मैत्रेयी खुद रही हैं स्त्री-देह विमर्श की पैरोकार- चित्रा मुद्गल

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पिछले कुछ महीनों में ‘बिंदिया’ पत्रिका ने अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियों से ध्यान खींचा है. जैसे कि नवम्बर अंक में प्रकाशित परिचर्चा जो कुछ समय पहले वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा द्वारा ‘जनसत्ता’ में लिखे गए उस लेख के सन्दर्भ में है जिसमें उन्होंने समकालीन लेखिकाओं के लेखन को लेकर अपनी असहमतियां-आपत्तियां दर्ज की थी. उनके उस लेख के प्रतिवाद में अनेक लेखिकाओं ने खुलकर अपनी बात रखी है. आज सबसे पहले प्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल का उस परिचर्चा में शामिल विचारोत्तेजक लेख- जानकी पुल.

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मैत्रेयी पुष्पा खुद स्त्री विमर्श की पैरोकार होते हुए भी और स्त्री-देह विमर्श की पैरोकार रही हैं। देह-विमर्श यानी स्त्री को अपनी मर्जी से अपनी देह का इस्तेमाल करने का अधिकार होना, अपनी इच्छा को महत्व देने वाली और उसकी लडाई लडने वाली रहीं हैं मैत्रेयी। स्त्री का शरीर है तो उसकी भी यौन इच्छाएं हैं। भले ही शादीशुदा है, सात फेरे ले रखे हें, एक रिश्ते में आ गई है, लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि उसका उसके शरीर पर से अधिकार खत्म हो गया है। मैत्रेयी स्त्री के इन्हीं अधिकारों की पैरोकार रही हैं। उन्होंने जब लिखना शुरू किया, वर्ष 1990 में उन्होंने पहली कहानी लिखी–, संभवत तब पचपन की रहीं होंगीँ। तब उस उम्र में भी उन्हें युवा लेखिका ही कहा गया। वो भी तब अपनी उम्र नहीं लिखतीं थीं। हंस की कहानियों में उनकी उम्र नहीं दर्ज होती थी। 55 साल की उम्र में ऐसी लगतीं थी जैसे अगर उन्हें स्कर्ट पहना दो तो स्कूल की बच्ची लगेंगी। मैत्रेयी ने अपने लेख में कहा है कि आज के दौर की लेखिकाएं अपनी उम्र छिपा कर युवा बने रहने की कोशिश करती हैं, यहां मै उनसे असहमति रखती हूं। जब से लेखक या लेखिका की सर्जना कि उम्र शुरू होती है, जब भी उसके पूर्व लेखन से उसके वर्तमान के रचना की तुलना की जाएगी, उसे युवा लेखक या लेखिका ही कहा जाएगा। चाहे लेखिका या लेखक दो बच्चों का पिता या मां है, या नन्हें मुन्ने बच्चे का दादा, दादी या कुछ है उससे फर्क नहीं पडता, उसके सर्जन का आयु क्या है, ये देखा जाएगा। लेखन उसे किशोर युवा व प्रौढ बनाता है। आम जिंदगी के लिए, सरकारी काम वगैरह में शारीरिक उम्र की जरूरत हो सकती है लेकिन लेखन से उसकी शारीरिक उम्र को कोई ताल्लुक नहीं होता। एक बार एक वरिष्ठ लेखिका इसी बात पर मुझ से नाराज हो गई कि आपको पहले स्टेज पर प्रतिष्ठित कर दिया गया जबकि मै आपसे उम्र में बड़ी हूं। मैने उनसे यही कहा कि आप मुझसे उम्र में बेशक बड़ी हैं लेकिन लेखन के क्षेत्र में मैं आपसे ज्यादा वरिष्ठ हूं। आपने 1972 से लेखन शुरू किया मैंने 1964 से शुरू कर दिया था, उस हिसाब से मै आपसे ज्यादा वरिष्ठ हूं।

