बेस्टसेलर! बेस्टसेलर! कहाँ है बेस्टसेलर?

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सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास कोलाबा कोन्सपिरेसी को हार्पर हिन्दी ने छापा है। यह हिन्दी के प्रकाशन की एक बड़ी परिघटना है जो यह संकेत देती है कि भविष्य में किताबों की दुनिया का क्या ट्रेंड होने वाला है। एक तरफ इसे हिन्दी किताबों से पाठकों को जोड़ने की मुहिम के रूप में भी देखा जा सकता है। कुछ समय पहले ही पेंगुइन हिन्दी ने पंकज दुबे के उपन्यास लूजर कहीं का छापा। हिन्दी युग्म ने कल बेस्टसेलर को लेकर परिचर्चा करवाई। इस समय हिन्दी के नए-पुराने प्रकाशक बेस्टसेलर की तलाश में हैं, असमंजस इसको लेकर है कि वह किस तरह का हो। क्या हो? मुझे लगता है कि इससे भी आगे बढ़कर मैं यह लिखना चाहता हूँ कि वह कितना होना चाहिए?

हम बेस्टसेलर की चर्चा तो करते हैं लेकिन इस बात की चर्चा नहीं करते कि 100-125 रुपये की किताबें अगर हजार दो हजार बिक रहा है तो उससे लाभ किसको हो रहा है? क्या यह बेस्टसेलर होना है? अगर है तो हिन्दी की दुनिया वाकई साहित्य से बहुत दूर हो गई है। अगर न गई होती तो जीतने दिन से बेस्टसेलर को लेकर चर्चा चल रही है उतने दिनों में ऐसी कोई किताब क्यों नहीं आई जो एक लाख भी बिकी हो? मैं तो उस किताब को बेस्टसेलर मानूँगा जिसकी कीमत 100 रुपये हो और जो एक लाख बिक जाये। हिन्दी के नए दौर के जोशीले प्रकाशकों को ध्यान इसके ऊपर देने की जरूरत है कि वे कैसे इस मैजिक फिगर तक पहुँचें?

फिलहाल प्रयोगों का दौर जारी है। जो प्रयोग सफल होगा, फॉर्मूला बन जाएगा।

वह उपन्यास होगा, नॉन फिक्शन- सवाल यह है।

प्रकाशकों को यह भी सोचना चाहिए कि वे ऐसे लेखक तैयार करें जिनके अंदर बेस्टसेलर लिखने की भूख हो, और साहस भी। हिन्दी में अभी गंभीर साहित्य का रिवाज है, वही मुख्यधारा बनी हुई है। इस मुख्यधारा से इतर लिखना हल्का माना जाता है। ऐसे लेखकों की हिन्दी को बेहद जरूरत है जो लेखन को ऐयर के रूप में देखें और इसे बेहतर कैरियर ऑप्शन में बादल देने का संकल्प रखते हों। अंग्रेजी में भी चेतन भगत, अमीश त्रिपाठी जैसे बेस्टसेलर लिखने वाले लेखक ब्रांड इसलिए खड़े हुए क्योंकि उन्होने लेखन को एक बेहतर कैरियर विकल्प के रूप में देखा।
बेस्टसेलर का मतलब बाजार है और बाजार से गुरेज करने वाले लेखकों का दिल इसमें नहीं रमने वाला। 

वैसे एक सवाल यह भी है कि लोकप्रियता ही आखिरी पैमाना है? 19 फरवरी को सुरेन्द्र मोहन पाठक से जब मैं बातचीत कर रहा था तो मैं यह देखकर अभिभूत था कि उनके पाठक बड़ी संख्या में आए थे, भाव विभोर हो रहे थे। ऐसा स्टार स्टेटस मैंने किसी हिन्दी लेखक का इससे पहले नहीं देखा था। उनके पास लेखन के अलावा कोई और ग्लैमर भी नहीं है। उनके किसी उपन्यास पर कभी कोई फिल्म भी नहीं बनी। लेकिन उनके जैसा जासूसी उपन्यास मैं नहीं लिखना चाहूँगा,शायद लिख भी नहीं सकता। लेकिन मैं भी यह चाहूँगा उस तरह की फैन फ़ौलोइंग मेरी भी हो। मुझे लगता है कि बहुत सारे लेखक यही चाहते होंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी किताबों का बाजार बाद रहा है, लेकिन उस दिन इसे मैं सम्पूर्ण मानूँगा जिस दिन मेरे पैमाने पर कोई किताब बेस्टसेलर बने, जो पल्प न हो। वाणी, राजकमल, पेंगुइन, हार्पर, आधार, हिन्दी युग्म में से कोई उस किताब का प्रकाशक हो। लेखक अपने लेखन से कमाई कर सके इसमें मुझे परेशानी नहीं दिखती। किताब लिखने में वह श्रम करता है, उसे उसका मेहनताना मिलना चाहिए। किताब लिखना सामाजिक संघर्ष नहीं होता। कम से कम मुझे ऐसा नहीं लगता।

