क्या ‘बेस्टसेलर’ नकारात्मक संज्ञा है?

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‘बेस्टसेलर’ को लेकर ये मेरे त्वरित विचार हैं. मैं यह नहीं कहता कि आप मेरी बातों से सहमत हों, लेकिन मेरा मानना है कि बेस्टसेलर को लेकर धुंध साफ़ होनी चाहिए. आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है- प्रभात रंजन.
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क्या ‘बेस्टसेलर’ नकारात्मक संज्ञा है या हिंदी समाज बिकने वाली चीजों से नफरत करता है? ये अलग बात है कि वह घर में उपभोक्ता वस्तुएं वही खरीदता है जो बिकती हैं, जिनका मार्केट में रसूख होता है, लेकिन हिंदी लेखक की किताब अगर बिक जाए तो वह हाय तौबा मचाने लगता है. मुझे एक वाक्य याद आता है, तब मैं ठीक से लेखक भी नहीं हुआ था, लेकिन महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘बहुवचन’ का संपादन करता था. अपने एक प्रिय लेखक श्रीलाल शुक्ल से मिलने का सौभाग्य मिला. इतने अब्दे लेखक से मिलना था इसलिए उस दिन मैंने बनने-संवरने पर कुछ अधिक ही ध्यान दे दिया. जब ‘रागदरबारी’ जैसे कालजयी उपन्यास के उस महान लेखक के पास पहुंचा तो तो उन्होंने मुझे देखा, अच्छी तरह परिचय के बाद बतौर सलाह एक वाक्य कहा- ‘हिंदी के लेखक हो तो अभाव का भाव दिखना चाहिए.’ उस दिन शायद उनकी यह बात मुझे बुरी लगी हो, लेकिन आज मुझे लगता है कि श्रीलाल जी ने यह सूत्र वाक्य कहा था. नहीं तो ‘बेस्टसेलर’ की बात आने पर हिंदी का लेखक नाक-भौं क्यों सिकोड़ता, उसे नकारात्मक संज्ञा के रूप में क्यों देखता?

लेकिन हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं कि लेखन लेखक का श्रम होता है और मेहनताना ही उसकी पूँजी. आज हिंदी के ज्यादातर लेखक कहीं नौकरी करता है, समय बचता है तो लेखन करता है. हम हिंदी वाले रामचंद्र शुक्ल के जमाने से ही ‘अंग्रेजी ढंग’ की बात करते रहे हैं. तो मैं भी अंग्रेजी का हवाला देते हुए कहूँ कि अंग्रेजी में लेखन कम से कम समकालीन लेखकों के लिए ‘कैरियर’ है और वह उसे बहुत गंभीरता से लेता है. हम चेतन भगत का उदाहरण देकर अंग्रेजी के बेस्टसेलर को परिभाषित करना चाहते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि अंग्रेजी में ‘मोठ स्मोक’, ‘रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट’ जैसी किताबें भी बिकती हैं. तो क्या बिकने के आधार पर हम मोहसिन हामिद को हल्का-फुल्का लेखक मान लें? मोहसिन हामिद तो महज एक उदाहरण है. ऐसे कई उदाहरण हैं अंग्रेजी में, कुछ ओरहान पामुक जैसे लेखक भी हैं जिसने अपनी तुर्की भाषा में पाठकों का आस्वाद बदल दिया. कहते हैं तुर्की में जासूसी उपन्यास पढने वाले पाठक जासूसी उपन्यास पढना छोड़-छोड़ कर उसके उपन्यासों को पढने लगे. कभी हिंदी में ‘चंद्रकांता’ के बारे में कहा जाता था कि उसे पढने के लिए लोगों ने हिंदी भाषा को सीखा.