मैत्रेयी खाप पंचायती स्वर में कह रही हैं कि आज की लेखिकाएं ये कर रही हैं और वो कर रही हैं, ये ठीक नही है। युवा लेखिकाएं लेखन के क्षेत्र में धीरे धीरे आगे बढ रही हैं, परिपक्व हो रहीं वरिष्ठता की ओर बढ रही हैं, उन पर इस तरह से तानाकशी ठीक नहीं है। मैत्रेयी ने अपने लेख में इन युवा लेखिकाओं पर आरोप लगाया कि अपनी जवानी बचाए रखने के लिए उम्र नहीं लिखतीं, लिपस्टिक लगाती, जिंस पहनती ये वो और अदाएं दिखातीं नाचती-कूदती-फिरती–-शायद मैत्रेयी को ये नहीं पता कि आर्मी, नेवी, एयरफोर्स में अगर कोई जनरल किसी विंग कमाण्डर या किसी दूसरे ओहदे के आफिसर की पत्नी को हाथ पसार कर नृत्य के लिए आमंत्रित करता है तो ओहदे का ध्यान नहीं दिया जाता, आमंत्रण सम्मान के तौर पर देखा जाता। क्योंकि नृत्य उत्सव होता है, खुशी को आनंद को जाहिर करने का उत्सव। स्‍त्री के नृत्य गायन को इस आशय से लेना, खाप पंचायत के फरमान की तरह है, जहां जाति-वर्ग-प्रेम-गोत्र के नाम पर तुगलकी फरमान जारी हो जाते हैं। मैत्रेयी का ये खाप पंचायती स्वर बहुत गलत है। फिर गीत संगीत तो हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, इसका विरोध करना बिल्कुल सही नही है। ढोलक की थाप पर आज भी पैर अपने आप थिरकने लगते हैं। शादियों मे सात दिन पहले से गवनई शुरू हो जाता है। छोटा घूंघट, लम्बा घूंघट काढे औरते सब कुछ भूलकर नाचने गाने लगती है– मार दियो रे रसगुल्ला घुमाई के.. या वो डोला दरवाजे खडा ससुर संग नहीं जाऊंगी। औरते इसी तरह रूठ और मनौव्वल के साथ नाचती हैं। सब कुछ भूल जाती हैं कौन बैठा है, बड़ा छोटा सब कुछ भूल जाती हैं, अपने ह्रदय को खोल कर रख देती है। तो नृत्य संगीत गीत ये सब तो हमारी लोक संस्कृति का हिस्सा है। वैश्विक संस्कृति के बाद तो कोई नृत्य या कोई गीत किसी देश की बपौती नहीं रह गया है। आज ढोल की ताप पर नहीं तो डीजे पर नृत्य कर रहे हैं युवा। मेरे पोता पोती इतना प्यारा नाचते हैं कि दिल खुश हो जाता । मै अपनी पोती से कहती हू कि तुम पंडित भीमसेन जोशी के मल्हार पर नाच कर दिखाओ। तो इतना अच्छा स्लो मोशन में नाचती है कि क्या बताऊं। नृत्य संगीत तो अंतरात्मा का उत्सव है। मैत्रेयी की पोतियां भी जरूर नाचती होंगी। हां, ये जरूर है कि कोई अश्लील गीत गा रहा है या अश्लील भाव भंगिमा के साथ नृत्य कर रहा है तो विरोध सही लगता है, लेकिन नृत्य ही क्यों कर रहे हैं, ये क्या बात हुई। आज के दौर में डीजे है, ढोल उतना प्रचलित नहीं है, तो डीजे पर ही नृत्य होगा।

