लड़की, लड़का, डेट… और घंटे भर का मार्क्सवाद!

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हाल के वर्षों में हिंदी में कहानियों की एक शैली नीलेश मिश्र के लोकप्रिय रेडियो प्रोग्राम के लिए लिखने वालों ने भी विकसित की है. ऐसे ही एक लेखक क्षितिज रॉय की कहानियां हाल में पढ़ी. वे वे दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के विद्यार्थी हैं, छोटी छोटी कहानियां लिखते हैं. एक कहानी फिलहाल साझा कर रहा हूँ. पढ़कर राय दीजियेगा- मॉडरेटर 
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लड़के की ख़ुशी की कोई इन्तहा ना रही जब पांच दिनों की धांसू मान मन्नावल और EMOTIONAL अत्याचार के बाद लड़की उसके साथ डेट पर जाने के लिए राजी हुई! वैसे भी दिल्ली की उस सर्द सुबह में आकाश में चमचमाता सूरज दिल को रोमांटिक रोमांटिक करने के लिए काफी था. उफनते जज्बात और बहकते खयालातों के बीच मिलने की जगह तय हुई…पीवीआर साकेत..चमकती बदलती हुई दिल्ली में लड़के को अपने प्यार को थोडा URBAN URBAN टाइप का लुक देना था.. WAKE UP SID टाइप वाले रणबीर कपूर के माफिक CONVERSE के जूतों में सज के उसे फील गुड करना था.इसीलिए पीवीआर साकेत….!! लड़की बड़ी थी उससे… और MATURED भी…नयी नयी नौकरी लगी थी उसकी..!


पिछले पांच दिनों से काफी वर्क लोड था लड़की को..लड़का खफा खफा सा था उससे.. QUALITY टाइम जो नहीं मिला था उसको! नतीजतन पिछले पांच दिनों में उसे एहसास होने लगा था की जीवन सिर्फ प्यार व्यार तक ही सीमित नहीं है.. और दुनिया का सिस्टम उसकी सोच से ज्यादा COMPLICATED है..उसे एहसास होने लगा था की प्यार मुह्हबत भी एक टाइप का STATUS SYMBOL है..और भावनाओं में बहते हुए आदमी को देख दुनिया उसी तरह खिलखिलाती है जैसे कभी वह टॉम को जेरी के पीछे भागता देख..!

अब कल रात की ही बात ले लो जब वह ऑटो में सर झुकाए हुए उस लड़की को याद करके अपने आंसू बहा रहा था,…ऑटो वाले भैया ने पैसे देते वक़्त उसे ऐसी नजरूं से देखा था मानों कह रहे हो..एक और इश्क में कुर्बान टाइप का लौंडा माँ बाप की गाढ़ी कमाई दिल्ली आ के फूंक रहा है, साले सब के सब दिल्ली आ के पढने में उस्ताद हो न या हों आशिकी में राज कपूर बन ही जाते हैं‘!

लड़के ने पिछली पांच रातों में पांच पैक WILLS फूंक डाली थी, सिर्फ इसलिए की उसे लगता चूका था की GLOBALISATION के इस दौर में प्यार भी RECESSION की चपेट में आ चूका है..और उसका गुस्सा सिर्फ उसकी माशूका के प्रति नहीं था बल्कि उस बैंक के लिए भी था जहाँ वो काम करती थी, जिसने उसके QUALITY टाइम भरे बाजार में कतल किया था,SALES और सरविस की इस अंधी आपाधापी में उसके छायावादी प्यार का मार्केट के यथार्थवाद ने गला घोंट कर रख दिया था. बेचारा किसको समझाता, उस लड़की को जो हज़ार मील दूर से अपना घर बार छोड़ कर सिर्फ इसी जॉब को करने आई थी, जिसके घर में उसे इस MULTINATIONAL BANK में PLACED होने की ख़ुशी में चार दिन तक मिठाई बाटी गयी थी, किसको समझाता कि उसके व्यक्तिगत संबंधों का गला घोंटा गया था! जनता पागल ही समझती उसको अगर अपने रहस्यवाद का रहस्योदघाटन करता वो! 

वो लड़का अपनी जान के इठला कर हमें तंग ना करोकहने के अंदाज़ पे फिदा था.. आप सब ने अगर आशिकी की होगी(टाइम पास से एक लेवल ऊपर वाली) तो आप इस फ़िदा होने कि इंटेंसिटी को भली भांति पहचान सकते होंगे…अमां गलत क्या है इसमें हर कोई फ़िदा होता है..भले ही फ़िदा होने की वजह भारत के विभिन्न प्रान्तों के LITERACY लेवेल्स की तरह विविध हो सकती है, पर फ़िदा होने की प्रोबब्लिटी उतनी ही है जितनी इंडिया के किसी भी कोने में एक CORRUPT बाबुसाहब को पाने की है!! हाँ..तो लड़के के दिल में गुदगुदी सी हो उठती थी जब लड़की उससे इस ठेट बिहारी अंदाज़ में बतियाती थी..पर बेडा गर्क हो इस दिल्ली की YO DUDE वाली MULTINATIONAL संस्कृति का, कि JUNCTION पर उतारते के साथ ही यह हमकब मैं में बदल गया लड़के को इसकी हवा तक नहीं लगी. फ़ोन पर बात ख़तम करते वक़्त रखते हैंकब ‘SEE YA..TAKE CARE BBYE” में बदल गया और कब लड़की का BABESIFICATION हो गया पता भी ना चला..!!