बहरहाल, मैं यहाँ दूसरी बात करना चाहता हूँ जब किसी गंभीर लेखक की किताब बिकती है, उसको रायल्टी मिलती है तो उसे लेखने की आजादी भी मिलती है, उसे आजीविका के लिए कुछ और नहीं करना पड़ता. उसे अपने ढंग से शोध करने की आजादी मिल जाती है. अगर यह आजादी नहीं मिली होती तो क्या अमिताव घोष ‘सी ऑफ़ पौपिज’ श्रृंखला के उपन्यास लिख सकते थे, जिसका शोध हैरत में डाल देता है. लेखक को अपने ढंग से लिखने, कम करने की आजादी भी यही बाजार और उसके पाठक देते हैं, जिनको हम हिंदी वाले ‘गंभीरता’ के चक्कर में नकार देते हैं, उसे नकारात्मक संज्ञा बना देते हैं.

मुझे पेंटिंग का उदहारण ध्यान में आता है, यह एक ऐसी कला है जिसमें जिस कलाकार की पेंटिंग अधिक बिकती है वह उतना बड़ा कलाकार माना जाता है. सिर्फ हिंदी लेखक ही बिकाऊ कैसे हो जाता है, मुझे इस बात का जवाब कभी ठीक से मिल नहीं पाया. समाज बदल रहा है लेकिन हम हिंदी के लेखक ‘संघर्ष’ वही पुराने ढंग का करना चाहते हैं. गलती हमारी है, हम यही पढ़-पढ़कर बड़े हुए हैं. आदत बन गई है हमारी. हम हिंदी वाले हर नई चीज का विरोध करते हैं, उससे संघर्ष करते हैं, यह अलग बात है कि धीरे-धीरे उसे अपना भी लेते हैं.

हिंदी में अब भी सर्टिफिकेटवाद चल रहा है. हिंदी के वीर-बालक चार-पांच शीर्षस्थों-मूर्धन्यों के सर्टिफिकेट बटोर लेता है, दो-चार पुरस्कार झटक लेता है. बस उसके अमर लेखक होने के लिए इतना ही काफी होता है. वे बाजार का विरोध इसलिए करते हैं शायद कि बाजार की दौड़ में आलोचकों के सर्टिफिकेट नहीं, पाठकों की पसंद मायने रखती है. उनको लगता है शायद कि अगर यह खुला खेल चलने लगा तो उनकी पोल-पट्टी खुल जाएगी. उनकी किताब न बिके शायद. लेकिन हिंदी के बौद्धिक-अकादमिक जगत को तो वे आराम से मैनेज कर सकते हैं. मुझे लगता है बेस्टसेलर से चिढने वाला यही तबका है जो यह जानता है कि संपादक को मैनेज किया जा सकता है, आलोचक को मैनेज किया जा सकता है, सदी के महान लेखकों की सूची में अपना नाम डलवाया जा सकता है, लेकिन पाठक को इससे मैनेज नहीं किया जा सकता है. यही वह वर्ग है जो साहित्य के बिकने पर नाक-भौं सिकोड़ता है, बाजारू होने के फतवे जारी करता है.

किताब पाठक तक पहुंचे यह किस लेखक की कामना नहीं होनी चाहिए. अब एक लेखिका के पहले कहानी-संग्रह को पाठकों का प्यार मिल रहा है, पाठक उसे खरीद रहे हैं तो इससे ईर्ष्या कैसी? कम से कम एक लेखक के रूप में मुझे कोई ईर्ष्या नहीं हो रही है. हमें वाणी प्रकाशन के सकारात्मक सोच का भी स्वागत क्यों नहीं करन चाहिए? क्या बेस्टसेलर होने में लेखक का हित नहीं जुड़ा है?
मैं चाहता हूँ कि हिंदी में बेस्टसेलर को लेकर अलग-अलग मत आयें. एक माहौल तो बने, चर्चा तो चले. बिना चर्चा के ख़ारिज कर देना तो जनतंत्र नहीं होता भाई!  

