नये सुल्‍तान की सारी दाढि़यां उजली थी

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हिंदी में अच्छी राजनीतिक कविताएँ कम पढने को मिलती हैं. युवा कवि रवि भूषण पाठक ने कुछ ऐतिहासिक राज-चरित्रों को आधार बनाकर शानदार समकालीन कविताएँ लिखी हैं. इतिहास और राजनीति की इस समझ ने मुझे प्रभावित किया इसलिए आपसे कविताएँ साझा कर रहा हूँ- प्रभात रंजन.
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महाराज नहुष को प्राणदण्‍ड

महाराज नहुष के प्राणदण्‍ड का विरोध करती जनता
निकल पड़ी झोपडि़यों, मड़ई, मचानों से
अपने चीथड़ों में सजी जनता
हाथ में कटोरा थामे
हाथों को,
कटोरा को, बैसाखियों को नचा-नचाकर
कुछ कहना चाहती थी।
विद्वान समझते कि ये बहुत खुश हैं
पर जनता उदास थी आज
ये भी मानते थे कि महाराज पतित हैं, नीच हैं, नराधम हैं
पर जीभ, तालू, दांत नहीं थे उनके पास
न ही थे हाथ, लेखनी और तालपत्र
महाराज ही निगल गए थे देश का उत्‍साह
स्‍पंदन-च्‍युत राष्‍ट्र कैसे करती अपने ही पिता की रक्षा
सो महाराज की शवयात्रा में शामिल हो गई जनता
भूखों-नंगों की भीड़ याद कर रही उनके कर्म-कुकर्म
वही महाराज जो ध्‍वजा वाले हाथों को कटबा देते थे
तोड़ दी जाती थी राजधानी की ओर बढ़ रही जंघाऍं
लुप्‍त हो जाते थे मंगलगीतों वाले जनकवि
इन्‍हीं जनकवियों के वंशज आज जय-जय कर रहे थे
वह नंगी पीठों वाला बूढ़ा
जिसने नहुष के बाप का भी कोड़ा खाया था
राजाओं के पाप-पुण्‍य का तराजू लिए
भीड़ के सबसे पीछे गुनगुना रहा था
खून पीऐंगे, आग मूतेंगे
मुकुट देश की वही जीतेंगे …

बलबन जिंदाबाद


नये सुल्‍तान की सारी दाढि़यां उजली थी
और एक-एक दाढ़ी एक-एक युद्ध की साक्षी
युद्ध, राज्‍य, वंश की अपनी चुनौतियां थी
और दोगला राजा मुफ्तियों के सामने कहता
राज्‍य की नींव न्‍याय में है
और सेनापति से कहता कि राज्‍य की नींव डर से है
सुल्‍तान ईमामों के साथ रहकर भी
उसके कटे गरदनों पर चलने का सपना देखता
ईमामों के सामने वह खुद को खुदा का बंदा कहता
और सामने से हटते ही खुदा बन जाता
और उसकी खुदावत जिंदा थी
खाल और भूसे से
दिल्‍ली में उन दिनों भूसे की मांग बहुत ज्‍यादा थी
साल में तीन-चार बार तो मंगोल ही बढ़ आते थे
और राजपूत भी मौका की खोज में रहते
सो घोड़ों, बैलों के लिए भूसे का भंडार बनाया जाता
बलबन के समय भूसे की जरूरत और बढ़ गई
क्‍योंकि सुल्‍तान ही नहीं, वली और ईक्‍तेदार भी
भूसे रखने लगे
हरेक विरोधी की, फकीरों, कवियों की
समारोहपूर्वक खाल-खिंचाई होती
और उनके खालों को सात दिन हल्‍दी-नमक में सुखाकर
आठ दिन तक भूसा भरा जाता
फिर उन्‍हें बाजारों, चौराहों, मजारों के पास लटकाया जाता
इन्‍हीं नुमाईशों के दौरान केवल कर नहीं लिया जाता
और इस उदारता के लिए दिल्‍ली सल्‍तनत की जनता कहती
सुल्‍तान जिंदाबाद
बलबन ने कई हूनर को कर से मुक्‍त कर दिया
फारस के दरबारबाज यहां पैबोस और सिज्दा की ट्रेनिंग देते थे
फारसी इतिहासकार का भी सम्‍मान कम नहीं था
जो कहते कि अपना बलबन तो पवित्र फारसियों के खानदान का है
इस वंशविरूदावली, इस पैबोस और इस भूसागिरी
से जो डर की किरणें निकलती
तो दिल्‍ली की जनता कहती
सुल्‍तान जिंदाबाद

