भारतीय सिनेमा का लास्ट लियर

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युवा लेखक कुणाल सिंह सिनेमा की गहरी समझ रखते हैं. हाल में ही दिवंगत हुए फिल्मकार ऋतुपर्णो घोष पर उनका यह लेख रेखांकित किये जाने लायक है. ऋतुपर्णो घोष पर इस लेख में अनेक नई जानकारियां हैं, बंगला सिनेमा परंपरा में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन भी. एक अवश्य पठनीय लेख- मॉडरेटर 
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13 अगस्त, 1963 को कलकत्ते में जनमे ऋतुपर्णो अर्थशास्त्र से स्नातक थे। पिता श्री सुनील घोष का सम्बन्ध फिल्मी जगत से था, सम्भवतः मां का भी, इसलिए ऋतुपर्णो बचपन से ही फिल्म-निर्माण की प्रक्रियाओं से वाकफियत रखते थे।

अपने समकालीन अंजन दत्ता की तरह ही उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन जगत में कॉपी राइटिंग से की। जिंगल लिखने में ऋतुपर्णो को महारत हासिल थी। उनके द्वारा लिखे गये कई विज्ञापनों ने मकबूलियत हासिल की। बोरोलिनतो अब भी बंगाल में लगने वाले होर्डिंगों में ऋतुपर्णो के लिखे बेसलाइन बोरोलीन: बंग समाजेर अंगका इस्तेमाल करता है। यह ऋतुपर्णो ही थे जिन्होंने मार्गोसाबुन के लिए देखते खाराप, माखते भालो’ (देखने में बुरा, इस्तेमाल में लाजवाब) जैसे दुस्साहसी बेसलाइन लिखा। यह भी इत्तेफाक है कि उम्र में कोई एक दशक भर का फासला होने के बावजूद ऋतुपर्णो और अंजन ने एक ही वर्ष में निर्देशन शुरू किया, ऋतु ने बांग्ला में हीरेर आंग्टीबनाई तो अंजन ने हिन्दी में मार्क रोबिन्सन, तारा देशपांडे अभिनीत बड़ा दिन

टाॅलीवुड में ऋतुपर्णो का, बतौर फिल्म निर्देशक, आगमन बीती सदी के आखिरी दशक के शुरुआती वर्षों में हुआ था। 1992 में बांग्ला कथाकार शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय के उपन्यास पर उन्होंने हीरेर आंग्टी‘ (हीरे की अंगूठी) नामक फिल्म बनाई, लेकिन उन्हें असली पहचान उनकी दूसरी फीचर फिल्म उनीसे एप्रिल‘ (उन्नीस अप्रैल) से मिली, जो दो वर्ष बाद 1994 को रीलीज हुई थी। अपर्णा सेन और देबश्री राय अभिनीत इस फिल्म ने तब के बंगाली मध्यवर्ग को झकझोर कर रख दिया था। मां-बेटी के अन्तस्सम्बन्धों के विविध परतों को प्याज के छिलके की तरह शनैः-शनैः उतारती इस फिल्म की सबसे बडी खासियत यह थी कि पूरी कहानी एक घर के अन्दर परिघटित दिखाते हुए भी निर्देशक ने इसे बृहत्तर समाज के साथ नत्थी करने में कोई कोताही नहीं बरती थी। बाद के दिनों में ऋतुपर्णो की फिल्मों की यह खास अदा ही बन गयी कि बहुत जरूरत पडने पर ही वे कैमरे को आउटडोर में पैन करते, मूलतः वे इनडोर डाइरेक्टर ही बने रहे। वर्ष 2004 में बनी उनकी रेनकोटको इसका एक और सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है।

वैसे देखा जाए तो विजुअॅल मीडियम में ऋतुपर्णो का पहला काम हीरेर आंग्टीनहीं था। इससे पेश्तर, सम्भवतः 1988-89 में उन्होंने दूरदर्शन के लिए वन्देमातरमनामक एक डाॅक्यू-फीचर का निर्देशन किया था। दूरदर्शन पर एकाधिक बार प्रसारित होने वाले इस डाॅक्यू-फीचर में एक मां अपने बेटे को वन्देमातरमका अर्थ व इस शब्द का हमारे जीवन में महत्त्व समझाती है। इसमें ऋतुपर्णो ने बंकिमचन्द्र के आनन्दमठके एक अंश को बड़ी खूबसूरती के साथ पिरोया था।