9 COMMENTS

  1. असलियत यह है कि डेढ़-सौ और साढ़े तीन सौ के आंकड़े प्रकाशक द्वारा फैलाया गया प्रोपेगेंडा है। क्या इतनी कम प्रतियां छापकर कोई मुनाफा कमा सकता है? कुछेक, नाउम्मीद रचनाओं को छोड़ दें तो हर किताब पहली ही बार में हज़ार से ज्यादा छपती होगी, तभी अपेक्षाकृत कम दाम पर बिक कर भी प्रकाशक को मुनाफा देती है। और मैं जानती हूं, मेरी अपनी किताबें, खास तौर पर 'इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी' कई हज़ार की संख्या में छपी हैं- घोषित तौर पर द्वितीय और शायद वास्तविकता में कई आवृतियों के साथ और आज भी बिक रही हैं। पाठकों की प्रतिक्रियाएं इसकी खबर मुझे देती रहती हैं।

    मूल समस्या यहीं पर है कि प्रकाशक रॉयल्टी बचाने के चक्कर में बिक्री के सही आंकड़े लेखक तक से साझा नहीं करते। ऐसे में बेस्टसेलर तय करना बेहद अपारदर्शी प्रक्रिया है। भरोसा करने लायक नहीं।

    मेरी राय में हिंदी के प्रकाशकों को भी अपने डर, असुरक्षा या कंजूसपने के खोल से निकलकर खुलकर खेलना होगा- बाज़ार का जमाना है, यही बाजार उन्हें ज्यादा मुनाफा भी देगा, बेस्ट सेलर भी तय करेगा।

    और, पैसा देकर अपनी किताबें छपवाने वालों की जमात ही और है। वे कभी बेस्टसेलर की लाइन में नहीं आ सकते।

  2. चलो ! किसी प्रकाशक ने बेस्टसेलर कहने की हिम्मत तो दिखाई ! अन्यथा लेखक को तो पता ही नहीं चलता कि उसकी पुस्तक के कितनी प्रतियाँ बिकी ! इस परंपरा का स्वागत होना चाहिए !

  3. भाई मैंतो बेस्ट सेलर पुस्त की दो पुस्तकों के बारे में जनता हूँ.. एक पुस्तक जिसने अपनी पुस्तक छापने केलिए पचास हजार रु. दिया लोकार्पण में पैसठ हजार खर्च किया. आज प्रकाशक के पास चले जाए किताब खरीदने तो बोलता है मेरे यहाँ से तो ये पुस्तक नहीं छपी है साहब… दूसरी कहानी एक सरकारी साहब की जिनकी पुस्तक छपी और भारी लोकार्पण हुआ साथ ही जहा ये ययोजन हुआ उसी शहर में उसी प्रकाशक की पुस्त प्रदर्शनी लगी थी पुस्तक का आता पता नहीं था ये है बेस्ट सेलर की कहानी… बेस्ट सेलर का मतलब ???

  4. mai aap ki baat se pura sahmat hui.kishore aur jyoti ki kahani ki kitab best seller huai hai ,iss se pata chalta hai hindi ka kitna bada market hai.yeh ek sahi start hai.yeh sab dekhkar he school aur collage ka koi bachcha hindi mai interest lege varna aap lakh koshish karle kuch nahi hoga.writer ko bhi ek fuel milta hai in sab se.

