थोड़ा पैसा आ जाने दो फ्रेम नया हम मढ़ लेंगे

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अविनाश की पहली पहचान कवि के रूप में ही रही है. वे प्रयोगधर्मी हैं. हमेशा कुछ नया-नया करते रहते हैं. इधर उन्होंने छंदों में कुछ गीतनुमा-ग़ज़ल नुमा लिखा है. इनको पढ़कर मैं मुग्ध होता जा रहा हूँ. पारंपरिक छंदों की गजब की रवानी है इनमें. इनकी कुछ रचनाएँ आज साझा कर रहा हूँ. फेसबुक वाले दोस्तों ने तो पढ़ा होगा, बाकी लोग भी एक बार ध्यान से पढ़ें और इनका आनद लें- जानकी पुल.
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1.

लोककथा में फूलकुमारी गाना गाती है
पंछी हवा खिलौनों की वह संग-संगाती है

याद नहीं वह साल कि जब मैं अपने गांव गया
मेरी पूंजी बचपन के यारों की पाती है

नयी-नवेली दुल्हन के संग बैना आता था
गुना-मुना की याद मुझे फिर पास बुलाती है

अबकी छठ की तस्वीरें जब एफबी पर देखी
मुझको मेरी बागमती की याद सताती है

नंगे बदन बगीचे में हम डोला करते थे
मेरे बालों से मिट्टी की खुशबू आती है

यही सोच कर मजबूती से आगे बढ़ते हैं
ठूंठ नहीं हम, पास हमारे ठेठ दरांती है

किस्मत अगर यही है तो हम भी खुशकिस्मत हैं
मेरे सीने में यादों की कोमल थाती है

[नोट : “बैना” खाने की चीजों वाले उपहार को बोलते हैं और “गुना मुना” हमारे गांव में दुल्हन के आने पर विशेष तौर पर पकाये जाने वाले मीठे पकवान का नाम है | बागमती बिहार में अधवारा समूह की एक नदी है | दरांती एक तरह का हथियार है…]



2.
सुबह गये शाम आ जाएंगे
कभी कभी काम आ जाएंगे

बेर-कुबेर नहीं होता कुछ
संकट में राम आ जाएंगे

वोट बराबर मुर्गा रोटी
उस पर से जाम आ जाएंगे

बीपीएल की सूची में भी
हम सबके नाम आ जाएंगे

लोकतंत्र का महापर्व है
पौव्वा के दाम आ जाएंगे

कड़ी धूप में बचकर रहना
बुरी तरह घाम आ जाएंगे



3.
लिखने वाले लिख लेंगे तो पढ़ने वाले पढ़ लेंगे
हम अपनी औकात बराबर कुछ तो सीढ़ी चढ़ लेंगे

वह अपनी पुरजोर कलम से कथा-कहानी कहते हैं
हम भी उनसे चुरा चुरा कर अपना किस्‍सा गढ़ लेंगे

उनकी ऐनक से तारीखें साफ दिखाई पड़ती हैं
थोड़ा पैसा आ जाने दो फ्रेम नया हम मढ़ लेंगे

अब तक सफर बहुत मुश्किल था पता नहीं कल क्‍या होगा
साथ चलो तो आगे भी हम थोड़ा थोड़ा बढ़ लेंगे


4.
मैं शायर हूं मगर गालिब नहीं हूं
अदब का बाअदब नाइब नहीं हूं

मुझे मालूम है औकात अपनी
मैं लिखता हूं मगर कातिब नहीं हूं

अंधेरा उनसे डरता था हमेशा
मैं काला हूं कोई साकिब नहीं हूं

उन्हें पढ़ डालिए वह काम के हैं
मैं अपने होने का जालिब नहीं हूं

मुझे गुमराह होने का शऊर है
दबा हूं कर्ज से साहिब नहीं हूं

नाइब = प्रतिनिधि, कातिब = लेखक, साकिब = उजाला, जालिब = वजह


5.
हमारा दौर है हम जिंदगी में डूब बैठे हैं
जिसे जो चाहिए मिलता नहीं तो ऊब बैठे हैं

उन्हें देखो उन्हें दुनिया से लेना एक न देना
समंदर के किनारे इश्क में क्या खूब बैठे हैं

उदासी रात के पहलू में दुबकी सो रही होगी
खुशी के ख्वाब में जागे हुए महबूब बैठे हैं

कलम की नोक से जिसने बना डाला था पैगंबर
सुपारी लेके उसकी हर तरफ याकूब बैठे हैं

जहां बैठे हैं मोदी जी वहीं बैठे हैं तोगड़िया
उन्हीं के साथ में कश खींचते अय्यूब बैठे हैं



