फिर तोड़ने की कोशिश हर ओर हो रही है

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भरत तिवारी की जादुई तस्वीरों के हम सब प्रशंसक रहे हैं. उनकी गज़लों की रवानी से भी आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे. समकालीन हालात को लेकर कुछ मौजू शेर. रविवार की सुबह आपके लिए- प्रभात रंजन 
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मजबूत थी इमारत, कमज़ोर हो रही है
फिर तोड़ने की कोशिश हर ओर हो रही है

अपने लहू की गर्मी, ठंडी न होने देना
माहौल में तरावट, बा-ज़ोर हो रही है 

ये जो खड़े हुए हैं, हाथों को अपने जोड़े
इनके ज़ेहन में बातें कुछ और हो रही हैं

अपने पड़ोस को तुम, अपना ही घर समझना
घर लूटने की कोशिश पुरज़ोर हो रही है

तोड़ो भरम ये अपना, जागोगे या मरोगे
सोये भरत बहुत दिन, अब भोर हो रही है
* * * *
इन हुक्मरानों पर ज़रा सा भी भरोसा क्या करें
इनको खबर खुद भी नहीं, कब ये तमाशा क्या करें

शर्म ओ हया से दूर तक, जिसका न हो कुछ वास्ता
वही आबरू-एमुल्क का, जब हो दरोगा क्या करें

इक नौकरों का शाह है, इक बादशाह बेताज़ है
दोनों का मकसद लूटना, अब बापदादा क्या करें

काला बना पैसा हमारा, भेज दे स्विस बैंक में
रोया करें हम प्याज को, खाली खजाना क्या करें

नाटक दिखाते हैं तुझे, सब टोपियों का खेल है
सब के इरादे एक से, बस अब इशारा क्या करें
* * * *

किस्मत है अब सितारा तुम जो मुझे मिले हो
सब कुछ लगे है प्यारा तुम जो मुझे मिले हो

टूटा वजूद मेरा, टुकड़े तमाम बिखरे
जुड़ने लगे हैं यारा तुम जो मुझे मिले हो

सारे का सारा आलम अपना लगे है मुझको
क्या साथ है तुम्हारा तुम जो मुझे मिले हो

लिखना मुहाल बिलकुल गो गर्द में क़लम थी
उसको  है अब सहारा तुम जो मुझे मिले हो

वो ताज़गी मिली है पहले न थी कभी जो
मीठा है पानी खारा तुम जो मुझे मिले हो

अब देखिये भरतको ठहराव मिल गया है
मैं ना रहा अवारा तुम जो मुझे मिले हो

32 COMMENTS

  1. ये जो खड़े हुए हैं, हाथों को अपने जोड़े
    इनके ज़ेहन में बातें कुछ और हो रही हैं..

    समयानुरूप…बधाई भरत…
    सुमन केशरी

  2. कथ्य सटीक है गज़ल का मगर लगता है, गज़ल में भी फोटोग्राफर वाली दृष्टि हीं हावी है; बेहतर होता रचनाकार शे'र में खुद मौजूद रहते! फोटो के सम्मुख पार्श्व में यवनिका के पीछे अदृश्य होने की जगह!

  3. आभार आपका आ. प्रभात रंजन बाबू …. जो
    आपकी कोशिशों ने आ. भरत जी के टूटते जानकी पुल को
    रामदूत बन कर हम पाठकों तक पहूंचाया ….

    ***
    मुतमईन हो के बिछना यूँ क़दमों में ,
    रूठना खफा होकर हुए जो मुतनाज़ा ;
    नंगे हो सामने आ गये खुल कर हम भी ;
    सियासी, टके सेर भाजी टके सेर खाजा … |
    ———————
    ~ प्रदीप यादव ~
    ———————-

  4. Miane Bharat Bhai ko bataur ek photographer hee jana tha, aap yah hunar bhee rakhte hain…..padhkar accha laga……

    ये जो खड़े हुए हैं, हाथों को अपने जोड़े
    इनके ज़ेहन में बातें कुछ और हो रही हैं

    bahut khoob…..