  5. बेस्ट सेलर हिन्दी आलोचना के मौत की सूचना है।

    जानकी पुल पर जिस बहस की शुरूआत प्रभात रंजन ने की है इस पर खुल कर बात करने का शायद यह सबसे अच्छा वक्त है।

    मेरा ख्याल है कि इस विवाद की शुरूआत ज्योति के कहानी संग्रह छपने और विमोचन में कई महान लेखको की टिप्पडियों से आरम्भ हो गई थी। मैंने उनकी कोई कहानी नहीं पढी इसलिए मै उस पर कोई टिप्पडी नहीं कर सकता।उसका दूसरा दौर आया जब उसी ताम झाम से दो महीनों में एक हजार प्रतियों के बिकने की घोषणा कर इस शब्द को प्रचारित किया गया।

    कई मित्रों की आशंका है कि ज्योति ने खुद ही सारी प्रतियां खरीद ली हो और कुछ की आशंका है कि यह पूरी तरह से एक फ़्राड है जिसे जानबूझ कर रचा गया है और इसको प्रमाणिक बनाने के लिए कई बडे नामों का सहारा ही नहीं बल्कि शामिल कर लिया गया है।आशंका यह भी जताई जा रही है कि इस तरह कोई भी अलेखक जिसके पास पैसा है वह अपनी किताब से चर्चा में आ सकता है।

    हमें ज्योति या किसी अच्छे बुरे रचनाकार की आलोचना उनके प्रभावशाली और अमीरी के प्रभाव के वजाय उनकी कहानियों से करनी चाहिए कि उसमें क्या है, उनके चरित्र कैसे है, वे अच्छी है या बुरी। क्योकि जिस तरह के समय से हम गुजर रहे है इसमे सच्चाई के एक नहीं कई चेहरे है।

    साहित्य में आन्दोलन की शुरूआत चाहे जब हुई हो किन्तु लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन की एक बडी भूमिका रही है। मुझे याद है कि एक दौर में लघु पत्रिकाओं को धर्म युग हिन्दुस्तान और सारिका जैसी कई बडी पत्रिकाओं को बेदखल कर नया स्वर दिया था। लेकिन आज हर छोटी पत्रिका संकलन बन गई है और बडे अधिकारियों का एक बडा समूह जो विज्ञापन दिला सकता है या दे सकता है-बडा रचनाकार बन गया है। छोटी पत्रिकाए कई लोगों के लिए रोजी रोटी का साधन बन गई। इससे विरोध नहीं है मगर संपादकीय दृष्टिकोण और मूल्य कहां चले गए? क्या हमने इस पर कभी गौर किया। फॆस बुक पर किसी न किसी को पुरस्कार मिलने की सूचना हर दो दिन पर मिल जाती है।क्या हमने योग्यता के आधार पर उसे अलगाने की कोशिश की ?
    इन बातों का उल्लेख मैने इस लिए किया कि हिन्दी समाज के इस चरित्र को समझा जा सके । गोरख पांडे और जाने कितने रचनाकारो को किस तरह इस समाज ने तडपा कर मारा है…. आलोक धन्वा जैसे कवि का मजाक उडाया है.. जाने कितने रचनाकार गुमनामी के अपने अंधेरे में आज भी जी रहे है, रचना और रचनाकार के प्रति कितना सम्मान है और हमारा यह समाज कितना इमानदार है. अगर आकडे इकट्ठे किए जाए तो खुद हम अपने मुंह पर कालिख पोतने पर विवश हो जाऎंगे।

    बेस्ट सेलर बाजार का शब्द है। विज्ञापन आज के समाज में बकरी को गाय और कई बार बैल बना कर बेच रहा है। अंग्रेजी में कई किताबें यह मानक हासिल कर चुकी है। इस शब्द का सीधा मतलब है कि विषय और रचनात्मकता के मूल्य के वजाय खरीद के आधार पर किताब को मानक बनना या मानक माना जाना। हिन्दी सिनेमा में इस अफ़वाह का प्रचलन है। सिनेमा के रीलिज होते ही घोषणा कर दी जाती है कि इसने पहले ही दिन छ्ह सौ करोड का ब्यवसाय किया और इस बात का प्रचार किया जाता है और कई फ़िल्मे इस तकनीक के अपनाए जाने के कारण चली भी है।हिन्दी में शायद पहली बार किसी किताब के सन्दर्भ में यह शब्द प्रचारित हुआ है।

