जोहरा सहगल का जीवन ही कला था

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102 की उम्र में ज़ोहरा सहगल ने इस दुनिया के रंगमंच को अलविदा कहा. 2 साल पहले उनकी बेटी किरण सहगल ने उनकी जीवनी लिखी थी- ‘Zohra segal: ‘Fatty’. जानकी पुल की ओर से उस महान कलाकार को अंतिम प्रणाम करते हुए उसी किताब के एक छोटे से अंश का अनुवाद हिंदी में- मॉडरेटर.
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नानी और नाना के सात बच्चे थे और अम्मी का नंबर तीसरा था. उनसे बड़ा एक भाई, एक बहन, एक छोटा भाई और तीन छोटी बहनें थीं. सातों में उनका छोटा भाई इकरामुल्लाह उनका पसंदीदा था, वह उसको बेहद प्यार करती थीं. जब वह पांच साल की थीं उनके मामू ने उनको गोद ले लिया और उनको अपने घर लखनऊ ले गए. इकराम को उनकी कमी बेहद खलती थी और उनके लिए हर रोज एक-एक करके मिठाइयाँ बचाया करता और जब कनस्तर भर गया तो उसने सारी खुद खा लीं! अम्मी को यह बहुत मजेदार लगता है! वे मुंबई में भारतीय नौसेना में कमोडोर थे और विभाजन के बाद कराची चले गए. उनके बड़े भाई ज़काउल्ला इंजीनियर थे जिन्होंने कोलकाता में ज़कारिया पुल को बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभाई, जहां भारत सरकार ने उनको तैनात कर रखा था. बाद में वे भी कराची चले गए और वहां कराची पोर्ट ट्रस्ट के चीफ इंजीनियर रहे. उनकी सबसे बड़ी बहन हाजरा बेगम पक्की कम्युनिस्ट, स्वाधीनता सेनानी और भारतीय राष्ट्रीय महिला संघ की संस्थापिका थीं.

अम्मी और उनकी छोटी बहन उजरा कभी पकिस्तान जाना नहीं चाहती थीं! असल में, अम्मी को इस बात से बड़ा सदमा पहुंचा जब उनके दोनों भाइयों और दो छोटी बहनों में पाकिस्तान जाने के बारे में तय किया! उनको इस बात से भी बड़ी हैरत हुई जब उनके कुछ ऐसे रिश्तेदारों ने भी पाकिस्तान की राह चुनी जो हिन्दुस्तान में पले-बढ़े थे, जिनके अजीज दोस्त इसी देश में थे. जब पाकिस्तान बना तो उनको लगता था कि सारे मुल्ला-मौलवी वहां जाकर बसेंगे- इसके बारे में तो उन्होंने शायद ही सोचा हो कि उनकी दो छोटी बहनें, अमीना(शांतिनिकेतन की पूर्व-छात्र एवं लीड्स, इंग्लैंड से शिक्षा में डबल एम.ए.) और सबरा(जिन्होंने लंदन से शारीरिक शिक्षा की पढ़ाई की थी), और उनके दो भाई वहां चले जायेंगे, खासकर तब जब उनका लालन-पालन धर्मनिरपेक्ष माहौल में हुआ था और उनके कई करीबी दोस्त हिंदुओं में थे. उनको लगा शायद इसलिए कि नए देश में नए-नए मौके मिलेंगे. उनके पिता भी पाकिस्तान नहीं गए और बीस साल बाद तब गए जब उनकी प्यारी बेटी अपने शौहर के साथ चली गई.

