जाल बहेलिया ही बिछा सकता है जानवर नहीं

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प्रियदर्शन की ये कविताएं प्रासंगिक भी हैं और बहुत कुछ सोचने को विवश भी करती हैं- ‘जानवरों से हमें माफ़ी मांगनी चाहिए’- जानकी पुल.
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जानवरों से हमें माफ़ी मांगनी चाहिए

एक

लोमड़ी चालाक होती है,
सियार शैतान
सांप ख़तरनाक
बाघ डरावना
गधा मूर्ख
घोड़ा तेज़
और कुत्ता वफ़ादार,
ये सब उस इंसान ने तय कर लिया
जो कभी चालाक होता है, कभी शैतान
कभी डरावना, कभी मूर्ख,
और कभी-कभी तेज़ और वफ़ादार भी।
वह एक ही साथ सांप भी हो जाता है और सियार भी
जानवरों से हमें क्षमा मांगनी चाहिए
उनके जंगल सभ्यताओं की तरह छलावों के घर नहीं रहे
वे जो हैं, वे दिखते रहे
उनके दांत, नाखून, रोएं, पंजे सब बिल्कुल सामने होते है
छुपना हो या छलांग लगाना, भागना हो या भक्षण,
सब खुला होता है, सबको मालूम होते हैं उनके लक्षण।
वे जानवर हैं, इंसानों की तरह दुर्व्यवहार नहीं कर सकते।

दो

जाल बहेलिया ही बिछा सकता है जानवर नहीं.
चींटियां संचय तो कर सकती हैं कालाबाज़ारी नहीं कर सकतीं
चूहे गेहूं या रोटी कुतर तो सकते हैं, उन्हें बेच नहीं सकते
बिल्लियां चूहों को खा तो सकती हैं, उन्हें पका नहीं सकतीं
कुत्ते भौंक सकते हैं, काट सकते हैं, दुम हिला सकते हैं
लेकिन आदमी को ज़ंजीरों में नहीं बांध सकते
गधे बहुत सारा वज़न ढो सकते हैं
ढेचूं-ढेचूं की आवाज़ कर सकते हैं
लेकिन अपना बोझ दूसरों के कंधों पर नहीं डाल सकते
घोड़े बहुत तेज़ दौड़ सकते हैं
योद्धाओं और कारोबारियों को पीठ पर बिठा कर दूर ले जा सकते हैं
लेकिन न तलवार चला सकते हैं न राशन तौल सकते हैं
बहुत फुर्तीले होते हैं बंदर, हर शाख उनकी पहुंच के भीतर होती है
लेकिन वे पेड़ नहीं काट सकते
बहुत विशालकाय होते हैं हाथी
लेकिन अपनी काया से बाहर जगह वे भी नहीं घेरते
अकेला इंसान है जिसके लिए जगह छोटी पड़ती जाती है,
जिसकी हसरत उसकी हैसियत से बड़ी होती जाती है
जिसके लिए धरती भी उसके कारोबार की कड़ी होती जाती है।

तीन

वे झूठ नहीं बोलते
वे मारते-मरते हैं, लेकिन क़त्ल नहीं करते
वे साज़िश नहीं करते, दस्ताने नहीं चढ़ाते
वे डरते है, लेकिन पूजा नहीं करते
वे फूल नहीं चढ़ाते. मंत्र नहीं पढ़ते
वे मंदिर-मस्जिद नहीं बनाते,
नमाज अदा नहीं करते, नहीं बोलते आमीन।
उनमें टकराव तो होते हैं, झगड़ा भी होता है.
मिल्कियत का सवाल भी खड़ा होता है
लेकिन राजनीति नहीं होती।
उनके पास भावनाएं तो होती हैं, लेकिन इतनी निखरी हुई भाषा नहीं होती
असभ्य होते हैं जानवर
नहीं होता उनका कोई ईश्वर।