  5. //लिखना मुहाल बिलकुल गो गर्द में क़लम थी
    उसको है अब सहारा तुम जो मुझे मिले हो//

    बहुत सुन्दर सर जी

  6. इन हुक्मरानों पर ज़रा सा भी भरोसा क्या करें
    इनको खबर खुद भी नहीं, कब ये तमाशा क्या करें

    नये मिजाज़ की ग़ज़लें …..बेहतरीन!

  7. Pran Saab aapsi ghazal bhala koun kah sakta hai, hamesha tazi aur sandesh deti hui hoti hain.
    Uppar aapne jo likha hai harf-harf aashirwaad hai…. bahut bahut shulriya aapka.
    Bharat

  8. MAANAA KI BHARAT TIWARI MEIN TAAZGEE HAI MAGAR UNKEE GHAZALON MEIN BHEE
    TAAZGEE KAM NAHIN HAIN . UNKE ADHIKAANSH ASHAAR NE MAN KO AANANDIT KAR DIYAA HAI .

  9. नाटक दिखाते हैं तुझे, सब टोपियों का खेल है
    सब के इरादे एक से, बस अब इशारा क्या करें……..

    A subtle expression of contemporary surroundings …. Very nice…

  10. ये जो खड़े हुए हैं, हाथों को अपने जोड़े
    इनके ज़ेहन में बातें कुछ और हो रही हैं..

    समयानुरूप…बधाई भरत…
    सुमन केशरी

  11. कथ्य सटीक है गज़ल का मगर लगता है, गज़ल में भी फोटोग्राफर वाली दृष्टि हीं हावी है; बेहतर होता रचनाकार शे'र में खुद मौजूद रहते! फोटो के सम्मुख पार्श्व में यवनिका के पीछे अदृश्य होने की जगह!

  12. आभार आपका आ. प्रभात रंजन बाबू …. जो
    आपकी कोशिशों ने आ. भरत जी के टूटते जानकी पुल को
    रामदूत बन कर हम पाठकों तक पहूंचाया ….

    ***
    मुतमईन हो के बिछना यूँ क़दमों में ,
    रूठना खफा होकर हुए जो मुतनाज़ा ;
    नंगे हो सामने आ गये खुल कर हम भी ;
    सियासी, टके सेर भाजी टके सेर खाजा … |
    ———————
    ~ प्रदीप यादव ~
    ———————-

  13. Miane Bharat Bhai ko bataur ek photographer hee jana tha, aap yah hunar bhee rakhte hain…..padhkar accha laga……

    ये जो खड़े हुए हैं, हाथों को अपने जोड़े
    इनके ज़ेहन में बातें कुछ और हो रही हैं

    bahut khoob…..

  14. //लिखना मुहाल बिलकुल गो गर्द में क़लम थी
    उसको है अब सहारा तुम जो मुझे मिले हो//

    बहुत सुन्दर सर जी

  15. इन हुक्मरानों पर ज़रा सा भी भरोसा क्या करें
    इनको खबर खुद भी नहीं, कब ये तमाशा क्या करें

    नये मिजाज़ की ग़ज़लें …..बेहतरीन!

  16. Pran Saab aapsi ghazal bhala koun kah sakta hai, hamesha tazi aur sandesh deti hui hoti hain.
    Uppar aapne jo likha hai harf-harf aashirwaad hai…. bahut bahut shulriya aapka.
    Bharat

  17. MAANAA KI BHARAT TIWARI MEIN TAAZGEE HAI MAGAR UNKEE GHAZALON MEIN BHEE
    TAAZGEE KAM NAHIN HAIN . UNKE ADHIKAANSH ASHAAR NE MAN KO AANANDIT KAR DIYAA HAI .

  18. नाटक दिखाते हैं तुझे, सब टोपियों का खेल है
    सब के इरादे एक से, बस अब इशारा क्या करें……..

    A subtle expression of contemporary surroundings …. Very nice…

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