अपने लेखन से युवा लेखिकाएं परिपक्वता की ओर कदम बढा रही हैं । मैत्रेयी को अपने दिन याद करने चाहिए। 1990 में जब रचनाएं ले कर आई थी स्त्री विमर्श की पैरोकारी करने, सारंग की इच्छाओं पर बात करने वाली, उसके सुख दुख लेने देने की बात करने वाली। समय आएगा इसमें भी आगे बदले हुए वक्त व जीवन बदलते समय का संक्रमण की विसंगतियां, विषमताएं उसमें होने का अस्तित्व-बोध, उद्धेलन और कहीं संस्कारों के दबाव, मूल्यों की टकराहट और इन सबको लेकर कहीं मूल्यों में बदलाव आएंगेँ। मेरा बचपन लौटता है जब मै अपने पोते पोतियों की छोटी-छोटी शरारतों को देखती हूं, महसूसती हूं। इंसान अपने बचपन को नहीं महसूस करता, उसके सुख को उसकी चिंता को। लेकिन जब वो बच्चों को देखता तब अपने बचपन को महसूस करता है। मैनें अपने पोते पोतियों के बस्ते, उनका ड्रेसअप होते देखा है, महसूस किया है। हमारा बस्ता कितना हल्का होता था, अब बस्ते कितने भरे हुए होते हैं। याद आता है, कैसे में खेतों के मेडों पर अपनी सहेलियों के साथ स्कूल जाया करती थी। चुपके से मेडो की मिट्टी हथेलियों में छुपा लिया करती थी। तो वरिष्ठ लेखिकाओं को तो इन युवा लेखिकाओं को देखकर अपने लेखन की युवा अवस्था याद आनी चाहिए। आज लेखन अपने किशोरावस्था में है, उनके विरुदध खाप पंचायत वाले तुगलकी फरमान जारी करना गलत हैं। वहीं हुआ न ऐसा नहीं ऐसा करो, ऐसा क्यों कर रही हैं, उनकी आलोचना करना। पहले मैने उस लेख को देखा तो मुझे लगा कि मैत्रेयी स्वयं के लेखन की आत्मालोचना कर रही हैं, पढा तो पता चला कि गंगा में लेखिकाओं की नव-युवा पीढी की अस्थियां विसर्जित कर रही हैं। इसका उन्हें अधिकार नहीं है। आपका बंटी में शकुन का बेटा जहां छूट गया था, बंटी का द्वंद्व कहीं और पहुंचता है। वहीं मैत्रेयी की नायिका अपने बच्चे की चिंता छोडकर अपने प्रेमी से मिलने चली जाती है। बच्चे के बारे में नहीं सोचती है, अपने मन को जीती है। मैत्रेयी के पात्र भी समानता की बात करते हैं। मैत्रेयी ने आरोप लगाया, आज की लेखिकाएं जींस पहनती है, सब पहनते हैं हम स्कर्ट पहना करते थे, तो इसमें गलत क्या है।