असल में उजरा के पाकिस्तान चले जाने से उनको बेहद तकलीफ हुई और हालाँकि दोनों जब लड़कियां थीं तो उदय शंकर के डांस ग्रुप में साथ-साथ थीं, लेकिन दोनों तब बहुत करीब हुईं जब अक्टूबर 1945 में में अम्मी पृथ्वी थियेटर में शामिल हो गईं. 1936 से 1938 के दौरान दोनों में खास नजदीकी नहीं हुई जबकि वे साथ-साथ उदय शंकर के ग्रुप के साथ यात्राएं किया करती थीं. अम्मी चूंकि बड़ी थीं इसलिए खाला के ऊपर धौंस जमाया करती थीं. उन यात्राओं के दौरान समय की पाबन्दी का बहुत महत्व था क्योंकि समय पर ट्रेन, बस और जहाज पकड़ने होते थे. मेरी माँ अपनी अलार्म घड़ी को पांच मिनट आगे रखती(जो आज भी रखती हैं). अब दोनों बहनें एक ही कमरे में रहती थीं तो अम्मी तैयार हो जातीं और उजरा खान(मौसी) को समय पर तैयार न होने के लिए दांट पिलाने लगतीं. उजरा खान इससे चिढ़ जातीं, लेकिन अमेरिका में तटीय नगरों की यात्राओं के दौरान आधे सफर में उनको अम्मी के अलार्म घड़ी के पांच मिनट आगे होने का राज पता चल गया और उसके बाद वे भी समय पर तैयार होने लगीं.

उदय शंकर के डांस ग्रुप में अम्मी को काफी अहम भूमिका दी गई थी, उदय शंकर के साथ; उनकी छोटी बहन माधवन नायर और ‘रोबू’(रवि शंकर) के साथ भाग लेती थी. अम्मी हँसते हुए याद करती हैं कि किस तरह जब अख़बारों में कुछ आता तो वह उजरा से हमेशा कहती, ‘देखो-देखो मेरे बारे में कुछ निकला है?’ वह इस बात को स्वीकार करती हैं कि वह बेहद जोश-खरोश से भरी रहती थी, जिसके जवाब में मैंने कहा, “आप तो आज भी वैसी ही हैं!’ पृथ्वी थियेटर के दिनों में वह ओपरा हाउस के मेकअप रूम का एक कोना ले लेतीं और किसी कि मजाल थी जो उनका एक सामान भी छू लेता, मेरी मौसी उजरा भी नहीं, जो असल में पृथ्वीराज कपूर(जिनको वह पापाजी बुलाती) के नाटकों में अक्सर मुख्य भूमिका में होती थीं. ‘जोहरा दी’, वे थियेटर में इसी नाम से जानी जाती थीं, उदय शंकर से मिले प्रशिक्षण के कारण अपने मेकअप बॉक्स, कपड़ों, गहनों का काफी ध्यान रखती थीं. इसके बावजूद कि अम्मी की हैसियत ऊंची थी, उनका स्वभाव भी धौंस जमाने वाला था, लेकिन अम्मी को लगता है कि लोग उजरा को अधिक याद करते क्योंकि वह बेहद सुन्दर थीं. इसके कारण अम्मी में मौसी को लेकर हीन भावना विकसित हो गई थी और सुन्दर दिखने तथा लोगों का ध्यान खींचने के लिए उनको खासी मेहनत करनी पड़ती. मुझे जाती तौर पर लगता है कि मेरी मौसी का स्वभाव अधिक घुलने-मिलने वाला था. मेरी माँ को एक टिप्पणी आज तक याद है. अमेरिका में एक प्रदर्शन के बाद कोई आदमी स्टेज के पीछे आया और उसने ‘मिस मुमताज’ के बारे में पूछा. ड्रेसिंग रूम के बाहर खड़े दरबान ने पूछा, ‘कौन-सी, जिसकी आँखे बड़ी हैं वह या जिसके नितंब बड़े हैं वह?’