    मेरे लिए अभी तय कर पाना कठिन है कि इसे सुखद कहूं या दुखद।

    सुखद इस मामले में कि चलो साहित्य भी अब बाजार में उपस्थित हो रहा है । मन में कभी एक स्वप्न जगता है कि शायद हिन्दी का कोई लेखक अपने लेखन के बल पर अपनी जिन्दगी जी सके।दुखद इस मामले में कि पहले जब कोई किताब छ्पती थी। पत्र पत्रिकाऒं में उसकी समीक्षा छपती थॊ और अच्छे बुरे का निर्णय कर लोग किताबे खरीदते थे। महज पाठको की खरीद के नाम पर की जाने वाली घोषणा मेरे लिए हिन्दी साहित्य में विचार और आलोचना के मौत की सूचना है।

  6. जिस किताब के बेस्ट सेलर होने के विज्ञापन किया जा रहा है उसे पहले ही पुस्तक मेले में दो- तीन विवादों के कारण चर्चित कर दिया गया था जैसे कि अक्सर हिन्दी फ़िल्मों में भीड़ जुटाने के लिए उससे जुड़े लोग गासिप फ़ार्मूले के जरिए तमाशे करते हैं … वैसी ही गासिपों वाले फ़ार्मूले की शुरुआत हमारे यहां भी होती दिखायी दे रही है.. स्वागत है… मूल तो यह है कि किताब बिकनी चाहिए चाहे जैसे भी..

  7. मुझे लगता है आशुतोष भाई जिन पहलुओं की तरफ इशारा कर रहे हैं वही 'हिन्दी बेस्टसेलर' की त्रासदी हैं । बहुत जाना-माना तथ्य है कि कविता संकलन डेढ़ सौ और उपन्यास कहानी साढ़े तीन सौ ही छपते रहे हैं और जहां तक हिन्दी लेखकों का सवाल है तो अशोक माहेश्वरी –गगन गिल विवाद को भी ध्यान में रखे तो भी यह सच सामने आता है कि पुस्तकें अधिक नहीं बिक रही हैं इसलिए रॉयल्टी भी कम ही है । सैकड़ों लेखक जिन्होंने भाषा को समृद्ध किया जब रॉयल्टी का चेक पाते हैं तो माथा पकड़ कर बैठ जाते हैं । अरुण माहेश्वरी स्वयं लेखकों से पैसा लेकर पहली किताब छापते रहे हैं और लोग ब्रांड बनने के लिए ऐसे प्रकाशन से छपते भी रहे हैं । ऐसे में यह शंका उठना स्वाभाविक है कि इस आयोजन का सारा खेल वास्तव में है क्या ? जिस लेखिका को इतनी लोकप्रियता मिल गई क्या नियम तोड़कर उसकी किताब की हज़ार प्रतियाँ छापी गईं ? अगर ऐसा है तो काश कि ऐसा ही हो ! यह हिन्दी के लिए शुभ संकेत भी हो सकता है लेकिन ऐसा न होने पर उसे अशुभ और अशोभनीय होने से कौन रोक सकता है !

  8. हिन्दी के महा -प्रकाशक अपनी किताबों की बिक्री के सही और पारदर्शी आंकड़े छापना शुरू करें , लेखकों को वाजिब रायल्टी देना शुरू करें , अपने आंकड़ों की जांच का कोई भरोसेमंद मैकेनिज्म विक्सित करें , तभी बेस्टसेलर के उनके दावे को गंभीरता से लेना मुमकिन होगा . हमें बेस्टसेलर से विरोध नहीं है . उसके फ्रॉड से है . इस धुंध को साफ़ न किया गया तो जेनुइन बेस्टसेलर किताबों की गुपचुप बिक्री से प्रकाशक मालामाल होता रहेगा , और न बिकने वाली किताबों को बेस्टसेलर घोषित कर के बाज़ार में खपाने की कोशिश करता रहेगा .

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