6.
सनिच्चर तक मोहल्ले की सड़क सपाट लगती है
मगर इतवार के इतवार पूरी हाट लगती है

मेरी बेटी की जिद को जेब का जादू मनाता है
कोई मेहमान आता है तो उसकी वाट लगती है

वो पूरी शोखियों से सज के जब सीढ़ी उतरती है
हमारे घर की रौनक वो कसम से लाट लगती है

मैं कोई सीख देने से उसे परहेज करता हूं
मोहब्बत फिर भी उसको नफरतों की काट लगती है

समझते हैं उसे जितना, वो हमको भी समझती है
अभी छोटी उमर में ही वो पूरी जाट लगती है

हमारे घर की चौहद्दी बहुत छोटी है उससे क्या
हमारे दोस्त आते हैं तो सबकी खाट लगती है



7.
मैं मोदी मान लिखूं तुम राहुल मान पढ़ो
वो माया पढ़ते हैं तुम आजम खान पढ़ो

लब्बोलुआब इतना इस लोकतंत्र में है
मैं जो भी लिखता हूं तुम ससम्मान पढ़ो

आलोचक मत बनना इससे है उन्हें गुरेज
खत असंतोष का है पर तुम गुणगान पढ़ो

बीमारी में कोई कुछ क्या सलाह देगा
सारे हकीम हारे तुम तो लुकमान पढ़ो

बस उनकी जीभ चले बाकी मुंह पर ताला
इस कठिन समय में तुम खामोश जबान पढ़ो

8.
रंग बदल कर आ गया कागज का एक फूल
कमल केसरिया था कभी, पड़ी है उस पर धूल

कांटा प्रेमी लोग हैं, रोपें पेड़ बबूल
हम कीर्तन की भीड़ हैं, ब्याज बराबर मूल

धर्म भेद की राजनीति में हिंदू धर्म कबूल
नफरत की खेती करो प्यार मोहब्बत भूल

हिटलर उनके देवता, तानाशाही रूल
आपसदारी दोस्ती उनको लगती शूल

दंगों के उस्ताद हैं, चिंगारी की चूल
बिना बात के बात को देते हैं वे तूल

उनका ही हथियार है मंदिर और मस्तूल
बस्ते में बम डाल कर बंद करो स्कूल

एफबी पर आनंद है, टाइमलाइन पर झूल
ओ यारा ठंढा ठंढा कूल ओ यारा ठंढा ठंढा कूल

7 COMMENTS

  1. एफबी पर आनंद है, टाइमलाइन पर झूल
    ओ यारा ठंढा ठंढा कूल ओ यारा ठंढा ठंढा कूल
    कूल कूल… और क्या कहूँ… कूल कूल

  2. हाँ, कभी-कभी किसी उस्ताद से वज़न चेक करा लेना बनता है . अपना नहीं, मिसरों का .

  3. भाई, कमाल! इपंले मुग्ध हो गया! एकदम नई काट की चीज़! अविनाश के इस रूप से परिचित कराने के लिए प्रभात का शुक्रिया . अविनाश, कसम से, आपकी नक़ल करने की इच्छा हो रही है . इससे ज़्यादा और क्या कहूं!

  4. बहुत शुक्रगुजार हूं प्रभात जी आपका कि आपने मेरी मामूली कोशिश को इतनी आत्मीयता से यहां प्रतिष्ठा दी. ये सब सिर्फ फेसबुक पर ही रह जाती अगर आपने वहां से इसे उठाया नहीं होता. हौसला देते रहेंगे तो हम एक दिन अच्छे गीत जरूर कहेंगे.

  5. माटी की खुशबू और ताजी हवा सी ये कविताएं हृदय में जैसे उतर जाती हैं ।

  6. हमारे घर की चौहद्दी बहुत छोटी है उससे क्या
    हमारे दोस्त आते हैं तो सबकी खाट लगती है

    ये शख्‍स सोलहो आने कवि है। मस्‍त मौला है। मुहल्‍लेदारी के पचड़े में इस शख्‍स का कवि ओझल भले हो गया हो पर यही वक्‍त है कि वह कविता की अपनी पुरानी धारा लौट आए। पहली ग़ज़ल क्‍या उम्‍दा बनी पड़ी है। सभी अशआर एक से एक उम्‍दा। जमीन से जुड़ा शख्‍स ही यह कह सकता है कि

    नंगे बदन बगीचे में हम डोला करते थे
    मेरे बालों से मिट्टी की खुशबू आती है

    ऐसा शायरी से ज़मीनी रिश्‍ता रखने वाला कवि ही कह सकता है।

    बधाई अविनाश दास।

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