मंगलेश डबराल और ‘नए युग में शत्रु’

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मंगलेश डबराल से आप कितनी भी दूर चले जाएँ उनकी कवितायें आपको अपने पास खींच लेती हैं।हाल में ही उनका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘नए युग में शत्रु’। इस संग्रह की कविताओं पर प्रियदर्शन का यह लेख पढ़िये। हमारे दौर के एक प्रमुख कवि को उनके समकाल में ‘लोकेट’ करता हुआ- जानकी पुल। 
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एक उजली मनुष्यता की कविता

प्रियदर्शन

इन ढलानों पर वसंत / आएगा ह्मारी स्मृति में / ठंड से मरी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित करता / धीमे-धीमे धुंधुवाता ख़ाली कोटरों में / घाटी की घास फैलती रहेगी रात को / ढलानों में मुसाफ़िर की तरह / गुज़रता रहेगा अंधकार।(वसंत- पहाड़ पर लालटेन)

1980 में पहाड़ पर लालटेन जैसे कविता-संग्रह के साथ हिंदी कविता के समकालीन स्वर को बहुत दूर तक प्रभावित करने वाले मंगलेश डबरालकी काव्य यात्रा पहाड़ों और मैदानों से होती हुई अब महानगरों तक चली आई है। उनका नया कविता संग्रह नये युग में शत्रु  उन्हें एक बार फिर समकालीन हिंदी कविता की सबसे प्रतिनिधि और प्रभावशाली आवाज़ की तरह स्थापित करता है। इक्कीसवीं सदी के संकट और सवाल शायद ही किसी दूसरे कवि की आवाज़ में इस सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ व्यक्त हुए हों जो इस संग्रह में दिखती है। नई सदी के दरवाज़े खटखटाता, चमचमाते जूते, कपड़े और मोबाइल गांठे यह नए ज़माने का शत्रु वह भूमंडलीय बाज़ारवाद है जिसने अपनी एक मायावी दुनिया बसा रखी है। इस दुनिया में कुछ भी सपाट और इकहरा नहीं है। वह हर तरफ है लेकिन दिखाई नहीं पड़ता- वह अपने को कंप्यूटरों, टेलीविज़नों, मोबाइलों / और आइपैडों की जटिल आंतों के भीतर फैला देता है / अचानक किसी महंगी गाड़ी के भीतर उसकी छाया नजर आती है / लेकिन वहां पहुंचने पर दिखता है वह वहां नहीं है / बल्कि किसी नई और ज़्यादा महंगी गाड़ी में बैठकर चल दिया है / कभी लगता है वह किसी फैशन परेड में शिरकत कर रहा है, / लेकिन वहां सिर्फ़ बनियानों, जांघियों, प्रसाधनों का ढेर दिखाई देता है / हम सोचते हैं शायद वह किसी ग़रीब के घर हमला करने चला गया है / लेकिन वह वहां से भी जा चुका है..‘ (नए युग में शत्रु)

यह शत्रु ढेर सारे मोबाइल नंबर रखता है, लाखों का इनाम जीतने की सूचना देता है, किसी अकल्पनीय उपहार का इंतज़ार कराता है और भरोसा दिलाता है कि कहीं शत्रु नहीं बचे हैं- सब एक-दूसरे के मित्र हैं। एक नफ़ासत भरीक्रूरता के साथ वह बहुत सारी दुनियाएं उजाड़ रहा है,एक मैत्रीपूर्ण सौहार्द के साथ वह हमें बता रहा है कि हमारा उजाड़ा जाना ही आने वाली सदियों के हक़ में है।

यह जो बहुत चमकती हुई दुनिया है- अपने कौंधते हुए ऐश्वर्य के साथ हमारे चारों तरफ़ फैली हुई- मंगलेश डबराल की कविता जैसे आहिस्ते से उसकी पन्नियां हटा देती है, उसका जादू बुझा देती है। वह उस ढंकी-छुपी असलियत को बिल्कुल तार-तार करती हुई जैसे हमारे सामने प्रगट कर देती है जो भयावह और कुरूप दोनों है।