मैंने जान-बूझकर इसे प्रमुखता से रेखांकित किया कि सिने-जगत में ऋतुपर्णो का आगमन कब हुआ था। ध्यान रहे, बांग्ला सिनेमा का अतीत बहुत ही गौरवशाली है, जहां सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, तरुण मजूमदार, तपन सिंह और मृणाल सेन जैसे निर्देशकों ने न सिर्फ भारतीय, बल्कि अन्तरराष्टीय सिनेमा को भी प्रभावित किया। लेकिन 80 के दशक तक आते-आते वही बांग्ला सिनेमा फन्तासियों-मसालों के मकडजाल में फंस चुका था। रे-घटक-सेन जैसे निर्देशक नहीं रहे, न ही उत्तम कुमार, छबि बिश्वास जैसे अभिनेता। सौमित्र चैटर्जी, मिठुन चक्रवर्ती, रंजीत मल्लिक, विक्टर बैनर्जी, धृतिमान चैटर्जी, अपर्णा सेन जैसे सशक्त अभिनेता भी भला क्या कर सकते थे जब वैसा सिनेमा ही न हो। बुद्धदेब दासगुप्ता, गौतम घोष, अंजन दत्त जैसे निर्देशक भी क्लास और मास के द्वन्द्व में फंसे थे। अर्पणा ने ‘36चैरंगी लेनऔर परमाजैसी फिल्में बनाई अवश्य थीं लेकिन थीम की वजह से इन फिल्मों को वाहवाही तो मिली, पर फैमिली एक्सेप्टेंश नहीं। ऐसे में बांग्ला प्रबुद्ध जनमानस के पास कोई और विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि वे थिएटर जाना ही छोड दें।

ऐसे में ऋतुपर्णो की उनीसे एप्रिल‘, ‘दहनजैसी फिल्मों ने जब अपनी कलात्मकता को अक्षुण्ण रखते हुए भी भारी संख्या में दर्शकों को सिनेमा हालों में खींचा, तो एकाएक बांग्ला सिनेमा का परिदृश्य बदलता-सा दिखने लगा। ऋतुपर्णो ने कुछ नया नहीं किया, बल्कि अपने समकालीनों में अपेक्षाकृत वे सबसे पहले शख्स थे, जिन्होंने राय-घटक-सेन के व्यामोह को वेधा। उन्होंने यह अहसास दिलाया कि कलात्मकता का अकेला अर्थ यही नहीं कि आप राय-घटक-सेन सिंडोम में फंसे रहे, इनसे परे भी कलात्मकता की रहनवारी हो सकती है। ऐसा नहीं था कि बुद्धदेब, गौतम, अपर्णा जैसे निर्देशक कलात्मकता का अर्थ नहीं जानते थे, बस वे उस खास किस्म की बंगाली कलात्मकतासे निकल नहीं पा रहे थे जिसे सत्यजीत या मृणाल ने सृजित किया था और क्रूरतम सचाई ये थी कि एक जमाने में वैश्विक स्तर पर पहचान अर्जित करने वाली उस बंगाली कलात्मकताने आम बंगाली समाज में अब अपनी साख खो दी थी। जरूरत थी उस कलात्मकता के समानान्तर एक अन्य कलात्मकताको सृजित करने की, और यही काम ऋतुपर्णो ने अपने समकालीनों में सबसे पहले किया। मजेदार बात यह है कि अपने लुकमें ऋतुपर्णो की यह कलात्मकता सत्यजीत या मृणाल की अपेक्षा ज्यादा बंगाली टच लिये हुए है। मसलन रवीन्द्र संगीत का सर्वाधिक प्रयोग अपनी फिल्मों में ऋतुपर्णो ने ही किया है, ‘चोखेर बाली‘, ‘नौकाडुबी‘, ‘चित्रांगदाजैसी फिल्में तो रवीन्द्र साहित्य को अपना आधार बनाती ही हैं, टैगोर की आत्मकथा जीबोन सृतिपर ऋतुपर्णो ने एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया, जिसका प्रदर्शन अभी होना है। प्रसेनजित-बिपाशा बसु अभिनीत हालिया प्रदर्शित फिल्म शब चरित्रो काल्पोनिकमें तो नायक स्वयं एक लेखक है और पूरी फिल्म उसकी श्रद्धांजलि सभा के इर्द-गिर्द घूमती है। इस श्रद्धांजलि सभा में बांग्ला के तमाम साहित्यकार मौजूद हैं (फिल्मी नहीं, सचमुच के साहित्यकार) और श्रद्धांजलि-स्वरूप स्टेज पर आकर अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं।