आखिर में एक बात सुरेन्द्र मोहन पाठक की। उस दिन जब मैं पाठक जी से बातचीत कर रहा था तो उन्होने कहा कि आजकल किताब लिखना फैशन हो गया है। पिज्जा खाना और किताबें लिखना एक जैसा हो गया है। यह एक गंभीर टिप्पणी है। मैं मानता हूँ। फैशन में लिखने वाला बेस्टसेलर नहीं लिख सकता।

और हाँ, कल की बातचीत में यह बात उभरकर सामने आई कि हिन्दी में पाठकों तक किताबें पहुंचाने का उचित नेटवर्क नहीं है। लेकिन सच बताऊँ पिछले 20 साल से यही सुनते सुनते बड़ा हुआ हूँ। अगर नेटवर्क नहीं है तो कौन बनाएगा इसे? प्रकाशकों और लेखकों के सामूहिक प्रयास से ही यह संभव हो सकता है। हर बात के लिए सरकार की ओर देखना उचित नहीं है। जिस दिन हम हिन्दी वाले सरकार की ओर देखना बंद कर देंगे यकीन मानिए अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे और अपना बेस्टसेलर भी बना लेंगे। 

यह मेरा स्वतंत्र लेख है- प्रभात रंजन 

8 COMMENTS

  1. sahitya wo hi kaam ka, jo logon tak pahunche…. unka manoranjan kare… sochane par majboor kare…. sahi galat ka fark bataye. Surender Mohan Pathak Ji ke lekhan me ye sab upalabdh hai. Aise sahitya ka kya fayda jo kewal Pustkalyon me pada dhul khata rahe.

  2. मैं तो आप बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें नहीं समझता…….लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि जो बढ़िया लिखेगा वही बढ़िया बिकेगा……सुरेन्द्र मोहन पाठक को साहित्यकार माना जाए या ना माना जाए लेकिन उनके लेखन में कोई बात है जरूर जो हम पाठकों को पाठक का पाठक बनाती है…….

  3. लुगदी साहित्य अगर बिकता है तो सारे लोगों की गृद्ध दृष्टि वहीं तो रहेगी!

  4. हमारे समाज में जहाँ किताब पढ़ना व्यर्थ की, बेवकूफी की बात मानी जाती है किताब पढ़ने के लिए छोटे शहरों में जगह जगह धक्के खाने पड़ते है वहाँ पाठक कैसेमिले ? क्योकर मिले क्या पढ़े? कैसे मिले ? क्यों पढ़े? अभिभावक सबसे पहली और सबसे बड़ी बाधा है। पिछली पीढ़ी ने अनपढ़ अभिभावक पैदा किए है उनसे पढ़ने लिखने वाले बच्चों की अपेक्षा करना उनके साथ नाइंसाफी है। इन्टरनेट ने किताबों की उपलब्धता तो कर दी है। पर क्या पढ़े और क्यों पढ़े ये सवाल अब भी अपनी जगह कायम है

  5. आज मज़दूरों की जो युवा पीढ़ी कारख़ानों में आ रही है, खदानों, भवन-निर्माण, गोदामों, बन्दरगाहों पर काम कर रही है, उनमें से अधिकांश पढ़े-लिखे हैं। कुछ तो बी.ए. पास तक होते हैं। यदि लेखक की रचना में उनकी ज़िन्दगी की परेशानियाँ और संघर्षों की सही-सच्ची इन्दराजी होगी तो उन मेहनतकशों के बीच से साहित्य का नया पाठक वर्ग पैदा होगा। यह आज थोड़ी विस्मयकारी बात लग सकती है, लेकिन दरअसल है नहीं।

  6. इस बात पर काफ़ी चर्चे होते रहे हैं कि हमारे समाज में समकालीन स्तरीय साहित्य का पाठक वर्ग काफ़ी सिमट गया है। आज भी हिन्दी में सबसे अधिक प्रेमचन्द पढ़े जाते हैं। कामतानाथ, रवीन्द्र कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, अलका सरावगी, संजीव, शिवमूर्ति, उदय प्रकाश आदि के चर्चित उपन्यासों के पाठक वर्ग का दायरा भी काफ़ी छोटा है। हर सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या की तरह इस समस्या के भी कई कारण हैं। किताबों की ऊँची क़ीमतें, लाइब्रेरी-सप्लाई करके अंधाधुंध मुनाफ़ा कमाने की प्रकाशकों की अन्धी हवस के चलते आम लोगों तक पुस्तकों को पहुँचाने वाले किसी प्रभावी तंत्र का अभाव, इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रभाव के कारण आम पढ़े-लिखे लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचि में आई गिरावट आदि को इस समस्या के कुछ स्थूल कारणों के रूप में देखा जा सकता है।

