? महानगर और लघुक्वार्टर में. बतरीस बरस का कुमार जेनगी में. ओ लब शोखाना-बताना था तो पढ़ाई दसमी बाद बंद किए किएँ नेई? अमको ओ अंग्रेज के या रेयासत के सरकार दीये कियूं नेई जिहां में कुल विशेष जन्म लिए, माई बाप कहे, सारा देखा शुना हो पक्ष, ओ पंचांग परिवेश, ओ तेज त्यौहार, संजुक्त परिवार, भाभी-साली, नौकर-चाकर, बड़े से बाड़ी छोटे से परिधि ओ सब दीये कियूं नेई? अमारा जे बाबा काका लोग, अठारी बरस में बिये किए, घरे तृप्ति हुए नेई तो बेश्शा पाले गिए. अमारा जे बेटा भतीजा लोग ओ कहते आच्छा अठारो बरस में बिये किए नेई, सम्भोग अम कर लेगा अबश्श. अमारा बाबा-काका लोग्तःसीलदार, थानेदार, अमारा बेटा-भतीजा लोग अबी मेकनिक सेल्समैन. अम किए किया? बोलो? क्लार्की आर मास्टरी. एम. ए. पढ़े, डेढ़ सौ टाका कमाए, छोटा बाई बोन पड़ाये, बुड्ढा माँ-बाप के शेबा किए, तीरथ भेजे उन्हें. महीना में एक बारी जुआ खेले जे साहइत ऐशा पेशा आय. अम आई.ए.अस. टाई. एम. ए. कउन होए नेई, हम बिये किए, बाल-बच्चों के जिम्मेदारी लिए लायक बन सके नेई. देखता रहे, आबार बदलता पत्ता, आबार पलटता कीस्मत, आबार होता कउनी चमत्कार, एण्डिया गेट, कोतूब मीनार, मौदरसा, हुमायूँ मौकबरा किहाँ किहाँ देख रहे तरुण लोग का बाशना-बेपार. देखे, मने ईर्ष्या किए. ग्लानि हुए शे भाबे जे इनका उमिर में हम किए कीया? कउनी फिफ्टी पोनचास बरस के महिला से प्रणय निवेदन. संस्कारहीन, शिस्खाहीन, तुमारा नवा जमाना का लोग ओ माने खूब खुसी से. तभी अम समढ गिए, ऐसा होगा नेई. माँ भेजे ब्रिदाबौन, छोटा बोन को भेजे बड़ा भाई पासे. हियाँ अकेले हुए. बासन मांजता जो ओमसे ले करके, तुमारे रेडियो गायिका तक कउन भी छोड़े नेह फिन. साइप लोग के, हियाँ अपना क्वार्टर में पार्टियां किए, बोतल-टोतल ओ भी सब खोले. प्रामोशन पाए. बुझे तो? मने जीये, खूप गहरा लगाए गोता मजा का समुन्दर में. ओई दिन अमारे जान-पिचान हुए तुमारे प्रतिबेशी भद्र महिला से. एनका एक जनप्रेमी बऊन आंडर सेक्रेट्री, अमारे सेक्शन ऑफिसर का बधु. ओ एन्हें एधर लेके आए अमारा क्वार्टर में भद्र महिला अमसे भी वैसा माफिक टाका. संबंध बनाने का कथा बोले, अम मने किए. एक बारी किए, बिना टाका, फिर किगे नेई. अब अम शाबधान कउगो बड़ा महिला पर हेल्थ बिगाड़ेगा नेई. एजे भद्र महिला, ए बहुत खाराप मने बादमाश हो गिए शादी के पहला से. पुब्ब बंगाल का रेफ्यूजी, बुढा माँ का सिवा कउनी दूसरा थी नेई एनकी. देखा पढ़ा नेई, मजूरी करते सकता नेई, फिन माने कमाईगा कहाँ से? बुझे तो? ओई सब. ए जे भद्रलोक तुमारे प्रतिबेशी, एसका पत्नी शात बरस आगे मार गिया. दो छोटा बाच्ची. चार बड़ा बेटा, जिनमें दो बऊ संगे अलग गिए आगे ही,दो फिन में, ए भद्र महिला के आने का पीछे. एक बड़ा बेटी ओ कभी आते ससुराल से, कियूँ बये किए गरीब जगा ऐसा बोलके लड़ते, पैसा-टाका ले जाते. अभी छोटा बाच्ची, छोटा होने से बेशी मुस्किल. बाच्ची देखेगी कउन? ऐसा होने से ए भद्रलोक किहाँ देंड-टंड कारण गिए ए भद्र महिला के बिए कर लिए. दो बच्चा आर हुआ. भद्र लोक बेमार पड़ गिए. अभी रिटायरमेंट आते, लेकिन, दो बरस आगे यू. डी. सी. हुए. ए स्टार्ट किए दफ्तरी-पियून कउनी ऐसे ही, शिमला में. हुआं इनका पहला किसी अंग्रेज साइप का चाकरी. अभी खाइगा कैसा? इसी से. बुझे तो? नेई तो आमारा बंगाली में ऐसा पान्जाबी तांजाबी सेन्धी-तेंधी जैसा चलता नेई. बंगाली माने तो मोस्ट काल्चार्ड, बोलेगा तो डीसेंट माने सुसंस्कृत. ऐ तुमारा प्रतिबेशी नीचा जात के, पुब्ब बंगाल के, बुझे तो, आर दारुन देन्नो के मारे एसीसे बूझे तो? माने पाउर्टी, घोर गोरीबी ओसी से भद्र लोक चुप्प. बोलने से अभी रेटायरमेंट का पीछे बाच्चा-बाच्ची का देखा-सुना होगा कैसे?  हाँ, भद्रलोक बेटी का धियान करते. बेमाता संग चाहे जो करो, बेटी संग नेई. बेमाता माने अमसे कहते बेटी संग बिये कर लो, ओससे तुमारा सुबिधे, अमारा ओ शुबिधे. लेकिन ऐसा नीचा जात में बिये करे कैसे? अभी हमारा छोटा बोन को बिये होने बाकी. बुझे तो? जाने अम आपना फ्यूचर बेगाड ले ओसका फ्यूचर कीस अधिकार माने बेगाड़ेगा अम? अम एक जन संस्कारी लोग, झूठे बोले माने फ़ाल्स प्रामिल दिए काम बनाए, संभव नेई आमारे लिए. स्पष्ट बोले, जे बिये करेंगे नेई, ओ रकम कूछ बेपार हो तो होने से ठीक. ओ बेपार में टाका बेशी मांगता ओ भद्र महिला. बेटी बोलते जो मेरे को भागा ले जाओ. किहाँ. ओ सब रीते तैयार बुझे तो? लेकन करेगा कैसा? बाहर में बेमाता साथ जाते. घर में बाप नेगरानी करते. आमार क्वार्टर में कऊन बाबा के काका के एक जन बेटा आ गिये