ऐसा नहीं कि यह भूमंडलीय यथार्थ पहली बार हमारे सामने खुल रहा है। बाज़ार और उपभोग के रौनक वाले टापुओं के पीछे एक बहुत विशाल दुनिया भूख, अभाव और तकलीफ़ की भी बसती है, यह बताने वाली रिपोर्ट्स अब हमारे पास बहुत सारी है। लेकिन मंगलेश की कविता जब इस संसार में दाखिल होती है तो आंकड़ों के आईने में दिखने वाली एक सच्चाई जैसे अपने विराट दैत्याकार रूप में प्रगट होती है और हम ख़ुद को मनुष्यता और सभ्यता के उस संकट के सामने खड़ा पाते हैं जिनसे परिचित तो हैं, लेकिन आंख मिलाने को तैयार नहीं होते।आदिवासीनाम की कविता में वे लिखते हैं, इंद्रावती, गोदावरी, शबरी, स्वर्णरेखा तीस्ता बराक कोयल / सिर्फ़ नदियां नहीं उनके वाद्ययंत्र हैं / मुरिया बैगा संताल मुंडा उरांव, डोंगरिया कोंध पहाड़िया / महज़ नाम नहीं वे राग हैं जिन्हें वह प्राचीन समय से गाता आया है / और यह गहरा अरण्य उसका अध्यात्म नहीं, उसका घर हैऔर फिर बताते हैं किस तरह उन्हें उजाड़ने का एक सिलसिला जारी है।

दरअसल मंगलेश डबराल की कविता उजाड़े जा रहे लोगों की, विस्थापित आवाज़ों की, छीज रही स्मृतियों की, पीछे छूटते घरों की इतनी सारी स्मृतियों से बनती है कि वह निजी वृत्तांत सी लगती हुई भी एक सभ्यतागत विमर्श में बदल जाती है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के बाद की दुनिया को देखें तो यह विस्थापितों की दुनिया है। यह पूरी सदी बेदखल लोगों से बनी, उनकी स्मृतियों में बसी सदी है। इस पूरे दौर में घर टूटे हैं, मुहल्ले टूटे हैं, गांव टूटे हैं, शहर बसे और बदले हैं, लोग तमाम कारणों से अपनी जगहें छोड़ने, कहीं और जाने को मजबूर हैं। जड़ों से इस कटाव ने और भी कई तरह के कटाव पैदा किए हैं। ऐसे कटे हुए लोगों की दुनिया में सर्वशक्तिमान हुई व्यवस्था जैसे उन्हें कम मनुष्य होकर जीने को विवश कर रही है। भूमंडलीकरण नाम का राक्षस कई तरह के सुंदर मुखौटे ओढ़े दुनिया को लगातार विपन्न बनाता हुआ, उसे भरमा रहा है।

मंगलेश डबराल की कविता में इस पूरी त्रासदी के तमाम स्वर मिलते हैं। बल्कि ध्यान से देखें तो उनकी पूरी काव्य यात्रा जैसे विस्थापन के इन्हीं पड़ावों से बनी है। पहाड़ पर लालटेन’  में विस्थापन और उजाड़े गए लोगों की त्रासदी के बिल्कुल ताज़ा और हरे, टभकते हुए ज़ख़्म मिलते हैं तो घर का रास्ता में वापस न लौटने की कचोट नज़र आती है। हम जो देखते हैंऔर आवाज़ भी एक जगह है में उनकी कविता अपने पुराने विश्वासों को जीती हुई नए इलाक़ों में दाखिल होती है और सभ्यता के कहीं ज़्यादा सूक्ष्म संकटों के सुराग देती हैं। हालांकि इस पूरे दौर में पुराने मिज़ाज और लहजे की आवाजाही भी तमाम जगहों पर है, लेकिन कवि का आगे बढ़ना अलक्षित नहीं रह पाता। नए युग में शत्रु इस पूरी प्रक्रिया को जैसे उसकी संपूर्णता में पकड़ता है। इस संग्रह में बहुत निजी दुख की थपकियां भी हैं, सार्वजनिक संकटों की शिनाख्त भी है, ज़रूरी होने पर ठेठ राजनीतिक बयान भी हैं, और बहुत गहरे छूने वाली तरह-तरह की स्मृतियां, आवाज़ें और तस्वीरें भी हैं। 2002 की गुजरात हिंसा के बाद लिखी गई कुछ बेहतरीन कविताएं इस संग्रह में हैं। गुजरात के मृतक का बयानअब एक मशहूर कविता है, लेकिन उसका ज़िक्र यह समझने के लिए ज़रूरी लगता है कि किस तरह मंगलेश एक नितांत राजनीतिक कविता बहुत गहरे मानवीय आशयों के साथ लिख सकते हैः और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो / क्या छिपाए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम / कोई मज़हब कोई ताबीज / मैं कुछ नहीं कह पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था / सिर्फ एक रंगरेज़ एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार / जब मैं अपने भीतर मरम्मत कर रहा था किसी टूटी हुई चीज़ की / जब मेरे भीतर दौड़ रहे थे / अल्युमिनियम के तारों की साइकिल के नन्हे पहिये / तभी मुझ पर गिरी एक आग बरसे पत्थर / और जब मैंने आख़िरी इबादत में अपने हाथ फैलाये / तब तक मुझे पता नहीं था बंदगी का कोई जवाब नहीं आता।