1936 में उदय शंकर की मंडली ने इंग्लैंड के डारटिन्गटन हॉल में दो अन्य प्रसिद्ध मंडलियों- कुर्त जोसे बैले एवं मिशेल चेखव प्रशिक्षण केंद्र, जिसे बार्न थियेटर के नाम से जाना जाता था, के साथ प्रदर्शन किया. मिशेल चेखव को ‘मिशा’ के नाम से जाना जाता था, उनकी पत्नी बेहद खूबसूरत थीं लेकिन वे उजरा खान को अपने पास ही बिठाते और टूटी-फूटी अंग्रेजी में कहते, ‘मैं खुद को रोक नहीं पाता, इसको देखकर मुझे कुछ-कुछ होने लगता है!’ इंग्लैंड में उदयशंकर की मंडली के साथ यात्रा करते हुए बीबीसी ने उदय शंकर से एक नए टीवी कार्यक्रम में अपनी मंडली के साथ शामिल होने का आग्रह किया. वह शो लंदन के अलेक्जेन्द्रिया पैलेस में हुआ और अम्मी को याद है कि किस तरह से उनको अजीब सा मेकअप करने के लिए कहा गया- चेहरे पर हलका हरा तथा होंठों पर बैंगनी रंग! जिस जगह प्रदर्शन होना था वह बमुश्किल तीन गुना चार फीट की जगह थी. वहां उन्होंने दो प्रस्तुतियाँ दी- एक उदय शंकर का सोलो और दूसरे में सिम्की, जोहरा और उजरा ने प्रस्तुति दी. उसी साल राजकुमार एडवर्ड ने ब्रिटेन की राजगद्दी छोड़ दी थी.

और हालाँकि अम्मी उदय शंकर की मंडली में पहले शामिल हुई और खाला बाद में उस मंडली का हिस्सा बनी; लेकिन पृथ्वी थियेटर में शामिल होने के मामले में इसके ठीक उलट हुआ.     
दो बहनें
मेरे अम्मी-अब्बा, जिनका लाहौर के एम्प्रेस रोड पर अपना डांस स्कूल था, जोरेश डांस इंस्टीट्यूट, को अपना पेशा चलाये रखना मुश्किल लगने लगा क्योंकि भारत का विभाजन हो गया और वे दोनों हिंदू-मुसलमान पति-पत्नी थे! खाला ने उदय शंकर के अल्मोड़ा केंद्र को छोड़ दिया था और अभिनेता-लेखक हमीद बट्ट से शादी कर के मुंबई में रहने लगी थीं. पृथ्वीराज थियेटर की वह मुख्य अदाकारा बन गई, जिसमें वह 1944 में शामिल हुईं. उन्होंने लाहौर में मेरे अम्मी-अब्बा को खत लिखकर कहा कि उनको मुंबई में आकर फिल्मों में भाग्य आजमाना चाहिए. चूंकि मेरे पिता एक फिल्म में आर्ट डाइरेक्टर थे जिसमें सुरैया ने अभिनय किया था तथा जोरेश डांस इंस्टीट्यूट को भी बंद करने की तैयारी में थे, इसलिए वे लाहौर में ही रुक गए और वे अम्मी के पास मुंबई बाद में आये. मेरे अम्मी-अब्बा मौसी मौसा के साथ 41, पाली हिल के उनके छोटे-से फ़्लैट में रहने लगे, जिसे वे चेतन आनंद और उनकी पत्नी उमा, देव और विजय आनंद के साथ साझा करते थे. अम्मी आज भी याद करती हैं कि देव अंकल(हम लोग बचपन में उनको इसी नाम से पुकारा करते) आईने के सामने खड़े होकर बालों में कंघी करते हुए उनसे पूछते, ‘दीदी, क्या आपको लगता है कि वे मुझे हीरो रख लेंगे?’ माँ को चेतन अंकल और उमा आंटी की उदारता भी याद है कि उन्होंने उनको अपने फ़्लैट को साझा करने की इजाजत दी थी.