ऋतुपर्णो की फिल्मों की एक खास बात यह भी है कि उन्होंने अपनी फिल्मों में अभिनय के स्तर पर भी कोई खास परहेज नहीं दिखाई और अपनी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने उन्हीं मसाला ऐक्टरों को कास्ट किया, जिनसे कोई आर्ट फिल्म मेकर अपनी कलात्मक पहचान बनाये रखने की खातिर सहज ही दूरी मेंटेन कर सकता है। उनीसे एप्रिलमें मुख्य अभिनेत्री देबश्री राॅय तब की मसाला फिल्मों की हाॅट केक मानी जाती थीं और कुछेक दृश्यों में मसाला फिल्मों के सुपरस्टार प्रसेनजित की एकदम अलहदा ढंग से एंटी है। पहली बार बांग्ला दर्शकों ने प्रसेनजित और देबश्री को पेडों के इर्द-गिर्द डांस या रोमांस करते नहीं देखा। विदित हो कि तब प्रसेनजित और देबश्री में रोमांस की खबरों से कलकत्ते के अखबार रंगे होते थे और बाद में दोनों ने शादी भी कर ली, अलग बात है कि दोनों में जल्दी ही तलाक भी हो गया। लेकिन ऋतुपर्णो की ढिठाई देखिए कि पूरी फिल्म में उन्होंने इस तरह के किसी प्रकरण का इस्तेमाल नहीं किया। किसी नये फिल्ममेकर के लिए यह जोड़ी खतरनाक साबित हो सकती थी, अगर वह मसाला फिल्म नहीं बना रहा; क्योंकि पोस्टर पर प्रसेनजित-देबश्री को देखकर दर्शक एक दूसरी उम्मीद लिये थिएटर में प्रवेश करेगा। आगे चलकर प्रसेनजित ऋतुपर्णो के प्रिय अभिनेता हुए, जिनको उन्होंने कई बार रीपीट किया। सौमित्र चैटर्जी, चिरंजीत, अभिषेक चैटर्जी, ऋतुपर्णो सेनगुप्ता, दीपंकर दे, ममता शंकर, जिश्नु सेनगुप्ता, अपर्णा सेन आदि सबके साथ ऋतुपर्णो ने काम किया। इसी तरह उन्होंने हिन्दी के अजय देवगन, ऐश्वर्या राय, अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, अर्जुन रामपाल, मनीषा कोईराला, राखी गुलजार, किरण खेर, बिपाशा बसु, प्रीति जिंटा, शर्मिला टैगोर, मिठुन चक्रवर्ती, जैकी श्राफ, अन्नू कपूर, कोंकणा सेनगुप्ता, राइमा सेन, रिया सेन, दिव्या दत्ता, सोहा अली खान, नन्दिता दास, शेफाली शाह आदि कई स्वनामधन्य अभिनेताओं को उनकी अब तक की अर्जित ख्याति और इमेज के लगभग विपरीत भूमिकाओं को न सिर्फ सौंपा, उनसे बेहतर काम भी लिया।

ऋतुपर्णो की स्मृति बड़ी विचक्षण थी। शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय की कहानी साहेब भूतउन्हें बहुत पसन्द

5 COMMENTS

  1. ऋतुपर्णो घोष के बारे में आपने एक बढियां आलेख लिखा है

  2. dhanyavaad chandan aur vijay ji… pushyamitra ji aap sahi hain. antim dinon mein rituporno bahut jyada dawaiyan khane lage the. yahan tak ki un dawaon ki garmi se nijaat pane ke liye unke bedroom, jo thasathas bhara tha, mein do-do airconditioners hamesha chalte raha karte the. apne article se iska seedha seedha sambandh na thaharne ke kaaran, maine vistaar mein jana nahi chaha tha.anyways thanks.

  3. मैंने ऋतुपर्ण की कई फ़िल्में देखी और सराही हैं, वे अक्सर जमशेदपुर में अपनी फ़िल्में ले कर आते रहे हैं। कुणाल ने बहुत सारगर्भित लिखा है। लेख में जानकारी और विश्लेषण दोनों मार्के का है। बधाई जानकीपुल और कुणाल दोनों को।

  4. ऋतुपर्णो घोष के बारे में आपने एक बढियां आलेख लिखा है. खास तौर पर उनकी फिल्मोग्राफी के बारे में. मगर उनके जीवन के बारे में एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ छूट रहा है. वे खुद को एक मुकम्मल औरत में बदलना चाहते थे. इस कोशिश में उन्होंने हारमोन थेरापी का सहारा भी लिया. डाक्टरों का कहना है कि अतिशय हारमोन थेरापी की वजह से ही उनकी जान गयी है.

  5. A nice write up. Specially, parts of his understandings regarding the second sex. Kunal have not only understanding but full knowledge of subjects of cinema. Thanks.

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