ज्योत्स्ना जी हम सब की उम्र का होकर जीना जानती थी

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ज्योत्स्ना मिलन के जाने से जो शून्य साहित्यिक जगत में पैदा हुआ है उसे कुछ शब्दों से भरने की कोशिश की है कवि-लेखक अनिरुद्ध उमट ने. अनिरुद्ध जी करीब 25 सालों से ज्योत्स्ना जी को बहुत करीब से जानते थे. ज्योत्स्ना जी की स्मृति को प्रणाम- जानकी पुल.
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       खुद से बहुत बतियाना एक सूनेपन से भर देता है। एक-एक बात, शब्द अपनी रिक्तता में उदास-सा हमें देखता है कि किस तरह हम अपने ही हाथों अकेले रह गए हैं। अकेले ही नहीं बल्कि अधूरे से रह गए हैं।
       रहना न रहना दोनों ही स्थितियाँ असमंजस में धकेल देती है। कौन रह गया है, कौन नहीं रह गया है। जो रह गया है वह कितना रह पाया है और जो नहीं रहा है वह कितना नहीं रह पाया है। जिसके बारे में हम कहते हैं कि वह नहीं रहा वही हर पल हमें अपने सर्वथा होने की अनुभूति कराता है। बल्कि हमारे छितराए होने को भी बुहारता है। जिन्हें हम मृतक कहते हैं वे हर पल हमें बुहारते हैं। हमें जीते जी मृत होने से बचाते हैं। हम हर पल मरते हुए भी मृतक को हर पल जीवित पाते हैं।
       जीवन की कई सीढियाँ ऊपर को जाती प्रतीत होती है किन्तु वे असल में नीचे उतरती जाती है। जो जाता दीखता है असल में वह आ रहा होता है, अन्तिम बार । फिर वह कहीं नहीं जाता।
       ज्योत्स्नाजी से बतियाना इसी तरह हो सकता है। उन्हीं के अन्दाज में, ‘अस्तुकी तरह। उनके न होने की बात करना असल में उनसे बात न कर पाना हो जाता है। वे न हो पाने की स्थिति से परे का कोई जीवट थीं।
       कल रात जब ट्रैफिक के शोर में फोन पर तेजी ग्रोवर की लगभग चीखती सी आवाज आई थी-अनिरुद्ध तुम्हें पता है क्या हुआ ?’
      ‘क्या हुआ ?’ मैंने शोर में ठंडी आवाज में पूछा था।
       ‘बुरी खबर है, ज्योत्स्नाजी नहीं रही।तेजी ने कहा।
       मैंने तेजी से फिर ठंडी आवाज में कहा, तेजी, हम बाद में बात करते हैं।
       बाद में मैं ट्रैफिक के शोर में ही मन ही मन ठंडी आवाज में ही तेजी से कह रहा था कि ये बात जीम नहीं तेजी। ज्योत्स्नाजी न रहें, ऐसा कभी हो सकता है? हमारा होना संदिग्ध हो सकता है पर उनका होना तो हर हाल में होते रहना है।
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       बरसों से हम हो रहे थे। 25 बरस हो गए लगभग। कब जुड़े, कैसे, किस धागे से……उनके उपन्यास अ अस्तु कासे। अपनी तरह का आज भी अकेला उपन्यास, आकाश से होड़ लेता। वे हर वक्त सामने वाले के होने को पूरा अवसर देती…हवा, पानी, खाद सब कुछ। अपने होने को जरा सा स्थगित करती सी।
       बचपन से ही उनके साथ कुछ ऐसा रहा कि उनमें हर कुछ के प्रति जिम्मेवारी का अहसास रहा। जो जीवन भर उनके साथ उनकी छवि बना आगे-पीछे छाया रहा।
       अभी जब मैं पीछे की याद कर रहा हूँ तो वे मेरा हाथ रोक बरज रही है कि ये तुम क्या कर रहे हो? पीछे क्यों देख रहे हो? क्या हमारी बातें खत्म हो गयी? या तुमने भी मान लिया कि मैं नहीं रही? तो मैं कहता हूँ कि ज्योत्स्नाजी आप ही तो रह गयीं, आप न रह पातीं तो मैं कैसे रह पाता। हमारी मित्रता ऐसी हठ की रस्सी पर ही चलती थी।
       वे सबकी हम उम्र हो जीना जानती थीं। चाहे वह उनका दोहिता तुका हो चाहे वह मैं होऊँ चाहे वह शाह साहब हों।
