एक चिट्ठी जगजीत सिंह के नाम

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आज महान गजल गायक जगजीत सिंह का जन्मदिन है। वे इस दुनिया में भले न हों लेकिन अपनी सोज़ भरी आवाज में रची-बसी एक से एक गजलें छोड़ गए हैं। आज उनका जन्मदिन है और उनको, उनकी गायकी को याद करते हुए उनके नाम यह चिट्ठी लिखी है सैयद एस. तौहीद ने- जानकी पुल। 
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हरदिल अजीज़ जगजीत सिंह,

खत लिखकर आपसे रूबरू हो रहा हूं। काफी दिनों से सोच रहा था कि एक अजीज से दिल की बात कहूं। आपकी फनकारी का एक मामूली तलबगार आपको याद करता है।  लाईव महफिलों का जरिया भी तो हमेशा के लिए रूक गया। अब उन गजलों में ही खुदा के प्यारे को खोजा करता हूं। पुराने इंटरव्यु को देखकर मन नहीं माना…खत लिख रहा हूं। क्या नहीं बाक़ी कहने को और जिंदगी गुजर रही। मौसम के इम्तिहान में जिंदगी साथ सबको नसीब नहीं। आपके गजलों को सुनकर भी प्यार की तलब नहीं बेवफा को। जानता हूं कि परमेश्वर के यहां आपको आराम होगा…वहां भी एक महफिल सजा करती होगी। यहां इस दुनिया में लोग आपको काफी मिस करते हैं। अकेलापन व उदासी उनके हिस्से आई जिन्हें फनकारों से इश्क था। जहान की तकलीफ सुनें कि सफर के एक मरहले में होकर तन्हाई रह-रह कर दस्तक दे जाती है। एक तकलीफ से गुजरना ना जानें क्यों एक शाश्वत हकीकत बन सी गयी है। बहुत से मामलों में तन्हा शख्स की ठीक तरह से पहचान भी नहीं हो पाती । आप समझ सकते हैं कि ऐसे लोग उदासी से घोर उदासी मे जाने को मजबूर हैं। आपकी दुनिया में जाकर शायद शुकुन मिल जाए… मुझे वहां का अंदाजा नहीं लेकिन सुना कि रुहों को आराम मिलता है। खुदा के दरबार में बेसहारों की खातिर एक अर्जी लगा दें। शायद दुनिया की तकलीफों के एवज में जन्नत नसीब हो। 
वक्त रहता नहीं कहीं रूककर…आदत भी आदमी सी है। आदमी की फितरत में आवारगी का होना वक्त से मिली एक पहचान होती है। इंतजार की भी एक उम्र हुआ करती है। आवारगी और इंतजार दोनों ही हालत में हम कभी न कभी कोशिशों से हार कर रुक जाते हैं। बहुत ज्यादा इंतजार हर किसी से नहीं हो पाता..बन जाएंगे जहर पीते-पीते यह अश्क जो वो पीए जा रहे हैं। एक अर्जी खुदा के पास उन मुसाफिरों का सफर आसान होने का लगा दें जिन्होंने पडाव को मंजिल समझा। अपना जिक्र करें…क्या मालूम गज़लजीत अब भी गज़लों में बयान करते हों । गजलों में तो अब भी रुह जिंदा नजर पेश रहती है ,ख्वाबों को अमर गीतों से सजा दिया करें… होठों को पाकर वो गीत फिर नहीं मरेंगे। आपको मालूम कि अपने हिस्से की जन्नत में जा कर सबसे तन्हा हो गए हो। देखिए ना जमाने भर का एकाकीपन आप-हम को अजनबी कर दे रहा । सामने वाले के जीने में खुद के लिए वजह खोज लेना ही अब तकलीफें दूर करेगा। 
आज… प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है…का ख्याल आता है। लिखा किया करता था, नहीं जानता और उसने बताया भी नहीं कि वो खत थे। बेवजह भी लिख लिया करता था। अक्सर खामोश जवाब के एवज में दिल की कह दिया करता था। आपको मालूम कि वो खामोशी का दूसरा नाम सा बनता चला गया। उस तरफ की खबर उसमें ही तालाश करनी होती थी। हमारी दुनिया कहने को साथ चल रही थी। फिर शब्र कर लिया कि वो अपनी जिंदगी में खुशहाल होगा। सफर-दहलीज-उम्र से वो भी रूबरू होगा। सब साथ चल रहा था फिर भी जिंदगियां अपने में अकेली…कोई यह कैसे बताता कि वो तन्हा था। दुनिया में काले-सफेद के अलावा भी रंग सुने थे हमने। बात निकली नहीं…दूर तलक भला कैसे जाती? खत लिखा क्योंकि लिखकर आप उनके नजदीक हो सकते हो जो दूर हुआ करता है। सफर की खातिर चलना हमने सीख लिया था। इधर की दुनिया एक ख्वाहिशों की दुनिया है। ख्वाहिशें की एक उम्र हुआ करती है…हजारों ख्वाहिशें ऐसी भी कि उनको पूरा नहीं होना है। 
आप जिस दुनिया में चले गए वहां से कोई संदेश नहीं आता…तकलीफ भी रहती है कि…चिटठी ना कोई संदेश। आपका शहर अब काफी बदल चुका है। क्या बताऊं क्या ना समझ नहीं पा रहा। एक अजीज की कमी एक शाश्वत सच की तरह लिपटी हुई है। महफिल में होकर दीवाने उस आवाज को ढूंढा करते हैं… जहां में अबके दिन और रातों को वक्त को जीना है। कभी यह गुजर जाता कभी इंतजार बन जाता। कभी उम्र हो जाता…जिंदगी के सफर में कभी महफिल में तो कभी तन्हा जीना है। महफिलें जो आप ने कभी सुरों से सजाई अब कोई और भी वहां आता है। आप की कमी हमेशा रहेगी। गज़ल की ख्बाहिश आपकी ख्वाहिश बन चुकी है। जिंदगी की समझ कि वो जो था… अपना था ने हमें साथ रखा है। आपके दीवानों को हर गज़लकार में आपका चेहरा नजर आता है…कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है…तुमको भूल ना पाएंगे हमें ऐसा लगता है। कितना कुछ कहना बाक़ी रहा और जिंदगी गुजर रही।
                                                                                                                            आपका                                                                                                                       (सैयद एस. तौहीद)
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