एक वक्त था, जब वो खुद इन सभी चीजों की पैरवी करती थीं। आज उन्हीं चीजों को लेकर नव युवा लेखिकाओं को कटघरे में खडा कर रही हैं। खुद उन्हें विचार करने दें, क्या सही है, क्या गलत है। अगर वो गलत दिशा में भटक रहीं हैं तो उन्हें खुद एहसास हो जाएगा कि उनकी दिशा गलत है। स्‍त्री की जो परिभाषा सिमोन ने दी है मैं उससे असहमति रखते हुए मेरा कहना है कि स्त्री बनाई नहीं जाती है स्‍त्री, स्त्री ही जन्म लेती है। मुझे गर्व है कि मै स्त्री हूं। पितृसत्ता उसे अनुकूलित करता है, अपने हिसाब से उसे ढालता है। उसके अंदर ये निरूपित करता है कि तुम्हारी सार्थकता बच्चा जनने में, प्रिया बनने में पुरुष को लुभाने में हैं। सिखाया जाता है कि पुरुष को कैसे प्रलोभन देना है, और उससे बच कर भी रहना है, घूंघट में रहना है। पर हमे गर्व है स्त्री होने पर। हमारी कोख केवल बेटा पैदा करने के लिए नहीं है, ये पितृसत्ता की ज्यादती है। ये कोख स्त्री और पुरुष दोनों को जन्म देता है। लेकिन हम केवल एक कमनीय देह मात्र नहीं हैं, इस देह में केवल योनि नही है, एक मस्तिष्क भी है, जो सोचता है, समझता है और महसूस भी करता है। वो किसी भी मायने में पुरुष से कमतर नहीं है। वो भी उर्वर है। उषा प्रियंवदा की पचपन खंभे लाल दीवारें, जो वैसे तो खास नहीं लगी लेकिन उसकी नायिका सुषमा पितृसत्ता को चुनौती देती है। पढी लिखी है, घर को संभालती है और पूरी सक्षमता से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती है। पितृसत्ता की मान्यताएं, प्रतिस्थापनाएं स्त्री के प्रतिरोध को दबाता है। सुषमा स्वालंबी है, उसमें औरत की ताकत सामर्थ्य नजर आता है। वो ये सिद्ध करती है कि स्त्री एक सामाजिक प्राणी भी है वो अपनी इच्छाओं को भी महत्व देती है, जिम्मेदारियों का भी भली भांति निर्वहन करती है, अपनी मस्तिष्क की उर्वरा को भी साबित करती है। पितृसत्ता की ये सोची समझी साजिश है, हम औरतों को मस्तिष्क की उर्वरा को साबित करना होगा। मैत्रेयी को थोड़े धैर्य और संयम से बात करनी चाहिए। इस लेख में उनका आशय बिगड़ गया। बहुत समझदारी की बात भी किया करती थीं बल्कि वो इन सभी बातों की पैरोकार थी जिनका विरोध वो आज कर रही हैं। उनका ये अहम पालना बिल्कुल गलत है कि वो जो सोच रही हैं, जो कह रही हैं, वही सही है। युवा पीढी की कहानियां, कमाल हैं ¿, वे समय के साथ चल रही हैँ। अपने समय से लड़ते हुए आगे बढ रही हैं। उन्हें अपनी गति से आगे बढने दें। वही पितृसत्ता वाले स्वर में फरमान न जारी करें। इसकी भूमिका तो आपने ही तैयार की थी, अब कोई उस भूमिका में जीना चाहता है तो आप फरमान जारी कर रही हैं। मुझे तो एक ही बात लगती है कि सर्जक बिना चेतना के सर्जक नहीं हो सकता है। आप खुद सोचिए आने वाली पीढी के लिए आप क्या मिसाल छोड़ रही हैं। पितृसत्ता तो एक सोच है जिसका विरोध किया जाता है, पुरुष का विरोध नहीं किया जा रहा है। हमें भी पुरुष की जरूरत है, उन्हें भी हमारी जरूरत है। हम समानता की बात कर रहे हैं, आपसी प्रेम की बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे है कि चौबीस घंटे में पांच मिनट का यौन सुख स्त्री की सम्पूर्ण सक्रियता नहीं है। यौन सुख भी जरूरी है पर वो ही सब कुछ नहीं है।    

14 COMMENTS

  1. इतने संयमित ढंग से ठोस विस्तारपूर्वक सटीक बात कहना चित्रा मुदगल जी के
    लेखकीय व्यक्तित्व को तय करता है। उनकी दीर्घायु की कामना करती हूँ।

  2. ​चित्रा जी का लेख अत्यंत तार्किक होते हुए भी भावात्मक है और यह है वास्तविक खुलापन । इस में खरापन है और धारदार भी है । जिस खुलेपन की बात प्रायः मैत्रेयी जी की रचनाओं में होती है वह कभी कभी सीमा लाँघ जाती हैं और ज़रूरी नहीं की सभी उसे पसंद करते हों।

  3. चित्रा दीदी की इस बात से भी सहमत हूँ, उन्होंने बिलकुल सही सवाल पूछे हैं मैत्रेयी जी से – "एक वक्त था, जब वो खुद इन सभी चीजों की पैरवी करती थीं। आज उन्हीं चीजों को लेकर नव युवा लेखिकाओं को कटघरे में खडा कर रही हैं। खुद उन्हें विचार करने दें, क्या सही है, क्या गलत है। अगर वो गलत दिशा में भटक रहीं हैं तो उन्हें खुद एहसास हो जाएगा कि उनकी दिशा गलत है। मैत्रेयी को थोड़े धैर्य और संयम से बात करनी चाहिए। इस लेख में उनका आशय बिगड़ गया। बहुत समझदारी की बात भी किया करती थीं बल्कि वो इन सभी बातों की पैरोकार थी जिनका विरोध वो आज कर रही हैं। उनका ये अहम पालना बिल्कुल गलत है कि वो जो सोच रही हैं, जो कह रही हैं, वही सही है। युवा पीढी की कहानियां, कमाल हैं ¿, वे समय के साथ चल रही हैँ। अपने समय से लड़ते हुए आगे बढ रही हैं। उन्हें अपनी गति से आगे बढने दें। वही पितृसत्ता वाले स्वर में फरमान न जारी करें। इसकी भूमिका तो आपने ही तैयार की थी, अब कोई उस भूमिका में जीना चाहता है तो आप फरमान जारी कर रही हैं। मुझे तो एक ही बात लगती है कि सर्जक बिना चेतना के सर्जक नहीं हो सकता है। आप खुद सोचिए आने वाली पीढी के लिए आप क्या मिसाल छोड़ रही हैं।"

