यह उपन्यास हर उस व्यक्ति के लिए है जिसने कभी प्यार की चाह की हो

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अंग्रेजी लेखिका मीनाक्षी ठाकुर का उपन्यास ‘लवर्स लाइक यु एंड आई’ प्रेम पत्रों के संग्रह की तरह है जिसे आप पलटने लगें और और पुराने दिनों की हूक आपके अंदर उठने लगे. उनका एक छोटा सा इंटरव्यू ‘ओपन रोड रिव्यू’ में आया है जिसे कुलप्रीत यादव ने लिया है. इस इंटरव्यू को हिंदी में लाना इसलिए भी जरूरी लगा क्योंकि इसमें हिंदी साहित्य, हिंदी के समकालीन लेखकों के बारे में काफी कुछ है. अंग्रेजी का कौन लेखक हिंदी लेखकों के बारे में बात करता है. उनके अपने उपन्यास के साथ साथ अनेक किताबों को लेकर कई तरह की जानकारियों से भरपूर बातचीत- प्रभात रंजन 
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कुलप्रीत यादव: क्या ‘लवर्स लाइक यु एंड आई’ ऐसी सामान्य प्रेम कहानी है जिससे आम पाठक खुद को जोड़ सकें?

मीनाक्षी ठाकुर: यह एक ऐसा उपन्यास है जो हर उस आदमी के लिए है जिसने कभी भी प्रेम की चाह की हो; हम सब जीवन में कभी न कभी या हर वक्त प्यार की चाह करते हैं. इस पत्र में हर उस आदमी के लिए एक पत्र है जो इसकी प्रति प्राप्त करेगा. उपन्यास की कहानी एक ऐसे काल में अवस्थित है जो अभी हाल में ही गुजरा है, इसलिए इसका लक्ष्य उस नौस्टेलजिया को जगाना भी जब लोग अधिक अर्थपूर्ण तरीके से संवाद करते थे. यह जीवन और प्रेम के एक ख़ास तरीके का आनंद मनाने जैसा भी है. नहीं, अपनी संरचना और गद्य में यह कोई सामान्य कहानी नहीं है, लेकिन यह किसी भी तरह से एक जटिल उपन्यास नहीं है; यह हर उस आदमी के लिए है जो कुछ कवित्वमयी और रोमांटिक पढना चाहते हैं.  

कुलप्रीत यादव: किताब में काफी उर्दू और हिंदी कविता है. क्या आपको ऐसा लगता है कि भारतीय पाठक स्थानीय भाषाओं में भावनात्मक रूप से गहरे तौर पर जुड़ सकते हैं, चाहे उन्होंने औपचारिक तौर पर उसकी पढ़ाई न भी की हो?  

मीनाक्षी ठाकुर हम सभी, अगर बहुभाषी नहीं तो द्विभाषी हैं. संवेदनात्मकता वह चीज है जिसे हमसे कोई भी नहीं छीन सकता है. हालाँकि हम इन दिनों हिंदी या बांगला या उर्दू में अधिक नहीं लिखते, लेकिन संगीत है और टेलिविजन है या सामाजिक मौकों पर हम हिंदी में बातचीत करते हैं; यह कुछ ऐसा है जो अनजाने में भी हमारे साथ है. हमारी भाषाएँ भावना के स्तर पर स्वाभाविक तौर पर काफी ऊंची हैं, उनकी बुनावट कुछ इस तरह की है. और यह सच है कि कम से अकाम मेरी पीढ़ी तक के लोगों से वह सीधा और तत्काल रिश्ता कायम करने में पूरी तरह से समर्थ रही हैं. 
कुलप्रीत यादव: जब टिबोर जोन्स लिटररी एजेंसी ने पुरस्कार के लिए आपको चुना तो इससे आपके इस विश्वास को कितना बल मिला कि आप लिख सकती हैं. क्या इससे इस बात में कोई फर्क पड़ा कि जिस तरह से प्रकाशक आपकी रचनात्मकता को देखते थे?  

मीनाक्षी ठाकुर: मैंने पुरस्कार के लिए अपनी पाण्डुलिपि को यूँ ही जमा किया था. मुझे कोई उम्मीद नहीं थी. लेकिन जब मुझे उसके लिए शॉर्टलिस्ट किया गया तो उससे अपने काम में मेरा विश्वास फिर से बढ़ा और मैं इसके लिए शुक्रगुजार हूँ. अब प्रकाशकों का नजरिया मेरे लेखन को लेकर बदला या नहीं इसके बारे में आपको कार्तिका से सवाल पूछना चाहिए. मैं केवल यही कह सकती हूँ कि मैंने चूँकि उसके साथ बरसों काम किया है, इसलिए उससे फीडबैक लेना मेरे लिए सरल था, जिससे मैंने उपन्यास के पहले ड्राफ्ट से दूसरे ड्राफ्ट तक काम किया. 
कुलप्रीत यादव: ऐसे भारतीय लेखकों में जिन्होंने विदेश में पढ़ाई नहीं की है, और जिनकी उम्र 50 साल से अधिक नहीं है, उनमें आपके पसंदीदा कौन हैं?  

