नायक विहीन समय में प्रेमचंद

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आज मुख्यधारा की मीडिया में प्रेमचंद की जयंती पर उनको याद करते हुए कुछ अच्छे लेख प्रकाशित हुए हैं. ‘जनसत्ता’ में शम्भुनाथ ने अच्छा लेख लिखा है. लेकिन वह हमें इतनी सुबह-सुबह उपलब्ध नहीं हो पाया. फिलहाल यह लेख पढ़िए- सदानंद शाही ने लिखा है और यह लेख छपा है ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में- जानकी पुल.
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कुछ तारीखें कैलेंडरों पर दर्ज होती हैं और याद रखी जाती हैं, पर कुछ तारीखें ऐसी भी होती हैं, जो दिल के कैलेंडर में दर्ज होती हैं और अनायास याद आ जाती हैं। प्रेमचंद की जन्मतिथि 31 जुलाई ऐसी ही एक तारीख है। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा भले ही प्रेमचंद जयंती न मनाती हो, लेकिन छोटे-छोटे स्कूलों में, सुदूर ग्रामीण अंचल में सक्रिय नामालूम-सी कितनी ही संस्थाएं प्रेमचंद जयंती पर छोटे-बड़े आयोजन करती रहती हैं। 31 जुलाई जैसे-जैसे करीब आती है, बिना किसी प्रेरणा या प्रोत्साहन के प्रेमचंद जयंती पर आयोजनों का स्वत: स्फूर्त सिलसिला चल निकलता है। कबीर और तुलसी के बाद हिंदी पट्टी में ऐसी व्यापक लोक स्वीकृति प्रेमचंद को ही प्राप्त है। प्रेमचंद की यह लोक स्वीकृति उनकी छवि को नायक का दर्जा देती है। जिस समय में हम जी रहे हैं, वह नायक विहीन समय है। हमारे सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन में ऐसे किरदार नहीं रह गए, जिन्हें हम सहजता के साथ नायक मान लें। नायक की तरह रंगमंच पर उपस्थित होने वाले हर शख्स के भीतर एक छिपा हुआ खलनायक रहता है, जो अवसर-बेअवसर प्रकट होकर फर्जी नायक का पर्दाफाश कर देता है। ऐसे समय में प्रेमचंद जैसे लेखक की जयंती सुकून देती है।

यों तो प्रेमचंद की छवि इतनी साधारण है कि उसमें दूर-दूर तक नायक होने की संभावना नहीं है। ऐसा कई बार हुआ कि प्रेमचंद से मिलने आने वाले लोग उनसे ही पूछ बैठते थे कि यहां प्रेमचंद कहां रहते हैं? उनके व्यक्तित्व में ऐसी कोई विशिष्टता न थी, जो उन्हें दूसरों से अलग करे। अमृत राय (प्रेमचंद के बेटे और हिंदी कथाकार, आलोचक व अनुवादक) ने अपने पिता का जो चित्र खींचा है, वह बताता है- अपने साथ वो ऐसा एक भी चिन्ह नहीं रखना चाहते थे, जिससे पता चले कि वो दूसरे साधारण जनों से जरा भी अलग है। कोई त्रिपुण्ड-तिलक से अपनी विशेषता की घोषणा करता है, कोई रेशम के कुर्ते और उत्तरीय के बीच से झांकने वाले अपने ऐश्वर्य से, कोई अपनी साज-सज्जा के अनोखेपन से, कोई अपने किसी खास अदा या ढंग से। यहां तक कि यत्न साधित सतर्क सरलता भी होती है, जो स्वयं एक प्रदर्शन या आडंबर बन जाती है, शायद सबसे अधिक विरक्तिकर। देखो, इतना बड़ा नामी आदमी होकर भी मैं कितनी सादगी से रहता हूं। प्रेमचंद की सरलता सहज है। उसमें कुछ तो इस देश की पुरानी मिट्टी का संस्कार है। कुछ उसका नैसर्गिक शील है, संकोच है, कुछ उसकी गहरी जीवन दृष्टि है और कुछ उसका सच्चा आत्म-गौरव है।