  4. चित्रा दीदी ने बिलकुल सही कहा है – "पहले मैने उस लेख को देखा तो मुझे लगा कि मैत्रेयी स्वयं के लेखन की आत्मालोचना कर रही हैं, पढा तो पता चला कि गंगा में लेखिकाओं की नव-युवा पीढी की अस्थियां विसर्जित कर रही हैं। इसका उन्हें अधिकार नहीं है।"

  5. चित्रा जी का यही औदात्य और बड़प्पन उन्हें और भी वरिष्ठ बनाता है।
    उन्हें किसी से ईर्ष्या नहीं होती क्योंकि ईर्ष्या वही करता है जो अपने को लेकर स्वयं किसी हीनभावना से ग्रस्त होता है। इन अर्थों में भी वे श्रेष्ठ हैं।

  6. चित्रा मुद्गल जी, हिन्‍दी कथा साहित्‍य में अपने उत्कृष्ठ लेखन के कारण आरंभ से ही अपनी इसी सकारात्‍मक सोच को खुलकर अपनी बात के साथ ,स्‍त्री मन की बेहतरीन चितेरी बन कर हिन्दी जगत पर छाई रही हैं।अपनी रचना कर्म-भूमी में संजीदगी से पहल ही उनको साहित्यिक लेखन में पूरा मान-सम्‍मान दिलाता है। मुदगल जी जिसकी वास्तव में हकदार है……………

  7. चित्रा मुद्गल जी, हिन्‍दी कथा साहित्‍य में अपने उत्कृष्ठ लेखन के कारण आरंभ से ही अपनी इसी सकारात्‍मक सोच को खुलकर अपनी बात के साथ ,स्‍त्री मन की बेहतरीन चितेरी बन कर हिन्दी जगत पर छाई रही हैं।अपनी रचना कर्म-भूमी में संजीदगी से पहल ही उनको साहित्यिक लेखन में पूरा मान-सम्‍मान दिलाता है। मुदगल जी जिसकी वास्तव में हकदार है……………

  8. चित्रा मुद्गल की यही सकारात्‍मक छवि उन्‍हें हिन्‍दी कथा साहित्‍य में उचित सम्‍मान का हकदार बनाती है। वे अपने लेखन के आरंभ से ही इसी सकारात्‍मक सोच के साथ विकसित हुई हैं और स्‍त्री मन की बेहतरीन चितेरी बनी रही हैं। बेशक वे मैत्रेयी पुष्‍पा से उम्र में सात महीने छोटी हों, लेकिन जैसा उन्‍होंने एक वरिष्‍ठ लेखिका को उत्‍तर दिया, जो लेखन के क्षेत्र में उनके बहुत बाद सक्रिय हुई, लेखन में वरिष्‍ठ वही होता है, जिसने अपने रचनाकर्म में संजीदगी से पहल ही और साहित्‍य को बेहतर रचनाओं से समृद्ध किया, इस अर्थ में चित्रा जी मैत्रेयी से कहीं अधिक वरिष्‍ठ हैं और उनका साहित्यिक अवदान भी बड़ा है। वे यह कहने का हक रखती हैं कि मैत्रेयी की सोच में इधर असंगतियां बढ़ी हैं और अच्‍छी बात यह कि यही बात उन्‍होंने मैत्रेयी के लेखन को पूरा मान-सम्‍मान देते हुए कही। 'जानकी पुल' को इस अच्‍छी टिप्‍पणी के लिए बधाई और चित्रा जी को प्रणाम।

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