मीनाक्षी ठाकुर: आपका मतलब इंग्लिश में लिखने से है?साथ जब तक कि आप अच्छा लिखते होते हैं, कौन इसकी परवाह करता है कि कौन 50 साल का है कौन नहीं. मुझे अल्ताफ टायरवाला की किताबें पसंद हैं, अनुजा चौहान, अनीता नायर, पंकज मिश्रा, अनोश ईरानी, ऐनी जैदी… अनीस सलीम, वी. संजय कुमार, जैनिस पैरीयट…
मैं हिंदी खूब पढ़ती हूँ. गीतांजलि श्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ, कुणाल सिंह, अजय नावरिया, प्रत्यक्षा… ये लोग इतना अच्छा लिख रहे हैं.

कुलप्रीत यादव: क्यों साहित्यिक कृतियाँ भारत में बेस्टसेलर कभी-कभार ही बन पाती हैं?

मीनाक्षी ठाकुर: अगर हम यह चाहते हैं कि उनकी बिक्री हो तो हमें उन्हें साहित्यिक कृति कहना बंद करने की जरुरत है. वह सिर्फ उपन्यास होता है. शायद प्रकाशक के तौर पर हमें अलग-अलग रुख लेना पड़ता है, नहीं? शायद इस तरह के वर्गीकरण के कारण ही नुक्सान हो रहा है. एक बार फिर सोचें, तो हमारे देश में पढने की संस्कृति खतरे में है. यहाँ तक भषाओं में भी, अगर मलयालम को छोड़ दें, तो अधिक लोग न तो किताब खरीद रहे हैं न पढ़ रहे हैं. पहले के जमाने में हमने जिन किताबों को पढ़ा उसने हमें बनाया, हम आज जो हैं वह बनाया; अब हालात थोडा बदल गए हैं; अब ट्विटर पर चलने वाली लड़ाइयाँ बताई हैं कि हम कौन हैं और हम क्या बनते हैं. इंग्लिश में, हमारा मानना है कि पाठक बढ़ रहे हैं, लेकिन उस तरह से नहीं जिस तरह से हम चाहते हैं. हमें पढने के लिए प्रेरित करने की जरुरत है, उसे सेक्सी बनाने की जरुरत है.   
कुलप्रीत यादव: क्या आप अपनी किताब को 5 शब्दों में बता सकती हैं?

मीनाक्षी ठाकुर: प्रेमियों के लिए एक लम्बी कविता.  

कुलप्रीत यादव: जीबन और सलिल में आदर्श प्रेमी कौन है?  

मीनाक्षी ठाकुर कोई नहीं. जीबन और सलिल दिन को दो हिस्सों की तरह हैं; अगर आप दोनों को जोड़ें तो पैकेज पूरा हो जाता है. लेकिन लोग पैकेज नहीं होते हैं. ‘आदर्श’ कुछ ऐसा है जिसके पीछे हम भागते रहते हैं. यह समय को काटने का एक तरीका भर है, नहीं तो समय हमको मार देगा.  
कुलप्रीत यादवआपने पिछले दो सालों में जो बेहतरीन किताबें पढ़ी हों. जिन किताबों ने आपको बेहद प्रभावित किया हो, आपको रूपांतरित कर दिया हो, कुछ देर ठहर कर आपको उन बातों के ऊपर सोचने के लिए विवश कर दिया हो जो आपको बेहद प्रिय हों.  

मीनाक्षी ठाकुर: ‘द सेन्स ऑफ़ इंडिंग’ की कथा शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया, कथा के स्तर और अप्रत्याशित अंत ने. ‘ज़ू टाइम’ बहुत व्यंग्यात्मक है, गहरा, पागलपन से भरा और अनिष्टकारी. मुझे होवार्ड जैकोबसन की बुद्धिमत्ता ने बहुत प्रभावित किया. योको ओगावा के ‘द प्रोफ़ेसर और ‘द हाउसकीपर’ ने मुझे गहरे प्रभावित किया. मैं जापानी लेखकों को लेकर वैसे भी थोडा पूर्वग्रह से भरी हूँ. अतीक रहमानी की ‘अर्थ एंड ऐशेज’. इसकी कहानी अफगान के पहाड़ों में अवस्थित है, यह एकदम अलग तरह की कथा है उस दौर की है जब अफगानिस्तान में रुसी अतिक्रमण हुआ था, यह उस दौरान परिवार और युद्ध की कथा कहती है, यह बहुत जबर्दस्त कहानी है जो क्रोध, दुश्मनी, जरूरतें और प्यार को लेकर आपके विचार को पूरी तरह से रूपान्तरित कर देती है. गीतांजलि श्री का हिंदी उपन्यास खाली जगह, जो एक यूनिवर्सिटी कैफे में हुए बम विस्फोट को लेकर है. यह हिंदी में पिछले दस सालों में लिखी गई सबसे जबर्दस्त किताबों में एक है. मैंने हार्पर कॉलिन्स से इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया था. कैटालन लेखक मेर्स रोदोरेदा की ‘द टाइम ऑफ़ डव्स’. यह के बहुत अलग तरह की खूबसूरती लिए है. सरमागो का ‘द डबल’. लेकिन सारामागो हमेशा से अतुलनीय रहे हैं! इटैलियन लेखक फ्रेंसेसका मर्सियानो का ‘रूल्स ऑफ़ वाइल्ड’. 

http://www.openroadreview.in से साभार 

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