कुछ समय बाद मेरे मौसी-मौसा मरीन ड्राइव, चर्च गेट पर सूना महल में रहने चले गए, और जैसे ही नीचे के दो तल्ले खाली हुए मेरे माता-पिता और मैं नीचे रहने चले गए. शुरूआती दौर में अम्मी को फिल्म में रोल मिला जिसमें निर्देशक यह चाहता था कि वे स्विमिंग सूट पहनकर गुलाब के फूलों के बीच से निकलती हुई दिखें. जिस तरह की उनकी पृष्ठभूमि थी, प्रशिक्षण था, वे इस प्रस्ताव से घबड़ा गईं. जाहिर है, उन्होंने मना कर दिया, लेकिन मेरे अब्बा फिल्मों में आर्ट डायरेक्शन का काम करते रहे. मेरी मौसी तब पृथ्वी थियेटर में थी, अम्मी को अपने साथ रिहर्सल और शो के दौरान ले जाती. पहला नाटक उन्होंने देखा शकुंतला, और उससे वे खास प्रभावित नहीं हुईं. लेकिन जब उन्होंने दीवार देखी तो उनको बहुत अच्छा लगा और वे थियेटर में पहले बतौर डांस डायरेक्टर शामिल हुईं फिर अभिनय भी करने लगी. उसके बाद दोनों बहनों ने चौदह साल साथ-साथ काम किया.

भावनात्मक और आर्थिक तौर पर मेरी मौसी अम्मी के लिए बहुत बड़ा सहारा थीं. उनकी माली हालत मेरे माता-पिता से बेहतर थी क्योंकि वह पृथ्वी थियेटर की मुख्य अदाकारा थीं, और मेरे मौसा, जिनके पास नियमित तौर पर कोई काम नहीं था, लेकिन फिल्म लिखकर और जुआ खेलकर वे खूब पैसे कमाते थे! चूंकि उनके कोई बच्चे नहीं थे मेरी मौसी मुझे खूब लाड़-प्यार देती. हम जो भी मांगते वह न नहीं कहतीं. एक दफा उन्होंने मेरी माँ के सामने इस बात को स्वीकार किया कि मेरे छोटे भाई पवन को वह इस कदर प्यार करने लगी थी कि वह उसको गोद लेने के बारे में सोचने लगी थीं, लेकिन बाद में उन्होंने इस ख़याल को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि यह बहुत तकलीफदेह होता. मेरे पिता भी उनको बेहद चाहते थे. जब मेरे पिता की मौत हुई तो मेरी मौसी ने ही हम तीनों को मरीन ड्राइव के अपने घर में रखा.

वे जब भी ‘पापाजी’ (पृथ्वीराज कपूर) के यहां पार्टियों में जाते, तो वहां औरतें उनकी मुख्य अदाकारा यानी खाला के बारे में पूछतीं और अम्मी उनको उनके बारे में सब कुछ बता दिया करतीं. फिर वे अम्मी से पूछती कि वे कौन हैं; अम्मी जवाब देतीं कि बहन और वे पीछे घूमते हुए पूछती, ‘सगी!’ अब वह बताती हैं कि इस टिप्पणी के लिए वह उन औरतों को थप्पड़ मार सकती थीं. अजीब बात यह है कि वे दोनों अपनी जवानी के दिनों में काफी अलग दिखती थीं और अब खाला को कई दफा लोग गलती से अम्मी ही समझ लेते हैं.

एक दशक के बाद दोनों बहनों का मिलन हुआ ‘एक थी नानी’ नाटक के दौरान, जिसमें दोनों ने तैंतीस साल बाद एक साथ काम किया. नाटक को लिखा था पाकिस्तानी नाटककार शाहिद नदीम ने. उन्होंने अजोका थियेटर के साथ इस नाटक को भारत, पकिस्तान और लंदन में प्रस्तुत किया. इस नाटक की कहानी दो बहनों के जीवन से प्रेरित थी जिनको सरहद के दोनों तरह के लोग खूब पसंद करते थे. दोनों के लिए यह एक तरह से नाटकों, डांस मंडली के शुरूआती दिनों को फिर से जीने के समान था. 

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