चार

चिड़ियां भी ख़ूब ऊंचे उड़ती हैं
हालांकि उनका काम पंखों से चल जाता है, उनमें पेट्रोल नहीं लगता
वे बीट कर सकती हैं, बम नहीं गिरा सकतीं
वे चहचहाती हैं अंडे देती हैं सेती हैं
उनमें से कुछ ज़्यादा से ज्यादा इतनी चालाक होती हैं
कि अपने अंडे दूसरों के घोसलों में छोड़ आती हैं
लेकिन इतनी सी चालाकी के लिए भी चाहिए बहुत सारा भरोसा।
वे धरती को उसकी सबसे मीठी आवाज़ देती हैं
आसमान को उसकी सबसे प्यारी उड़ान
वे हमारी छतों और मुंडेरों को गुलज़ार करती हैं
वे उन कोनों में घर बसा लेती हैं जहां भूतों का अड्डा होता है
उनके घरों में ईंट नहीं तिनके लगते हैं,
सीमेंट नहीं घासफूस लगती है.
बहुत छोटी सी जगह में वे बना लेती हैं
अपना बहुत हल्का सा घर
जिसे कोई एक हाथ उठा कर फेंक सकता है, फेंक डालता है
कुछ देर के करुण क्रंदन के बाद लेकिन वे तैयार कर लेती हैं दूसरा घर
वे बदला नहीं ले पातीं, मजबूत घर नहीं बना पातीं, ज़मीन घेर नहीं पातीं,
वे बस उड़ती हुई दूर चली जाती हैं।
वे बहुत हल्की होती हैं बहुत नाजुक
शायद इसलिए हम उनकी परवाह नहीं करते
ये भी नहीं सोचते कि वे नहीं रहेंगी कि कितनी सूनी होगी धरती
ये भी नहीं जानते कि वे नहीं रहेंगी तो हम भी नहीं रह पाएंगे।

15 COMMENTS

  1. बेहतरीन कविताओं के लिए धन्यवाद। आप ने जिन प्रतिकों से आज के समाज को पकड़ा है वह बेहतरीन है। आज धरती भी उनके कारोबार की कड़ी हो जाती है। सिएटल का पत्र एक इन कारोबारियों को जरूर पड़ना चाहिए।

  2. प्रेमचंद जी, आप जैसे पढ़ने वाले हों तो लिखना सार्थक भी हो जाता है और लिखने की चुनौती भी बढ़ जाती है। शुक्रिया।

  3. शुक्रिया। हालांकि अब तक संशय में हूं कि लोग कुछ उदार हैं मेरे प्रति।

  4. प्रियदर्शन जी की कविताएं पढ़ता रहा हूं… उनके यहां विषयों की जितनी विविधता है, उतनी ही उन्‍हें डील करने की भी… यह कवियों का सबसे बड़ा गुण माना जाना चाहिए… ऐसी सादगीपूर्ण भाषा और ऐसा रचाव दुर्लभ है… मैं तो उनकी कविताओं को बहुत चाव से पढ़ता हूं…

  5. मनुष्य के विकास का जो ढांचा है ,प्रकृति और मनुष्य के बीच जो रिश्ता बना है, हम चाहे भी तो बहेलिया होने से बच नहीं सकते।ऎसा मुझे लगता है।

  6. राजीव जी, इंसान की क़द्र जानता हूं। आपसे पूरी तरह सहमत हूं कि हर इंसान बहेलिया नहीं हो सकता। मेरे ध्यान में बस इतनी बात थी कि अपनी भाषा में हम जो प्रतीक चुनते हैं, किसी गिरी हुई हरकत को जानवरों जैसी बताते है, नरपशु या धनपशु जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, उसके पहले हमें सोचना चाहिए। इंसान बेहतर है, भोला है, मासूम है, वह देवता भी हो सकता है, जानवर भी- यह उसकी ताकत है। लेकिन जो जानवर इंसान या देवता नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी अपनी प्रकृति है, उसे अपनी क्रूरताओं, अपने लालच का प्रतीक हमें नहीं बनाना चाहिए।

  7. प्रियदर्शन जी, जाल बहेलिया ही बिछा सकता है जानवर नहीं; लेकिन हर एक इंसान बहेलिया हो, यह कतई जरूरी नहीं है। कोई लाख-लिख कहे, अनगिनत ऐसे लोग हैं जो अपनी संवेदना, सोच और दृष्टि में ईश्वर-वुश्वर से बीस बैठते है। हाँ ये ठीक है कि अब इंसानी चोले में सजी-धजी बहेलियों की ऐसी प्रजातियाँ भी कुकुरमुते की तरह उगी दिखाई दे रही हैं जो आम इंसानों को फांसती हैं, उनकी हत्या या क़त्ल करती हैं; लूट लेती हैं किसी की भी अस्मत; करने लगती हैं बेहयाई खुलेआम। आज इन बहेलियों के शिकारगाह में जो इंसान बलि चढ़ रहे हैं वे भी इन जानवरों की बिरादरी में आते हैं। वे अपवाद नहीं कहे जा सकते हैं। वे बहुसंख्यक हैं। अतः प्रियदर्शन जी, सामाजिक-राजनीतिक अर्थशास्त्र के द्रव्यमान, घनत्व, आयतन में बहुत हल्के, नाजुक, सीधे-सादे, भोले, निश्छल, निस्वार्थ……इन सामान्य जनों को क्या इन जानवरों की बिरादरी/बराबरी में रखना न्यायोचित नहीं होगा?

  8. क्या बात है प्रियदर्शन जी। आत्मा में जाकर घुल गई आपकी कविताऎ।

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