मैं औरत हूँ एक जिसके दिल में समय थम सा गया है

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निजार कब्बानी की कुछ कविताओं के बहुत आत्मीय अनुवाद कवयित्री-कथाकार अपर्णा मनोज ने किये हैं. कुछ चुने हुए अनुवाद आपके लिए- मॉडरेटर.
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निज़ार को पढ़ना केवल डैमस्कस को पढना नहीं है या एक देश की त्रासदी को पढना भी  नहीं -यह हर अकेले व्यक्ति की मुक्ति की जिजीविषा का संघर्ष है जिसका पूर्वदृश्य कट्टर परम्पराओं,अलंघनीय यौन वर्जनाओं और राजनैतिक दबाओं से तैयार हुआ .
औरत के लिए कब्बानी की कविता गॉस्पेल के साथ खुद की तलाश भी है .
उनकी पुस्तक “ओन एंटरिंग द सी “से मैंने इस लम्बी कविता को लिया है.आठ में से चार अंश यहाँ हैं.मूल से अंग्रेजी अनुवाद लेना जायुसी और जॉन हीथ स्टबब्स ने किया है- अपर्णा मनोज.
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एक बेरुख़ औरत के रोजनामचे से :: कब्बानी
एक औरत हूँ मैं
एक औरत
मेरी आँख खुलने के साथ चले आये फरमान मेरी तबाही के
पर अदालत का कोई दरवाज़ा न देखा मैंने
और न ही चेहरे मेरे  क़ाज़ी के.
घड़ी के दोनों हाथ
जैसे व्हेल के जबड़े,मुझे निगलने को तैयार
जैसे दीवार पर दो सांप
जैसे कैंची ,जैसे फांसी
जैसे एक छुरी दो फांक में बाँट देगी मुझे
जैसे तेज़ी से मेरे पीछे आता एक चोर
मेरा पीछा करता
मेरा पीछा करता
क्यों न मैं इसे मसल दूँ
जबकि हर घड़ी ने कुचला है मुझे
मैं औरत हूँ एक
जिसके दिल में समय थम सा गया है
बहारों में गुलों का खिलना मैं नहीं जानती
और न ही वाबस्त: है अप्रैल का मौसम मुझसे.
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अपनी  हमजोलियों के लिए बोलूंगी मैं
उनमें देखती हूँ
अपनी ही कहानी और बदनसीबी
अपनी  हमजोलियों के लिए बोलूंगी मैं
उस कैद  के बारे में जिसने बेनूर किया उनके जीवन को
उस समय के लिए जो बर्बाद हुआ जनाना किताबों में
उन दरवाज़ों के लिए जो कभी खुले ही नहीं
उन इच्छाओं के लिए जो खिलने से पहले ही नोच दी गईं
उन छातियों के लिए जो चीखती रहीं  रेशम के नीचे
उन कैदों के लिए
और उनकी स्याह दीवारों के लिए
उन हजारों-हजार शहीद लड़कियों के लिए
जो दबी हैं रवायत के अनाम कब्रगाहों  में
यह सहेलियां मेरी
गोया रुई में लिपटी गुड़ियाँ हैं
अजायबघर के तालों में बंद
जैसे सिक्के ढाले गए तवारीख की टकसालों में -न खर्च के ,न काम के
मछलियों की मछलियाँ हैं ये
घुट जायेंगी अपने तालाबों में
बिल्लौरी बोतलों में दफ़न तितलियाँ हैं .
बिना डर के अपनी दोस्तों के लिए लिखूंगी मैं
खून के उन धब्बों पर जो पड़े रहे बनकर बेड़ियाँ
 खूबसूरत लड़कियों के पैरों में
उनके दुस्वप्नों ,उबकाइयों और खुदा से फ़रियाद करती रातों पर
तकियों में घुटी चाहतों पर
कामिल सन्नाटों पर
भागते हुए लम्हों की मौत पर
मेरी सहेलियां गुलाम
सौदे हुए जिनके तुर्रहत  के बाज़ारों में
मशरिकी महलसरों में कैद
मुर्दा न होकर भी मुर्दा
सांप की छतरियों (कुकुरमुत्तों ) की तरह शीशे में जीती हैं
शीशे में मरती हैं
मेरी हमजोलियाँ
जैसे चिड़ियाँ  बेआवाज़ फ़ना होती अपनी ख़ोह में.
अकसर पूछती हूँ खुद से
प्यार दुनिया में सबके लिए क्यों नहीं?
जैसे फ़ज्र का नूर
प्यार रोटी और शराब की तरह क्यों नहीं होना चाहिए
और दरिया के पानी की तरह
और बादलों -बरसात की तरह
 घास और फूलों के मानिंद ?
क्या प्यार इंसानियत के बीच
एक जीवन में एक जीवन का होना नहीं?
मेरे वतन में प्यार क्यों नहीं सहज ?
ठीक वैसा जैसे चट्टान से उगता सफ़ेद फूल
सहज जैसे होंठों का होठों से टकराना
बहना, जैसे  पीठ पर लहराते मेरे बाल
क्यों नहीं करते  लोग प्यार सहजता से?
जैसे तैरती है मछली समंदर में
जैसे सितारे आकाश में
क्यों नहीं मेरे वतन में जरुरी है प्यार उतना ही
जितना कविता की किताब 

25 COMMENTS

  1. क्यों नहीं मेरे वतन में जरुरी है प्यार उतना ही
    जितना कविता की किताब !"…..वाह……
    बेहतरीन…….