दरअसल कविता में यह उजली और मार्मिक मनुष्यता ही वह चीज़ है जो मंगलेश डबराल को अपने समकालीनों के बीच अलग और विशिष्ट बनाती है। समकालीन हिंदी कविता में कई आवाज़ें मंगलेश डबराल से मिलती-जुलती हैं, उन सबकी अपनी-अपनी खूबियां और ख़ासियतें भी हैं, लेकिन मंगलेश की कविता में जो सूक्ष्म संवेदना लगातार प्रवाहमान रहती है- तमाम पाठों के बीच एक अंतर्पाठ जिस तरह सतत सक्रिय रहता है, वह हिंदी कविता में विरल है। उनके यहां विषयों की बहुतायत है। वे अपनी कविताओं में जीवन का पाठ, प्रेम का पाठ, खुशी का पाठ, अच्छाई का पाठ ले आते हैं, शरीर, चेहरा, त्वचा, आंखें और बाल तक उनकी कविताओं में चले आते हैं, राग शुद्ध कल्याण और राग मारवा को वे विषय बनाते हैं, करुणानिधान और मोहन थपलियाल जैसे छूटे हुए दिवंगत मित्रों को फिर से बसाते हैं, और यह सब करते हुए अंततः वे अपनी मनुष्यता को ही परिभाषित कर रहे होते हैं जो बहुत सारी चोटों के बीच, बहुत सारे छलावों और भटकावों के बीच अंततः कायम है और लगातार खुद को उलट-पुलट कर देखती हैः प्यार में तुम किसी करिश्मे का इंतज़ार करते रहे / सितमगरों का साथ नहीं दिया / पैसे की ख़ातिर ख़याल बदले नहीं / कभी ताकत की दहलीज तक गए तो अपने को बददुआ दी / आदमखोरों को भी तुम हैरत से देखा किये / सोचा किये कि आखिर हमीं से कुछ हुआ है कि वे इस तरह हो गए / अक्सर अपने भीतर झांका किए कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं / तुम्हारा अदना ज़मीर कहता रहा गलत गलत सही सही।(अच्छाई का पाठ)

यह साफ़ नज़र आता है कि कविता लिखते हुए मंगलेश अपने सर्वोत्तम रूप में होते हैं- और यही चीज़ उनकी कविता को बड़ा बनाती है। नितांत संवेदनशील मगर उतनी ही चौकस उनकी कविता अपनी पारदर्शी निगाह से यथार्थ को जैसे तार-तार कर देती है। इस चौकस और मर्मभेदी दृष्टि के बूते ही वे लिख पाते हैं, मैं जब भी यथार्थ का पीछा करता हूं / देखता हूं वह भी मेरा पीछा कर रहा है, मुझसे तेज़ भाग रहा है, / घर हो या बाज़ार हर जगह उसके दांत चमकते हुए दिखते हैं / अंधेरे में रोशनी में / घबराया हुआ मैं नींद में जाता हूं तो वह वहां मौजूद होता है / एक स्वप्न से निकल कर बाहर आता हूं / तो वहां भी वह पहले से घात लगाए हुए रहता है/ ….य़थार्थ इन दिनों बहुत ज़्यादा यथार्थ है उसके शरीर से ज़्यादा दिखाई दे रहा है उसका रक्त।(यथार्थ इन दिनों)

कितने हैं हमारे समय में ऐसे कवि, जो अपनी कविता में यथार्थ की इतनी गहरी पड़ताल के साथ मनुष्यता का यह पाठ संभव कर रहे हैं? ‘नये युग में शत्रुके साथ मंगलेश डबराल फिर से याद दिलाते हैं कि वे क्यों समकालीन कविता की सबसे गहरी, भरोसेमंद और प्रतिनिधि आवाज़ हैं।

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