दरअसल, इस देश की पुरानी मिट्टी का संस्कार और उससे निर्मित गहरी जीवन दृष्टि ही उन्हें यह लोक स्वीकृति दिलाती है। इस गहरी जीवन दृष्टि में भीगी प्रेमचंद की कहानियां भारत के आम आदमी को कदम-ब-कदम याद आती हैं। मेरे एक पड़ोसी जो दवा का व्यापार करते हैं, हरिश्चन्द्र घाट पर एक दाह संस्कार में मेरे साथ थे। सफेद कफन देखकर उन्हें कफन  कहानी के घीसू का कथन याद आया कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढ़ाकने को चीथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफन चाहिए।मुझे आश्चर्य हुआ कि श्मशान घाट पर जिस संस्कार में शामिल होने हम आए हैं, प्रेमचंद की कहानी उसी का आलोचनात्मक पाठ हमारे सामने रख रही है। प्रेमचंद दरअसल हमारी परंपरा के भीतरी आलोचक हैं। परंपरा के भीतर जो कुछ आलोच्य है, उसकी आलोचना करते हैं। यह आलोचना करते हुए वह समाज और परंपरा से बाहर खड़े उपदेशक की तरह नहीं; बल्कि परंपरा में मौजूद संकीर्णताओं का दंश ङोलते हुए सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करते हैं। प्रेमचंद जति, धर्म, स्त्री-पुरुष के नाम पर होने वाले विभेद की दृढ़तापूर्वक आलोचना करते हैं। इसीलिए एक समय में उन्हें घृणा का प्रचारक कहकर अपमानित करने की कोशिश की गई थी।

प्रेमचंद ने साहित्य में घृणा का स्थान निबंध लिखकर बताया कि सच्चा साहित्य बचपन घृणा करने वाली वस्तु या प्रवृत्ति से घृणा करना सिखाता है। मेरे बचपन के एक मित्र, जो गांव में ही रहकर स्कूल चलाते हैं, प्रेमचंद की कहानी नमक का दारोगा के कायल हैं। उनका मानना है कि यह कहानी हमारे समय की सच्चाई है। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नमक के दारोगा वंशीधर को व्यवस्था भ्रष्ट और पतित अलोपीदीन का सेवक बना देती है। जब वंशीधर पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं, तो उनके अनुभवी पिता सीख देते हैं- नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढ़ना जहां कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है! ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।अनुभवी पिता की इस सीख पर वंशीधर ने भले कान न दिया हो, लेकिन हमारे सामाजिक तंत्र में यह सामान्य अनुभव हो गया है। कहानी के शुरू में ही प्रेमचंद लिखते हैं- जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे।

अनेक प्रकार के छल प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से।ऐसा लगता है कि प्रेमचंद औपनिवेशिक युग में विकसित हो रहे तंत्र का घोषणा-पत्र ही लिख रहे हैं। एक सामान्य-सी सीधी-सादी कहानी समूले भ्रष्ट तंत्र की रूपक कथा बन जाती है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा मुअत्तली की ओर ले जाएगी, इसलिए भलाई अलोपीदीन का शरणागत होने में है। इसी तरह कुछ लोगों को ईदगाह कहानी याद रहती है। कहानी का हामिद बूढ़ी दादी अमीना के लिए अपने प्यार के बल पर चिमटे जैसी कुरूप और उपेक्षित वस्तु को सुंदर और स्पृहणीय बना देता है, यह मानवीय प्यार हामिद के भीतर एक ऐसा जज्बा पैदा करता है, जो उसे पूरी दुनिया के विरुद्ध तन कर खड़ा होने की ताकत देता है। इसी प्यार से सारे अभावों के बावजूद अपने तमाम हमउम्र और संपन्न बच्चों को अपना मुरीद बना लेता है। पंच परमेश्वर  कहानी के जुम्मन शेख और अलगू चौधरी अपनी न्याय-निष्ठा के लिए याद किए जाते हैं। बूढ़ी काकी जैसी कहानी भूख की सृजनात्मकता का पता ही नहीं देती, बल्कि बूढ़ी काकियों के प्रति संवेदनशील बनाती है। लाटरी  कहानी लोभ और धार्मिक कर्मकांडों के संबंध को उजागर करती है, तो नशा कहानी झूठे दंभ की पोल खोलती है।

इस तरह प्रेमचंद की कहानियां हमारी आत्मा को रचती हैं। अमानवीय समय में हमें मानवीय बनाती हैं। प्रेमचंद का जीवन और साहित्य हमें यह भी बताता है कि इस देश की मिट्टी की सुगंध को पहचानने वाले व्यक्ति को ही नायक का दर्जा मिल सकता है, जैसे कि गांधी को मिला।

4 COMMENTS

  1. sunder aalekh.premchand ne kaha thha sahitya samaj ka aaina hai aur uske aage aage mashal lekar chalne wali sachchhai bhi.kalawanti,ranchi

  2. yatn sadhit satark sarlta .. achha laga yah visheshan angrezi me aksar carefully looking careless to bahut baar bola .. sundar lekh hai ..

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