‘लेकिन अब तो छत का रास्ता’— लेखक ने बंगाली बाबू की वाचालता की वल्गा थामने का प्रयास शुरु किया ही था कि माताजी की मौजूदगी ने स्वयं उसे टोक दिया. माताजी देहलीज पर अल्पना बनाने लगीं. बंगाली बाबू प्रसन्न होकर बोले, ‘नोमस्कार! आप लोग के हियाँ भी ऐसा माफिक अल्पना बनाते किया?’

पहाड़ी माताजी ने, जिनकी जबान पर अपने पहले ‘देसी’ पड़ोसियों की बोली का असर अब तक बरकरार है, कहा, ‘हमारी तरफ इन्हें एपण कहे हैं.’

‘ओ आछा! माताजी आपको देखने में अमको अपना माताजी के खेयाल आते. ओ अभी बिंद्राबौन कहते तुमारे बिये करने से ही आयेंगे.’

‘बी.ए. में पढ़ो हो?’ माताजी ने प्रश्न किया.

लेखक ने उत्तर दिया, ‘बी.ए. नहीं बिये, ब्याह-शादी.’

माताजी बोलीं, ‘शादी तो हमारा मनोहर भी नहीं करे हैं.’

लेखक-पाठकों की बोरियत का भां हुआ. उसने यह प्रकरण समाप्त करने के लिए नायक से अंग्रेजी में कहा, ‘जब चाहो छत के रास्ते चले जाना, लेकिन छत से कूदना मत.’

नायक ठहाका मार कर चल दिए. माताजी ने इस ठहाके के संबंध में जिज्ञासा की. लेखक ने बताया, नायक कहता था कि शादी करना और छत से कूदना बराबर है. माताजी ने पूर्णाहुति दी, ‘आग लगे आजकल के लड़कों को.’
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