       अभी बार-बार शम्पा की कांपती-डरती आवाज कानों में गूँज रही है……….आप कुछ कीजिए……….मम्मी की तबियत कुछ ठीक-सी नहीं लग रही। तब मैं सैकड़ों मील दूर बैठा उसे कहता कि……..शम्पा……..चिन्ता मत करो………..कुछ करता हूँ………कुछ करता हूँ। तभी राजुला की आवाज गूँजती………..कल रात मम्मी ने आँखें खोली थी…………..शायद कल कुछ और सुधार हो…………..तो मैं उसे फोन पर कह रहा था……….राजुला,  इस बार मम्मी की आँखें खुले तो तुम धीमे से उनके कान में मेरा नाम लेना…..अनिरुद्ध…..तुम देखना वे मुस्कुराएंगी। और दो तीन दिन बाद घर लौट आएंगी।
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       हम बढ़ती उम्र के साथ बच्चों-सी बातें करने लगते हैं।
       बच्चे बड़ों-सी बातें सोचते चुप रहने लगते हैं।
       और जो बड़े होते हैं वे………….तभी शाह साहब का चेहरा सामने आ जाता। क्या कर रहे होंगे ? बार-बार कमरे से बाहर आ सीढ़ियाँ उतर-चढ़ रहे होंगे।
       और जो पूरे घर में हर वक्त व्यस्तता में इधर-उधर दौड़ती रहती थी….वो बिल्कुल शांत सी, अविचल…..एक पराए कमरे में….हर आवाज से जरा सी दूर।
        एक यही दृश्य मैंने कभी सोचा नहीं था।
       वे कुछ ऐसा वैसा सोचने ही नहीं देती थीं। करीब हफ्ता भर पहले शाम उनका फोन आया था कि सुना है बीकानेर से चैन्नेई रेल शुरू हो रही है, जो भोपाल होते गुजरेगी। मैंने सोचा पता नहीं तुम्हें पता भी है कि नहीं। हम जो बरसों से हर रेल बजट में इस रेल का इन्तजार कर रहे थे,  इस बार जब शुरू होने वाली थी………..तो जिसे इस रेल से बीकानेर आना था….वह अस्पताल में दिल के धक्के से ठंडा होता जा रहा था।
       कितनी बातें……..यादें….बहसें…….सपने…..किस्से…..कितने पत्र लिखने…..इन्तजार के दिन। नीम के पीछे से झांकते आकाश की खबर देते। पूर्णिमा को मैं उन्हें कहता ज्योत्स्नाजी आज तो आप का नाम पूरी पृथ्वी को चमका रहा है । तो हल्का सा ठहाका लगा देती और कहती, मेरे बापूजी ने रखा था ये नाम
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       भोपाल निराला नगर, एम-4…..हमारा घर।
       जैसे ही गाड़ी एम-4 के आगे पहुंचती। सबसे पहले दरवाजे पर मुस्काती मुझसे हाथ मिलातीं।
       और जब जाने का समय आता तो भरसक मुस्कान में अपनी रुलाई को रोकती रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आती और अपना हाथ हिलाती।
      भोपाल में जब भी किसी कार्यक्रम में जाता तो हमेशा मेरे साथ होतीं। चुपचाप। सबको देखती। सब को सुनती। भोपाल जैसे अतिबौद्धिक नगर में जहाँ हर कोई कुछ कहता सा लगता, तब ज्योत्स्नाजी हर किसी को सुनती सी लगती। जीवन का अनुभव, छल-छद्म से बहुत आगे ले जाता है।
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       पर मैं ये क्या लिख रहा हूँ ? अभी वे इसे पढ़ेंगी तो कहेंगी अनिरुद्ध तुम इतना रूखा लिखोगे …..मैंने सोचा भी नहीं था। कहाँ तो वे मेरे पत्रों को कविताओं…कहानियों……….उपन्यासों को पढ लंबे लंबे पत्र लिखा करती थी, फोन पर खूब बधाई देती थीं। और कहाँ आज ये मैं हर पंक्ति पर खुद को ही छलता….ठगा सा महसूस कर रहा हूँ।
       यादों के पत्ते अभी सूखे नहीं जो शोर करेंगे। अभी हरे हैं। गीले हैं। वे एक-एक पत्ते का खयाल रखती थीं। उनके होते कोई पत्ता कैसे सूख सकता था।
       अपने होने की बनावट में वे खुरदुरे अपनेपन के साथ जीती थीं।
       हमारी बहुत सी बातें थीं, बहसें थीं, असहमतियां थीं, स्नेह था, सिर्फ एक बात कभी नहीं थी कि मुझे उनके न रहने के बारे में लिखना होगा।
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       अभी रात को चिता पर राख उभर रही होगी जिसके नीचे दहकते गुलाबी अंगारों में उनका मुस्काता चेहरा मुझे कह रहा है,‘क्या फालतू काम कर रहे हो। जो तुम्हारे वश का नहीं। देखो छत पर आओ………चाँद कैसा चमक रहा है।
       अन्त्येष्टि………………
       कौन किसकी कर रहा है ,
       अभी आधी रात को अपने कोने में मैं ये लिखता वही तो नहीं ?