शहरदेव का फोटो


शहर के पूरब और पश्चिम
शहरदेव की विशाल फोटो लगाई गई है
फोटो में मूंछ की ऊंचाई नाक तक छूती है
उसके जेब में कलम है, उसके पास एक बंदूक भी है
आपको जो चीज दिखे, आप बस वही देखें
शहरदेव की एक आंख डबडबाई हुई है
शायद शहर के कष्‍टों से लबालब
शहरदेव की दूसरी आंख से चिंगारियां निकल रही
पता नहीं क्रोध की, हिंसा की, घृणा की
शहरदेव का एक नथूना फूल, वृक्ष,आकाश की खुशबू से सराबोर है
एक फूला नथूना सूंघ रहा बारूद, खून शायद
शहरदेव की एक हाथ किसी सुभाष किसी भगत की तरह उठी है
दूसरी हाथ गंदी बस्‍ती की ओर झपट्टा मार रहा है
शायद बुलडोजर की तरह
शहरदेव की फोटो में महान कलाकारी की गई है
अर्द्धनारीश्‍वर से भी ज्‍यादा बारीक
वह हरिहर हो गया है
हरेक जगह, हरेक क्षण से एक नया एंगल उभरकर आता है
आपको इसी शहर में रहना है न
खुदा करे आपको अच्‍छा ही अच्‍छा दिखे

शहरदेव और स्‍यादवाद


देवतुल्‍य शहरदेव का नाम
दंगों से जोड़ना पाप है पाप
जबकि वे शहर में भी नहीं थे
और हों भी तो क्‍या प्रमाण कि गोली उन्‍होंने ही चलाई
और चलाएं भी हो तो क्‍या ये जरूरी है
कि मौत उन्‍हीं की गोली से हुई
जबकि किसिम-किसिम के दुखों से भरी है यह दुनिया
और यदि मौत उन्‍हीं के गोली से हुआ भी हो
तो मरने वाला कौन सा गांधी का अवतार था
और फिर शहरदेव का निशाना इतना अचूक है
तब इसमें उनका क्‍या दोष
और मान लीजिए उन्‍होंने जानबूझकर भी मारा हो
मृतक की कोई गलती भी नहीं हो
तो आप मेरा क्‍या उखाड़ लेंगे  ?

शहरदेव और राजनीति

शहरदेव जानता है कि राजनीति काफी नहीं है
और गुंडई कब तक चलेगी
इसीलिए वह अपने च्‍यवनप्राश में नित नए वनस्‍पतियों को मिलाता
नए अवतार में जब आप उसे मां-बहन की गाली देंगे
तब वह आपको नासमझ कहते मुस्‍कुरा देगा
उसकी ओर मुक्‍का-थप्‍पड़ दिखाएंगे
तब वह और भी ठहाका लगाएंगे
बशर्ते टीवी चैनल वाले कवर कर रहे हों
ये बात और है कि आप घर ही पहुंच न पाए
या आपका मुन्‍ना स्‍कूल से ही गुम हो जाए
आपकी जवान बेटी कॉलेज से वापस न आए
पर शहरदेव को पूरी तरह से गलत साबित करना भी कठिन है
और जबकि आपकी लाश शहरदेव के फार्म के पास मिली हो
बेटी आपकी शहर के बाहरी नाले पर बेहोश मिली हो
शहरदेव पूरी दया के साथ पेश होगा
एक लाख रूपया का चेक
और सरकारी नौकरी का ऑफर पर्याप्‍त है
आपकी बुद्धि पर ताला लगाने के लिए
सारी घटनाएं तब पृष्‍ठभूमि में होंगी
आप जब-जब उन हत्‍याओं के तह में जाएंगे
एक लाख का चेक आपकी तालूओं को जकड़ लेगा
आप मौत को मौज कहेंगे
और दमन को जीवन मानेंगे