    इनके अतिरिक्त कुछ बुनियादी सामाजिक ऐतिहासिक कारण भी हैं। हमारे समाज के तीव्र पूँजीवादीकरण ने एक ऐसी मध्यवर्गीय आबादी की भारी संख्या पैदा की है जो बाज़ार-संस्कृति का अन्ध-उपासक और गैर-जनतांत्रिक प्रवृत्ति का है। कला-साहित्य-संस्कृति से न तो इसका कुछ लेना-देना है और न ही आम जनता के जीवन से। व्यापार-प्रबन्धन, बचत, निवेश और मौज-मस्ती आदि की इसकी अपनी दुनिया है जो शेष समाज से एकदम कटी हुई है। एक कारण यह भी है कि तमाम भौतिक प्रगति के बावजूद, हमारे समाज के आम लोगों की आँखों में आज वे भविष्य-स्वप्न नहीं हैं जो सामाजिक जीवन को आवेगमय बनाते हैं। यह समय गतिरोध और विपर्यय का समय है। सामाजिक मुक्ति की कोई नयी परियोजना अभी जीवन में हलचल पैदा करने वाली भौतिक शक्ति नहीं बन पायी है। इतिहास के ऐसे कालखण्डों में स्तरीय जनपरक साहित्य का दायरा प्रायः काफ़ी संकुचित हो जाया करता है। लेकिन इन कारणों से जुड़ा हुआ एक और कारण है जिसे हम यहाँ विचारार्थ अपने उन सहयात्री साहित्यकारों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं जो साहित्य में कुलीनतावाद का विरोध करते हैं।
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    हम विनम्रता, चिन्ता और सरोकार के साथ साहित्यक्षेत्र के सुधी सर्जकों का ध्यान इस नंगी-कड़वी सच्चाई की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं कि उस मेहनतकश आबादी की, जो देश की कुल आबादी के पचास प्रतिशत से भी अधिक हो चुकी है, ज़िन्दगी की जद्दोजहद समकालीन हिन्दी साहित्य की दुनिया में लगभग अनुपस्थित है। आप याद करके ऐसे कितने उपन्यास या कहानियाँ उँगली पर गिना सकते हैं जिनकी कथाभूमि कोई औद्योगिक क्षेत्र की मज़दूर बस्ती और कारख़ानों के इर्दगिर्द तैयार की गयी हो, जिनमें हर वर्ष अपनी जगह-जमीन से उजड़ने, विस्थापित होकर शहरों में आने और आधुनिक उत्पादन-तकनोलॉजी में आने वाले कारख़ानों में दिहाड़ी या ठेका मज़दूर के रूप में बारह-बारह, चौदह-चौदह घण्टे खटने वाले नये भारतीय सर्वहारा के जीवन की तफ़सीलों की प्रामाणिक ढंग से इन्दराजी की गयी हो। और इनके पीछे की कारक-प्रेरक शक्ति के रूप में काम करने वाली सामाजिक-आर्थिक संरचना की गति को अनावृत्त करने की कोशिश की गयी हो? सच्चाई यह है कि जो मज़दूर वर्ग आज संख्यात्मक दृष्टि से भी भारतीय समाज का बहुसंख्यक हिस्सा बन चुका है, उसका जीवन और परिवेश जनवादी और प्रगतिशील साहित्य की चौहद्दी में भी लगभग अनुपस्थित है। मज़दूर वर्ग और समाजवाद के प्रति रस्मी, दिखावटी या पाखण्डपूर्ण प्रतिबद्धता का भला इससे अधिक जीता-जागता प्रमाण और क्या हो सकता है?
    ……….
    http://ahwanmag.com/archives/4512

  7. मुझे लगता है प्रभात जी ये हमारे पूर्वजो की देन है, वो ब्राह्मण शूद्र मे फंसे रहे, स्वर्ण दलित करते रहे। आज की साहित्यिक दुनिया मे गंभीर साहित्य, पोपुलर साहित्य का अंतर आ गया। लेकिन भाव वही है। वही भेदभाव, वही छुआछूत, जैसा आपने परसों कहा की गभीर साहित्य लेखक भी हैं सीक्रेट एडमायरर पाठक साहब के । सबके सामने कबूल नहीं कर सकते, इज्ज़त घटती है। हवाई जहाज मे अंग्रेजी नॉवल पढ़ते हैं। ताकि आसपास के सहयात्री हँसे नहीं। लेखक बनने से पहले इन सभी ने खूब पढ़ा लिखा होगा, क्या काम आया वो सब। ब्राहमनवाद से तो दूर आ गए लेकिन नए किस्म के ब्राहम्ण्वाद मे फंस गए। मैं ऊंचा तू नीचा। खून वही है, जज़्बात वहीं हैं । इन्हें कोई नहीं बदल सकता शरद

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