       सामने उनकी किताबें रखी हैं।
       वे कहेंगी ये क्या फालतू बातें लिख रहे हो।
       सामने उनकी किताबें रखी हैं।
       जिन्हें मैं पिछले कई बरसों से जाने कितनी बार पढ़ता रहा हूँ। कैसा गद्य है ये! कैसे कोई ऐसे दृश्य रच सकता है! जैसे वह सिर्फ कागज के सामने ध्यान लगा शब्दों के इन्तजार में बैठा है और शब्द धीमेधीमे अपनी जगह बनाते उतर रहे हैं।
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       अभी मुझे भोपाल जाना है।
       अभी जाना है………….आज ही जाना है।
       पर मैं नहीं जाऊँगा।
       उस घर में एक चेहरा था जो उसे घर बनाता था। अब भी वह चेहरा होगा। पर आवाज का स्पर्श नहीं होगा। इस कमरे से उस कमरे में जाते किसी को रास्ता नहीं नहीं देना होगा। और मैं दो कमरों के मध्य खड़ा उस कुर्सी को देखूंगा जिस पर वे बैठती थी…….या उस दरवाजे की ओर देखूंगा जहां वे हमारे लिए तरह तरह की चाय……खाना बनाती थीं……कुछ न कुछ बुदबुदाती सी। तब मैं उनके पास जा आहिस्ता से कहता था, ज्योत्स्नाजी, अब बस भी कीजिए। चलिए ना…देखिये बैठक में सब आपका इन्तजार कर रहे हैं।
       पर मैं ये क्या लिख रहा हूँ ?
       जबकि उनकी किताबें मेरे सामने रखी हैं। उन दरवाजों की तरह जिन पर हाथ रखते ही वे खुल जाते हैं। पर आज मैं जब लिखने बैठातो सब दिन भर का खुद में बतियाना किस तरह हवा हो गया…! कहाँ गया वो दिन भर का बातूनी शख्स ?
       श्मशान में……..
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       ज्योत्स्नाजी आप तो बीकानेर आ रहीं थीं इस साल।
       पर अब तो भोपाल भी हमारे लिए भोपाल नहीं रहा।
       आदमी के साथ चीजें…..जगहें भी चली जाती हैं।
       यहाँ…..!
       सॉरी ज्योत्स्नाजी, आप मेरे हर काम से सन्तुष्ट, प्रसन्न रहीं, पर मेरा ये इस वक्त का लिखा आप न ही पढें। इसमें मेरा मरण है। भाषा, शब्द…….सब अभी पराए हैं। एक लेखक का इस तरह…………खाली हाथ रह जाना…..एक तरह से अच्छा ही है।
      कम से कम कुछ पल वह सच में किसी के साथ मर तो सकता है।
       वे मेरे और आपके लंबे-लंबे पत्र…..ढेरों-ढेर।
       और ये …….ओह मेरे कंधे पर किस का हाथ…!
       आप….?
        ‘ये क्या लिख रहे हो ? रहने दो……….रात बहुत हो गयी है…….सो जाओ………मुझे भी सोना है ।
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       उस तरफ आप। इस तरफ मैं।

2 COMMENTS

  1. हिंदी साहित्य की अपूरणीय छति….अनिरुद्ध जी ,सुन्दर रचना के लिए धन्यवाद….

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