शहरदेव का पत्र गर्भस्‍थ शिशुओं के नाम

हे गर्भस्‍थों
!
तुम लोग किस चिंता से व्‍याकुल हो ?
तो तुम दो मास के हो
और अपना पैर ठीक नहीं बनने से परेशान हो
चिंता ठीक नहीं पुत्रों
शहरदेव तुम्‍हें बैसाखी देगा
तीसरे माह वाले जो आंख के लिए चिंतित हैं
वे भी निश्चिंत रहें
जब संभावित अशुभ ही है, तो देखने की कौन सी उत्‍कंठा
चार माह वाले मेरूरज्‍जू के बिना झुके जा रहे थे
उठो पुत्रों !स्‍टेमसेल की अपनी फैक्‍ट्री लगने ही वाली है
मुझे पांच महीने वालों की भी सूचना है
जो अपने दिल के लिए परेशान है
यह बेदिली भी बड़ी बात है पुत्‍तर
तुम तो मेरे राईट च्‍वाईश हो
छह माह वालों के रोने की प्रैक्टिश मैंने कई बार सुनी
वे गला नहीं होने के कारण घिघिया रहे थे
अरे भाई!शहरदेव तुम्‍हारी वाणी ही तो है
कुछ लोग हाथ की जिद कर रहे थे
शहरदेव ने उन्‍हें डांटते हुए कहा
’भीख मांगना है क्‍या
कुछ भ्रूण ये नहीं समझ रहे थे
कि वे लड़का हैं या लड़की
शहरदेव ने उनकी जिज्ञासा शांत करते कहा
कि उन्‍हें शरमाने की जरूरत नहीं
वही उनके बदले में शरम कर लेगा
शहरदेव की चिंता उन लोगों के लिए थी
जिनके सभी अंग ठीक-ठाक बन रहे थे
शहरदेव का मानना है कि ठीक होना या ठीक होने की तमन्‍ना
संक्रामक है
इस संक्रामकता से शेष भ्रूण सुरक्षित रहे
इसी मंगलकामना के साथ
– शहरदेव

एक निर्धनतम देश में शहरदेव


निर्धनतम प्रदेश में शहरदेव
हँसता है गाल फुला-फुलाकर
उसके बोलने का स्‍टाईल, चलने का तरीका
पहरावा ,गाली,तकियाकलाम सब आईकन हो चुका है
उसके हँसी और क्रोध के तर्कों को खोजा जा रहा
कभी वह बाघ को मजाक सुनाने का टोटमा बताएगा
तो कभी गधों को जोतने का मंत्र
मीडिया में गधायन की अतिचर्चा से मुग्‍ध है वह
वह दुहराता है मंत्र हाथ उठा-उठा के
एक दिन वह टीवी पर गरीबी का सौंदर्य बता रहा था
बंद पड़ी मिलों और टुटे पुलों में सगुन देख रहा शहरदेव
उसकी बेहूदगी छिप जाती उसकी ढ़ीठता के आगे
उसकी नीचता भी सूर्खियां पाती है
पता नहीं वह क्‍यों हँस, क्‍यों रो रहा है
शायद देश का कैमरा ऑन हो रहा है

शहरदेव के देश में शेर
कुछ शेर इतना ही मांस नोचते थे
जितना से पेट भरता हो

4 COMMENTS

  1. महाराज ही निगल गए थे देश का उत्‍साह
    स्‍पंदन-च्‍युत राष्‍ट्र कैसे करती अपने ही पिता की रक्षा
    सो महाराज की शवयात्रा में शामिल हो गई जनता //.. इतिहास की जमीन पर खड़ा होकर हमारे समय की नब्‍ज पर हाथ रख देने वाली इन कविताओं पर अलग से और इत्‍मीनान के साथ बात करने की आवश्‍यकता है। फि‍लहाल तो कवि को ढेरों बधाई और 'जानकी पुल'को अपार आभार सौंप ही दूं..

  2. सभी कवितायें तल्ख सच्चाई से रू-ब-रू करातीं…पसंद आई!! कवि को ऐसी कविताओं के लिए बधाई और जानकी पुल का आभार

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