हमारा लड़का कुछ विचारशील मिजाज़ का था, ग़ालिब, जैनेन्द्र,दुष्यंत, रेनू, दांते, फैज़, जैसे फरिश्तों से रु-ब-रु हो चूका था, और विचारशील होना बाज़ार का REQUIREMENT अब नहीं रह चूका है, इस बात को मान लेना हमारे INTELLECTUAL बंधुओं के लिए थोडा मुश्किल जरूर हो सकता है पर गुडगाँव कि बहुमंजिली इमारतों में जहाँ NSE, SENSEX, और DOW JONES जैसे अल्फाज़ बेतरह गुंजतें हैं, लंच ब्रेक में एक आध लोग चेतन भगत को याद कर लेते हैं यही बहुत है, रही बात ग़ालिब कि तो बेचारे गुलज़ार साहेब की बीडी के धुंए में ढकें से ग़ालिब को अब गुमनामी की जिंदगी बसर करनी पड़ती है!

बेचारी लड़की पक जाती थी जब वो लड़का उसे ग़ालिब क़ी लम्बी लम्बी शायरी SMS किया करता था..पूरी शायरी पढ़ के भी SUMMARY समझ नहीं पाती थी बेचारी, और बेचारी पढ़ती भी क्या, उर्दू भी ऐसी थी क़ी कहर ढा के ही छोडे! 

इधर लड़का बेचारा अपनी ग़ालिब और दिनकर वाली दुनिया में अपनी उर्वशी का पान करने का दिवा स्वप्न देखता तो उधर लड़की SAVING ACCOUNTS के खतों में अपना सर खपाती!

इन पांच दिनों में लड़के को एहसास हो गया था क़ी वो परफेक्ट MISMATCH का शिकार हो चूका था,कि प्यार मुहब्बत भी ARCHIES, और VODAFONE के बदलते CALL रेट्स के इशारों पर नाचने वाली बसंती का नाम है!!


फूंकते फूंकते उसे लगा कि उसके दर्द का ज़िम्मेदार मनमोहन सिंह जी हैं, न वो होते और ना बाज़ार यों सुलगता और ना ही प्यार छायावादियों के पाले से भाग पूंजीवादियों के इशारों पर दौड़ता! प्रेम अब तक उसके लिए सामीप्य जनित भावनात्मक उपद्रव था, पर उन पांच दिनों ने उसे सिखाया था कि इस SHINING INDIA में प्यार MC DONALDS के बर्गर के WRAPPER में ढँक कर आता है! रात को २.३० बजे उसने इस नयी आर्थिक नीति कि जम कर माँ-बहिन की! रूम मेट बेचारा यही पूछते पूछते परेशां हो गया कि भाई बता तो गलिया किसको रहा है तू?’ आधे घंटे भारत भर की माँ बहिन की गालियों के धारा प्रवाह संबोधन के बाद लड़का ने अपने रूम मेट से पूछाभाई, तुझे इस मार्केट पर गुस्सा नहीं आता क्या, खुश कैसे है तू अपनी वाली के साथ, तब जबकि प्यार मुहब्बत के मायने ही बदल कर रख दिया है इन सालों ने, ‘THESE BLOODY CAPITALISTS’! उसका रूम मेट पल भर के लिए उसे देखता ही रह गया, फिर डर गया बेचारा,’बोला भाई तू गुस्से में पागल क्यूँ होता है, सुबह तक भाभी मन जाएंगी,chill यार‘!

लड़का हंसने लगा, आधे घंटे बाद पता नहीं कहाँ से सुधीर मिश्रा की हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीउठा कर ले आया, फिर फूंकते फूंकते पूरी पिक्चर देख डाली, और सुबह हुई तो लड़का खुद को मार्क्सवादी टाइप का फील करने लगा! उसे लगने लगा की प्रेम एक निहायती संकुचित अवधारणा है जो कमज़ोर दिल वाले करते हैं, उसे लगा की संवेदनशील होना जैसे एक गुनाह है, और फलां फलां ऐसे कितने खतरनाक टाइप के ख्याल उसके दिमाग में आने लगे!

लड़के के कॉलेज में ,मार्क्सिस्ट होना fashionable किस्म की hobby थी,..लम्बा कुरता पहनने का, लम्बे बाल-बढ़ी दाढ़ी रखने का, कैंटीन में cigarette जलाने का लाइसेंस भर था मार्क्सवाद, उस लड़के के लिए! कभी कभी उसे मार्क्सवादी बनने का मन करता था,

14 COMMENTS

  1. इस तरह का लेखन एक ख़ास तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता को टारगेट करने के लिए भी किया जाता रहा है। इस कहानी का मुख्य किरदार हर उन लोगों से कोशों दूर है जो सही मायने में आर्थिक असमानता पर मनन या राजनीति करते हुए एक लंबे अनुभव के बाद कॉमरेड कहलाने के लायक बनते है। दाढ़ी, या कुरता या बिंदी से कभी कोई वाम विमर्शवादी नहीं बनता है और ना ही किसी मर्सिडीज़ कार पर चढ़ने से कोई दक्षिणपंती हो जाता है। असल में हम लोगों नें अपने संकुचित मानसिकता से एक डिजाईन या कहिये एक खाका गढ़ा है और मौके बेमौके अपनी कुंठा निकलने के लिए इस तरह के चित्रण का प्रयोग करते रहते हैं।

    जो लोग इन किरदारों के समान्तर होते भी होंगे, उनको किसी ख़ास विचारधारा से ब्रांड करने का मतलब है की आप पूरी तरह से संवेदनहीन होकर खांटी लोगों की विश्वश्नियता पर सवाल उठाने लगते हैं । इस सतही विवेचना को कई दफा हम हास्य विनोद में जायज़ भी ठहरा देते हैं। दूसरी बात ये भी है की कोई २ दिन आर एस एस की शाखा करने से संघी नहीं हो जाता और उसी तरह दाढ़ी या मार्केट इकॉनमी को कोसने से कोई मार्क्सवादी नहीं हो जाता।

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