  2. बहुत सुन्दर अनुवाद किये हैं बधाई अपर्णा .. अंतिम कविता तो भीतर बस गई

  3. वाह……
    बेहतरीन…..
    शुक्रिया अपर्णा जी..शुक्रिया जानकीपुल.

    अनु

  4. निजार कब्बानी की ये कविताये स्त्री की त्रासदी पर बेहतरीन कवितायें है … जिसका उतना ही सुन्दर अनुवाद और सुन्दर शब्द विन्यास .. अपर्णा जी बधाई इस सुन्दर अनुवाद के लिए और जानकीपुल को धन्यवाद, इन्हें हम तक पहुचाया है .. सादर

  5. शानदार कविताओं का बेहतरीन अनुवाद ….बहुत खूब अपर्णा..:)

  6. कविता का चयन और अनुवाद दोनों उत्तम हैं. आखिरी कविता मुझे अच्छी लगी. और सबसे बड़ी बात यह चारों कविताएँ मिलकर भी कुछ कहती हैं. प्रेम का कवि निज़ार स्त्री को कितने गहरे समझता है. कविता पढ़ते हुए अनुवाद का रुखापन नहीं है . यह अनुवाद की पूर्णता का परिचायक है.

    "क्यों नहीं मेरे वतन में जरुरी है प्यार उतना ही
    जितना कविता की किताब"

    और मेरे वतन में न प्यार जरूरी है न कविता की किताब..

  7. "उस कैद के बारे में जिसने बेनूर किया उनके जीवन को
    उस समय के लिए जो बर्बाद हुआ जनाना किताबों में
    उन दरवाज़ों के लिए जो कभी खुले ही नहीं
    उन इच्छाओं के लिए जो खिलने से पहले ही नोच दी गईं
    उन छातियों के लिए जो चीखती रहीं रेशम के नीचे
    उन कैदों के लिए
    और उनकी स्याह दीवारों के लिए
    उन हजारों-हजार शहीद लड़कियों के लिए
    जो दबी हैं रवायत के अनाम कब्रगाहों में …"

    इस यंत्रणा … इस पीड़ा …. इस घुटन … इस विकलता को अपर्णा जी की क़लम ही स्वर दे सकती थी ! जिस संवेदना से वो लिखतीं हैं, हर शब्द सप्राण हो जाता है ! मूल भाषा जो भी रही हो, इस कविता को इससे बेहतर कोई नहीं लिख सकता !

    सच ….जीवन की सबसे नैसर्गिक आवश्यकता ही सबसे दुर्लभ क्यों है ?

    "क्यों नहीं करते लोग प्यार सहजता से?
    जैसे तैरती है मछली समंदर में
    जैसे सितारे आकाश में
    क्यों नहीं मेरे वतन में जरुरी है प्यार उतना ही
    जितना कविता की किताब !"

    एक हूक सी उठती है कहीं …. एक अवश उच्छ्वास सा !

  8. सच एक औरत जैसे सामने बैठ कर इन सब सवालो के जवाब मांग रही हो ! सुन्दर कवितायेँ !

    अनुपमा तिवाड़ी

  9. अनुवाद की प्रक्रिया गहन पठन का माध्यम लगती है. निजार की कवितायें औरतों की दुर्दशा और जीवन में प्रेम की जरूरत को रेखांकित करती हैं. दुनिया भर की औरतें मूलतः समान स्थिति में जी रही हैं.महान साहित्य हमें भाषा और सीमा के पार परस्पर जोड़ देता है.

  10. "मेरे वतन में प्यार क्यों नहीं सहज ? /ठीक वैसा जैसे चट्टान से उगता सफ़ेद फूल /सहज जैसे होंठों का होठों से टकराना / बहना, जैसे पीठ पर लहराते मेरे बाल—" बहुत खूबसूरत कविताएं हैं कब्‍बानी की और इतना ही प्रभावशाली अनुवाद। अपर्णा को बधाई।

  11. इस सुन्दर अनुवाद कार्य के लिए बधाई अपर्णा दी!
    आभार जानकीपुल!

  12. Aparna mànoj ke kiye hue ye anuvad nijaar kabbani kii siskiyon ke hain jisame har aurat khud ko khojati hui paayi jaati hai. Aprna ko ashesh shubhkamnayen.

  13. ये कविताएँ पढ़ना…सच में…निःशब्द कर गया…| आभार, इन्हें पढवाने का…|

    प्रियंका

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